आज अमेरिका के राष्ट्रपति हमारे देश आये और गुजरात के धरती पर हीं उतरे. वहां उतरने के बाद ट्रम्प सीधे हवाई अड्डे से 'साबरमती आश्रम' पहुंचे. वहां वो अपनी बेटी के साथ पहुंचने के बाद बापू को नमन किया और उसी चरखे पर सूत काता जिस पर बापू कभी 100 साल पहले सूत कातते हुए अंग्रेजों के खिलाफ स्वदेशी को बढावा देने का एक जनांदोलन चलाया. आज हमारे उसी बापू को पूंजीवाद का सबसे बड़ा देश और उसका प्रथम नागरिक आज सिर झुका रहा है. यही तो हमारे बापू की ताकत है. जिस पर हम विश्व समुदाय को बता सकते हैं कि बिना मार-काट के अहिंसा के माध्यम से हम मुश्किल से मुश्किल मंजिल को आसानी से हासिल कर सकते हैं. यह साबरमती वह पुण्य भूमि है जहां इसकी नींव रखने के बाद बापू जी 12 सालों तक रुके थे और जब 1920 में बापू जी यहां से दांडी मार्च के लिए निकले तो ये बोल कर निकले थे कि अब वो देश को आजाद कराकर हीं वापस यहां आएंगे. लेकिन ऐसा हो नहीं सका. आजादी के बाद बापू की हत्या एक सनकी ने कर दी. जिससे वो दुबारा उस जगह नहीं लौट सके.
आज ट्रम्प तो साबरमती आश्रम जरूर पहुंचे, सूत भी काता लेकिन 'विजिटर बुक' में ट्रम्प ने गांधी जी के बारे में न लिखकर अपने प्यारे मित्र मोदी के बारे में लिखा और उन्हें धन्यवाद दिया. ये बात थोड़ी अखरने वाली है. हो भी सकता है. मेरे मन में एक सवाल पैदा हो रहा है कि क्या ट्रम्प गांधी जी को जानते भी हैं ? अगर नहीं जानते थे तो उन्हें शो बाजी के लिए वहाँ जाने से परहेज करना चाहिए थे. मोदी जी की भब्यता को, उनसे अपनी दोस्ती को ट्रम्प मोटेरा स्टेडियम में भी जाहिर कर सकते थे. क्योंकि ट्रम्प मनमौजी तरिके के आदमी है. वो चीजों को अपने तरिके से परिभाषित करते हैं. जो भी है आज वही अंग्रेज हमारे बापू के सामने झुक रहें हैं. जो आजादी के दिनों में या उससे पहले करमचंद गांधी का घोर मजाक उड़ाते थे.
मेरे मन में इन सबके साथ एक सवाल और उमड़ रहा है कि हमारे समाज का एक कट्टर वर्ग हमेशा से हीं पश्चिमी देशों की सभ्यता को लेकर असभ्य बोल बोलता रहता है. लेकिन उसी संगठन से निकले लोग आज एक पश्चिम देश के किसी नेता के आगमन पर अति उत्साहित नजर आ रहें हैं. इनके कट्टर विचारों को अब क्या संज्ञा दिया जाय ? उस कट्टर वर्ग को आरएसएस लीड करता था. और आज के हमारे प्रधानमंत्री उसी आरएसएस के लम्बे समय तक प्रचारक रह चुके हैं. जिस बापू से संघ आजीवन घृणा करता रहा. आज उसी बापू के सामने संघ के समर्थक घुटनों के बल झुके हुए दिखाई पड़ रहें हैं. यही तो हमारे बापू है. जो उन्हें उनके हत्यारे और हिन्दू राष्ट्र के विचारकों को आज भी अपने समाधि, विचारों के आगे झुका देते हैं और ऐसे बहसी लोग बापू के सामने घुटनों के बल बैठ जाते हैं.
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