राजनीति में अपने-अपने अंदाज का दौर शुरू हो चुका है जैसा कि हम सभी को पता है आज तीसरे दौर का मतदान देश के १५ राज्यों में चल रहा है. कहीं मतदान की रफ्तार सुस्त तो कहीं सरपट दौड़ रही है पर इनके बीच कयासों का दौर भी खूब चल रहा है कि फला दौर में फला की इतनी सीटें आयी फला ने बढ़त बनाई वगैरह-वगैरह। परन्तु इन सब के बीच जनता की कोई नहीं सुन पा रहा है कि जमीन पर निचले पायदान का आदमी जो चमक-दमक और गोदी मीडिया की पहुंच से दूर गांव में वो क्या चाहता है वो किसे जिताना चाहता है. मै २ अप्रैल को ट्रैन से रायबरेली, फैजाबाद होते हुए अपने गृह नगर जौनपुर गया था वहां से वाराणसी जाने का भी अवसर मिला तो लोगों से रास्ते में बात करने पर एक बात का तो चला कि जनता के बीच में मोदी और भाजपा के लिए २०१४ वाली बात नहीं है. जनता सपा और बसपा के गठबंधन के बाद दो खेमों में अंदर-अंदर बट चुकी है. जमीन का हाल मीडिया द्वारा दिखाए जा रहे भ्रामक प्रचार से कहीं ज्यादा सत्ता पक्ष के लिए डराने वाला है. गांव, गरीब, किसान को इस सरकार से सबसे बड़ी नाराजगी आवारा छुट्टा पशुओं को लेकर सरकार की बेरूखी से है. मेरे अपने गांव की मैं बात करना चाह रहा हूँ जहां के अधिकतर वोटर बीजेपी को वोट करते थे वो भी इस बार इन छूटता पशुओं की वजह से नाराज चल रहे है. गांव के हीं एक गिरि परिवार जो कि त्रिलोचन महादेव के मंदिर के पुजारी है उन्होंने ३ एकड़ में गेहूं के खेती की थी और सारा गेहूं सांड चर गए और वहां मैं भी देखा तो ७-८ की संख्या में सांड और बछिया थी जो सभी फसलों का मर्दन कर के रख दिया। जब उनसे बात किया तो उनकी बैठा देखकर जी भर आया और उनसे मेरी दो दिन पहले बात हुई तो बोले की मात्र एक कुंटल गेहूं की पैदावार हुई है जो की पिछले साल २०-२२ कुंटल के आस-पास था. तो इनके जैसे करोंड़ो किसान देश के ग्रामीणांचल में बसे हुए हैं जो इन तरह की समस्याओं के साथ दिन-ब-दिन दो चार हो रहे हैं. दूसरी वजह देहात में ये है कि उत्तर-प्रदेश में योगी जी के आने के बाद अगणी और पिछणी जातियों में टकराव दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है मुजफ्फरनगर में भीम आर्मी और गाँव वालों का संघर्ष इसी का एक उदाहरण था. जो लोग कहते हैं कि इस बार चुनाव में जात-पात और धर्म का भेद-भाव भुलाकर लोग वोट कर रहे हैं तो वो या तो सनक से भरे हैं या अति-उत्साह में वो जमीन की बात को अनदेखा कर रहे हैं. महागठबंधन की वजह से पिछड़े समाज के एक खास जाति और अनुसूचित जाति का वोट एक साथ जुड़ गया है और साथ में मुस्लिमों वोटों का जगह-जगह पर गठबंधन के साथ खड़े होने से इनकी ताकत में और इजाफा कर रहा है. जमीन हालात यह है कि अगर यह चुनाव ईवीएम के छेड़-छाड़ के बिना ईमानदारी से लड़ा जाए तो बीजेपी को १५ से २५ सीटें हीं मिल सकती है और गठबंधन को आसानी से ४० से ५० सीटें हासिल होती हुई दिख रही है और बात कांग्रेस की तो वो अपने खाते में बमुश्किल ४ सीट और जोड़ सकती है. जो लोग इस हकीकत को नहीं मान रहे हैं वो २३ मई को मान जाएंगे कि उत्तर-प्रदेश में सपा-बसपा का गठबंधन बहुत अच्छा काम कर रहा है. बहरहाल एक स्वस्थ्य लोकतंत्र का ज़िंदा रहना हीं एक आम आदमी के अधिकारों का ज़िंदा होना है.
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