Saturday, April 20, 2019

संघ स्वदेशी छोड़ विदेशी पूँजी की हिमायती बनी

स्वदेशी की बात करते-करते आरएसएस आज कहाँ तक पहुंची है उसे समझदार लोग आसानी से समझ सकते है. १९२५ से आरएसएस के भीतर जिस तरह की ट्रेनिंग दी जाती थी उसमें अर्थब्यवस्था के लिए स्वदेशी का जिक्र बार-बार होता था. परन्तु अब जब संघ सत्ता में अपरोक्ष रूप से भागीदार है तो उसकी नीतियां उसके पूर्व के प्रशिक्षण के ठीक उलट है. उदाहरण के लिए हम FDI को ही ले ले. जिस FDI निति को लेकर संघ पूर्व की कांग्रेस की सरकार पर हमलावर रहती थी वही आज बिलकुल खामोश सी रहती है तो सोचना चाहिए कि आखिर संघ की क्या मजबूरी है जो शांत हो कर पूर्व की सरकार से सौ गुना ज्यादा रफ्तार से बाजार के विदेशी करण की तरफ भाग रही है तो उसका बस कारण है कि संघ को समझ आ गया है कि अगर जनता के आकांक्षाओं को पूरा करना है, नौकरियों की संख्या बढ़ानी है तो कांग्रेस सरकार सरकार की कितियों के सहारे हीं खुद को आगे बढ़ाना होगा। क्योंकि स्वदेशी सामान का उत्पादन करने पर मेहनताना और खर्च ज्यादा बढ़ जाता है और मुनाफ़ा कम होता है. इसलिए संघ और संघ समर्पित संगठनों ने इस मोदी सरकार के आने के बाद स्वदेशी का झंडाबरदारी छोड़ कर चुप-चाप मौन होकर पूर्व की सरकार की नीतियों को स्वीकार रहे है. निःसंकोच कांग्रेस सत्ता में ज्यादा दिनों तक रही है तो जबाब और जिम्मेदारी उनकी ज्यादा बनती थी. जभी १९९१ में नरसिम्हा राव की सरकार ने भारतीय बाजार को विश्व के हवाले कर दिया. जिसके बाद भारतीय बाजर पूरी तरह से विश्व ब्यापार के लिए खुल गया पर स्वदेशी की बात करने वाली संघ के पृष्ठ भूमि से जो दोनों सरकारें बनी चाहे अटल जी (११९९-२००४) या अब मोदी जी (२०१४-२०१९) तक दोनों ने संघ के स्वदेशी एजेंडे पर न चलकर उसी कांग्रेस के आर्थिक एजेंडे पर आगे बढ़े और बहुत रफ्तार से बढ़ते चले गए. वर्तमान सरकार ने तो FDI को किसी-किसी क्षेत्र में १००% तक विदेशी निवेश के लिए खोल दिया.

प्रभात पटनायक का लेख पढ़ा पर उसमें एक बहुत हीं शानदार बात का जिक्र किया है जो अत्यंत मार्मिक है -
"कमला नेहरू स्विस सेनोटेरियम में टिपोक्लोसिस से उनकी मौत हुई थी उस समय नेहरू के पैसा नहीं था कि अपनी मृत पत्नी को देखने जा सके. उस समय जे डी बिड़ला ने नेहरू जी को पैसा देने का प्रस्ताव दिया था कि मैं आपको पैसा दे रहा हूँ और आप अपनी पत्नी को देखने स्विट्जरलैंड चले जाओ जिसे नेहरू ने मना कर दिया और कह सकते है कि क्राउड फंडिंग के पैसे जुटाए फिर अपनी मृत पत्नी को देखने स्विस सेनोटेरियम गए थे."

इसका मतलब ये नहीं था कि नेहरू जी के पास पैसा नहीं था पर नेहरू जी की कांग्रेस में गोखले जी और गांधी जी के देखरेख में ट्रेनिंग इस प्रकार से हुई थी कि जे डी बिड़ला द्वारा दिया जाने वाला पैसा उस संस्कार को धूमिल कर रहा था. गोखले जी कांग्रेस को बहुत अच्छी तरह से जानते और समझते थे तभी जब महात्मा गांधी जी दक्षिण अफ्रिका से देश लौटे थे तो गोखले जी ने गांधी जी से कहा था कि अगर तुम्हें हिन्दुस्तान को समझना है तो तुम्हें गाँव में जाना होगा. उनके बीच रहकर उनकी जीवन का जीना होगा, उनके दुःख-दर्द को मह्शूश करना होगा, दर्द सहना होगा जभी आप अच्छे तरिके से हिन्दुस्तान को जान पाओगे. उसके बाद हीं महात्मा गांधी जी चम्पारण समेत देश के अनेक गाँव वाले हिस्से का दौरा किया था और तब जाकर उन्होंने एक जाति-धर्म, भेद-भाव रहित समाज की कल्पना करने का विचार मन में आया और उसी पथ पर बाद में अग्रसर होते चले गए. अब की में एक भाव आया है कि मुझसे बलवान कोई नहीं है क्योंकि १९४८ में आरएसएस पर लगे प्रतिबंध को लेकर  स्वयं सेवकों के मन में टीस छिपे तौर पर आज भी है. आगे चलकर इनकी सोच ये है कि २०१९ के बाद संघ सत्ता को उस स्थिति में ला देने की जरूरत है जहां किसी भी पार्टी संगठन को भी प्रतिबंधित कर सके. अब आप अगर थोड़ा सा गहराई से अध्ययन करेंगे तो पाएंगे संविधान के साथ-साथ एक नई सत्ता उभर कर आ रही है जो कुछ भी कर दे उसका कोई कुछ भी नुकसान नहीं कर पायेगा. उदाहरण के तौर पर जहां-जहां संघ की सत्ता में भागीदारी हैं वहीं क्यों गाय माता के नाम पर हिंसा सबसे ज्यादा हुई. अगर हुई तो उन पर कोई कार्यवाई क्यों नहीं हुई ? ये सब उसी समकक्ष चल रही सत्ता का असर है. हिंदी भाषी क्षेत्रों में हम गौ माता को पूजनीय मानते है इसलिए यहां भावनाओं को भड़काना आसान है परन्तु जब संघ की सत्ता गोवा, मणिपुर, मेघालय, असम, त्रिपुरा, इत्यादि में है तो वहां गौ मांस भक्षण करने वालों के साथ संघ खड़ी है क्योंकि वहां सत्ता को खोने का डर है. उदाहरण के तौर पर मेघालय से आने वाले उनके गृह राज्य मंत्री किरन रिजिजू ने खुलेआम मीडिया में कहा कि मैं बीफ खता हूँ कोई मेरे क्या कर लेगा. उनके इस बयान के बाद भी संघ मंडली उनका मुंह भर देखती रही. तो हम नागरिको को ये देखने और समझने की जरूरत है कि संघ पिछले दरवाजे से सत्ता को कंट्रोल करने के लिए बेचैन है और मुखौटे के रूप में बीजेपी को सामने रखी हुई है.        

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