पिछले लगभग दो हफ्ते से शुरू हुआ राजस्थान की सियासत का झगड़ा आज राज्यपाल महोदय के आंगन में पहुंच हीं गया। सचिन पायलट और अशोक गहलोत जी के बीच राजनैतिक वर्चस्व की लड़ाई इस हद तक पहुंच जायेगी कि पार्टी में हीं बगावत हो जायेगी। इस बात का अंदाजा शायद कांग्रेस आलाकमान को भी नहीं रही होगी। लेकिन आज राजस्थान के राजनिति में जो कुछ भी घटित हो रहा है। उससे सबसे ज्यादा निराश राजस्थान की बेचारी जनता होगी। विधायक जयपुर से लेकर दिल्ली तक होटलों में कैद हैं और उनके क्षेत्र की मासूम जनता अनेक परेशानियों से रोज दो-चार हो रही है। उसका किसी को शायद अंदाजा नहीं है।
जब भी सरकार कोई गिरती या गिराना होता है तो उसमें भाजपा का हीं नाम आता है। और सारा दोष भाजपा के सिर पर मढ़ने की कोशिश कांग्रेस की तरफ से की जाती है। जिसे मैं तर्क संगत नहीं मानता। क्योंकि कांग्रेस ने संगठन के नेताओं को तवज्जो न देते हुए विरासत वालों को तवज्जो देती रही है। विरासत होने की वजह से कुछ वफादार लोग उनके भी चुनकर आते हैं। जो अपनी वफादारी साबित करने के लिए किसी भी स्तर तक जाने के लिए तैयार रहते हैं। जिसका परिणाम पहले मध्य प्रदेश और अब राजस्थान में देखने को मिल रहा है। विरासत वाली राजनीति को लेकर जो गलती कांग्रेस ने की वहीं अब बीजेपी कर रही है। जब वो कांग्रेस के विधायकों को इस्तीफे के बाद अपनाती है तो उसके साथ एक शर्त भी जुड़ी होती है कि फलां क्षेत्र का टिकट शामिल (बागी) होने वाले को हीं दिया जायेगा। जिसके फलस्वरूप बीजेपी का जमीनी कार्यकर्ता निराश होने लगता है और अपने घर में बैठ जाता है। अब तक बीजेपी को संगठन और कार्यकर्ताओं की पार्टी कहा जाता रहा है पर कुछ सालों में बीजेपी के चरित्र में घोर परिवर्तन आया है। जो कल कांग्रेस की तरह बीजेपी के लिए भी दुखदाई साबित होगा।
माना कि राजस्थान में जादूई आंकड़ा कांग्रेस और गहलोत के पक्ष में है। फिर भी उन्हें और कांग्रेस आलाकमान को कुछ चीजें नजदीक से देखना चाहिए था। कांग्रेस आलाकमान शायद मध्य प्रदेश के तख्तापलट से कुछ सिखा नहीं। खैर पिछे जो हुआ उसे भूलाकर कांग्रेस कम से कम अब से सबक सिखाते हुए अपने नेताओं पर पैनी नजर रखे तो भविष्य को संवारा जा सकता है और फिर से अपने पुराने रौं में कांग्रेस पार्टी लौट सकती है। राजस्थान की सरकार फिलहाल तो सुरक्षित दिख रही है पर अब तक ? भाजपा जब तक चाहे तब तक। भाजपा के अन्दर सत्ता की बहुत भूख हो गयी है और कहीं न कहीं संविधान संशोधन और हिन्दू राष्ट्र की तरफ बढ़ने का छिपा एजेंडा भाजपा इस रणनीति में दिखाई पड़ती है।
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