कर्नाटक में पिछले पाँच दिनों से एक सियासी नाटक जो फैला है उसका पटाक्षेप कम से कम अभी होता तो कत्तई नहीं दिख रहा है. क्योंकि पार्टियों के सियासत दाँ अभी हर एक दांव-पेंच आजमा लेना चाहते हैं। जिससे जनता द्वारा हुए "राजनितिक गधों" को धन या मंत्री पद से खरीदा जा सके. इस नाटक का कितना बुरा असर कर्नाटक जनता की सेहत पड़ होगा इसका इल्म न तो विधायकों को तोड़ने वालों को है और न हीं विधायकों को एकजुट रखने की कोशिश करने वाली पार्टी को है. इस घटनाक्रम की प्रत्यक्ष आवाज संसद से सड़क तक और बैंगलोर से मुंबई सुनी और देखी जा सकती है. ऐसा लग रहा है मानो देश में अब कोई कायदा-कानून काम नहीं कर रहा है. एक बात जनता को समझ लेनी चाहिए कि जो भी विधायक किसी भी पार्टी को छोड़ते हैं तो वो बीजेपी में जाते हीं मंत्री या अन्य लाभ के पद कैसे पा जाते हैं उसका ताजा उदाहरण गुजरात है जहां बीजेपी में जाते हीं दो कांग्रेसी विधायकों को मंत्री बना दिया जाता है, जबकि बीजेपी के जमीनी कार्यकर्ता जो सालों तक धूप-बरसात एक करके मेहनत करते हैं वो पद, वो प्रतिष्ठा बीजेपी अपने कार्यकर्ता को क्यों नहीं है ? क्या कभी आपने सोचा है कि आपके जनप्रतिनिधि अगर आप के वोट से चुनकर आने के बाद ऐसी हरकत करते हैं तो उस वोटर को कितना बड़ा झटका लगता होगा, शायद नहीं सोचा होगा तो अब सोचना शुरू करें। छोटी सी लालच की खातिर जो नेता, मंत्री हमारे वोट की इज्जत नहीं करते तो हम उनकी इज्जत क्यों करें ?
कर्नाटक की घटना देश में बढ़ती हुई राजनैतिक अविश्वश्नीयता का जीवन्त उदाहरण है. जिसका चलन हाल के कुछ वर्षों में अनेक बार देखने को मिला है और हर बार ऐसा घृणित कार्य करने वाली एक हीं पार्टी का नाम आया है जिसका संबंध कर्नाटक में मची संवैधानिक अस्थिरता से भी है. इस राजनितिक उथल-पुथल के बीच बीजेपी को भी कीचड़ में कमल खिलने की उम्मीद जगी है. वैसे प्रधानमंत्री द्वारा निर्मित नई इंडिया में नैतिक आधार पर यह जायज होता नहीं दिख रहा है. माननीय विधायकों को बचने की लिए मानों दोनों तरफ से घुड़दौड़ सी मची है. मीडिया की नजर में कर्नाटक का संकट ज्यादा विकट है अपितु सूखे और बरसात से. कितने लोग बाढ़ के पानी में बह गए, उनमें से बहुतों का पता भी नहीं चल पा रहा है पर मीडिया के लिए वो जरूरी नहीं है. शायद वो लोग मीडिया को पैसे नहीं देते। आज शाम सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार कांग्रेस+जेडीएस के बागी विधायक शाम को स्पीकर के सामने फिर से इस्तीफा देने के लिए आएंगे। इस खबर को लेकर मीडिया इतनी उत्साहित है कि मानो हमें विश्व का नंबर एक देश घोषित कर दिया गया हो. आज की हालत को देखकर संविधान निर्माता बाबा साहेब भी शायद खुश नहीं होते। कर्नाटक में दोनों तरफ से सत्ता का लालच जोर मार रहा है. एक तरह जेडीएस के कुमारस्वामी जो कि वर्तमान मुख्यमंत्री हैं वो कुर्सी से चिपक कर रहना चाहते हैं तो दूसरी और भ्र्ष्टाचार के आरोप में दो साल जेल की सजा काटकर लौटे हुए बीजेपी के स्वर्ण पुरूष श्री येदुरप्पा जी हैं, जिनसे बिना कुर्सी के रहा नहीं जा रहा है और किसी भी तरह वो कुर्सी हासिल करने को लालायित है. इस लड़ाई में किसी ब्यक्ति की हार होगी किसी की जीत पर दोनों स्थितियों में संविधान का हार निश्चित हीं होगा.
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