Thursday, May 30, 2019

कांग्रेस का टीवी मीडिया त्याग और मोदी का शपथ समारोह

लोकसभा चुनाव में विपक्ष की करारी हार के बाद कुछ अभूतपूर्व घटनाएं घटित हो रही हैं. उन घटनाओं में पहले घटना समाजवादी पार्टी प्रमुख और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव द्वारा अपने प्रवक्ताओं को टीवी पर होने वाली हिन्दू-मुस्लिम समेत सभी तरह के बहसों में जाने से रोकना और आज 30 मई की सुबह जब सबकी आंख खुली तो देखने को मिला कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने भी अपने प्रवक्ताओं को टीवी डिबेट में जाने से रोक दिया और आज के दौर में  भी था क्योंकि "जब पत्रकार संविधान को दरकिनार करके संघ के संविधान /सरकार की भक्ति में लीन हो जाए तो ऐसे पत्रकारों और मीडिया घरानों का बहिष्कार लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत हैं. गोदी मीडिया से दूर रहकर गांव-गिरांव तक जनता के बीच अपनी बात और प्रभावी तरीके से पहुंचाई जा सकती है."

एक तरफ आज संघ/भाजपा इतिहास रचते हुए देश में लगातार दूसरी सरकार बनाने वाली पहली गैर-कांग्रेसी पार्टी बनी तो वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने अपने प्रवक्ताओं को टीवी चैनलों में न भेजने वाला चौकाने वाला फैसला लिया. कमाल तो ये हो रहा है जहाँ एक तरफ भाजपा अपने विजय को महान बताने और जताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है वहीं देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष कैकयी की भाँति कोप भवन में विराजमान हैं और अपनी जिद मनवाने पर अड़े हैं. उनको उनके किसी सिपहसलार को जाकर समझाना चाहिए कि आपके इस कदम से पार्टी का बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है. ऐसे वक्त में राहुल गाँधी को निराश नहीं होना चाहिए वरन एक कुशल बहादुर योद्धा की भाँति फिर से दोबारा अपने काम में जुट जाना चाहिए. हार और जीत को प्रतिष्ठा का विषय बनाना हानिकारक होता है और ऐसी स्थिति में मनुष्य अनेक गैर वाजिब कामों को अंजाम दे देता है और जब उसे होश आता है तो वो पीछे मुड़कर देखने का साहस नहीं कर पाता है. इसलिए राहुल गाँधी को दोबारा अपने पद पर आकर अपने संगठन की अपेक्षाओं के अनूरूप अविलम्ब कार्य शुरू कर देना चाहिए। अटल जी और आडवाणी जी ने भी तीन-तीन विकराल हार के बाद इस्तीफा नहीं दिया था और अपनी समस्त ऊर्जा को इकट्ठा कर लड़े और सफलता के झंडे गाड़े। चुनाव और खेल में एक पक्ष हारता है और दूसरा पक्ष जीतता है इसके अलावा कोई और पक्ष नहीं होता तो कांग्रेस अध्यक्ष को चाहिए कि अपने हठ को त्यागकर देश हित और अपनी पार्टी के हित में सोचें और काम करें.      

"पर उपदेश कुशल बहुतेरे"

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