पार्ट - २ से आगे की कहानी -
कहानी धीरे - २ आगे बढ़ती है और इन दो दिलों में प्यार की तरंगों का प्रवाह तीव्र होता गया। जब उस महिला/पुरुष को उसके रिश्तेदारों ने समझाने की कोशिश की तो उनके ऊपर उनकी बातों का कोई असर नहीं हुआ। फिर भी चुपचाप सबके आंखों के सामने उनका फोन आता और बात होती। इसी दरम्यान उन दोनों का एक बार फिर सामना होना था। और वो दिन था मंगलवार। उपरोक्त पुरुष/महिला अपने घर से सुबह आठ बजे अपना कागज लेनें के लिए निकल गये थे। उसी दिन उनका पुरूष/महिला साथी अपने कार्यों से निवृत्त होकर दिल्ली जाने के लिए निकले। लेकिन वो दिल्ली नहीं गए। सबको चकमा देते हुए एक सच्चे आशिक की तरह वह रास्ते में एक-दूसरे से मिले और विश्रामगृह में जाकर एकांत में कुछ घंटे ब्यतीत किए। हालांकि विश्राम करने का कोई ठोस सूबूत तो नहीं है लेकिन उनका कूबूलनामा था विश्राम करने का।
बाकी कि सारी बातें उनके चेहरे और हाव-भाव को देखकर उनके कूबूलनामें पर मुहर लगा रही थी। उनका चेहरा थका सा प्रतीत हो रहा था, चेहरे की रंगत उड़ चुकी थी। जो समझने वालों के लिए काफी था। सब समझ चुके थे और जब आनंद बस उनसे और जानने की जिज्ञासा हुई तो वो फिर अपनी बात को थोड़ा घुमाने लगा/लगी। जब तक असलियत का पता और असर हो चुका था। आम तौर पर वो पुरुष/महिला काफी बन-ठन कर रहता/रहती थी। लेकिन उस दिन लौटने के बाद उनका चेहरा बहुत अलग दिखाई दे रहा था।
उनसे बात करने वालों को बहुत आनंद भी आ रहा था और प्यार से छिंटाकशी भी कर रही थी। लेकिन उनका/उनकी प्यार और परवान चढ़ चुका था। उन्हें अब किसी परवाह नहीं थी। वो सबसे अलग होकर अपने प्यार की दुनिया में मशगूल रहना चाहती थी। जो प्यार करने वालों के लिए सही भी है। एक दिन और गुजरा तो अगले दिन दिल्ली भ्रमण की योजना बनाई गई और उसमें मोहरा बनाया गया एक 15 साल के बच्चे को। जिसे इन सब बातों की कोई खबर तक नहीं थी। वह बालक भी घूमने के नाम पर खुशी-खुशी तैयार हो गया। अन्ततः समय कम होने के कारण घूमने का प्लान रद्द करना पड़ा।
अगला और अंतिम भाग कल लिखूंगा।
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