Tuesday, December 17, 2019

नागरिक संशोधन बिल पर जामिया के बाद सीलमपुर में बवाल

नागरिक संशोधन बिल पिछले हफ्ते तो देश के दोनों सदनों से पास हो गया, पर अब देश जल रहा है. बिल से पहले तो केवल असम समेत देश के उत्तर-पूर्व के राज्यों में विरोध की आवाज बुलंद थी. परन्तु यह आग अब असम, मेघालय, त्रिपुरा, नागालैण्ड से होते हुए अब देश के हिंदी भाषी क्षेत्रों उत्तर प्रदेश और दिल्ली तक पहुंच गयी है. दो दिन पहले जामिया यूनिवर्सिटी के सामने विरोध प्रदर्शन किया। जो देखते हीं देखते उग्र हो गयी. वहां दिल्ली सरकार की कुछ बसों को आग के हवाले कर दिया गया. जिस पर पुलिस ने भी बल प्रयोग किया और इस क्रम में पुलिस जामिया मिलिया  यूनिवर्सिटी के अंदर पहुँच गयी और लाइब्रेरी में पढ़ रहे छात्र- छात्राओं के उपर  बर्बरता पूर्वक लाठीचार्ज किया गया. इस तरह का आरोप छात्रों ने लगाया है. जिसकी जांच दिल्ली पुलिस द्वारा जारी है. नागरिकता संशोधन की आग देश में भड़कती जा रही है. जामिया के छात्रों के समर्थन में देश के लगभग 22 विश्विद्यालयों के छात्र विभिन्न प्रदेशों में हड़ताल/ जूलूस निकालना शुरू कर दिया। जिसमें दिल्ली विश्व विद्यालय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, जाधवपुर विश्व विद्यालय, राजस्थान विश्व विद्यालय के कुछ कॉलेजों ने खुलकर जामिया के छात्रों का समर्थन किया.
यह आग वहां से निकलकर आज देश के गली-चौराहों पर आ गयी है. आज दोपहर बाद की घटना दिल्ली के सीलमपुर इलाके में घटित हुई. जहाँ नागरिक बिल का विरोध करने वाले और पुलिस के बीच तीखी बहस हुई और मामला अराजकता की तरफ बढ़ गया. छिट पूट घटनाएं भी देखी गयी. देखते हीं देखते देश में अराजकता बढ़ती जा रही है. यदि मीडिया रिपोर्टों को आधार मानें तो अब तक अकेले असम में प्रदर्शन से चार नागरिकों की मौत हो चुकी है. परन्तु सरकार अपनी कुम्भकर्णी नींद से नहीं जाग पा रही है. सरकार देश में संघ के विचारों को फैलाना तो चाहती है  पर इतनी जिद्दी हो चुकी है कि उस विचार के फैलाव के लिए कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार है. सरकार के विरोध कोई मायने नहीं रखता है. बस उसे तो अपने मूल अजेंडे में इजाफा करना है.
32 प्रतिशत लोगों ने सरकार को चुना जबकि 68 प्रतिशत लोगों ने सरकार का विरोध किया था. पर वो विरोध अब मायने नहीं रखता. क्योंकि सरकार संख्याबल के माध्यम से बहुत मजबूत है. शर्म आनी चाहिए सरकार और उसके सहयोगियों को. सरकार और उसके सहयोगियों के पास संविधान की कसम खाने और गांधी जी का नाम लेने का नैतिक अधिकार नहीं हैं. जब सदन में संविधान को तोड़ा जा रहा था तब जेडीयू (नितीश), एजीपी (प्रफुल्ल कुमार महंत) और बीएसपी (मायावती) जैसों ने बिल का समर्थन किया और आज दो दिन से सदन के बाहर वो घड़ियालू आँसू बहा रहे है. विपक्ष की जो 12 पार्टियां संविधान के लिए लड़ रहीं हैं. उनके लिए हम देशवासियों का दायित्व बनता है कि उनको समर्थन दे और दूसरों को भी समर्थन  प्रेरित करें। संविधान नहीं रहेगा तो हमारा हक भी नहीं रहेगा. सरकार को आम की डाली की तरह लचीचा होना चाहिए न कि गन्ने की तरह.


  

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