जमाना बहुत बदल गया है. अब कभी किसी को अपने निजी रिश्तों पर विश्वास नहीं रह पायेगा. सोशल मीडिया के इस दौर में देख पा रहा हूँ और तमाम उदाहरण मेरे सामने घटित हुए हैं और वर्तमान में हो भी रहें हैं. पुरूष/महिला अपने साझीदार को छोड़कर दूसरे पुरूष/महिला की तरफ बहुत तेजी से आकर्षित हो रहें हैं. इस प्रकार की मनो: स्थिति में वो क्यों पहुंच रहें हैं ? ये शोध का विषय है. मैं यहां बात युवक/ युवतियों की नहीं बल्कि 40 की उम्र पार कर चुके लोगों की कर रहा हूँ. जिनकी 18/20 साल की अपनी संतानें हैं. ऐसे लोगों में अपने पार्टनर से असंतुष्टि की भावना जागृति होना बहुत आश्चर्यचकित करने वाला हूँ. लेकिन यह घटित हो रहा है. ऐसे लोग अलप समय के लिए थोड़ा सुख तो उठा सकते हैं. लेकिन जब वो अपने चौथेपन में प्रवेश करेंगे तब उनको आज की गलती का अहसास करेंगे.
मैं कोई दूध का धुला नहीं हूँ. हो सकता है कि मैं भी किसी से बात करता हूँ, लेकिन वो बस बात तक हीं सिमित है. पार्टनर बदल-बदलकर मिलने-जुलने, घूमने-फिरने का कोई इरादा भी नहीं हैं और न कभी होगा. उनसे मैं एक अच्छे दोस्त के रिश्ते के दरम्यान बात करता हूँ. वो भी कोई एक होगी, एक से ज्यादा नहीं.
हाँ, मैं बात कर रहा था अधेङ उम्र के प्यार के बारे में. कई बार इस तरह के लोग आँखों देखी हकीकत को झूठ साबित करने के लिए अनेक तरह की बातों का जिक्र करते/करती हैं. और सच देखने वाला जब सबकुछ सोच-समझ कर कहता है कि मैं जो बोल रहा हूँ वो झूठ था. तब उस चरित्र को लोगों के सामने संतुष्टि तो जरूर मिलता/मिलती है, लेकिन मेरा दावा है कि उसकी अंतरात्मा उसे धिक्कारती होगी और कहती होगी कि तुमने तो चार लोगों के सामने उसे झूठा साबित कर दिया. लेकिन अपने जमीर को कैसे समझा पायेगा/पाएगी. हकीकत को तू, मैं और ऊपरवाला तो देख रहा था ना. उसके बाद चालाकी बस स्टेटस पर दो-चार ऐसे परिचित लोगों का चेहरा लगाकर वो फिर से दोहराई जाने वाली उस कहानी को छुपाने का असफल प्रयास करता/करती है. यार स्क्रिप्ट तो पहले से लिखी होती है, बस उसके अनुसार नाटक किया जाता है. आजकल के कैब वाले भी दिन में 11 बजे फ्री होते हैं और उसके बाद अपने ग्राहक को लाने के लिए गंतब्य को निकलते हैं और उचित किराया भी वसूलता है. लेकिन जो यात्री है, वह कहता है कि मैंने कोई किराया अदा नहीं किया है. इसे कैसे सच मान लिया जाय कि इस भागम-भाग की दुनिया में जहां हर किसी के पास समय का अभाव है, उस दौर में नि:स्वार्थ सेवा कौन करता है ? बहरहाल, मैं अपने मुद्दे पर फिर से लौट कर आता हूँ कि आजकल बुढ़ापे में इश्क का बुखार क्यों इतना बढ़ रहा है. मैंने कुछ लोगों को देखा है कि बहुत दूर से चलकर आते हैं और किसी वयस्क पुरूष/महिला से मिलते है और घंटे भर की दूरी को 5-6 घंटों में पूरा करते हैं. मिले हुए 24 घंटे भी नहीं बीतते है और फिर मिलने की बहुत बेचैनी रहती है, फिर कहीं बुलाते हैं और मिलते हैं. ऐसे लोगों को मेरे ख्याल से शायद अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचने से ज्यादा किसी एक इंसान के बारे में सोचने की उत्तेजना रहती है. और वह इंसान अब उनकी जिंदगी में वर्तमान भी नहीं बन सकता.
मेरे अनुमान के मुताबिक़ ऐसी घट रही घटनाओं के पीछे पैसा हीं एकमात्र कारण होता है. अब समझ में आता है कि अगर हमारे पास पैसा है तो दुनिया की हर ख़ुशी हमारे पास होगी वर्ना आप बेकार हैं. मेरी हर किसी से यही प्रार्थना रहती है कि आप इधर-उधर भागने से अच्छा है अपने परिवार के साथ रहें। वो हर हाल में, हर परिश्थिति में आपके साथ होंगे और आपका सहयोग करेंगे।
मेरे लिखें हुए शब्दों से यदि किसी भाई/बहन को तकलीफ पहुंचती है. तो मैं उनसे खेद प्रकट करता हूँ, माफी चाहता हूँ.
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