Thursday, September 5, 2019

शिक्षक सभ्य समाज का आईना

भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है. क्योंकि राधाकृष्णनन जी राष्ट्रपति बनने से पहले पेशे से शिक्षक थे और एक शिक्षक के रूप में अपनी जिंदगी में 40 बहूमूल्य बरस देश को दिए थे. राधाकृष्ण जी का मत था कि समाज की कुरीतियों को दूर केवल शिक्षा के माध्यम से हीं किया जा सकता है. जिसके लिए उन्होंने अथक प्रयास भी किये। राधाकृष्णन जी का मानना था कि किसी मनुष्य की प्राथमिक शिक्षा उसके परिवार से शुरू होती है और विद्यालय में जाकर निखरती है. मेरे गुरु मेरे नाना स्वय रहे हैं क्योंकि वो भी पेशे से अध्यापक थे (अब पेंशनभोगी). उन्होंने मुझे बचपन से समाज और इसमें फ़ैली कुरीतियों को समझने और उन्हें दूर करने के गुर सिखाये थे. जो शब्दशः आज भी मुझे याद है. उनके बाद मै बलइपुर स्कूल में दाखिला लिया और इंद्रदेव पाल गुरु जी से नर्सरी (गदहिया) से शुरू किया. जहां मुझे नंदलाल, मोछू, पांचू, छोटेलाल इत्यादि गुरुजनों का सानिध्य मिला और जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गयी अन्य गुरुजनों का सानिध्य मिला. फिर 1995-1996 में मेरे गाँव मटियारी में सरकारी विद्यालय खुला जिसमें वहां के प्रधानाध्यापक श्री मखोदर यादव जी ने मेरे नाना से निवेदन किया कि मेरा दाखिला प्राइवेट स्कूल से निकाल कर सरकारी स्कूल में करा दें जिससे की गाव के दुसरे लोग भी अपने बच्चे को भेज सके. उनके अंदर भी सरकारी स्कूल को लेकर एक विश्वास पैदा हो. गुरु जी के आग्रह को मेरे नाना जी ने स्वीकार किया और मेरा दाखिला अपने गाँव के स्कूल में हो गया. वहां मैंने पढ़ाई पूरी करने के बाद छठी कक्षा के लिए कटहरी के सरकारी विद्यालय में दाखिला लिया. उसकी बाद 9 से 12 तक श्री नाल देव कुल देव इण्टर कालेज में रहा फिर स्नातक की पढ़ाई चक्के स्नातकोत्तर महाविद्यालय से पूरा किया.
आज शिक्षक दिवस के अलावा मेरे लिए दोहरी खुशी है. आज के हीं दिन मेरी जिंदगी में एक ऐसे फूल का उदय का उदय हुआ जो मेरी पूरी जिंदगी को बदल दिया और वो है मेरी बेटी इशू. जिसका जन्म आज की तारीख को सन 2013 में हुआ था. आज उस मेरी फूल सी मासूम गुड़िया का जन्मदिन है. इसलिए मेरे लिए शिक्षक दिवस और ख़ास हो जाता है क्योंकि मेरी बिटिया भी अब स्कूल जाती है और स्कूल के अपने अनुभवों को शाम को मेरे साथ साझा करती है.      

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