दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसान भाइयों के समर्थन में लगभग 29 दिन बाद राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने सोशल मीडिया से निचे उतरकर जमीन पर प्रदर्शन किया और किसानों को अपना और अपनी पार्टी का समर्थन दिया। जो निश्चित तौर पर घाटा-मुनाफा का आंकलन करने के बाद समर्थन देने के बारे में निर्णय लिया गया होगा। और यह निर्णय एक देशवासी होने के नाते और जिम्मेदार विपक्ष होने के नाते जरूरी था। किसानों को समर्थन देने के लिए कांग्रेस पर राजनीति करने का भी आरोप लगाया जायेगा। जिसे कांग्रेस को खुले मन से स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि कांग्रेस भी एक राजनीतिक पार्टी है और वो राजनीति करने के लिए है न कि भजन-कीर्तन करने के लिए।
राहुल गांधी की अगुवाई में महीनों बाद कांग्रेस पार्टी सभी बड़े नेताओं के साथ किसान बिल के विरोध में धरना प्रदर्शन किया। और दो करोड़ चिट्ठीयों के साथ राष्ट्रपति को मेमोरण्डम सौंपने की कोशिश किया। लेकिन कोरोना काल को देखते हुए राहुल गांधी, गुलाम नबी आजाद और अधीर रंजन चौधरी को हीं राष्ट्रपति तक पहुंचने का आदेश मिला। इस दौरान प्रियंका गांधी, वेणुगोपाल, सुष्मिता देव समेत काफी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को कुछ घंटों के लिए दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया फिर बाद में छोड़ दिया। कांग्रेस का किसानों के हक में प्रदर्शन राजनीतिक और विपक्षी पार्टी के लिहाज से उचित है। कांग्रेस को इस मुद्दे को जन-जन से जोड़ने की जरूरत है। कांग्रेस अपने कार्यक्रमों में किसानों के हित को सबसे उपर रखकर बात करनी चाहिए। आम जन भी सरकार के पूंजीवादी मित्रों के बारे में जानता है। बस वह विकल्प नहीं मिल पा रहा है जिसे जनता अपना मत दे। आज के दौर को देखकर स्व.राहत इन्दौरी जी का एक शेर बरबस हीं याद आ रही है। जो कुछ इस तरह है-
लगेगी आग तो आयेंगे घर की जद में ।
यहां अकेले मेरा मकां थोड़ी है ।।
इससे यह सीख मिलती है कि काश ! शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों का साथ आज के प्रदर्शनकारी दिए होते। जब न तो इनको ये दिन देखना पड़ता और न हीं उन्हें। सरकार ने उस प्रदर्शन के माध्यम से देश की जनता का नब्ज टटोला और जब उन्हें लगा कि उम्मीद के मुताबिक सब धर्मों में विघटित हो चुके हैं। तो बिना वक्त गंवाए किसान बिल लाकर दोनों सदनों से पास करा दिया। मैं नहीं मानता कि इसमें सरकार की ग़लती थी। इसमें हमारी गलती थी। जिसका संघ और सरकार ने बस फायदा उठाया। एकत्र होंईए, अपनी लड़ाई अपने दम पर लड़िए। धर्म में अन्धे मत बनिए। हम सबका धर्म इतना कमजोर नहीं है जिसे कोई कांग्रेस या बीजेपी मिटा दे या स्थापित कर सके।
किसान आन्दोलन पर सरकार का रवैय्या शाहीन बाग वाले प्रदर्शन की तरह हीं सख्त है। सरकार को लगता था कि किसानों से बात नहीं किया जायेगा तो वो थक-हार कर वापस चलें जायेंगे। पर सरकार का आंकलन गलत निकला। सरकारी पार्टी के प्रवक्ता शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को तो खुलेआम जिहादी, पाकिस्तान परस्त, आतंक परस्त बोल रहे थे पर किसानों के सन्दर्भ में खुलेआम नहीं बोल पा रहे हैं। क्योंकि यहां बहुतायत संख्या में हिन्दू अनुयायी हैं। भाजपा के प्रवक्ता मजबूरी वश मुंह सिले हुए हैं।
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