Friday, November 29, 2019

आतंक की आरोपिनी का संसद में माफी राग

परसों बीजेपी के मध्य प्रदेश भोपाल की सांसद महोदय एवं आतंक की आरोपी साध्वी प्रज्ञा गांधी जी हत्या करने वाले आतंकी गोडसे का महिमामंडन करते हुए सदन में उसे देशभक्त बताया था और कल तक जो भक्त कह रहे थे कि प्रज्ञा ठाकुर ने गोडसे को देशभक्त कहा वो सही था और उसका समर्थन कर रहे थे. वो अपनी दोनों आँख खोलकर देख लें आज वही आतंक की आरोपी साध्वी प्रज्ञा संसद में माफी मांग रहीं हैं और गांधी जी के विचारों को सम्मान करने को बोल रहीं है. यही गांधी की जीत है. यही तो गांधी है. यही तो देश की आत्मा है. वो गांधी हीं थे जो अनेक बर्बरता के बाद भी किसी पर हथियारों का उपयोग नहीं किया. गांधी वो थे जब उन्हें डरबन (दक्षिण अफ्रीका) के रेलवे स्टेशन पर रंग भेद के कारण उतार दिया गया था. तब भी उन्होंने उसका हिंसक रूप से जबाब नहीं दिया और माफ़ करते हुए आगे की लड़ाई की लकीर खींच दी. 
गांधी जी ने तो हमेशा घटिया और गंदी सोच वालों को अपने अच्छे विचारों से परिवर्तित किया है. ऐसे में राहुल गांधी ने जो सोशल मीडिया पर कहा उससे मैं पूरी तरह से सहमत हूँ. एक आतंक की आरोपी को कैसे कोई सांसद का चुनाव लड़ सकता है ? आज सदन में महिला और सन्यासी होने का जो रोना रो रही हैं. वो उस वक्त खा गया था ? जब आप एक बार नहीं बार-बार गांधी जी को अपमानित कर रही थी. आज भी जब प्रज्ञा ठाकुर ने शर्तों के साथ माफी मांगी तो उसमें भी "तोड़-मरोड़ करके पेश करने का आरोप लगाया, और उसके संदर्भों के साथ छेड़-छाड़ करने का आरोप भी लगाया".
हद तो तब हो गयी जब आतंक की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर के बयान के संदर्भ में  वरिष्ठ सांसद श्री निशिकांत दूबे जी ने एक और आपत्तिजनक बयान दे दिया. दूबे ने कहा "एक महिला का अपमान करना गांधी जी हत्या करने से भी ज्यादा बड़ा अपराध है". ऐसा उन्होंने राहुल गांधी के "आतंकवादी" वाले ट्वीट के संदर्भ में कहा था. दिक्क्त ये नहीं है कि किसने क्या कहा ? परन्तु दिक्क्त ये है कि उन्हें सत्ता और संघ का वरद हस्त हासिल है. प्रज्ञा और उनके जैसे लोग आतंकी गोडसे को देश की रौशनी के बीच लाना चाह रहे हैं और गांधी जी के समकक्ष खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं. संघ/बीजेपी के लोग आज मजबूरीवश दिखावे के लिए गांधी जी को अपनाने की कोशिश करते हैं परन्तु उनके हृदय में बापू का हत्यारा गोडसे हीं निवास करता है. संसद बाधित है, होनी भी चाहिए. क्योंकि जो देश, समाज अपने विरासत को संभालने में नाकाम रहता है तो उसका मस्तक ऊपर नहीं उठ सकता.

      

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