राफेल के मामले पर भले हीं सरकार को माननीय सुप्रीम कोर्ट से कुछ शर्तों के साथ पाक-साफ होने का सूबूत मिल गया हो पर विपक्षी पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष इस मुद्दे को छोड़ने के मूड में नहीं है. आज सुबह "द हिंदू में छपी एक खबर के मुताबिक रक्षा मंत्रालय तो सौदे को लेकर बातचीत कर ही रहा था, उसी दौरान प्रधानमंत्री कार्यालय भी अपनी ओर से फ्रांसीसी पक्ष से 'समांतर बातचीत' में लगा था. अखबार के मुताबिक 24 नवंबर 2015 को रक्षा मंत्रालय के एक नोट में कहा गया कि पीएमओ के दखल के चलते बातचीत कर रहे भारतीय दल और रक्षा मंत्रालय की पोज़िशन कमज़ोर हुई." इस बात को लेकर मोल-भाव समिति के लोगों में शामिल अधिकारियों ने तत्कालीन रक्षामंत्री श्री मनोहर पारिकर के सामने प्रधान मंत्री कार्यालय के अधिकारियों की तरफ से बेजा द्वाव पर अपनी सख्त आपत्ति दर्ज कराई थी. इस पर रक्षा मंत्री को इन अधिकारियों के द्वारा एक नोट भी लिखा गया था और पीएमओ के हस्तक्षेप को ये कहते हुए दखल देने से रोकने की अपील कर रहे थे कि उक्त अधिकारी मोल-भाव समिति में शामिल हीं नहीं है तो निगोशिएट कैसे कर सकते हैं.
इस नोट की प्रतिलिपि मीडिया में कांग्रेस द्वारा आधिकारिक तौर पर बाँट दिया गया है. जो निचे मै भी लगा रहा हूँ -
इससे एक बात तो साफ़ हो रही है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी के राष्ट्रिय अध्यक्ष पिछले छः महीने से जो बात राफेल को लेकर बोल रहे थे और जिसके लिए उनका मजाक उड़ाया जाता था. वो अब धीरे-धीरे हीं सही लेकिन स्थापित होती जा रही है. अब तो सरकार को तथ्यों के साथ जबाब देने के लिए फिर जनता के सामने आना होगा। और दूसरी बात ये भी साबित हो गयी कि इस राफेल डील में रक्षा मंत्रालय की भूमिका को सिमित करके प्रधानमंत्री द्वारा एकतरफा फैसला लिया गया था. इस लिहाज से आरोप तो सीधा-सीधा प्रधानमंत्री पर हीं बनता है न कि उनके मंत्रिमंडल सहयोगी पर.राफेल अब विपक्ष की तरफ से आगामी लोकसभा चुनाव में एक बड़े मुद्दे की तरह प्रयोग में लाया जाएगा। अब देशवासियों को भी लगने लगेगा कि राफेल में कुछ तो है जो आये दिन कुछ नहीं बात निकल कर सामने आ रही है.
रक्षा सौदे में सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप से एक बात प्रतीत होती है कि शायद प्रधानमंत्री जी को नेगोशिएशन कमेटी में शामिल लोगों की क्षमता और निष्ठा पर शक था. इसीलिए तो इस सौदे को लेकर सीधा पीएमओ से दखल देने की चेष्टा होती रही. मेरे ख्याल से यह उन सेना के जवानों का अपमान था जो इस कमेटी का हिस्सा थे.

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