Thursday, March 26, 2020

नोटबन्दी के बाद कोरोना से देशबन्दी, मजदूर बेहाल

कोरोना का प्रकोप दिनों-दिन महामारी का रूप लेता जा रहा है. सरकार ने २१ दिन भारत बंद का घोषणा करते हुए शायद इस बात का ध्यान सम्भवतः नहीं दिया था. वरना सरकार को ये जरूर समझ में आ गया होता कि इस फैसले से कौन-कौन से लोग कितने प्रभावित होंगे ? भारत बंदी नोट बंदी का दूसरा रूप है. मीडिया रिपोर्टों से कुछ खबरें निकलकर सामने आ रहीं हैं. जो अत्यंत हृदय विदारक है. दिल्ली में दिहाड़ीं मजदूरी करने वाले देश के अन्य भागों की तरह परेशान हैं. जो असंगठित क्षेत्र के कामगार हैं उनके सामने खुद को ज़िंदा रखने की सबसे बड़ी चुनौती साबित हो रही है. एक न्यूज़ चैनल की खबर को आधार मानकर अगर मैं बात करूँ तो आज की स्थिति नोटबंदी से भी भयावह हो गयी है. लोग दिल्ली से अपने घर के लिए पैदल हीं ठेले पर सामान लेकर निकल पड़े हैं. उनकी चिंता सरकार को  नहीं हैं या ये कहें कि सरकार अंधी हो चुकी है. वो कुछ न तो देखना चाहती है और न हीं सुनना चाहती है.
प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में एक गाँव कोइरीपुर आता है. जिसमें गाँव के मुसहर जाति के बच्चे अपने पेट को भरने के लिए घास खा रहें हैं. ऐसे निरीह लोगों तक सरकार की निति अगर नहीं पहुंची तो इसके लिए हम किसे जिम्मेदार माने ? क्या इसके लिए हम सरकार को के लोगों  दोष नहीं दे सकते ? मैं खुद गाँव में हूँ और गाँव के लोगों के मन में ब्याप्त भय आसानी से पढ़ पा रहा हूं. सरकार के इस फैसले से लोगों के मन में उहा-पोह की स्थिति में जी रहें हैं. ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को खाद्यान की चिंता सताने लगी है. गाँव में लोगों के पास साग-सब्जी की कमी होने लगी है. अगर उदाहरण स्वूपरूप मैं अपनी बात हीं रखू तो ३१ मार्च को मेरे दादा जी की तेहरवीं है. उनके तेरहवीं के लिए जरूरी सामान भी मेरे बाजार में उपलब्ध नहीं हो पा रहा है. मेरा बाजार त्रिलोचन महादेव क्षेत्र में एक जाना-माना बाजार है. ऐसी हीं ब्यथा मेरे जैसे सैकड़ों लोगों की है. कुछ तो पुलिस प्रशासन के रवैये से परेशान हो रहे हैं. जैसे कल त्रिलोचन महादेव मंदिर पर भैयालाल राजभर को पुलिस ने गाली-गुप्तार दिया और बाजार में बस स्टैंड के पास पीपल के पेड़ के निचे चार डंडा मार भी दिया। इस तरह से लोगों के मन में बहुत भी ब्याप्त है.
मुझे कहीं भी देखने या पढ़ने को नहीं मिला है कि आजादी के बाद पूरे भारत को कभी बंद किया गया हो. अगर ऐसा हुआ तो इसी मजबूत सरकार के दौर में देखने को मिला। मैं सरकार के इस बंद का समर्थन करता हूँ पर विलम्ब करने को लेकर मेरी नाराजगी भी है. राहुल गांधी ने 12 फरवरी को हीं सरकार को चेता दिया था. पर ये घमंडी सरकार उनकी बात को इग्नोर करती गयी. जिसका परिणाम आज पूरे देश में तालाबंदी के रूप में देखने को मिल रहा है. यदि एहतियातन सरकार ने एक महीने पहले हीं विदेश से आने-जाने वाली उड़ानों पर प्रतिबंध लगा दिया होता। तो आज भारत बंद करनी की आवश्यकता नहीं होती। इस बंद देश का कितना नुक्सान होगा ? उसका अंदाजा चाटुकार, दरबारी मीडिया वालों को तो है. पर वो जनता के सामने असलियत बताने से बच रही हैं. और सरकार की तरफदारी करते-करते देश के साथ गद्दारी कर रही है. देश की अर्थब्यवस्था वैसे हीं गर्त में डूबी पड़ी थी और इस आर्थिक मंदी के बाद अब रसातल में भी पहुंचने की संभावना निश्चित है. अकेले कोरोना के झटके से उबरने में सरकार को कम से कम १ साल का समय लग सकता है.

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