पार्ट - 1 से आगे लिख रहा हूँ -
इंसान ये भूल जाता है कि वो जिस जगह जा रहा है. उस जगह भी उसे पहचानने वाला कोई हो सकता है. लेकिन अधेड़ उम्र के चक्कर में पड़कर वो सोचता है कि अब तो शादी भी हो चुकी है, बच्चे और पति भी हैं. लेकिन ये भूल जाता है/जाती है कि ये दुनिया है. यहां के लोग नजरों को देखकर हकीकत पहचान जाते हैं. वो भी तब जब आप अपने काम के लिए सुबह-सुबह किसी और के साथ निकलते हैं और घर से 60 किलोमीटर दूर आपका अधेड़ पुरूष/महिला मित्र पहुँच जाता है. उसके साथ 1 घंटे का सफर 5 घंटे में पूरा करते हैं.
ऐसे अधेड़ लोगों में मैंने मिलने की बहुत तड़प देखी है. दोनों अधेड़ उम्र के आशिक शुक्रवार को बहाने से 5 घंटों तक साथ रहते हैं और फिर शनिवार को इनके दिल में मिलने की इतनी तड़प होती है कि किसी रिश्तेदार के यहां (अपने घर वालों से दूर) बहाने बनाकर बुलाते हैं, फिर रविवार को पीवीआर मॉल में बहाने बनाकर बुलाते हैं और एक अपने रिश्तेदार और उसके छोटे से बच्चे के साथ जाते हैं. ये सब उनके कुछ जानकार लोगों के नजरों के सामने घटित होता है. जिन लोगों के सामने ये जाया करते थे/थी. उनमें से एक उनका जानने वाला भी उनके रिश्तेदारों के आस-पास रहता है. और जब वो पूछता है तो पूर्व की भांति आँखों में आँखें डालकर झूठ बोल देता/देती है कि मैं तो वहाँ गया/गयी हीं नहीं था/थी. आप झूठ बोल रहे हो. आप मुझ पर शक कर रहे हो. मुझे बदनाम कर रहे हो. आपने मुझे कहाँ देखा ? जब देखा तो मुझे बुलाया क्यों नहीं ? अब इन्हें कोई कैसे बताएं कि राह चलते किसी को कोई बुलाकर अपनी जान जोखिम में क्यों डाले ? वहाँ पहचाने से इंकार कर देती/देते तो जनता उस बेचारे का क्या हश्र करती ? ये न तो आप को अंदाजा होता और न उस बेचारे को. ये शहर है कोई गांव नहीं, जहां आप किसी को रोककर न पहचानने पर भी थोड़े समय में अपना परिचय दे सकते हैं.
ऐसे घट रही घटनाओं को साक्षात देखकर मैं हतप्रभ हो जाता हूँ. क्योंकि, उस घटना का मैं भी उस दिन गवाह था. इन सब बातों को देखकर तो अब रिश्तों से भी विश्वास उठता जा रहा है. जब कोई 40 साल की महिला/पुरूष किसी दूसरे महिला/पुरूष से संबंध बनाने पर इतने उतारू हो जाएँ तो उनमें शर्म कहा बची ? और कोई कैसे विश्वास करें कि उनके बच्चों की उम्र 20 साल हो जाने के बाद भी वो अपने जीवनसाथी पर पूर्ण विश्वास कर सकें ?
उन्होंने ये सारे पैंतरे बड़ी चालाकी के साथ आजमाए थे. लेकिन जब आप किसी से बात करते हैं और घूम किसी और के साथ रहे/रही हैं. तो सामने वाला अपने भी पैंतरें बदलता रहता है. जिसने इस सत्य घटना को लिखने के लिए प्रेरित किया उसके मन को टटोला तो इनको लेकर उसके मन में कोई दुराभाव नहीं था. बल्कि उसका मात्र इतना कहना था कि आप जिस पुरूष/महिला के साथ अपना काम करवाने के लिए गए/गयी. उसके बारे में आप अपने घरवालों को बताकर जाती/जाते। क्योंकि वो जिस पुरूष/महिला के साथ गए/गयी थी. वो भी उनके परिवार वालों को बहुत करीब से जानता था/थी. अभी तो टेलीविजन और किताबों पढ़ने/देखने को मिलता था कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती, लेकिन अब साक्षात देख भी रहा हूँ. इस स्टोरी में अभी बहुत से रूचिकर मोड़ आने बाकी हैं. जिन्हे आगे -आगे घट रही घटनाओं के आधार पर समेटने का प्रयास करूंगा.
मेरा लेख के माध्यम से किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का इरादा बिलकुल नहीं हैं, अपितु समाज में घट रही सत्य घटनाओं से सबको परिचित कराने का इरादा है.
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