Wednesday, September 11, 2019

गांधी के सत्याग्रह का जन्म भाग-1

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का नाम ले लेकर तो आज लाखों लोग ढोंग रचा रहें हैं और उनमें वो लोग भी शामिल है जिनके राजनैतिक बाप-दादा स्वंवतंतता के समय खुलेआम गाँधी जी की सत्याग्रह और आजादी के उनके प्रयासों का विरोध करते थे. उनमें सत्ताधारी को पीछे के दरवाजे से अपनी पूरी ताकत देने वाला संघ परिवार भी गाँधी जी की विरोध करने के मामले में अग्रिम पंक्ति में स्थान बनया था. परन्तु आज वक्त ने ऐसा पासा बदला कि जो 1948 तक बापू जी के विरोध में आगे खड़े रहते थे वो आज उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा किये बिना नहीं रहते. क्योंकि इसे गैर राजनीतिक संगठन को पता है कि आजादी के आंदोलनों के वक्त ऐसे संगठनों की भूमिका संदिग्ध रही है. जिनके अनेकों प्रमाणित दस्तावेज है. माफी मांगने से लेकर सेलुलर जेल तक. आजकल समाज में गांधी जी को अपशब्द कहने को लेकर एक नया चलन शुरू हो चुका है. कुछ सप्ताह पहले मध्य प्रदेश, भोपाल से बीजेपी सांसद प्रज्ञा ठाकुर (आतंक की आरोपी) ने गांधी जी को खलनायक बताते हुए हत्यारे गोडसे की देशभक्त बोली थी. क्योंकि वो भी उसी तरह की देशभक्त हैं जिस तरह का देशभक्त गोडसे था. गोडसे राष्ट्रपिता का हत्यारा था और प्रज्ञा आतंक की आरोपी। तो उन्हें तो गोडसे प्यारा लगेगा ही.

बापू जी हमेशा हीं सत्य के पुजारी रहें है. जीवन पर्यन्त उन्होंने हमेशा सत्य की हीं बात की और उसी रास्ते पर चले. सत्याग्रह उसी का एक बहुत स्वर्णिम अध्याय है. सत्याग्रह के तीन अति महत्वपूर्ण कारक (तत्व) होते हैं, जिनमें 1.सत्य,2.अहिंसा और 3. साधन-शुद्धि। साधन और शुद्धि एक दूसरे की पूरक हैं. साधन में नैतिकता का विशेष ध्यान रखा जाता है क्योंकि इसके बिना आपका बाहरी स्वरूप कैसा भी पर आंतरिक स्वरूप सही नहीं है तो आपके द्वारा की गई चेष्टा निरर्थक हैं. सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ हीं 'सत्य के साथ चलना' होता है.
  • सत्य का आग्रह अर्थात सत्य को समेट लें या सत्य का हीं हो लिया जाए. जहां किसी तरह के शक की गुंजाइश हीं न बचे.  
  • सत्याग्रह में दूसरा स्थान अहिंसा का आता है जिसका मतलब होता है कि आप किसी को चोट नहीं पहुचायेंगे, चाहे वो शारीरिक हो या मानसिक। सत्याग्रही कभी भी किसी काम को छुपा कर करने में यकीन नहीं रखता अपितु उसे खुले तौर पर करता है.   
  • साधन नैतिकता का हीं एक उच्च विचार है जिसमें समस्त चुनौतियों से पार पाने की जुगत होती है और यथासंभव शक्ति के अनुरूप कार्य को अपने में ढाल लेती है.
सत्याग्रह का संक्षिप्त वर्णन - 

"सत्याग्रह" मतलब सत्य का आग्रह. इस विचार में गांधी जी कैसे ढले और पैसिव रेज़िस्टेंस शब्द से सत्याग्रह तक बापू जी कैसे पहुँचे, इसका इतिहास उन्होंने स्वयं लिखा है, 'दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास’ में जिस घटनाक्रम का विस्तार पूर्वक बताया गया है उसे एक बार दुबारा पढ़ने की आवश्यकता है. बापू जी ने लिखा है कि ‘‘ उस नाट्यशाला में सभा हुई. ट्रान्सवाल के भिन्न भिन्न शहरों से प्रतिनिधि भी बुलाये गये. पर मुझे स्वीकार करना चाहिए कि जो प्रस्ताव मैंने बनाये थे उनका पूरा अर्थ स्वयं मैं ही न समझ सका था. इसी प्रकार यह अंदाज भी न लगा सका था कि इनका दूरवर्ती परिणाम क्या होगा. सभा हुई. नाट्यशाला में कहीं भी जगह नहीं खाली बची. सबके चेहरे मानों यही कह रहे थे कि कोई नयी बात आज हमें करनी है.’’

गांधी जी आगे लिखते हैं कि - ‘‘ हम में से कोई भी इस बात को नहीं जानते थे कि कौम के इस निश्चय अथवा आंदोलन को किसी नाम से पुकारा जाय. उस समय मैंने इस आन्दोलन का नाम ‘पैसिव रैजिस्टेन्स’ रखा था. मैं उस समय पैसिव रेजिस्टेन्स का महत्त्व भी न तो जानता था और नसमझता ही था। मैं तो केवल यही जानता था कि एक नवीन वस्तु का जन्म हुआ है. पर जैसे-जैसे आन्दोलन बढ़ता गया वैसे–वैसे ‘पैसिव रेज़िस्न्स’ के नाम से घोटाला होने लगा और इस महान् युद्ध को एक अंग्रेजी नाम से पुकारना भी मुझे लज्जाजनक मालूम हुआ. दूसरे कौम को यह शब्द जल्दी याद होने लायक भी न था. इसलिए इस युद्ध के लिए सर्वोत्कृष्ट नाम ढूँढ़नेवाले के लिए मैंने ‘‘इण्डियन औपीनियन’’ में एक छोटे से इनाम की घोषणा की. उत्तर में कितने ही नाम आये. उस समय युद्ध के रहस्य की चर्चा ‘‘इम्डियन ओपीनियन’’ में अच्छी तरह हो चुकी थी. इसलिए उम्मीदवारों के लिए उस शब्द को ढूँढ़ने के लिए प्रमाण की कोई कमी न थी. मगनलाल गांधी ने भी इस प्रतिस्पर्धा में भाग लिया था. उन्होंने ‘ सदाग्रह’ नाम भेजा. इस शब्द को पसंद करने के लिए उन्होंने कारण बताते हुए लिखा था कि कौम का आन्दोलन एक भारी आग्रह है. और यह आग्रह ‘सद्’ अर्थात शुभ है। इसलिए उन्होंने इस नाम को इतना पसंद किया है. मैंने उनकी दलील का सार बहुत थोड़े में दिया है. मुझे यह नाम पसन्द तो आया तथापि मैं उसमें जिस वस्तु का समावेश करना चाहता था उसका समावेश उससे नहीं होता था. इसलिए मैंने उसके ‘द्’ को ‘त्’ बनाकर उसमें ‘य’ जोड़ दिया और ‘सत्याग्रह’ नाम तैयार कर लिया. सत्य के अन्दर शान्ति समाविष्ट मानकर किसी भी वस्तु के लिए आग्रह किया जाय तो उसमें से बल उत्पन्न होता है। इसलिए ‘‘आग्रह’’ के द्वारा उसमें "ब" का भी समावेश करके भारतीय आन्दोलन का नामाभिधान -‘सत्याग्रह’ अर्थात् सत्य और शान्ति से उत्पन्न होने वाला बल –करके उसका प्रयोग शुरू कर दिया. तब से इस युद्ध को ‘‘पैसिव रेज़िस्टेन्स’’ नाम से पुकारना बन्द कर दिया और यहाँ तक कि अँग्रेजी लेखों में भी कई बार पैसिव रेज़िस्टेन्स को छोड़कर सत्याग्रह अथवा उसी अर्थ के अन्य अँग्रेजी शब्द का प्रयोग शुरू कर दिया. ‘सत्याग्रह’ के नाम से पुकारे जाने वाली वस्तु का और सत्याग्रह का जन्म इस तरह हुआ.’’


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