आज देश में चईत (चैत्र) राम नवमी की पूजा बड़े धूम-धाम से की जा रही है. हमारे हिन्दू समाज में राम नवमीं का बहुत हीं बड़ा महत्व है. आज के हीं दिन अयोध्या (अवध) के राजा चक्रवर्ती सम्राट महाराज दशरथ जी के घर एक नन्हें से बालक के रूप में श्री राम का जन्म हुआ था जो आगे चलकर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के नाम से जगत विख्यात हुए. आज के दिन मैं अपने बचपन की याद को ताजा करता हूँ जो कि अयोध्या के आस-पास के इलाके है वहां इस चैत्र के राम नवमी का पर्व बड़े हीं विधि-विधान और विविध पकवानों के साथ मनाया जाता था. आज मैं अपने गाँव से बहुत दूर एक शहर में नौकरी करते हुए जब उस दिन के बारे में सोचा तो बरबस हीं मन भर आया और अपने उन्हीं पुराने दिनों में खो गया. उन दिनों जब मैं छोटा था बचपन में नवमी के पूजा का एक महीने पहले से घर में तैयारी शुरू हो जाती थी. उन दिनों गाँव में मिट्टी के बने कच्चे मकान में बहुतायत थे, एक्का-दुक्का पक्के मकानों को छोड़कर। हम सब जगल से जा कर मटखन्ना (मिट्टी खोदने की जगह) से चिकनी मिट्टी खोदकर लाते थे और उसी मिट्टी से घर के अंदर और बाहर की दीवारों पर लिपाई करते थे फिर गोबर का लेप करके घर को साफ़-सुथरा किया जाता था और जो पूजा घर होता था उसमें पूजा के दिन 24 घंटे घर के ज्यादातर सदस्यों का प्रवेश वर्जित होता था. रात के समय पूजा होती थी और सुबह के नवमी की पूजा की समस्त तैयारी हो जाती थी क्योंकि ये पूजा मुहूर्त के हिसाब से या अधिकतर सूर्योदय से पहले कर दिया जाता था. पूजा में पूरी, रिकवच, हलवा, कटहल की सब्जी, उरद की दाल, चावल, गुजिया और नाना प्रकार के पकवान बनते थे. उस दिन हम जल्दी उठने की कोशिश करते थे और नीम की दातून अपने बिस्तर पर हीं रखते थे उठते हीं सबसे पहले दातून करते थे फिर खाने लग जाते थे. गुड़ की बनी हुई गुजिया मैं बड़े हीं चाव से खाता था जो की मेरी नानी बनाती थी पर अब वो स्वर्गवासी हो चुकी है आज के दिन मुझे मेरी नानी की बहुत याद आती है. अब देखता हूँ तो लगता है कि गाँव के रिवाज में भी बदलाव आ गया है वहां भी शहरों का दिखावापन लोगों के ब्यवहार में बड़े पैमाने पर शामिल हो गया है. राम नवमी का पर्व तो विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी आया पर मन को कुछ समय के लिए सोचनीय अवस्था में डाल गया.
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