Tuesday, November 12, 2019

कांग्रेस को सेना के साथ मिलकर सरकार बनानी चाहिए

हमारी पार्टी के तथाकथित क्षत्रपों, आदरणीय महानुभावों आपने क्या किया इतने दिनों में उत्तर प्रदेश और बिहार में ? जो आज आप महाराष्ट्र में सेना से हाथ मिलाने से डर रहें हैं. महानुभावों आप पार्टी को बचाओ अपनी महत्वाकांक्षी भावना का परित्याग करो. कांग्रेस पार्टी यह समझने में नाकाम क्यों हो रही है कि धीरे-धीरे धर्म की राजनीति हाशिये पर जा रही है. हमें उन चीजों से बाहर निकलकर सोचना पड़ेगा। कल अगर कांग्रेस की जगह भाजपा को किसी राज्य में इस तरह का सरकार बनाने का आमंत्रण मिलता तो बीजेपी अब तक शपथ लेकर मंत्रालयों का बटवारा कर रही होती। लेकिन कांग्रेस अब तक अपना मन साफ़ नहीं कर पायी है. मैं कांग्रेस की सेकुलर छवि का समर्थन करता हूँ परन्तु मौके की नजाकत ये है कि कांग्रेस को सरकार में शामिल हो जाना चाहिए। इसी में कांग्रेस का भला है. अन्यथा मुंबई में भी गोवा की पुनरावृत्ति जल्द देखने को मिल सकती है.
कांग्रेस के जो छत्रप कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया जी को बता रहें हैं वो जमीनी सच्चाइयों से कोसों दूर है. जब आपके दो तिहाई से ज्यादा विधायक बोल चुके हैं कि हमें सरकार में शामिल होना चाहिए न कि बाहर से समर्थन दें. इसके बाद भी कांग्रेस में उहापोह की स्थिति बताती है कि कांग्रेस के वेटरन नेता आज की सोच के साथ नहीं जा पा रहें हैं. सही समय पर सही निर्णय ना लेने से कांग्रेस को नुकसान होता है. निर्णय लेने में देरी हम करते हैं और जब भाजपा सरकार बना लें जाती है तब कहते हैं कि वो विधायकों को खरीद लिया है। भाई मौका दोगे तो वो कांग्रेस नहीं है, समर्थन लूट लेगी. जब आपके ४४ में से ३९ विधायक सरकार में जाने को सोच रहें हैं तो आप उन्हें कब तक टोक पाओगे ? आपको खुद समझ लेना चाहिए कि ये विधायक कही भी जा सकते हैं, फिर उनको संभाल कर रखना कांग्रेस नेतृत्व के लिए नामुमकिन सा होगा.
जब बीजेपी ऐन-केन प्रकारेण सरकार बना ले जाती है तो हम संविधान की दुहाई देते हैं. जो अब सरासर गलत लगता है. कांग्रेस ने कल मौक़ा खो दिया है. कांग्रेस के पास कल अपनी छवि को भी सुधारने का एक सुनहरा मौक़ा था, जो कल अन्धेरा होते हीं धुंध में बदल गया. कांग्रेस, एनसीपी और सेना की सरकार बनाने के ढेर सारे कारण हैं. जिसमें भयंकर बारिश के बाद किसानों की बदहाल स्थिति, कुछ सूखाग्रस्त इलाकों में किसानों का संकट। इस तरह की जायज दलीलों के साथ थोड़ा वैचारिक मतभेद होते हुए भी ये एक साथ आकर जनता की सेवा कर सकते हैं. जिसमें कोई बुराई नहीं है. लेकिन ये तब होगा जब दिल्ली के अकबर रोड पर एसी कमरों में रहने वालों को जमीन की सच्चाई का स्वतंत्र आंकलन हो. फैसले में देर होना कहीं न कहीं कमजोरी की तरफ इशारा करता है.  
आज कांग्रेस को शिव सेना अछूत लगने लगी है पर अगर हम देखें तो सेना ने इमरजेंसी में कांग्रेस का साथ दिया, १९७७ में साथ दिया, १९८० में कांग्रेस को समर्थन करते हुए सेना ने अपने प्रत्याशियों की घोषणा नहीं की थी. ये तो तो तीन दशक से ज्यादा पुरानी है और २००७ में सेना ने राष्ट्रपति के चुनाव में प्रतिभा सिंह पाटिल का समर्थन किया. जो कांग्रेस की प्रत्याशी थी. २०१२ में एक बार सेना ने राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए कांग्रेस प्रत्याशी डॉ प्रणव मुखर्जी का समर्थन किया था. क्या तब सेना अछूत नहीं थी ? माना की बाला साहेब ठाकरे ने कांग्रेस के लिए कभी अपशब्द कहा था लेकिन अगर १० सालों का उद्धव ठाकरे का कार्यकाल का इतिहास देखें तो हमें प्रतीत होगा कि सेना ने कांग्रेस के खिलाफ न तो कटु वचनों का उपयोग किया है और न हीं अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़काऊं विचार रखरण हैं. अलबत्ता महाराष्ट्र के २०१९ के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज मुस्लिम नेता सेना के टिकट पर जीत कर आएं हैं. तो अब कांग्रेस के लिए कोई ज्यादा सोचने की बात नहीं बचती है.
उत्तर भारतियों के खिलाफ शिव सेना का रूख कभी बाला साहेब के जमाने में था पर वो अब गुजरी बात हो गयी है. गैर मराठों पर कड़ा रूख अब मनसे रखती है. सेना का उत्तर भारतीयों के प्रति नरम रूख इस बात से देखने को मिलता है कि अब बकायदा सेना के कार्पोरेटर और विधायक महाराष्ट्र में छठ पूजा का आयोजन कराते हैं और उद्धव ठाकरे 'सामना' के माध्यम से छठ व्रतियों को धन्यवाद देते हैं. तो एक बात स्पष्ट हो जाती है कि अब बाला साहेब की सेना और उद्धव जी की सेना के विचार में काफी परिवर्तन आ चुका है.
सेना के जिस उग्र हिंदुत्व की बात से कांग्रेस डर रही है और उसकी केरल इकाई सेना के साथ जाने में अल्पसंख्यकों का हवाला दे रही है. उसका पटाक्षेप तो हो चुका है. अगर इतिहास उठाकर देखें तो शिव सेना का मूल रूप से तीन विचार रहा है. जिसके लिए हम उसे उग्र हिंदुत्व वाली पार्टी बोलते थे. उसमें पहला राम मंदिर निर्माण, दूसरा कश्मीर से धारा ३७० का हटाना और तीसरा मराठा मानुष। जिसमें मराठी सम्मान की राजनीति तो चलती रहेगी और बाकी दोनों मुद्दे तो अब हल हो चके है. इसी महीने की ९ तारीख को मंदिर निर्माण का रास्ता सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया है और लगभग ढाई महीने पहले सरकार ने कश्मीर से धारा ३७० को भी हटा दिया है. अब कोई कांग्रेसी विद्वान बताएं कि सेना की कौन सी राजनितिक अजेंडा उग्र वाली है. मुझे तो नहीं लगता है कि अब कुछ और बचा है जिससे अल्पसंख्यकों को डरने की जरूरत है.





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