Wednesday, March 11, 2020

एमपी में सिंधिया की गद्दारी से कमल खिलने की संभावना

सिंधिया घराने के वारिस और कांग्रेस के पूर्व नेता रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया पाला बदलते हुए बीजेपी में के पाले में जा चुके हैं. वैसे ये भी बहुगुणा परिवार की तरह नमक हराम निकले और अपने इतिहास को दोबारा फिर से दोहरा रहे हैं. साल 1967 में इनकी दादी श्रीमती राजमाता जी ने भी मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार को गिराते हुए जनसंघ की टोली में शामिल हो गयी थी. उसके बाद इनके पिता स्व. माधवराव सिंधिया 1971 में जनसंघ पार्टी के चिन्ह पर चुनाव लड़ा और हार गए थे. फिर उसके बाद कांग्रेस में शामिल हुए और 1996-1997 में कांग्रेस पार्टी को छोड़कर अपनी अलग पार्टी बनाई. जिसमें वो सफल नहीं हुए. फिर वापस कांग्रेस में लौट आये. इस दौरान वो 9 बार सांसद, मंत्री भी रहे. आखिरकार वो एक कांग्रेसी के रूप में इस दुनिया से विदा हुए. उनकी विरासत के दम पर हीं 18 वर्षों में 15 साल सांसद, मंत्री के तौर पर जिया. अब मात्र 2 साल बिना पावर के महाराजा से रहा नहीं गया. तो इनके परिवार का इतिहास पुराना और दागदार है. आज औपचारिक रूप से ज्योतियादित्य सिंधिया भाजपा से जुड़ गए हैं. तो आगे के लिए उन्हें बधाई. परन्तु ये परिवार बहुत दलबदलू है. इसे एक बार फिर से साबित कर दिया.
आज जब महाराजा बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता स्वीकार करेंगे. तो वो किस मुंह से नैतिकता की बात करेंगे. उन्होंने तो अपनी सारी नैतिकता, विश्सनीयता महज एक राजयसभा सीट के लिए समाज में नफरत फैलाने वालों के कदमों में रख दिया. ग्वालियर और चंबल संभाग के जो बीजेपी नेता उन्हें गाली देते थे. अब वो क्या कहेंगे ? क्या महाराज की पूजा करेंगे ? जो प्रभात झा सीधे-सीधे सिंधिया के राज-पाठ को लेकर सार्वजिन तौर पर गंभीर आरोप लगाते रहते थे क्या अब वो बदल जाएगा ? जिस सिंधिया को शिवराज, मोदी, शाह एवं बीजेपी के सभी छोटे-बड़े नेता सोने की चम्मच लेकर पैदा होने का आरोप लगाते थे. क्या वो अब महाराज को भिखारी मानने को तैयार हो गए हैं या सिंधिया जी अपना महाराजा वाला ठाठ छोड़ चुके हैं. राजनीति में अब दोगलेपन का बोलबाला है. इसीलिए संविधान में 'राइट टू रिकाल' का प्रावधान जोड़े जाने की आवश्यकता है.  
मुझे अब भी दिग्विजय सिंह जी के कौशल पर पूरा विश्वास है. मुझे विश्वास है कि कमलनाथ जी के अगुवाई वाली मध्य प्रदेश सरकार बनी रहेगी. क्योंकि दिग्विजय जी कहीं भी बयानों में नजर नहीं आ रहें है. वो चुप चाप अपना काम बिना किसी शोर-गुल के कर रहें हैं. ये मेरा दृढ विश्वास है कि दिग्विजय सिंह जी अब तक शांत नहीं बैठे होंगे. क्योंकि ऐसी परिस्थिति को उन्होंने पहली बार नहीं देखा है, तो ऐसी स्तिथि से निपटना उन्हें अच्छी तरह से आता है. कुछ मीडिया रिपोर्ट में खबरे आ रही हैं कि सिंधिया समर्थक बागी विधायक भी सिंधिया के बीजेपी में जाने से खुश नहीं है. बागी विधायक अलग पार्टी बनाने की मांग कर हैं. तो कमलनाथ और दिग्विजय सिंह उन्हीं को वापस अपने खेमें में लाने की योजना पर काम कर रहें हैं. जिसके लिए उन्होंने दो मंत्रियों को बेंगलुरू भेज भी दिया है. उसमें थोड़ी हीं सही लेकिन सफलता निश्चित मिलेगी. अब तक मैं जिन भी चैनलों को देखा सब पर एकतरफा बीजेपी की बात चलाई जा रही है. कांग्रेस के संदर्भ में बस नकारात्मक बातें हीं प्रसारित की रही हैं. किसी चैनल ने ये खबर नहीं चलाया कि कुछ टूट बीजेपी में भी हो सकती है. आखिर जब सत्ता के लिए हीं ह्रदय परिवर्तन करना है तो ये तो कांग्रेस और भाजपा दोनों के नेताओं पर लागू होती है. बीजेपी में भी कुछ विधायक होंगे जिनको लगता होगा कि उन्हें भी मंत्री बनना चाहिए. उनकी भी कुछ आकांक्षा होगी.
वैसे एक बात मैं बड़े गौर से देख रहा हूँ राहुल गांधी ने जितने भी दोस्त बनाये उनमें ज्यादातर नमक हराम निकले. आप ताजा उदाहरण महाराजा सिंधिया को हीं ले लें. लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि राहुल गांधी के किसी भी निर्णय पर उनको टोकने का हिम्मत केवल सिंधिया के पास था. जो महज सत्ता के लिए उस संबंध को भी तोड़ दिया. पूर्व में हरियाणा में अशोक तंवर ऐसे निकले थे. हुड्डा भी धमकी देते रहे कि अगर उन्हें प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाया जाएगा तो वो पार्टी तोड़ देंगे. त्रिपुरा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बर्मन भी पार्टी छोड़ देते हैं. ऐसे लोगों को राहुल जी का ख़ास माना जाता रहा है. सुनने में तो ये भी आ रहा है कि कांग्रेस के लोग सिंधिया को मध्य प्रदेश में बहुत बड़ी जिम्मेदारी का मन बना लिया था. परन्तु कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं को ज्योतिरादित्य और भाजपा के नेताओं की मुलाक़ात की भनक लग गयी थी. जो कांग्रेस के लिए अच्छा हुआ. नहीं तो महाराज अरुणांचल की तरह पूरी कांग्रेस समेत भगवामय हो जाते.
कल महाराज कांग्रेस से इस्तीफा दिए और आज औपचारिक तौर पर भाजपाई बन गए. ये महाराज जैसा स्वाभिमानी हीं कर सकता था. अच्छा हुआ कि महाराज का स्वाभिमान राज्य सभा की सीट के लिए हीं जागा और मात्र 22 विधायकों का हीं इस्तीफा करवा पाए. इन्हीं विधायकों के बल पर महाराज मुख्यमंत्री का सपना देख रहे थे. ऐसे ब्लैकमेलर के आगे कांग्रेस नहीं झुकी. ये कांग्रेस के भविष्य के लिए ठीक है. अब गए हैं महाराज संघ की शाखा में हाजिरी भी लगाएंगे और कांग्रेसी बस उनके और शिव राज सिंह चौहान के भाषणों को हर जगह दोहराये. जनता खुद-ब-खुद इनके स्वाभिमान को समझ जायेगी और कांग्रेस को अगली बार भरपूर आशीर्वाद देगी. 15 माह में ही कांग्रेस की सरकार लगभग गिरने के मुकाम तक पहुंच गयी है. 'माफ़ करो महाराज, हमारा नेता शिवराज' का नारा बुलंद करने वाले शिवराज उनके नेता और सांसद कहते थे. अब महाराज कमलनाथ सरकार गिराने के बाद शिवराज के साथ हीं होंगे. अब शिवराज और समस्त भाजपाई सिंधिया के संदर्भ में क्या पहले जैसा विचार रखते हैं? ये देखना दिलचस्प होगा.

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