आज पंजाब के लिए एक राजनैतिक दृष्टि से ऐतिहासिक दिन रहा. जहाँ कांग्रेस पार्टी ने पहली बार पंजाब के इतिहास में पंजाब को 'चरणजीत सिंह चन्नी' के रूप में एक दलित मुख्यमंत्री दिया. पंजाब कांग्रेस में पिछले लगभग एक साल से आंतरिक कलह चल रही थी. जिसके दो गुट बन गए थे. एक गुट भाजपा से चार साल पहले आकर कांग्रेस में शामिल होने वाले निवर्तमान पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष श्री नवजोत सिंह सिद्धू और दूसरा वर्तमान मुख्यमंत्री और अनुभवी नेता श्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का था. इनके बीच भयानक कलह हो रही थी. जिसका विपरीत असर पंजाब की सरकार और कांग्रेस की छवि पर पद रहा था. अंततः कांग्रेस ने येन-केन प्रकारेण अमरिंदर सिंह का इस्तीफा शनिवार को करवा लिया था.
अमरिंदर के बाद कौन ?
अमरिंदर जी के बाद पंजाब का मुखिया कौन ? इसका जबाब कांग्रेसी नेता ढूंढ रहे थे. जिसमें सुनील जाखड़ से लेकर रंधावा तक कई नाम गोदी मीडिया में चलें, लेकिन अंत में कांग्रेस ने भी बीजेपी की तर्ज पर चलते हुए अनुमानों के उलट चन्नी का नाम सामने किया. जिसकी उम्मीद शायद खुद चन्नी को भी नहीं रही होगी। खैर ये नाम निकलते हीं राजनैतिक तौर पर कांग्रेस ने एक साथ कई सवालों का जबाब दे दिया. चन्नी जमीन से जुड़े हुए नेता की छवि रखते हैं और दो बार के लगातार विधायक भी रहें है. चन्नी को आगे कर कांग्रेस ने दलितों को एक बड़ा संदश अपनी तरफ से दिया है. पंजाब देश का एक ऐसा राज्य है जहां दलितों की संख्या सर्वाधिक 32 प्रितशत है. पांच महीने बाद होने वाले चुनाव में ये पता चल जाएगा कि कांग्रेस की ये चाल कितनी कामयाब हुई ? आप तौर पर पंजाब ने अब तक 15 मुख्यमंत्री देखें हैं जिनमें सिख और जाट का बोलबाला रहा है. इस प्रकार का पहला प्रयोग करने का साहस कांग्रेस ने हीं किया है बेशक अल्पसमय के लिए हो.
पंजाब के नए मुखिया की तलाश की जरूरत क्यों ?
चुनाव से महज पांच महीने पहले कांग्रेस को मुख्यमंत्री बदलने की जरूरत इसलिए आई कि अमरिंदर जी पर नौकरशाही हावी है , ऐसा पंजाब नेताओं का मानना था. पंजाब के मंत्री और विधायकों को मुख्यमंत्री जी से मिलने के लिए काफी लम्बा इन्तजार करना पड़ता था और अमरिंदर जी पर ये भी आरोप लगता रहा है कि वो खुद को कांग्रेस आलाकमान से ऊपर समझने लगे थे. उसका उदाहरण ये है कि 2017 में अकाली/बीजेपी की सरकार अपनी लगातार 10 साल की सरकार की एंटीइंकम्बेंसी झेल रही थी. उस दौरान अमरिंदर जी ने कमजोर हो चुकी कांग्रेस और आलाकमान से सौदेबाजी कर रहे थे और अपना नाम चुनाव पूर्व घोषित करवाने पर अड़ गए थे. तब राहुल गांधी ने ऐसा करने से मना किया था तो राहुल से अमरिंदर जी नाराज हो गए थे और सोनिया जी को पार्टी छोड़ने की धमकी दे दी थी. तब कांग्रेस आलाकमान उनके दबाव के आगे झुकते हुए चुनाव से पूर्व जनता के बीच अमरिंदर जी के नाम का ऐलान कर दिया था. कांग्रेस चुनाव बाद प्रचण्ड जीत हासिल करते हुए 80 सीटें जीती और अमरिंदर जी मुख्यमंत्री बने. उसके बाद कांग्रेस नेतृत्व इन पर नजर बनाये रखा और इनके कमजोर होने का इन्तजार किया. जिसका बीड़ा सिद्धू ने उठाया. पहले अमरिंदर जी की तमाम आपत्तियों को दरकिनार करते हुए कांग्रेस आलाकमान ने सिद्धू को पंजाब प्रदेश अध्यक्ष बनाया फिर सिद्धू ने नाराज कांग्रेस विधायकों को साधकर अमरिंदर जी पर दबाव बनाना शुरू किया और इनकी नाकामियों को आलाकमान तक पहुंचाया और अमरिंदर जी को अंत में मुख्यमंत्री पद से विदा करवा दिया. अब पंजाब में पास ऐसा कोई बड़ा क्षत्रप नहीं है जो कांग्रेस नेतृत्व को चुनौती दे सके. कुछ इस पंजाब कांग्रेस के कलह का पटाक्षेप हुआ और चन्नी के रूप में पंजाब को पहला दलित मुख्यमंत्री आज 11 बजे मिला.
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