रिश्तों की डोर कितनी असहाय हो गयी है. इस तरह के किस्से-कहानियां तो हमने अक्सर अपनी छोटी सी जिंदगी में जरूर देखी-सुनी होंगी पर जब खुद के घर में कुछ इसी तरह की घटनाएं घटित होती हैं तो उसकी वास्तविक पीड़ा का अहसास होता है. मेरा हृदय किसी बुजुर्ग के साथ किये जाने वाले बर्ताव को लेकर बहुत दुखी होता है. वो चाहे मेरे माँ-बाप के साथ हो या मेरे दादा-दादी के साथ. मेरी पूरी जिंदगी मेरे ननिहाल में गुजरी और मेरे नाना जी क्षेत्र के सम्मानित सदस्य रहें हैं और प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्याक भी रहे. आज से लगभग 19 साल पहले वो सेवानिवृत्त हुए थे. मेरे घर के लगभग सभी सदस्य उच्च शिक्षा ग्रहण किये हुए हैं पर मेरा भी परिवार बुजुर्गों की तौहीन करने वाली संस्कृति से नहीं बच सका. आज मेरे नाना असहाय से रहते हैं, हालांकि उनके सेवा-टहल में कोई कमीं नहीं है फिर भी जो माली एक बाग़ में चार फूलों को खाद-पानी दे-देकर सींचता है और उसे दुनिया के सामने खुश्बू बिखेरने के काबिल बनाता हैं. जिससे की वो अपनी पहचान के साथ जी सके. परन्तु दुर्भाग्यवश जब उसी माली के साथ उसके जीवन के अंतिम पलों में एक दो फूल उस बगिया को भूलने की कोशिश करें या उस माली के मेहनत को दरकिनार करते हुए उससे अपनी पहचान को अलग कर ले तो कितना दुःख होता है, सामान्यतया उसका अंदाजा लगाना बहुत हीं मुश्किल काम लगता है परन्तु जब उस माली की जगह अपने आपको खड़ा करके देखें तो उसकी ब्यथा को हम जरूर पढ़ सकते हैं. आज की समस्त युवा पीढ़ी से मेरा विनम्र अनुरोध है कि आप अपने बड़े-बुजुर्गों का अपनी जिंदगी में सबसे ज्यादा सम्मान करें क्योंकि उनके जीवन का अंतिम समय अगर ख़ुशी से बीतेगा तो आपका भविष्य उनकी दुआओं की वजह से तारों के समान चकदार होगा.
kahaani ghr-ghr kee.
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