उत्तर प्रदेश बीजेपी में आचार संहिता लागू होते हीं भगदड़ मच गयी. आज पूर्वांचल के विधायक और योगी सरकार में श्रम मंत्री श्री स्वामी प्रसाद मौर्या और उनके साथी विदायक बाँदा जिले की तिंदवारी विधानसभा सीट से ब्रजेश प्रजापति, शाहजहांपुर की तिलहर सीट से रोशन लाल वर्मा और कानपुर के बिल्हौर सीट से विधायक भगवती सागर भगवा कुनबा छोड़कर साईकिल पर सवार हो गए हैं. ये दोपहर के बाद की आज की सबसे बड़ी खबर है. कल हीं विभिन्न चैनलों पर चुनावी सर्वे लाईव किया था. जिसमें भगवा पार्टी की सरकार बनते हुए दिखाया जा रहा था. वो सर्वे ठंडा भी नहीं पड़ा था कि पूस की ठंड में आज स्वामी प्रसाद मौर्या ने पार्टी छोड़कर पूर्वांचल के माहौल को गरमा दिया है. गौर करने वाली बात ये है कि चुनावी नजर में नजर आने वाले सारे महारथी अपनी कर्मभूमि पूर्वांचल की भूमि को हीं बना रखें हैं. जिनमें हमारे प्रधानमंत्री श्री मोदी जी वाराणसी (काशी), श्री योगी जी (गोरखपुर), सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव (आजमगढ़), उत्तर प्रदेश के एक उप मुख्यमंत्री श्री केशव प्रसाद मौर्या (फूलपुर, इलाहबाद), कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राहुल गांधी, श्रीमती प्रियंका गांधी (रायबरेली, अमेठी) प्रमुख सियासी चेहरे हैं. जो पूर्वांचल को अपनी राजनैतिक उपजाऊ जमीन बनाये हुए हैं.
स्वामी प्रसाद मौर्य बीजेपी में आने से पहले बीएसपी में रहे और २०१७ में बसपा छोड़ बीजेपी से जुड़े थे. स्वामी जी एक वरिष्ठ नेता हैं और ५ बार के विधायक रहे. वर्तमान सरकार समेत पिछली सरकारों में भी मंत्री रहे हैं. मौर्या जी बेटी श्री संघमित्रा मौर्या भी बीजेपी से सांसद है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि मौर्या जी का राजनैतिक रसूख कितना बड़ा है. एक तरह से कहें तो सपा प्रमुख श्री अखिलेश यादव पूर्वांचल को अच्छे तरिके से साध लिया है. जो प्रदेश में परिवर्तन की खबर को पुख्ता कर रही है. आगे स्वामी प्रसाद मौर्या अपने साथियों के साथ मिलकर बीजेपी को और कितना नुकसान पहुंचाते हैं ? यह देखना दिलचप होने वाला है. लेकिन इतना तो तय है कि मौर्या ने बीजेपी की किल्ली हिला चुके हैं. अब पूर्वांचल में एक बार फिर अगड़े-पिछड़े की राजनितिक लड़ाई बड़े जोर-शोर से उठेगी. स्वामी प्रसाद मौर्या अपने को पिछड़ों और वंचितों का नेता के रूप में अपने आप को प्रचारित करेंगे. पहले भी इनकी पहचान पिछड़ों के एक बड़े नेता के रूप में रही है. अब सपा को ये कितना फायदा पहुंचा सकते हैं ? इसका आंकलन भविष्य में जरूर किया जाएगा.
जमीन पर घट रहे घटनाओं पर नजर डाले तो प्रचण्ड बहुमत के घमंड ने बीजेपी को डूबा दिया. बीजेपी अपने निचे की जमीन को देखने की कोशिश नहीं की या यूं कहें कि बीजेपी अपने पैर को देखना को देखना मुनासिब नहीं समझा. अहंकार में बस आँखों के बराबर हीं देखना जरूरी समझा. इतना बड़ा मंत्री और उसके समर्थक विधायक पार्टी को छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हो जाते हैं और बीजेपी शीर्ष नेतृत्व महज मूक दर्शक बना रहता है. ये अहंकार की बानगी है. इस एक नासमझी के कारण बीजेपी चुनाव में अब धीरे-धीरे निचे की तरफ खिसकते जा रही है. खासकर पूर्वांचल का क्षेत्र हमेशा जातियों में बंटकर वोट करता है. जिसका बीजेपी ने २०१७ विधानसभा और २०१९ लोकसभा चुनाव में बहुत अच्छे से उपयोग किया था. लेकिन समय मामला थोड़ा उलटा पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है. इस क्षेत्र के ओम प्रकाश राजभर जो अपनी जाति पर बढ़िया पकड़ रखते हैं. वो बीजेपी का साथ छोड़ अखिलेश के साथ जुड़ चुके हैं. निश्चित तौर पर बीजेपी अब नुकसान में रहने वाली है. जमीन का मुद्दा रोजगार, आवारा पशुओं से निजात, भय मुक्त शासन, महिलाओ का सम्मान, कृषि उपज की बेहतर कीमत, महँगाई इत्यादि है न कि धर्म. जनता अब अपने हक के लिए सरकार से सवाल पूछना शुरू कर दिया है.
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