भारत जोड़ो यात्रा के बीच राजस्थान से कांग्रेस के लिए बहुत हीं चिंताजनक तस्वीरें सामने आए रही है. कांग्रेस आलाकमान एक तरफ गहलोत को राजस्थान का मुखिया बनाने का मन बना चुका है. तो दूसरी तरफ गहलोत गुट सचिन को किसी भी कीमत पर मुख्यमंत्री बनने से रोकने पर आमादा है. इन सब के बीच राजनितिक हलकों में एक बात बहुत तेजी से तैर रही है कि क्या अब गहलोत कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन पाएंगे ? राजस्थान में हुईं विधायकों के जमघट के पीछे आलाकमान गहलोत को जिम्मेदार मान रही है. कांग्रेस के लिए सोचने की बात ये है कि जिस गांधी परिवार पर गहलोत अटूट आस्था रखते थे. तो दो दिन में ऐसा क्या हुआ कि गहलोत ने पायलट को रोकने के लिए अपनी पूरी बेदाग़ जिंदगी को हीं दांव पर लगा दिया। कांग्रेस के इस बुरे दौर में भी गांधी परिवार के ऊपर G-23 के सस्दस्यों एवं विरोधियों ने हमला किया. तब-तब अपने आलाकमान की तरफ से मुखर होकर मोर्चा संभाला और करारा जबाब दिया.
कांग्रेस के अंदर गहलोत हीं एक ऐसे नेता थे. जिन पर गांधी परिवार अटूट विश्वास रखता था. उन्होंने हीं राजस्थान में आलाकमान को झकझोर कर रख दिया. इससे संशय होने लगा है कि अब गहलोत के ऊपर से आलाकमान का भरोसा उठ चुका है. आलाकमान के लिए इस समय दोहरी मुसीबत है. एक तरफ राजस्थान है और दूसरी तरफ गहलोत और पायलट की जगजाहिर अदावत. जिस तरह से गहलोत के समर्थन में 90 से ज्यादा विधायक एकजुट हुए और गहलोत के समर्थन का खुला ऐलान एवं पायलट की मुखालफत की. गहलोत समर्थक विधायक जुलाई 2020 में पायलट की बगावत को माफ़ करने के मूड में नहीं दिख रहे हैं. उस समय पूरे देश ने देखा था कि कैसे सचिन पायलट अपने समर्थक विधायकों के साथ 35 दिन तक मनेसर के होटल में बंद थे. उस समय पायलट ने कांग्रेस की गहलोत सरकार को बहुमत साबित करने की चुनौती दी थी. इस घटना को सरकार बचाने वाले विधायक भूल नहीं पा रहें हैं और भूलना भी नहीं चाहिए. उससे दिल्ली से भेजे गए दोनों पर्यवेक्षकों अजय माकन और मल्लिकार्जुन खड़गे को नाराज कर दिया. क्योंकि खरगे और माकन जी सोनिया जी के दूत बनकर आये थे. ऐसे में गहलोत की निष्ठा अब सशंकित हो गयी है. आलाकमान अब अपनी साख बचाने के लिए चाहे जितनी भी कठोर कार्रवाई कर ले. लेकिन इस प्रकरण से हुए नुकसान की भरपाई बड़ी कीमत राजस्थान कांग्रेस को चुकानी पड़ेगी.
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