सर्वप्रथम बीजेपी/संघ को २०१९ का लोकसभा चुनाव इतने विशाल अंतर से जितने के लिए बधाई। इस आम चुनाव ने देश के तमाम मिथक को तोड़ कर रख दिया है. ऐसा प्रतीत होता है कि देश की आवाम ने जहां से २०१४ चुनाव को छोड़ा था वहीं से फिर से दुबारा शुरुआत किया है. जात-पात, धर्म-सम्प्रदाय से ऊपर उठकर जनता ने बीजेपी पर भरपूर वोटों की बारिश की है. जनता ने वोट क्यों दिया अगर आप उनसे पूछोगे तो बस दो-तीन तरह के उत्तर मिलते हैं पहला जबाब जबाब होता है मोदी है, दूसरा जबाब होता है कि बीजेपी हिन्दूओं की पार्टी है और तीसरा पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक मोदी ने किया है. इससे पहले की तो कांग्रेस सरकार निकम्मी थी. कांग्रेस माँ-बेटे की पार्टी है. राजाओं की पार्टी है जबकि मोदी तो गरीब माँ का बेटा है. मोदी के बही की कोई कम्पनी नहीं हैं. मोदी की अपनी कोई औलाद नहीं है तो वह किसके लिए भ्र्ष्टाचार करेगा जबकि कांग्रेस में सब भ्र्ष्ट हैं और राहुल गाँधी तो पप्पू है. कांग्रेस का तब तक कुछ नहीं हो सकता जब तक उसके पास पप्पू है पर जैसे हीं उनसे पूछो कि मोदी ने आपके भविष्य के लिए क्या किया, आपके वर्तमान में क्या बदलाव आया तब वो चुप हो जाते हैं मानो की अब उनके पास कोई जबाब नहीं बचा है. आज के परिणाम में गांधी परिवार का अमेठी जैसा किला ढह गया ठीक वैसे हीं जैसे ९ महीने पहले हुए उपचुनाव में बीजेपी का गोरखपुर ढह गया था.
इस चुनाव से दो-तीन बातें बहुत साफ़ हो गयी है कि अब इस देश का मानस में बहुत बदलाव आ चुका है. उसका दो-तीन प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से मैं प्रकाश डालने की कोशिश कर रहा हूँ -
१) साध्वी प्रज्ञा का भोपाल से जीतना - इस चुनाव में साध्वी प्रज्ञा भजपा/संघ की तरफ से उग्र हिंदुत्व के एक पोस्टर ब्यॉय के तौर पर उभरी हैं. जो प्रयोग बीजेपी ने मध्य प्रदेश के भोपाल से आतंक के आरोपी प्रज्ञा ठाकुर को लोक सभा का चुंबाव लड़ाकर किया और मोदी-शाह की जोड़ी समेत बीजेपी के सभी पदाधिकारियों ने उसका समर्थन किया उससे लगता है कि संघ/भाजपा अपने मंसूबों में पूरी तरह सफल रही क्योंकि ये लोग धीरे-धीरे देश को इसी विमर्श की तरफ ले जाने की कोशिश काफी लम्बे समय से कर रहे थे. क्योंकि इनकी प्रथमिकता ये है कि देश को एक रंग में रंग दिया जाए, देश में एक हीं सोच हो जिसे हर किसी के ऊपर थोप दिया जाए, देश में केवल एक विचार का बोलबाला हो और कमाल की बात ये है कि अब जनता भी बीजेपी/संघ के इस कृत्य का साथ दे रही है. जिस भाषा को संघ/बीजेपी वाले पर्दे के पीछे बोलते थे अब उसे साध्वी प्रज्ञा और साक्षी जैसे उदण्ड नेता खुलेआम बोलते हैं. ये लोग राष्ट्रपिता बापू जी को देशद्रोही और हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताते हैं. ये सब कुछ एक दिन में नहीं हुआ या जुबान फिसलने से नहीं हुआ. इस स्तर के घटिया नेताओं को आगे करके ये काफी पहले से किया जा रहा है. जनता भी इसमें बराबर की भागिदार हो रही है. संघ कभी नहीं चाहा कि गाँधी जी और नेहरू जी का नाम इस देश में हो. नेहरू जी को तो संघ वाले खुलेआम गाली देते हीं थे अब वे गाँधी जी बारे में भी सार्वजनिक तौर पर अपमानजनक बातें करने से गुरेज नहीं कर रहें हैं. संघ/भाजपा के लोग गांधी जी और नेहरू जी के बारे में जो बातें अपनी शाखा के अंदर बोलते थे वो अब इनकी जुबान से बाहर भी आने लगे हैं.
२) जनता का मुद्दों को भूल जाना - जनता इस आम चुनाव में तमाम सारे ज्वलंत मुद्दों को भूलकर बस एक चेहरे पर आकर्षित हो गयी जिसका नाम नरेंद्र मोदी था. जनता ने महंगाई के मुद्दे को भूला दिया, युवाओं ने रोजगार के मुद्दे को भूला दिया, किसानों ने अपनी बदहाली और बढ़ती आत्महत्या को भूला दिया। ये सब एक परिवर्तन हीं तो है और इसे आश्चर्यजनक परिवर्तन कहा जा सकता है. बताओ जिस उज्ज्वला योजना के तहत ६ करोड़ से ज्यादा गैस सिलंडर बांटे गए और सरकारी आंकड़ें बताते हैं कि ८० प्रतिशत सिलंडर दुबारा भरवाए नहीं गए क्योंकि गैस के दाम बहुत ज्यादा थे. गृहणियां इस ब्यथा को भी भूल गयी तो इसे हम मोदी मोह हीं कहेंगे।
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