बिहार का शुरूआती रूझान कांग्रेस गठबंधन के लिए सुखद प्रतीत हो रहा है। इस चुनाव को मोदी जी और नीतीश कुमार जी ने अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया था। लेकिन नतीजों का अध्ययन करने के बाद ऐसा लगता है कि बिहार की महान जनता ने उनके अहम को काफूर कर दिया। और देश को एक नया रास्ता दिखाने के लिए बिहार हमेशा से हीं अपना उत्कृष्ट स्थान रखा हुआ है। महात्मा गांधी जी ने चंपारण से हीं अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ने का बिगुल बजाया और पूरी दुनिया को चंपारण ने एक नया दिशा दिखाया था। लगता है बिहार इस भी इस निरंकुश सरकार के विचारों के खिलाफ जाकर एक नया मानदंड स्थापित करने का काम किया है।
इस चुनाव में आम तौर पर शालीनता की मूर्ति कहे जाने वाले नीतीश कुमार जी ने लालू परिवार पर कुछ निजी हमले किए। जिसमें नीतीश जी की खींझ साफ-साफ देखा जा सकता था। चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश जी सभाओं में बेचैन नजर आते थे। इस चुनाव में नीतीश और मोदी जी के कोरोना चुनौती से निपटने के लिए असफल हुए और इस चुनाव में उसका भी असर देखने को मिल रहा है। बीजेपी के नेता बेरोजगारी के मुद्दे पर सवालों का जबाव बड़े थेथरेपन से देते थे। जिससे जनता में इनके प्रति नाराजगी बढ़ती गई और ये दंभ में चूर उसे भांप नहीं पाये। जिसका परिणाम हार के रूप में सामने दिखाई दे रहा है।
गौर करने वाली बात यह है कि 1990 के बाद ये पहला चुनाव आरजेडी लालू प्रसाद यादव के बगैर लड़ रही है। लालू यादव बिहार की राजनीति में खुद एक चमकते ब्रांड की तरह रहे हैं। लालू की भाषण कला और लोगों से जुड़ने का तरीका बिल्कुल अलहदा और सुखद अनुभव वाला होता है। चूंकि लालू यादव चारा घोटाले में झारखंड की दुमका जेल में बतौर सजायाफ्ता बंद हैं। जिसकी कमी बिहार की जनता और राजद को निश्चित तौर पर कल रही है।
No comments:
Post a Comment