Saturday, October 5, 2019

राजघाट पर दूबे जी से एक संक्षिप्त वार्तालाप

कौन कहता है कि आज गांधी का अस्तित्व मिटने की कगार पर है. मैं ऐसे लोगों की राय से इत्तेफाक नहीं रखता। सौभाग्य से 2 अक्टूबर के दिन परिवार के साथ मुझे राजघाट गाँधी समाधि स्थल जाने का मौक़ा मिला. जो मेरे लिए बड़े हर्ष का विषय रहा. मैं वहां पहुंचा तो लोगों का भारी हूजूम इकट्ठा था और वो समय सुबह के बमुश्किल साढ़े 10 बजे का रहा होगा. जाहिर सी बात है बापू की जयंती थी और वो भी 150 वीं तो विभिन्न राजनितिक पार्टियों का प्रेम भी गांधी जी के प्रति उमड़ा था. उनमें से कुछ दो-चार साल पहले से गांधीवादी बनने की कोशिश करने वाले भी थे. जो उससे पहले गोड़सवादी हुआ करते थे. इन राजनितिक कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर भी दिया जाय तो देश के अन्यान्य हिस्सों से हर उम्र के लोग आये हुए थे. एक दूबे जी प्रयागराज के तेलियरगंज से हाथ में जलती हुई मसाल लेकर आये थे. उनसे गांधी जी के सिद्धांतों पर बात करने से पता चला कि गांधी जी का असर उनके मानने वालों के मन-मष्तिष्क पर किस कदर हावी हो जाता है. मैं और छत्तीसगढ़ से आये एक प्रखर गांधीवादी विचारक श्रीमती नजमा अजीम जी थी. जो कि बीजेपी के विचारों से प्रभावित थी पर हम सब एक थे और एक साथ थे. दूबे जी से मेरे वार्तालाप के कुछ अंश इस प्रकार हैं -


मैं - दूबे जी प्रणाम 
दूबे जी - खुश रहो 
मैं - आप कहाँ से आये हो ?     
दूबे जी - इलाहबाद, तेलियरगंज से आया हूँ. आप तेलियरगंज को जानते हैं.
मैं - हां 
दूबे जी - आप कहाँ से हो ?
मैं - जौनपुर से हूँ.
दूबे जी - फिर तो आप मेरे पड़ोसी हैं.   
मैं - आप राजघाट किस लिए आये हैं और आपके हाथ में ये क्या है ?
दूबे जी - मैं गांधीवादी विचार से जुड़ा हूँ. मैं बापू जी का दर्शन करने आया हूँ. आप जो ये देख रहें हैं ये जलती हुई मसाल है. जिसे मैं इलाहबाद से लेकर आया हूँ.
मैं - जब आप गांधीवादी है तो क्या आप बता सकते हैं कि गांधी जी की विचारों पर गोड़से के विचार कैसे हावी हो गए ?
दूबे जी - कुछ पल ठहरने के बाद ! हाँ मैं आपकी बात से सहमत हूँ कि आज के दौर में भी गांधी जी के विचार क्षीण नहीं हुए हैं. बस उन्हें झूठलाने की कोशिश की जा रही है. बापू जी के आदर्शों को पूरा विश्व अपनाने की कोशिश कर रहा है. क्या अमेरिका, क्या चाइना सब किसी भी बड़ी से बड़ी समस्या का हल बैठ कर शांति से सुलझाने की अपील कर रहें हैं. यही तो हमारे गाँधी जी है. जो संघ/बीजेपी वाले कल तक गांधी के अस्तित्व को नकारते थे आज वही लोग गांधी जी के समर्थन में रैली और तमाम तरह के सार्वजनिक कार्यक्रम का आयोजन कर रहें है. यही तो गांधी जी के विचारों की जीत हैं.
मैं - बाबा जी आपने मूल प्रश्न का उत्तर नहीं दिया.
दूबे जी - गांधीवादी विचार धारा को दबाने का काम सरकारों ने किया. मैं सभी सरकारों को इसका कसूरवार मानता हूँ. इतना कहते हीं उनकी आँखें गीली हो गयी.
मै भी उनसे माफी लेकर उनके साथ एक फोटो लिया और हम गेट खुलने का इन्तजार करने लगे. क्योंकि वीआईपी का इन्तजार वहां भी था. 

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