आज सुबह जैसे हीं आंख खुली हमेशा की भांति देश-प्रदेश का हाल जानने के लिए मोबाईल हाथ उठाया और ट्विटर को खोला। ट्विटर खोलते हीं जो पहली खबर आंखों के सामने आई सहसा उस पर यकीन हीं नहीं हुआ। फिर धैर्य के साथ पढ़ा एवं कुछ और पत्तलकार भाईयों के अकाउंट को चेक किया तो उन सबमें एक घटना कामन थी और वो थी कानपुर एनकाऊंटर की घटना। सबसे पहले मैं उत्तर प्रदेश के शहीद पुलिस के जवानों को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि भेंट करता हूं तथा आशा करता हूं कि इनके हत्यारे को पुलिस पाताल से निकालकर यमलोक की सैर करायेगी। हमें हमारे पुलिस के जवानों की क्षमता पर पूरा विश्वास है।
यह एनकाउंटर आज प्रसाशन और सरकार पर बहुत से सवाल खड़े कर रही है कि इतनी बड़ी घटना को एक अपराधी कैसे अन्जाम दे दिया ? सवाल ये भी उठता है कि कहीं पुलिस के बीच से हीं किसी की अपराधी विकास दूबे के साथ मिलीभगत तो नहीं थी ? ऐसे अनेकों सवाल प्रदेश के हर नागरिक के मन में बिजली की तरह कौंध रहा है कि आखिरकार इन शहीदों की शहादत के लिए कौन जिम्मेदार है ? जैसा कि खबर निकलकर आ रही है कि अपराधी विकास दूबे पर 50 से ज्यादा गंभीर मुकदमे प्रदेश में दर्ज है। फिर भी वो बेल्लौस होकर बाहर घूमता रहा और आज उसकी हिमाकत तो देखिए वो पुलिस वालों पर हीं कहर बनकर टूट गया। आखिर एक अपराधी में इतनी ताकत आती कहां से है ? यह सवाल भी उठना चाहिए और एक निर्णायक स्तर पर जाकर रूकना चाहिए। हम पुलिस को दोष देते हैं लेकिन ये क्यों नहीं समझते हैं कि वो किसी सत्ता, सरकार के अधीन हैं। और उस सरकार के अंग विकास दूबे जैसे कई गंभीर धाराओं वाले अपराधी भी हैं। सत्ता का वो रंग है जहां लोग अपने-अपने तरीके से अपने को अपराध मुक्त करवाते हैं और कहते हैं कि ये मुकदमे राजनीतिक प्रतिशोध के माध्यम से करवाया गया था। लेकिन सच जो है वो हर शख्स को पता होता है।
आज हम विभिन्न तरीकों से इन शहीद पुलिस के जवानों को श्रद्धांजलि देंगे और अपराधी को कोसेंगे, सत्ता को कोसेंगे लेकिन कल से हम फिर किसी विकास जैसे पागलों का गुणगान गाना शुरू कर देंगे। हमें सिस्टम को मजबूत और पारदर्शी बनाने के लिए एक लम्बे संघर्ष की आवश्यकता है, बिना संघर्ष के 'ढाक के तीन पात' वाली कहानी चरितार्थ होगी।
पुलिस के शहीद वीर जवानों को सिर झुकाकर नमन !
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