इस हफ्ते देश की राजधानी दिल्ली ने अपने आप को बहुत दुःख में पाया. जहां नागरिकता संशोधन के मामले में प्रदर्शन करते हुए दो समुदाय एक दूसरे के सामने आ गए. और एक दूसरे के खून के प्यासे बन गए.दशकों से चला रहा सामुदायिक भाई-चारा तार-तार हो गया. इस बीच दिल्ली के एक नार्थ-ईस्ट जिले में दंगा बहुत हद तक भड़क गया. उस इलाके के सांसद श्री मनोज तिवारी जी हैं. जो बीजेपी के दिल्ली प्रदेश इकाई के अध्यक्ष भी हैं. इस बीच रूक-रूक कर दु:खद और हृदय विदारक खबरें देश की जनता के सामने आती रहीं. जिसमें एक-एक करके लगभग 39 लोग अब तक अपनी जान गवां चुकें है. अस्पतालों में न जानें और भी कितने लोग हैं. जो अपने जीवन की अंतिम साँसें गईं रहें हैं. खैर अब धीरे-धीरे हालात सामान्य होने लगे हैं. लेकिन जख्मों को भरने में निश्चित तौर पर एक लम्बा समय लगेगा.
इस दंगे में नुकसान दंगा भड़काने वालों को नहीं हुआ. अगर किसी का कोई नुकसान हुआ है तो वो है दिल्ली की भोली-भाली जनता. दिल्ली की जनता के भाई-चारे का नुकसान हुआ, आपसी सद्भाव का नुकसान हुआ और उससे भी ज्यादा मानवता का नुकसान हुआ. इस दंगे में चाहे आईबी अधिकारी शर्मा की हत्या की गई हो या फुरकान की. ये दोनों उस धार्मिक जंग का हिस्सा नहीं थे. लेकिन उनके साथ दंगाइयों ने क्रूर मजाक किया है. और दंगाइयों को संरक्षण देने वाली राजनैतिक पार्टियां अब आरोप-प्रत्यारोप पर उतरा आयी हैं. लेकिन ये नहीं बता सकने की स्थिति में है कि ऐसी घटना कैसे घटित हुई ? जो की देश के माथे पर एक कलंक के समान है. ठीक उसी तरह जिस तरह हम 1984 के सिख दंगे को, 2002 के गुजरात दंगे को, 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे को देखते हैं. अब उसी कड़ी में 2020 दिल्ली का दंगा शामिल हो गया है. ये सारे दंगे मानव समाज को अंदर से झकझोर देने वाले थे.
जब गोकलपुरी, मौजपुर, करावल नगर, शिव बिहार, भजनपुरा, खजूरी, सीलमपुर, चाँद बाग़ की नालियों से शव निकाले जा रहें हैं. उस दौरान उसी दिल्ली दिल्ली ने इस दंगों के दौरान कुछ ऐसे नजारे भी देखें जिनसे प्रतीत हो रहा है कि अभी भी भाईचारे को बढ़ाने वाले लोग है. चाँद बाग़ क्षेत्र के जाकिर नगर में देखने को मिला. जब एक प्राचीन शिव मंदिर के पुजारी हालात से डर कर मंदिर छोड़ कर जाने का मन बना लिया था. तभी मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग आये और उन्हें रुकने की सलाह तथा जान-माल की पूरी हिफाजत करने का भरोसा दिलाया. बकौल मंदिर पुजारी श्री पंडित राकेश शास्त्री पुजारी प्राचीन शिव मंदिर "जावेद भैया आये उन्होंने बोला कि पंडित जी कहीं जाने की जरूरत नहीं हैं. अगर कोई गोली यदि चलाएगा तो सबसे पहले हम उसे अपने सीने खाने के लिए तैयार हैं. सभी लोग आये और बोले कि किसी तरिके से डरने की आवश्यकता नहीं है." इसके बाद मुस्लिम युवकों ने मानव श्रृंखला बनाकर मंदिर की रक्षा की. उन मुस्लिम युवकों पर दंगाई भीड़ ने पत्थर भी फेकें पर वो युवक टस से मस नहीं हुए. ये खबरें हमारे भाई-चारे को बहुत मजबूत बनाने का काम करती हैं. इसमें कुछ हिस्सा आज तक की रिपोर्ट का भी है. जिसका लिंक भी शेयर कर रहा हूँ.
शासन-प्रशासन ने तो दंगे रोकने में कोई तत्तपरता तो दिखाई नहीं. क्योंकि इनको ट्रम्प की सेवा करनी थी. गृहमंत्री जी और प्रधानमंत्री जी अहमदाबाद में 'नमस्ते ट्रम्प' में ब्यस्त थे और इधर दिल्ली में दंगाई दंगा करने में ब्यस्त थे. जब गृहमंत्री जी गुजरात में ब्यस्त थे तो दिल्ली वालों की सुध लेता कौन ? पुलिस कमिश्नर साहब गृहमंत्री जी के आदेश की बाट जोह रहे थे. जब तक उनका इशारा आता तब तक दिल्ली का नार्थ-ईस्ट जिला शवों के ढेर में बदल चुकी थी. दुकाने या तो जला दी गयी थी या लूट ली थी गयी थी. इन सबमें गरीब बस पीसा जो शराफत से गुजर-बसर कर रहा था.
दिल्ली उच्च न्यायालय के जब श्री मुरलीधरन ने जब दंगा न रोकने के संदर्भ और भड़काऊं भाषण देने वालों पर कार्यवाही न होने के संबंध में दिल्ली पुलिस को डांटा तो आधीरात को उनका स्थानांतरण कर दिया गया. क्योंकि जज साहब ने दिल्ली पुलिस पर कुछ गंभीर टिपण्णी की थी. जो शायद मोदी सरकार को पसंद नहीं आयी और आनन-फानन में सत्ता की तरफ से स्थानांतरण का रास्ता ढूंढ लिया गया. क्योंकि सवाल दिल्ली पुलिस पर था और दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय के अधीन है. जज साहब ने दिल्ली पुलिस पर अपनी टिप्प्णी करते हुए कहा था कि "हम अभी भी 1984 के पीड़ितों के मुआवजे के मामले से निपट रहे हैं. ऐसा दोबारा नहीं होना चाहिए, लोगों से बात जरूर करनी चाहिए." जज साहब की ये चिंता शायद सत्ता को पसंद नहीं आयी. और ये हकीकत है कि 1984 के पीड़ित आज भी अपने न्याय की लड़ाई लड़ रहें हैं.
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