Saturday, February 22, 2020

गुजरात के विकास मॉडल को दीवार से ढक कर क्यों छिपाया जा रहा है

ये फरवरी महीना जिसे की युवा प्यार का महीना भी कहते हैं. धीरे-२ अपनी ढलान की तरफ जा रहा है. वैलेंटाइन डे से लेकर कई दिन युवाओं को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं. पर इसी प्यार के महीने के अंतिम सप्ताह में एक और चीज होने की तरह अग्रसर है और वो है अमेरिका के चर्चित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा. हम इसे भारत यात्रा कम गुजरात यात्रा ज्यादा कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. क्योंकि उनके गुजरात यात्रा की शुरुआत मोटेरा स्टेडियम में होगी. जिस पर अरबों रूपये का खर्च आएगा. ये खर्च किस संस्था के द्वारा वहन किया जाएगा ये साफ़ नहीं हो रहा है. बस इतना सुनने में आ रहा है कि हिन्दुस्तान में एक 'नमस्ते ट्रम्प' की नाम की संस्था है. जो इस यात्रा का पूरा खर्च उठा रही है. 
सबसे आश्चर्य करने वाली बात ये है कि इस संस्था का नाम अब से पहले किसी ने सुना तक नहीं था. आज एकाएक यह संस्था भारत के जन मानस के सामने 'केतू' की भाँती चमकने लगी है. उससे भी आश्चर्य की बात ये यही कि इस संस्था की पहुंच वहां तक है. जहां तक हमारे प्रचारमंत्री जी की नहीं है. मतलब अमेरिका के 'व्हाइट हाउस' तक. नमस्ते ट्रम्प नामक संस्था ने न सिर्फ ट्रम्प को हिन्दुस्तान के गुजरात में बुला लिया बल्कि हमारे देश के प्रधानमंत्री महोदय को भी बुला लिया. मैं तो इस संस्था की ताकत को प्रणाम करता हूँ. इतनी ताकतवर संस्था अगर हमारे देश में है तो हम चीन और पाकिस्तान के आगे क्यों बेबस नजर आते हैं. हमारे प्रधानमंत्री महोदय को एक बार इस संस्था के प्रमुख से अपनी चिंता बता देते और बिना देर किये ये संस्था ट्रम्प चाचा को आदेश दे देती और चीन-पाक को घुटने टेकने पर मजबूर कर देती. फिर ना होता पाकिस्तान और ना होती हमारे वीरों की शहादत. २४ फरवरी को ट्रम्प के सम्मान में अहमदाबाद में जो कार्यक्रम तय हैं, उसमें ट्रम्प के अनुसार ७० लाख से १ करोड़ लोग उनकी अगुआई करेंगे. वो भी सड़कों  के दोनों तरफ खड़े होंगे. किसी भी मेहमान का सम्मान होना चाहिए परन्तु झूठ के बिनाह पर नहीं.
एक विदेशी नेता की अगुवाई के लिए हमारे भारतवासियों का क्या मजाक बनाया गया है ? स्टेडियम के पीछे कुछ गरीब भाई-बहन झुग्गी-झोपड़ी बनाकर अपना गुजर-बसर करते थे. अब उन्हें तोड़ने का फरमान जारी किया जा चुका है. और तो और उनके घरों के सामने ८ फ़ीट ऊँची दीवार खड़ी कर दी गयी है. वो भी बस इसलिए कि अंग्रेजी मेहमान को कहीं झुग्गी न दिख जाय. ये उस राज्य का विकास मॉडल है जिसके बोल ने लोगों के कान में एक स्थायी घर बना लिया था और गुजरात को 'द्वारकापुरी' से भी समृद्ध नगरी कहकर प्रचारित किया गया. उसी गुजरात मॉडल की ये हकीकत है कि २५ साल की सत्ता के बाद वहां की गरीबी, बेगारी छिपाने के लिए दिवार खड़ी की जा रही है. यह स्थिति उन लोगों के लिए भी शर्मनाक है. जिन्होंने इस मॉडल को सुपर मॉडल कहकर प्रचारित, प्रसारित किया.
मेरा सवाल गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और आज के प्रधानमंत्री जी से है कि यदि आपने इतना विकास किया तो ये कैसे छोट गया ? इनकी गरीबी का मजाक उड़ाने के लिए आप अपनी गुजरात सरकार पर क्या कोई कार्रवाई करेंगे ? एक विदेशी के स्वागत के लिए आप एक हिन्दुस्तानी के सम्मान को नीचा दिखाने वाले जिम्मेवार लोगों के खिलाफ क्या करवाई करेंगे ? ये सब देखने की बात है. इसी गुजरात मॉडल को प्रसारित करके भाजपा ने केंद्र की सत्ता हासिल की थी और वही नेता प्रधानमंत्री बने. जो निरंतर १५ साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे. अब ऐसा लगता है कि साहेब के गुजरात से निकलते हीं वहाँ की स्थिति पर उनका काबू नहीं रहा. लेकिन गुजरात विकास मॉडल का सपना साहेब ने हीं बना था. जो अब धीरे-धीरे एक-२ करके देश के सामने निकल कर आ रही है. जो तथाकथित विकास मॉडल वाला राज्य था अब उसमें हर तरफ असंतोष देखने को मिल रहा है. वो चाहे दलित आंदोलन हो, सवर्ण आंदोलन हो, पटेल आंदोलन हो, पिछड़ा आंदोलन हो. हर वर्ग अब मुखरता के साथ अपनी आवाज को उठा रहा है. जो देश को सामने हैं. दिवार लगाकर उसी आवाज को छुपाने का एक बार फिर प्रयास किया जा रहा है. 

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