माननीय प्रधानमंत्री जी देश के करोड़ों नागरिक आपसे कुछ सवालों के जबाब जानना चाहते हैं. प्रमुख गांधीवादी और इतिहासकार रामचंद्र गुहा जी को आज बैंगलोर में किस आधार पर ग्रिफ्तार किया ? जबकि रामचंद्र गुहा जी गांधी जी की फोटो हाथ में लेकर शान्ति के साथ अपना विरोध दर्ज करा रहे थे. उस दौरान पुलिस ने किस हक से उनको गिरफ्तार किया गया ? पुलिस योगेन्द्र यादव, कांग्रेस के पूर्व सांसद संदीप दीक्षित, लेफ्ट के बड़े नेताओं सीताराम येचुरी, वृंदा करात और पोलित ब्यूरो के सदस्य समेत सभी साथी जो विरोध प्रदर्शन शांति के साथ कर रहें हैं. उनको आप क्यों गिरफ्तार कर रहें हैं ? इस देश को गांधी का देश रहने दें. उन्हें अपनी आवाज शान्ति के साथ रखने दें. विमर्श तो होने दें. सरकार को अगर जब लगता है कि जिन लोगों को लगता है कि वो देश के लोगों को गुमराह कर रहें हैं तो सरकार अपने ब्यापक तंत्र का उपयोग करके लोगों के भ्रम को दूर क्यों नहीं कर रही है ? आरोप लगाने से क्या होता है ? उसका समाधान निकालें. माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी कल कहा कि सरकार को अफवाहों पर लगाम लगाने के लिए ब्यापक तौर पर प्रचार अभियान चलाये और लोगों के मन में ब्याप्त शंकाओं को दूर करे.
नागरिक संशोधन बिल अब क़ानून का शक्ल ले चुका है. इस बिल पर संसद के भीतर सरकार का सहयोग करने वाले नवीन पटनायक की बीजू जनता दल, नितीश की जनता दल यूनाइटेड, अकाली दल अब इस बिल को अपने राज्यों में लोगों करने के खिलाफ हैं. क्या ये लोग मिलकर संविधान के साथ धोखा नहीं दिए ? क्या अमित शाह जी आप इन लोगों को नक्सल समर्थक घोषित करेंगे ? अमित शाह ने बंगाल की रैली में ये क्यों कहा कि नागरिक संशोधन बिल और एनआरसी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं ? आज जब देश में माहौल खराब हो रहा है उस वक्त कल से सरकार अपील कर रही है कि एनआरसी और नागरिक संशोधन बिल दोनों अलग-अलग चीजें हैं. आप जो कल से बोल रहें हैं वो पहले से बोलते तो आप नागरिकों को अपनी बात अच्छे से समझा चुके होते.
आज जो प्रदर्शन हो रहें है उसे प्रधानमंत्री जी, गृहमंत्री और मंत्री, सरकार के प्रवक्ता सब लोग इसे कांग्रेस और राजनितिक पार्टियों द्वारा प्रायोजित और जनता को गुमराह करने का आरोप लगा रहें है. तो जनता जानना चाहती है कि माननीय गृहमंत्री जी पूरे देश के कोने-कोने में जितने लोग भी सड़क पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे है, क्या वो सारे आपकी नजर में नक्सलवादी हैं ? क्या सारे कांग्रेस के बहकावे में सड़क पर उतरे हैं ? माननीय मंत्री जी आपसे विनम्र निवेदन है कि कम से कम प्रदर्शनकारियों की आवाज तो मत छीनो. संविधान की धारा 14 का उपयोग वाली जनता की संवैधानिक अधिकार तो मत छीनो। कांग्रेस सरकार के खिलाफ भी बड़े से बड़े आंदोलन हुए है. लेकिन उस वक्त ऐसा माहौल नहीं देखा गया था ? इस देश में कांग्रेस सरकार द्वारा थोपी गयी "इमरजेंसी" भी देखा है. जिसमें एक नागरिक के सभी अधिकारों को छीन लिया गया था. वही हालात तो आज भी हैं. आप अपने खिलाफ उठ रही जनता की आवाज को सुनना पसंद नहीं कर रहे हैं. आप संघ के अजेंडे में इतने अंधे हो चुके हैं कि आपको अपने देशवासियों की चीख-पुकार, चीत्कार तक सुनाई नहीं दे रही है. साहब ऐसा हठ मत करो. जितने लोग भी इस देश में है सब लोग इस मिट्टी से प्यार करने वाले हैं.
देश के हर हिस्से में उग्र प्रदर्शन हो रहा है. क्या उत्तर ? क्या दक्षिण ? सब जगह ठहराव हो गया है. पुलिस शांति बहाल करने के लिए पुरजोर पसीने में बहा रही है. जिसकी मैं सराहना करता हूँ. हमारे फ़ोर्स के भाई-बहन हमें सुरक्षित रखने के लिए हमारे हिस्से की चोट अपने साइन पर खा रहें हैं. सरकार साफ़-साफ़ कह दे कि जो भी एनआरसी में नहीं आ पाएंगे वो सारे बाहर जाएंगे. उनका धर्म कुछ भी हो, वो घुसपैठिया है. जनता को इसी बात से गुमराह किया जा रहा है. मेरा सबसे निवेदन है कि क़ानून अपने हाथ में न लें और प्रसाशन की मदद करें. हिंसा फैलाने से किसी का भला नहीं हो सकता. हालात इस कदर बिगड़े हुए हैं कि देश की राजधानी दिल्ली के कुछ क्षेत्रों में इंटरनेट, मोबाईल सेवा को बर्खास्त कर दिया गया है. देश अपना है. उसे सवारने की जिम्मेदारी भी हमारी है.
निश्चित तौर पर अब जब भी इतिहास लिखा जाएगा तो नागरिकता संशोधन बिल की खिलाफत करने वाला आंदोलन उसमें स्वर्णिम अक्षरों में जरूर लिखा जाएगा। जो इस वक्त घर में छुप कर बैठ गया है. इतिहास में इसलिए दर्ज होगा कि इस संशोधन का विरोध बहुसंख्यक कर रहा था. जो अल्पसंख्यकों में भरोसा पैदा करने के लिए लड़ रहें हैं. इतिहास उन्हें कायरों की भाँति परिभाषित किया जाएगा। जैसे कि आजादी के आन्दोलनों में जैसे संघ और उसके नेता माफी मांगकर अंग्रेजी फ़ौज की मदद करते थे. जिनका नाम इतिहास की किताब में एक गद्दार के रूप में दर्ज है. आखिर संघ सत्ता जो चाहती थी वही हुआ. इस बिल को टुकड़े-टुकड़े और माओवादी बोला जा रहा है न कि देशद्रोही। ऐसा इसलिए हो रहा है कि इसका विरोध बीजेपी शासित असम समेत पूरा पूर्वी भारत कर रहा है. वर्ना अभी तक तो एक समुदाय को देशद्रोही, पाकिस्तानी अथवा नाना प्रकार के संज्ञाओं से नवाज दिया गया होता.
निश्चित तौर पर अब जब भी इतिहास लिखा जाएगा तो नागरिकता संशोधन बिल की खिलाफत करने वाला आंदोलन उसमें स्वर्णिम अक्षरों में जरूर लिखा जाएगा। जो इस वक्त घर में छुप कर बैठ गया है. इतिहास में इसलिए दर्ज होगा कि इस संशोधन का विरोध बहुसंख्यक कर रहा था. जो अल्पसंख्यकों में भरोसा पैदा करने के लिए लड़ रहें हैं. इतिहास उन्हें कायरों की भाँति परिभाषित किया जाएगा। जैसे कि आजादी के आन्दोलनों में जैसे संघ और उसके नेता माफी मांगकर अंग्रेजी फ़ौज की मदद करते थे. जिनका नाम इतिहास की किताब में एक गद्दार के रूप में दर्ज है. आखिर संघ सत्ता जो चाहती थी वही हुआ. इस बिल को टुकड़े-टुकड़े और माओवादी बोला जा रहा है न कि देशद्रोही। ऐसा इसलिए हो रहा है कि इसका विरोध बीजेपी शासित असम समेत पूरा पूर्वी भारत कर रहा है. वर्ना अभी तक तो एक समुदाय को देशद्रोही, पाकिस्तानी अथवा नाना प्रकार के संज्ञाओं से नवाज दिया गया होता.
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