आज दिल्ली चुनाव में देश जीता पाकिस्तान हारा. ऐसा मैं इसलिए कहना चाहता हूँ कि भाजपा के शीर्ष नेताओं ने जीत और हार को हिन्दुस्तान की जीत और पाकिस्तान की जीत हार का नाम दिया था. बीजेपी के शीर्ष नेताओं ने बार-बार कहा कि अगर भाजपा जीतती है तो देश की जीत होगी और हारती है तो पाकिस्तान की हार होगी. लेकिन आज तो दिल्ली की जनता ने भाजपा को सिरे से नकारते हुए उन्हें हीं सत्ता सौपीं हैं. जिसे ये लोग भाजपा वाले आतंकवादी और पाकिस्तानी कहते थे. वो जीत रहा है. और 10 हजार से भी ज्यादा जनसभा करने के बाद बीजेपी/ संघ हार गयी है. राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में इसके बहुत बड़े मायने हैं. उसका प्रथम मायना ये है कि आप आप महज चुनाव जितने के लिए देश के निर्वाचित मुख्यमंत्री और नागरिकों को पाकिस्तान समर्थक नहीं बता सकते. उन्हें आतंकवादी नहीं कह सकते. यदि आप के ठोस आधार है तो ऐसे लोगों को जेल में डालना चाहिए.
दिल्ली के परिणाम और पीछे के कुछ चुनावों से कुछ बातें स्पष्ट होती जा रही है. जिन्हें मैं अपनी समझ के अनुसार रेखांकित करने की कोशिश कर रहा हूँ -
- अब पाकिस्तान का नाम लेकर आप जनता का विश्वास नहीं जीत सकते. आपको कुछ और करने की जरूरत है.
- आप जनता के सामने बगैर सार्थक और सकारात्मक मुद्दों के गए तो आपको इसी तरह के नतीजे देखने को मिलेगा.
- दिल्ली में 2015 के बाद कांग्रेस एकदम हासिये पर चली गयी है या यूं कहें कि समाप्त हो गयी है.
- नागरिकता कानून के खिलाफ दिल्ली के शाहीन बाग़ इलाके में धरना पर बैठी महिलाओं के ऊपर शाह से लेकर प्रवेश वर्मा, अनुराग ठाकुर, योगी आदित्यनाथ जैसे शीर्ष नेताओं ने जिस तरह की ओछी टिप्पणी की. उसका भी कुछ असर भाजपा के परिणाम पर देखने को मिल रहा है.
- शाहीन बाग़ के मुद्दे को बीजेपी ने शाह की अगुआई में दिल्ली के चुनाव में एक मुद्दा बनाया जो कुछ हद तक कारगर रहा और बीजेपी की कुछ सीटें अवश्य बढ़ीं है. पर उतनी नहीं की सत्ता की कुर्सी तक पहुंचा दें.
- गृह मंत्री और बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कई बार बयान दिया कि 'ईवीएम का बटन इतनी तेज से दबाना कि उसका करंट शाहन बाग़ तक लगे'. उनके इसी लाइन को लगभग प्रधानमंत्री जी ने कड़कड़डूमा की रैली में दोहराया था.
- केंद्र की सत्ता ने शाहीन बाग़ को 'तौहीन बाग़' कहकर सम्बोधित करना शुरू किया. इसके बाद गोली मारो सालों का नारा बीजेपी के केंद्र सरकार के मंत्री अनुराग ठाकुर ने दिया. इसे दिल्ली की महान जनता ने नकार दिया.
- पिछले 5-6 चुनावों को आधार मानकर देखा जाय तो बीजेपी वहां चुनाव हार जाती है. जहां उसके प्रतिद्वंधी उसके सामने सकारात्मक राजनीति करते हैं. रोजी-रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली ऐसे मुद्दों के सामने बीजेपी का राष्ट्रवाद हार जाता है. उसका औरों का पाकिस्तानी करण किसी काम नहीं आता.
- दिल्ली चुनाव का पना एक राष्ट्रीय महत्व है. यहां से निकला परिणाम पूरे देश में जाता है. क्योंकि पूरे देश की जनता दिल्ली में निवास करती है.
- इस जीत के बाद जाहिर तौर पर आप अति उत्साही हो जायेगी और उन्हें राष्ट्रीय नेता के तौर पर एक बार फिर प्रदर्शित करने की कोशिश करेगी. जो आप के लिए नुकसानदेह रहेगा.
- इस चुनाव में जो भी गालीबाज नेता थे वो सब चुना हार रहें हैं. चाहे तेजिंदर पाल सिंह बग्गा हो या सबसे पहले 'गोली मारो सालों' को नारा देने वाले कपिल मिश्रा हो. इनका हारना एक सभ्य समाज की जीत है.
- चुनाव घोषित होने से चंद हफ्ते पहले भाजपा ने कच्ची कालोनियों को पक्की करने की घोषणा की और सम्मान के तौर पर प्रधानमंत्री ने रैली भी की. वो भी कारगर साबित नहीं हुआ. जनता समझ गयी थी कि ये पांच साल तक तो बैठे रहे और अब चुनाव में फायदा लेने के लिए ऐसे चाल चल रहे हैं. उसे जनता ने पहचान लिया.
- मोदी और शाह का कद अब निश्चित तौर पर घट चुका है. विगत जितने भी राज्य में बीजेपी चुनाव हारी है. उससे बीजेपी के इन दोनों नेताओं का कद लगातार गिराया है. अब ये आकर्षित करने वाले चेहरे नहीं रहे.
- आप ने जो फ्री बिजली, फ्री पानी और उच्च शिक्षा गुणवत्ता जनता के सामने पेश किया. वो जनसरोकार वाला था. आप का यह फैसला लोगों के सिर चढ़ कर बोला. उसकी कोई काट बीजेपी और कांग्रेस के पास नहीं था. जो आज के परिणाम में परिलक्षित हो रहा है.
दिल्ली ने देश को एक बार फिर एक नई राह दिखाई है. 2014 में बीजेपी के प्रचंड जीत के बाद दिल्ली ने हीं उसे रोकने का काम किया था. और ऐसे रोका था कि एक नया इतिहास कायम करते हुए 70 विधानसभा सीटों में से 67 विधान सभा सीट जीती थी. 2020 में आप की जीत तो तय मानी जा रही थी. बस अंदाजा यह लगाया जा रहा था कि आप 67 से कितना कम होगी. दिल्ली से सीखते हुए बिहार ने भी बीजेपी को 2015 में बहुत बुरी हार दिखाई थी. अब दिल्ली के बाद बिहार की बारी है. इस बार बिहार की स्थितियां इस चुनाव में बदली हुई होंगी. क्योंकि 2015 में नितीश जी लालू और कांग्रेस गठबंधन के साथ चुनाव लड़े थे जो इस चुनाव में वापस बीजेपी के पाले में चले गए हैं. लेकिन जो भी हो दिल्ली की जनता का दिल से स्वागत किया जाना चाहिए. किसी को इतनी ताकत मत दो कि वो मदहोश हो जाए और आपकी फ़िक्र भी न कर सके.
आप के एक उत्साही कार्यकर्ता ने आप की जीत पर अपनी खुशी का इजहार कुछ इस तरह से किया -
जली को आग कहते है
बुझी को राख कहते हैं
जो बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष से
घर-घर पर्चा बटवा दे
उसे केजरीवाल कहते हैं
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