Tuesday, August 27, 2019

अघोषित आपातकाल

मैं और मेरे जैसे लाखों-करोंड़ो लोगों ने "आपातकाल" को नहीं देखा होगा। उस दौरान हुए मानव संघर्षों को नहीं देखा होगा। परन्तु जब हम उन किस्से, दास्तानों को तमाम माननीय बुजुर्ग, बुद्धिजीवी वर्ग, राजनेता, पत्रकार बंधुओं से सुनते हैं और उन्हें समझने की कोशिश करते हैं तो हमें प्रतीत होता है कि जैसा आज का माहौल हैं लगभग वैसा हीं तो उस वक्त रहा होगा. हां एक अंतर जरूर है तब में और अब में 1975 में आपातकाल लगाने की इंदिरा सरकार द्वारा घोषणा की गयी थी और 2019 में अघोषित आपातकाल है. जहां आप कुल कर न तो सांस ले सकते हैं और न हीं कुछ लिख सकते हैं. जम्मू-कश्मीर इसका ताजा और सबसे ज्वलंत उदाहरण है. जहां करीब सवा करोड़ लोगों को धारा 370 के संदर्भ में इस तरह अँधेरे में धकेल दिया गया है मानो उनको अपने हित की बात जानने का कोई हक नहीं है. कश्मीर में किसी समाचार पत्र की छपाई नहीं हो रही है, इंटरनेट और फ़ोन सेवाएं अस्थाई रूप से बंद कर दी गयी हैं, पत्रकारों को घर से उठाकर पुलिस थाने में कैद किया जा रहा है, दो पूर्व मुख्यमंत्रियों को आज 20 दिन से उन्हीं के घर में नजरबंद किया जा चुका है. एक पूर्व मुख्यमंत्री को दो बार श्रीनगर हवाई अड्डे से बैरंग लौटा दिया जाता है, राहुल गाँधी के नेतृत्व में कश्मीर जा रहे विपक्षी प्रतिनिधिमंडल को भी वापस लौटाया गया, पत्रकार बंधुओं को पीटा गया, उठा-उठाकर पटक दिया गया, आज तक की महिला पत्रकार मौसमी सिंह के साथ पुलिसिया दुर्ब्यवहार किया गया. यही तो आपातकाल का लक्षण हैं जो हमें सत्ताधारी दल के नेता और पत्रकार बताते हैं. तो हम क्यों न मान लें कि यह "अघोषित आपातकाल" है.                       

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