Thursday, December 31, 2020

2020 की महत्वपूर्ण झलकियां

आज बीतने जा रहा साल 2020 अपने आप में अनेक घटनाओं को समेटे हुए था। जो हमारे देश के साथ हीं साथ पूरे विश्व जगत के लिए कष्टकारी सिद्ध हुआ। आज मैं उन्हीं कुछ अहम घटनाओं का अपने विवेकानुसार जिक्र करूंगा।

कोरोना का भारत आगमन - कोरोना जो आज तक नहीं गया और समाज के लिए नासूर बना हुआ है। उसका आगमन केरल में सबसे पहले जनवरी महीने में हीं हो चुका था। तब तक पूरा चीन, अमेरिका और यूरोप इस लाईलाज बिमारी की बहुत बुरी गिरफ्त में पहुंच चुका था। राहुल गांधी ने जनवरी महीने में हीं सरकार से कोरोना के प्रभाव पर अपनी चिंता जाहिर की थी। जिसे सरकार समेत केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जी द्वारा राहुल गांधी का पूर्व की भांति उपहास उड़ाते हुए खारिज कर दिया। सरकार की उस गलती का परिणाम ये रहा कि करोड़ों लोगों ने रोजगार गवां दिये और हिन्दुस्तान के इतिहास में जीडीपी ने रिकार्ड 23 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की। कोरोना आज तक लाईलाज बीमारी बनी हुई है। कोरोना के गिरफ्त में करोड़ों देशवासी आये और डेढ़ लाख से ज्यादा ने अपने जान गवाएं‌। सरकार की लापरवाही का नतीजा हमें अपनी-अपनी नौकरियों को खोकर चुकाना पड़ा।

एम पी में सिंधिया की कांग्रेस से गद्दारी और भाजपा की सवारी - फरवरी के अंत और मार्च की शुरुआत में हीं महज 15 महीने बाद कांग्रेस नीत कमलनाथ की सरकार को हटाने की पटकथा केन्द्र के इशारे पर सिंधिया ने लिख दी थी। सिंधिया ने सरकार में शामिल अपने 22 समर्थक विधायकों को भाजपा शासित कर्नाटक के होटल में भेज दिया। काफी कश्मकश के बाद सिंधिया ने अपने समर्थकों का विधानसभा से इस्तीफा करवा कर बीजेपी को बहुमत प्राप्त करना दिया और खुद भी भाजपाई बन गये और भाजपा से राज्यसभा सांसद बने। सिंधिया की गद्दारी साल की सबसे बड़ी राजनीतिक घटनाओं में से एक है।

लाकडाउन का पहली बार इस्तेमाल - मार्च के महीने में जैसे हीं जोड़-तोड़ कर मध्य प्रदेश में सिन्धिया की गद्दारी से बीजेपी ने अपनी सरकार का गठन किया। ठीक उसी के दो-तीन दिन बाद केन्द्र सरकार ने 22 मार्च को एक दिन के लाकडाउन की घोषणा किया। वह लाकडाउन ऐसा था जब सामान्य सरकारी आदेश से रेल, मेल, बस, ट्रक, स्कूटर, साईकिल, प्लेन यहां तक कि पैदल आवागमन भी बन्द कर दिया गया था। जहां पर इंसानों के ऊपर पुलिस का पहरा बिठा दिया गया था। एक-एक करके सम्पूर्ण लाकडाउन को ४५ दिनों तक बढ़ा दिया गया. जिस दौरान देश के सारी गतिविधियां मानों  सिमट कर के हीं रह गयी हों. इस दौरान खुशी और मातम मनाने पर भी सरकार का पहरा था. 

ताली-थाली बजाकर कोरोना भगाने का बेहूदा ज्ञान और प्रचार - सम्पूर्ण लाकडाउन लगनेे और कोरोना वाायरस के विकराल रूप धारण करने के बाद सरकार खासकर प्रधानमंत्री जी ने देश को सम्बोधित करते हुए कहा कि ताली-थाली बजाइये। जिससे की जनसेवा में लगे हमारे भाई-बहनों का उत्साहवर्धन हो सके. प्रधानमत्री जी के इस कथन को देश की जनता ने ब्रम्ह वाक्य की तरह लिए. और पूरा देश मिलकर  खूब ताली-थाली बजाया। प्रधानमंत्री जी के इस  कथन के बाद बीजेपी का बगलबच्चा संगठन के पधाकारियों और भक्तों ने इसे मोदी जी का कोरोना भगाने का मंत्र कह कर गांव और कस्बों में खूब प्रचारित किया। लेकिन कोरोना और बिकराल से धारण कर लिया।  

समस्त देश से श्रमिकों का अपने-अपने गृह राज्यों को पलायन - इस दौरान देश को एक अभूतपूर्व तस्वीर को देस्खना पड़ा. जो अत्यंत पीड़ादायक था. १५ दिन के लकडाउन का पहला चरण समाप्त होने तक देश के नागरिकों में एक दृढ विश्वास था कि  मोदी जी कुछ चमत्कार जरूर करेंगे और सब चंगा हो जायगा। उसके बाद हमारी जिंदगी फिर से आम हो जायेगी। हमारी दिनचर्या पूर्व की भाँति फिर से पटरी पर लौट आएगी। लेकिन जैसे हीं मोदी जी ८ बजे सायं को टीवी पर अवतरित हुए और घोषणा किये कि दो हफ्ते के लिए आपको और अपने घरों में कैद रहना पड़ेगा। मानों तब भक्तों और नागरिकों का सब्र जबाब देने लगा. उस स्थिति में देश के विभिन्न शहरों से बहुत बड़ी मात्रा में पलायन शुरू हो गया. क्या दिल्ली, क्या पंजाब, क्या मुंबई, क्या बंगलौर। सब जगह से श्रमिक अपने-अपने घरों को पलायन कर लिए.

इस दरम्यान सबसे दुःख की बात ये रही कि परिवहन के सरे साधन बस, रेल, हवाई सेवा, ऑटो सब बंद थे. तो लोग पैदल हीं सड़कों पर उतर पड़े और हजार-हजार किलोमीटर की यात्रा २०-२० दिनों में पूरी किये। इस दौरान दूध मुंहे बच्चों को कोई माँ अपने  चिपका कर पैदल सड़क पर चल रही थी तो कहीं नंगे पाँव कोई बच्चा डगमगाते हुए क़दमों से चलकर अपने माता-पिता का साथ दे रहा है. इन बेचारों के पास खाने को एक दाना भी नहीं होता था न पीने को पानी। नोएडा से दिल्ली, लखनऊ से पटना, मुंबई से पटना की सड़कों पर पैदल, ठेले और साईकिल से चलने वालों रेला लगा हुआ था. उनका कष्ट देखकर समाज के लोग और पुलिस वाले भी रो पड़ते थे. इस सफर के दौरान पुलिस के बहादुर जवानों और सिविल सोसाइटी के लोगों ने इन जरूरतमंद राहगीरों की बहुत मदद करी. सिविल सोसाइटी के सहयोग से पुलिस के जवानों ने जगह-जगह खाने, पानी, दवा और कुछ हद तक परिवहन की ब्यवस्था की. हफ्तों तक ये सिलसिला अनवरत सड़कों पर चलता रहा और हमारे सिविल सोसाइटी के लोग तथा पुलिस के जवान बिना थके उनकी सेवा में लगे रहे. एक बार आप लोगों को भी सलाम। 

पुण्य प्रसून बाजपेयी जी से एक छोटी मुलाकात

आज दोपहर लगभग तीन बजे मैं नोएडा से जा रहा था। तो सहसा सेक्टर 6 में पहुंचते हीं मेरी नज़र उस शख्स पर पड़ी। जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सच की आवाज ‌हमेशा बुलंद किया। वो शख्स चाहे आज तक का "दस्तक" हो या एबीपी न्यूज का "मास्टरस्ट्रोक"। इन सभी शो में अपनी दमदार एंकरिंग से छा जाने वाले पूण्य प्रसून बाजपेयी जी से हुई। वो बिल्कुल सरल स्वभाव के इंसान हैं। उनसे रूक कर महज दो मिनट बात हुई होगी। क्योंकि वो अति ब्यस्त थे। जब मैंने उनसे उनके टी वी शो का उल्लेख किया तो उनका जवाब था कि आप हमारी यात्रा के बारे में काफी कुछ जानते हो। तो मैं बोला जी हां। इसके बाद वो अपने घर में चले गए। अब मुझे उनसे मिलने का इंतजार है। यह सत्य है कि जब भी मुझे किसी तथ्य की पुष्टि करनी होती है तो मैं सबसे पहले बाजपेयी जी को हीं सर्च करता हूं। बाजपेयी जी की ब्यस्तता के कारण उनके साथ एक तस्वीर भी नहीं ले सका। इसका मुझे मलाल है, लेकिन जब दोबारा मिलूंगा तो मैं मौका हाथ से जाने नहीं दूंगा। यह साल तो विश्व समुदाय के लिए मासूमियत वाला साल रहा है। लेकिन साल के अन्तिम दिन बाजपेयी जी से दो क्षण की मुलाकात हीं सही अन्त बढ़ियां बना गया।

Thursday, December 24, 2020

राहुल गांधी के नेतृत्व में सोशल मीडिया से निकलकर जमीन पर किसानों के पक्ष में समर्थन

दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसान भाइयों के समर्थन में लगभग 29 दिन बाद राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने सोशल मीडिया से निचे उतरकर जमीन पर प्रदर्शन किया और किसानों को अपना और अपनी पार्टी का समर्थन दिया। जो निश्चित तौर पर घाटा-मुनाफा का आंकलन करने के बाद समर्थन देने के बारे में निर्णय लिया गया होगा। और यह निर्णय एक देशवासी होने के नाते और जिम्मेदार विपक्ष होने के नाते जरूरी था। किसानों को समर्थन देने के लिए कांग्रेस पर राजनीति करने का भी आरोप लगाया जायेगा। जिसे कांग्रेस को खुले मन से स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि कांग्रेस भी एक राजनीतिक पार्टी है और वो राजनीति करने के लिए है न कि भजन-कीर्तन करने के लिए।
राहुल गांधी की अगुवाई में महीनों बाद कांग्रेस पार्टी सभी बड़े नेताओं के साथ किसान बिल के विरोध में धरना प्रदर्शन किया। और दो करोड़ चिट्ठीयों के साथ राष्ट्रपति को मेमोरण्डम सौंपने की कोशिश किया। लेकिन कोरोना काल को देखते हुए राहुल गांधी, गुलाम नबी आजाद और अधीर रंजन चौधरी को हीं राष्ट्रपति तक पहुंचने का आदेश मिला। इस दौरान प्रियंका गांधी, वेणुगोपाल, सुष्मिता देव समेत काफी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को कुछ घंटों के लिए दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया फिर बाद में छोड़ दिया। कांग्रेस का किसानों के हक में प्रदर्शन राजनीतिक और विपक्षी पार्टी के लिहाज से उचित है। कांग्रेस को इस मुद्दे को जन-जन से जोड़ने की जरूरत है। कांग्रेस अपने कार्यक्रमों में किसानों के हित को सबसे उपर रखकर बात करनी चाहिए। आम जन भी सरकार के पूंजीवादी मित्रों के बारे में जानता है। बस वह विकल्प नहीं मिल पा रहा है जिसे जनता अपना मत दे। आज के दौर को देखकर स्व.राहत इन्दौरी जी का एक शेर बरबस हीं याद आ रही है। जो कुछ इस तरह है-

लगेगी आग तो आयेंगे घर की जद में ।
यहां अकेले मेरा मकां थोड़ी है ।।

इससे यह सीख मिलती है कि काश ! शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों का साथ आज के प्रदर्शनकारी दिए होते। जब न तो इनको ये दिन देखना पड़ता और न हीं उन्हें। सरकार ने उस प्रदर्शन के माध्यम से देश की जनता का नब्ज टटोला और जब उन्हें लगा कि उम्मीद के मुताबिक सब धर्मों में विघटित हो चुके हैं। तो बिना वक्त गंवाए किसान बिल लाकर दोनों सदनों से पास करा दिया। मैं नहीं मानता कि इसमें सरकार की ग़लती थी। इसमें हमारी गलती थी‌। जिसका संघ और सरकार ने बस फायदा उठाया। एकत्र होंईए, अपनी लड़ाई अपने दम पर लड़िए। धर्म में अन्धे मत बनिए। हम सबका धर्म इतना कमजोर नहीं है जिसे कोई कांग्रेस या बीजेपी मिटा दे या स्थापित कर सके। 
किसान आन्दोलन पर सरकार का रवैय्या शाहीन बाग वाले प्रदर्शन की तरह हीं सख्त है। सरकार को लगता था कि किसानों से बात नहीं किया जायेगा तो वो थक-हार कर वापस चलें जायेंगे। पर सरकार का आंकलन गलत निकला। सरकारी पार्टी के प्रवक्ता शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को तो खुलेआम जिहादी, पाकिस्तान परस्त, आतंक परस्त बोल रहे थे पर किसानों के सन्दर्भ में खुलेआम नहीं बोल पा रहे हैं। क्योंकि यहां बहुतायत संख्या में हिन्दू अनुयायी हैं। भाजपा के प्रवक्ता मजबूरी वश मुंह सिले हुए हैं।

Friday, December 4, 2020

1988 के बाद किसानों का सबसे बड़ा और आन्दोलन

आजकल अन्नदाता पंजाब एवं दूसरे प्रान्तों से हजारों किलोमीटर दूर चलकर दिल्ली को घेरकर बैठे हुए हैं। उनकी बस एक मांग है कि जो जून महीने में सरकार कृषि संबंधी तीन नया बिल बनाया है। उसे किसी भी कीमत पर सरकार द्वारा वापस लिया जाना चाहिए। किसान दिसंबर की सर्द रात मे डंडे और पानी की बौछारों को सहते हरियाणा होते हुए दिल्ली तक आ पहुंचे हैं। जिसकी चिंता की लकीरें सरकार के माथे पर साफ-साफ महशूस की जा सकती है। जहां आन्दोलन की शुरुआत में सत्ता पक्ष और मिडिया इस आंदोलन को कभी सिर्फ पंजाब से जोड़ने की कोशिश करते थे तो कभी खालिस्तानियों के समर्थन से चलने वाला आन्दोलन बताते थे। वो सब आज किसानों से चार-चार दौर की बात कर रहे हैं। इस बिल से किसानों को बहुत समस्या है। उनमें सबसे बड़ी चिंता "कांट्रेक्ट फार्मिंग" को लेकर है। जिस पर वो एम एस पी पर सरकार से कानून में लिखित गारंटी मांग रहे हैं।

जैसा कि विभिन्न स्रोतों को आधार बनाकर दावा किया जा रहा है कि पूरे देश के लगभग 500 किसान संगठन इस आंदोलन को अपना समर्थन दे रहे हैं। वस्तुत: 1988 के बाद सम्भवतः किसानों का यह पहला बड़ा और सफल आंदोलन मालूम पड़ता है। 1988 में देश भर के लाखों किसान टिकैत जी के नेतृत्व में बोट क्लब पर 10 दिन तक धरना दिया था। जिस का नतीजा ये रहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. श्री राजीव गांधी जी को धरना स्थल पर पहुंच कर किसानों की सभी मांगों को मानना पड़ा था।

आज एक बार फिर से इतिहास दोहराया जा रहा है। किसान अपनी पूरी ताकत से इस आंदोलन को धार दे रहें हैं। आज मैं नई दिल्ली ट्रेन पकड़ने के लिए जा रहा था। तो देखा कि डाबर से यू पी गेट वाले रास्ते को एक तरफ से पूरी तरह बंद कर दिया गया था और पुलिस का सख्त पहरा भी था। इससे प्रतीत होता है कि किसानों से सरकार डर रही है। चार दौर की वार्ता के बाद भी अभी कोई फैसला नहीं निकल पाया है। किसानों की समस्या को अब सरकार ने। एड्रेस करना शुरू किया है। काश यही संवेदनशीलता सरकार संसद में कानून पास करते समय दिखाई होती और चर्चा की होती तो आज यह हाल नहीं देखने को मिलता। 

Wednesday, November 25, 2020

अहमद भाई पटेल एक दूर्लभ प्रजाति के कांग्रेसी नेता

टीवी और सोशल मीडिया के माध्यम से पता चला कि आज शुद्ध कांग्रेसी नेता आदरणीय अहमद भाई पटेल जी का तड़के 3.40 पर कोरोना संक्रमण की वजह से निधन हो गया। सबसे पहले मेरी तरफ से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी आत्मा को स्वर्ग में सर्वोच्च स्थान पर आसीन करें।
आज जब मैं सुबह हो कर उठा तो न्यूज एप के नोटिफिकेशन में एक खबर फ्लैश हुई। जिस पर सहसा यकीन नहीं हुआ तो उसे खोलकर पढ़ा और बेचैन हो गया कि इतना बेहतरीन इंसान इस दुनिया से चला गया। मैं कांग्रेस के लिए ज्यादा ब्यथित हुआ कि अब आगे क्या होगा ? कांग्रेस को कवर करने वाले मीडिया बन्धु और कांग्रेसी नेताओं के बयानों सुनकर और पढ़कर अहमद भाई के किरदार और अहमियत को आसानी से समझा जा सकता है। मैं कोई राजनीतिक ब्यक्ति नहीं हूं जो अहमद भाई के बारे में ज्यादा कुछ जानता हूं। पर हां ! मीडिया में उनके शख्सिसत की चर्चा मैं 2005 से सुन रहा हूं। मैं 2017 के गुजरात राज्य सभा के चुनाव को मीडिया के माध्यम से नजदीकी से समझा। जहां एक तरफ कांग्रेस के विधायक बीजेपी के पाले में चले गए थे और भाजपा ने उन्हीं बागियों में से एक को राज्य सभा के लिए समर्थन की घोषणा भी कर दी। बीजेपी के चाणक्य अमित शाह जी कत्तई नहीं चाहते थे कि अहमद भाई पटेल राज्य सभा का चुनाव जीतें। इसलिए उन्होंने अहमद पटेल की चौतरफा घेराबंदी कर दिए थे। उस दौरान शान्त रहते हुए अहमद भाई ने शाह के ब्यूह को अपने कौशल से सफलतापूर्वक तोड़ते हुए एक वोट से विजय श्री हासिल की। ये था कौशल अहमद भाई का। 
अहमद भाई कांग्रेस के वो नेता थे जो हमेशा दुनिया की नजरों से ओझल होते हुए भी कांग्रेस के सच्चे संकटमोचक रहे। हाल की दो घटनाओं में भी अहमद भाई ने अपने कौशल का परिचय देते हुए विचारों से धुर विरोधी शिव सेना को महा विकास अघाड़ी से जोड़ा और महाराष्ट्र में गठबंधन की सरकार का रूपरेखा तैयार किया। जिसकी तस्कीद आज सुबह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे जी ने भी किया। दूसरी घटना राजस्थान में गहलोत से टकराव के बाद पायलट का विद्रोह। जिसमें देश के सारे प्रतिष्ठित पत्रकारों, कांग्रेसी नेताओं और राजनीतिक जानकारों ने ये मान लिया था कि सिंधिया की तरह पायलट भी बीजेपी के खेमें में शामिल हैं। तब भी चर्चाओं से दूर अहमद भाई ने अपना काम बखूबी अंजाम दिया था और सकुशल पायलट की कांग्रेस में वापसी कराई। कांग्रेस के लिए वो कितने महत्वपूर्ण थे इसका अंदाजा सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जी के बयानों से जाहिर होता है। अहमद भाई गांधी परिवार के कितने करीब रहे हैं। ये बात किसी से छिपी नहीं है। उसका यहां उल्लेख करने का मतलब होगा बातों का दोहराव करना। तीन बार के लोकसभा सांसद और पांच बार का राज्य सभा सांसद बनने के बाद भी सत्ता का कभी हिस्सेदार नहीं बनना निश्चित तौर पर एक संत हीं कर सकता है और वो थे अपने अहमद भाई। अहमद भाई को इंदिरा गांधी जी से लेकर राजीव जी फिर मनमोहन सिंह जी ने मंत्रालय संभालने के लिए की बार अनुरोध किया। लेकिन इस योगी ने हर बार विनम्रता के साथ संगठन के लिए ठुकरा दिया। विरोधी भी अहमद भाई पटेल के मुरीद थे। बाकी मैं देश के प्रतिष्ठित पत्रकारों और लोगों के शब्दों को अपने लेख में जोड़कर अहमद भाई पटेल को सच्ची श्रद्धांजलि दूंगा।









अहमद पटेल साहब को अहमद भाई कहते थे। हमारी पार्टी के ऐसे एक व्यक्ति, जिनके पास पहुंचकर सारे संकट, चिंताएँ दूर हो जाती थी। जब से पार्टी में पहला कदम लिया है तब से एक वो केंद्रित जगह अहमद भाई की ही थी : श्री @salman7khurshid 25 Nov 7.20 PM Twitter

राजनीति से भी हटकर मेरे घनिष्ठ मित्र अहमद भाई के देहांत से मुझे गहरा आघात लगा। उनका इस तरह जाना मेरे लिये व्यक्तिगत क्षति है। आज मैंने अपना एक करीबी दोस्त और विश्वसनीय साथी खोया है। अहमद भाई की कमी को कोई भी पूरा नहीं कर पायेगा। श्री अहमद पटेल ने पूरा जीवन कांग्रेस पाटी के लिये समर्पित कर दिया। 
अशोक गहलोत मुख्यमंत्री राजस्थान। Twitter


Tuesday, November 10, 2020

बिहार चुनाव कांग्रेस गठबंधन के लिए सुखद

बिहार का शुरूआती रूझान कांग्रेस गठबंधन के लिए सुखद प्रतीत हो रहा है। इस चुनाव को मोदी जी और नीतीश कुमार जी ने अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया था। लेकिन नतीजों का अध्ययन करने के बाद ऐसा लगता है कि बिहार की महान जनता ने उनके अहम को काफूर कर दिया। और देश को एक नया रास्ता दिखाने के लिए बिहार हमेशा से हीं अपना उत्कृष्ट स्थान रखा हुआ है। महात्मा गांधी जी ने चंपारण से हीं अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ने का बिगुल बजाया और पूरी दुनिया को चंपारण ने एक नया दिशा दिखाया था। लगता है बिहार इस भी इस निरंकुश सरकार के विचारों के खिलाफ जाकर एक नया मानदंड स्थापित करने का काम किया है।

इस चुनाव में आम तौर पर शालीनता की मूर्ति कहे जाने वाले नीतीश कुमार जी ने लालू परिवार पर कुछ निजी हमले किए। जिसमें नीतीश जी की खींझ साफ-साफ देखा जा सकता था। चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश जी सभाओं में बेचैन नजर आते थे। इस चुनाव में नीतीश और मोदी जी के कोरोना चुनौती से निपटने के लिए असफल हुए और इस चुनाव में उसका भी असर देखने को मिल रहा है। बीजेपी के नेता बेरोजगारी के मुद्दे पर सवालों का जबाव बड़े थेथरेपन से देते थे। जिससे जनता में इनके प्रति नाराजगी बढ़ती गई और ये दंभ में चूर उसे भांप नहीं पाये। जिसका परिणाम हार के रूप में सामने दिखाई दे रहा है।

गौर करने वाली बात यह है कि 1990 के बाद ये पहला चुनाव आरजेडी लालू प्रसाद यादव के बगैर लड़ रही है। लालू यादव बिहार की राजनीति में खुद एक चमकते ब्रांड की तरह रहे हैं। लालू की भाषण कला और लोगों से जुड़ने का तरीका बिल्कुल अलहदा और सुखद अनुभव वाला होता है। चूंकि लालू यादव चारा घोटाले में झारखंड की दुमका जेल में बतौर सजायाफ्ता बंद हैं। जिसकी कमी बिहार की जनता और राजद को निश्चित तौर पर कल रही है।

Saturday, October 31, 2020

बिहार में अबकी बार बदलाव की प्रबल संभावना

बिहार चुनाव इस साल का और यूं कहें कि आने वाले अगले एक साल तक का सबसे बड़ा चुनाव साबित होने वाला है। इस बात के आसार प्रबल हैं कि इस बार बिहार में बदलाव की बयार चलेगी। उसके कुछ कारक भी है-

नितीश कुमार के खिलाफ 15 साल की सत्ता विरोधी लहर- नितिश जी की छवि अमूमन 'सेकुलर' और विकास वाले नेता की रही है। वो जबसे 2005 में पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए। उसके बाद उन्होंने कभी पिछे मुड़कर के नहीं देखा। बीजेपी गठबंधन के साथ 5 साल का पहला सफल कार्यकाल पूरा करने के बाद नितिश जी फिर इसी गठबंधन का चेहरा बनकर 2010 में दुबारा जनता के सामने अपने काम को लेकर गये। और बिहार की जनता ने एक बार फिर से नितिश जी के काम और चेहरे को सिर आंखों पर बिठाया और पहले कार्यकाल से भी बड़ी जीत दर्ज कर वापस सत्ता में पुनः स्थापित हुए। और पूर्व की भांति एकाग्र होकर अपने काम पर ध्यान देने लगे।

2013 में मोदी के नाम पर नितीश-भाजपा का पुराना गठबंधन टूटा- नितीश कुमार की पार्टी और भाजपा में सबकुछ बढ़िया चल रहा था कि अचानक भाजपा ने तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नाम को आधिकारिक तौर पर आगे करके 2014 का लोकसभा चुनाव की घोषणा कर आक्रामकता के साथ चुनाव में उतर चुकी थी। जिसको स्वीकार करने के लिए बीजेपी की तरफ से नितिश कुमार पर दबाव बन रहा था। परन्तु गौर करने वाली बात ये है कि गुजरात में हुए भीषण नरसंहार (दंगे) में मोदी जी पर किसी खास समुदाय को जानबूझकर लक्ष्य करने का आरोप लग चुका था। जिसकी वजह से अल्पसंख्यकों में डर का माहौल था। और नितिश कुमार की छवि एक गैर-सांप्रदायिक नेता की थी। 

तो उस वक्त नितिश कुमार उस दोराहे पर खड़े थे। जिसकी एक तरफ दिल्ली की सत्ता में भागीदारी साफ-साफ देख सकते थे और दूसरी तरफ उनकी सेकुलर छवि थी। जिसने नितिश कुमार को बिहार का एक सर्वमान्य नेता बनाया। तो अन्तत: यह हुआ कि 2013 के मध्य में जेडीयू और बीजेपी का गठबंधन टूट गया और दोनों पार्टियां एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ी। जिसमें भाजपा को अप्रत्याशित लाभ हुआ तो वहीं जेडीयू महज दो सीटों पर आकर सिमट गयी। और नितिश कुमार ने हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और महादलित समाज से आने वाले जीतनराम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया।

गठबंधन टूटने के बाद लालू प्रसाद यादव बने नितिश कुमार का सहारा - जैसा कि ऊपर वाले पैराग्राफ में विवरण दिया गया है कि मोदी जी के नाम पर जब नितिश-भाजपा का गठबंधन टूटा तो लालू यादव बार-बार नितिश के खेवनहार बने। भाजपा के समर्थन वापसी के बाद कांग्रेस और लालू जी की पार्टी राजद ने बारी-बारी जीतनराम और नितिश कुमार जी का कुर्सी सुख भोगने के लिए समर्थन किया। भाजपा के सह पर जब जीतनराम मांझी ने जेडीयू में बगावत कर दिया और नितिश कुमार को मुख्यमंत्री पद पर पहुंचने से रोकने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए। उस दौरान मत विभाजन के वक्त विधानसभा में भाजपा ने आधिकारिक तौर पर मांझी के पक्ष में वोट किया। तो वहीं दूसरी तरफ लालू और कांग्रेस पार्टी ने लालू के कहने पर नितिश के आमंत्रण पर नितिश कुमार के पक्ष में मतदान किया और विधानसभा में नितिश कुमार जी एक बार फिर अपना बहुमत सिद्ध करके मुख्यमंत्री पद को सुशोभित किया।

2015 का विधानसभा चुनाव लालू-नितीश और कांग्रेस ने मिलकर लड़ा और जीता- इतने बड़े घटनाक्रम के दौरान पार्टी के उदय के समय से एक दूसरे के खिलाफ राजनितिक लड़ाई और भाषण देने वाली पार्टी मोदी इफेक्ट की वजह से एक साथ आ खड़ी हुई। इस बात से कत्तई इनकार नहीं किया जा सकता है कि मोदी ने दो विपरित ध्रुव के लोगों को एक पाले में लाकर खड़ा कर दिया। एक तरह से 1990 के बाद का एक बहुत बड़ा प्रयोग था। पूरे देश के राजनीतिक पंडितों के मन में गठबंधन के मूर्त रूप लेने से लेकर वोट हस्तांतरण तक बहुत सवाल दौड़ रहा था। अन्तत: राजनीति का यह सबसे बड़ा प्रयोग सफल रहा। जिसमें राजद-जेडीयू-कांग्रेस गठबंधन बहुत विशाल जीत हासिल की। जहां चंद महिने पहले हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सबको मिट्टी में मिला दिया था और प्रचंड जीत हासिल की थी। वहीं विधानसभा चुनाव में भाजपा तीसरे नंबर की पार्टी बन गई। इस राजनैतिक प्रयोग का आखिरकार ढ़ाई साल में अन्त हो। गया। जिसपर लालू के बेटे और सरकार में उप-मुख्यमंत्री रहे तेजस्वी कुमार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए महज चार घंटे में बीजेपी गठबंधन के साथ मिलकर सरकार बनाने तक संपन्न हुआ। 

लालू परिवार पर भ्रष्टाचार का आरोप खुद नितिश के तर्कों से कमजोर - जैसा कि ऊपर दिए गए पैराग्राफ में विवरण अंकित है कि नितीश कुमार भाजपा के साथ सरकार बनाकर लालू प्रसाद यादव के परिवार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर सरकार छोड़ने का निर्णय लिया। वो तो जनता को पहले से पता था कि लालू के ऊपर "चारा घोटाले" का आरोप लगा है और आरोप सिद्ध होने पर जेल भी जा चुके थे। जब नितीश कुमार 2015 में लालू के साथ मंच साझा कर रहे थे। उस दौरान भी लालू यादव झारखंड की जेल से जमानत पर बाहर आते थे। तो ये तर्क अब जनता के सामने भाजपा और नितीश की नहीं चलने वाली है। जनता सब देखती है और समझती है।

तेजस्वी आत्मविश्वास से लबरेज- इस चुनाव में राजद लालू यादव की अनुपस्थिति में पहली बार चुनाव लड़ रही है। राजद के नेता और महागठबंधन के मुख्यमंत्री उम्मीदवार तेजस्वी कुमार आत्मविश्वास से लबरेज होकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं। एक-एक दिन में 13 रैलियां और इस 28 साल के नौजवान के पीछे पीएम और दर्जन भर सीएम पड़े हुए हैं ‌ फिर भी यह नौजवान बांका एक निर्भीक योद्धा की भांति सबके सामने अकेले खड़ा है।

संभावनाओं के अनुसार राजद और कांग्रेस का गठबंधन चुनाव जीत रहा है। बाकी तो ईवीएम में कैद परिणाम 10 नवम्बर को अपना अंतिम निर्णय बता देगा।

 

 

Tuesday, September 22, 2020

राज्य सभा में विवादित कृषि बिल पास, विपक्षी सांसदों का राज्यसभा के प्रांगण में पूरी रात धरना

संसद में पारित किसान बिल के खिलाफ देश का किसान अब इकट्ठा हो चुका है। जो बिल लोकसभा सभा के बाद राज्य सभा‌ में विवादित तरीके से पास किया गया। वो सरकार के प्रति किसानों को आन्दोलित करने वाला था। कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टियां अब किसानों के हक में अपनी आवाज संसद से सड़क तक बुलंद की हुई हैं। जब यह बिल राज्यसभा में ग़लत तरीके से पास कराया जा रहा था तो उस समय विपक्ष के कुछ सांसद वेल में जाकर रूल बुक पिठासीन अधिकारी को दिखा रहे थे। जिसको भी सत्ता पक्ष के उपसभापति श्री हरिवंश सिंह जी द्वारा नकार दिया गया। तो विपक्षी सांसदों ने सदन के अंदर हीं रूल बुक फाड़ दिया गया। सरकारी तंत्र लोकतंत्र का गला घोंटता रहा और उपसभापति उसमें अपनी भागीदारी निभाते रहे।

इस तरह के तीखे विरोध के कारण कांग्रेस, टीएमसी, सीपीएम, और आप के सासंदों राजीव सातव, डेरेक ओ ब्रायन, डोला सेन, हुसैन और संजय सिंह को एक हफ्ते के लिए सदन से निलंबित कर दिया गया। जिसके विरोध में ये तमाम सांसद संसद परिसर के अंदर हीं गांधी प्रतिमा के पास पूरी रात किसानों के हित के लिए खुले आसमां के निचे आन्दोलनरत रहे। परन्तु सरकार को रत्ती भर शर्म का अहसास नहीं हुआ। उधर युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता पूरे देश में ट्रैक्टर के जरिए आन्दोलन कर रहे हैं। जिसमें बड़ी संख्या में किसान भाई भी शामिल हो रहे हैं। 

सरकार का कहना है कि किसान बिल पर कांग्रेस और विपक्षी पार्टियां देश को गुमराह कर रही हैं तो एक सवाल का ज़बाब संघ और मोदी जी को जरूर देना चाहिए कि जब निश्चित तौर पर यह बिल किसान हितैषी था तो अपने कैबिनेट सहयोगी अकाली दल को क्यों नहीं समझा पाए ? अकाली दल कोटे से एक मात्र मन्त्री हरसिमरत कौर बादल ने इस बिल को किसान विरोधी बताते हुए आपकी कैबिनेट से क्यों इस्तीफा दे दिया ? शिरोमणि अकाली दल आपकी पांच दशकों से सहयोगी पार्टी रही है उसने इस बिल पर आपसे रिश्ता क्यों तोड़ लिया ? जो अकाली दल आपकी सरकार के पहले और दूसरे दोनों कैबिनेट में शामिल थी। आप उसे इस ऐतिहासिक बिल की खूबियों को क्यों नहीं समझा पाए ? इन सवालों का यदि आप ज़बाब देने में कामयाब हो जाते हैं तब आप कांग्रेस और विपक्षी दलों के उपर किसानों को गुमराह करने का आरोप लगा सकते हैं। अन्यथा आप झूठे मानें जायेंगे और जनता की नजर में गिरते जाओगे।

सरकारी गुण्डागर्दी के विरोध में बसपा को छोड़ सारी विपक्षी पार्टियों ने निलंबन वापस न लेने तक संसद सत्र का बहिष्कार करने का एलान किया। इसके बावजूद संघ की सरकार ने आज विपक्ष की खाली कुर्सियों के बीच कुल सात बिल पास किए। इस नये बिल में मण्डियों को खत्म करके उद्योग पतियों को फसल खरीदने का अधिकार दिया है। फसल नष्ट होने या निश्चित मूल्य से कम में खरीददारी करने पर किसी भी तरह के मुकदमें या भरपाई का कोई जिक्र नहीं है और न किसानों के पास कोई अधिकार है। किसानों को डर सता रहा है कि इस नए कानून के लागू होने के बाद 'न्यूनतम समर्थन मूल्य' की बात बेमानी हो जायेगी। सरकार मौखिक रूप से न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी रहने की बात तो कर रही है लेकिन बिल में डालने से कतरा रही है। यह मौजूदा सरकार सूट-बूट एवं पूंजिपतियों की सरकार है। इसी गुण्डागर्दी के खिलाफ देश भर के किसानों ने 25 सितंबर को रेल रोको एवं भारत बंद का एलान किया है। जिसका समर्थन पूरा विपक्ष कर रहा है और मैं भी स्वयं कर रहा हूं।

किसान एकता जिन्दाबाद


Tuesday, September 15, 2020

वाराणसी से दिल्ली की वन्दे भारत ट्रेन से यात्रा और उसका अनुभव

मैं आज खुद अपने अनुभव को साझा करने की कोशिश कर रहा हूं। जब 22 मार्च को एक दिन के लिए लाकडाउन का आदेश माननीय प्रधानमंत्री जी ने किया था। उसी दिन मैं गाजियाबाद से अपने गांव लौटा था। उस वक्त मण्डुआडीह से आते बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ा था। मेरे जैसे तमाम लोग कैण्ट स्टेशन तक पैदल हीं चलकर पहुंचने को मजबूर हुए थे।  तो उसी कड़ी में आज मुझे आफिस के काम से दिल्ली जाना हुआ। पहले तो बिहार से आने वाली एक रेल में टिकट बुक किया लेकिन वो प्रतिक्षा सूची की श्रेणी में था। जिस पर यात्रा करने का अधिकार नहीं था। तो 12 तारिख सितंबर के महिने से "वन्दे भारत" रेल को चलाने का आदेश रेल विभाग की तरफ से पारित किया गया। और मैं तीन दिन बाद यानी 15 तारीख का टिकट खरीदा। जैसा कि विदित हो कि इस ट्रेन में मेरे जीवन की पहली यात्रा थी। मेरे जैसे समय के मारे और भी बेचारे इसी सफर में मेरे साथ थे। जो राज्य के अनेक जिलों एवं पड़ोसी राज्य बिहार से भी थे। दोपहर 3 बजे अपने पूर्व निर्धारित समय के अनुसार ट्रेन ने पटरी पर रेंगना शुरू कर दिया। हर यात्री जो पहली बार इस रेल में सफर कर रहा था। वो कौतूहल बस अपने परिजनों एवं रिश्तेदारों को रेल की खूबी के बारे बता रहा था। तो मेरे मन में भी विचार आया कि मैं भी कुछ लिखूं -

यह ट्रेन आधुनिक जरूरतों से परिपूर्ण है। वातानुकूलित डिब्बा, डिब्बों की उन्नत साफ-सफाई, रेलवे स्टाफ के लोगों का यात्रियों के प्रति मर्यादित आचरण वन्दे भारत ट्रेन के चलाने की सार्थकता को पूरा करता है। यात्रियों का रेल इस के संबंध में एक सकारात्मक राय निकल कर सामने आई। मेरे समेत दर्जनों यात्रियों ने गर्व के साथ बोला कि भले हीं इसके चेयर कार का किराया 1460 रूपया प्रति यात्री है, पर सफर करके मजा आ गया। अभी ट्रेन इलाहाबाद से आगे दिल्ली की तरफ लगभग 100 किलोमीटर आगे की तरफ निकल चुकी है। ट्रेन इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में आधिकारिक स्टाप के बाद मानो चिता की तरह हवा के वेग को चीरते हुए आगे बढ़ रही है।

वन्दे भारत रेल में सफर करते हुए एक सवाल मेरे मन में बार-बार कौंध रहा है कि जब वन्दे भारत उसी रेलवे की पटरियों पर चलकर मात्र 8 घंटे में वाराणसी से दिल्ली का सफर तय कर रही है तो दूसरी तरफ काशी विश्वनाथ, शिवगंगा एक्सप्रेस, महामना, सुहेलदेव जैसी ट्रेनें उन्हीं पटरियों पर उतनी हीं दूरी तय करने में 11 से 15 घंटे क्यों लेती हैं ? यात्रियों का इतना समय जाया क्यों किया जाता है ? क्या ये मन्त्रालय के अधिकारियों के विचार से दूर है ? शायद नहीं ! मेरे ख्याल से फर्क ये है कि वन्दे भारत मोदी जी के निजीकरण का उत्पाद है और अन्य दूसरी ट्रेनें सरकार की सम्पत्ति है। इसलिए उन ट्रेनों में समय जाया नहीं किया जायेगा तो वन्दे भारत जैसे ट्रेनों को घाटा होगा। जो मौजूदा सरकार को पसंद नहीं है।

धन्यवाद


Wednesday, September 9, 2020

कंगना ने मुम्बई को POK बोल मोल लिया झगड़ा

कुछ दिनों से जीडीपी में हुई ऐतिहासिक गिरावट के बाद मिडिया में कोई सम्मान जनक जगह नहीं बना पाया। जितना कि फिल्मों में काम करने वाली और मायानगरी मुंबई में आलीशान जिंदगी जीने वाली बाला कंगना रनौत के मुंबई को POK कहने वाले बयान ने सम्मान कमाया। इस बीच कुछ राजनीतिक और निचले स्तर की बयानबाजी भी देखने को मिली। जिसमें शिवसेना के मुख्य प्रवक्ता और राज्य सभा सांसद संजय राऊत ने कंगना को 'हरामखोर लड़की' वाला बयान रहा। जो एक सभ्य समाज में कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता है। लेकिन कंगना भी कहां कम थी ! कंगना ने भी राऊत को ज़बाब देते हुए ये कह दिया कि 'मुंबई क्या उनके बाप की है ?' इसके साथ हीं राजनैतिक जोर आजमाइश शुरू हो गई। एक तरफ शिवसेना और उसके नेता तो दूसरी तरफ बीजेपी और कंगना रनौत। बात-विवाद इतना बढ़ गया कि कंगना रनौत की भाषा महाराष्ट्र के निर्वाचित मुख्यमंत्री श्री उद्धव जी ठाकरे के लिए तू-तड़ाक वाली निकलने लगी है। 

शिवसेना स्वाभाविक रूप से उग्र विचारों वाली पार्टी है। तो उसने कंगना के मुंबई को 'पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर' वाले बयान को शिवाजी महाराज और मुंबई के अपमान से जोड़ने का प्रयास कर रही है। जिसके प्रतिक्रिया स्वरूप संजय राऊत ने आवेश में आकर एक ओछी टिप्पणी की। कंगना रनौत के POK वाले बयान का उनका समर्थन करने वाली पार्टी भी मुंबई में समर्थन नहीं कर रही है। इससे राजनैतिक दृष्टि से देखा जाए तो यह शिवसेना की बीजेपी और कंगना रनौत पर एक मनोवैज्ञानिक बढ़त है। कंगना का मुंबई के संबंध में दिया गया बयान घोर निंदनीय है और राऊत का कंगना के उपर दिया गया बयान भी निंदा योग्य है। कंगना को बालीवुड से समर्थन बहुत कम मिल रहा है। जिसका असर उनकी प्रोफेशनल जिंदगी पर जरूर पड़ेगा। वैसे कंगना का नाम रितिक रोशन के साथ भी विवादों में रहा है। तो कह सकते हैं कि कंगना बड़बोली और विवादित अभिनेत्री रहीं हैं।

महाराष्ट्र में इस समय सेना+एनसीपी+कांग्रेस पार्टी की सरकार है। और पंगा बीजेपी की समर्थन वाली कंगना रनौत से है। तो दोनों लोग अपने-अपने तरीके से इस लड़ाई को लड़ने और जितने के लिए मन में निश्चय कर लिया है। उधर BMC में सेना की सत्ता है। जिसने आज कंगना के आफिस में हुए गैरकानूनी निर्माण को ढ़हाने का कम किया। इस पर कुछ लोग उद्धव ठाकरे पर बदले की भावना से काम करने का आरोप लगाया है। जो सत्य भी है। परन्तु ऐसे लोगों को मैं एक वाकया याद दिलाता हूं। जब शत्रुघ्न सिन्हा जी ने जब भाजपा छोड़ी थी। तब भाजपा की फड़नवीस सरकार ने उनके घर बुलडोज़र चलवाया था और उस गठबंधन में सेना भी शामिल थी। तब तो संविधान खूब प्रफुल्लित हो रहा था। और उस वक़्त तो सबके मुँह में दही जम गयी थी। लेकिन असल मायने में जो सिन्हा जी के साथ हुआ वो भी ग़लत था और जो आज कंगना रनौत के साथ हुआ वो भी ग़लत है। इसलिए कहते हैं कि समय बहुत निष्ठुर होता है। वो किसी के साथ अनंत तक नहीं रहता।


Monday, August 24, 2020

एक नजर आजादी के बाद बनें कांग्रेस अध्यक्षों पर

जे बी कृपलानी - महात्मा गांधी के शिष्यों में से एक थे बी कृपलानी जी को 1947 में अंग्रेजों से देश में सत्ता के हस्तांतरण के वक्त कांग्रेस के अध्यक्ष थे. जे बी कृपलानी इस तरह से कहा जाय तो आजाद हिन्दुस्तान के पहले कांग्रेस अध्यक्ष थे. उन्होंने मेरठ सत्र की अध्यक्षता की थी. 

पट्टाभि सीतारमैय्या - वह 1948 और 1949 में कांग्रेस के अध्यक्ष थे. सीतारमैया भी गांधी वादी नेता थे. परन्तु सीतारमैया भाषाई आधारों पर प्रांत विभाजन के बहुत बड़े समर्थक थे. उन्होंने आजादी के हुए जयपुर सम्मेलन की अध्यक्षता की थी.

पुरुषोत्तम दास टंडन - वह 1950 में कांग्रेस अध्यक्ष बने थे. टंडन जी हिंदी भाषा के बहुत बड़े विचारक और समर्थक थे उन्होंने नासिक सत्र की अध्यक्षता की थी. अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, वह उन प्रमुख चेहरों में से एक थे जिन्होंने हिंदी के लिए आधिकारिक भाषा का दर्जा देने की मांग की थी.

प. जवाहरलाल नेहरू - भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जी 1951 से लेकर 1954 तक कांग्रेस के अध्यक्ष थे. नेहरू जी आजादी के पहले भी कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके थे.

यू एन ढेबर - साल 1955 से 1959 तक ढेबर कांग्रेस के अध्यक्ष थे. उन्होंने अवडी, अमृतसर, इंदौर, गौहाटी और नागपुर में सत्रों की अध्यक्षता की थी. 

इंदिरा गांधी - साल 1959 में इंदिरा गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गई थीं. इंदिरा गांधी जी भी आजादी आंदोलनों के दौरान भी जेल गयी थी.

नीलम संजीव रेड्डी - वह 1960 से 1963 तक कांग्रेस अध्यक्ष थे. उन्होंने बैंगलोर, भावनगर और पटना सत्रों की अध्यक्षता की थी. बाबू में चलकर रेड्डी जी भारत के छठे राष्ट्रपति बने.

के कामराज - वह 1964 से 1967 तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे थे. उन्होंने भुवनेश्वर, दुर्गापुर और जयपुर सत्रों की अध्यक्षता की थी. कांग्रेस पार्टी और भारतीय राजनीति में उन्हें "K" कामराज प्रदान का जनक भी माना जाता है। कामराज जी को भारतीय राजनीति में "किंगमेकर" के तौर भी जाना जाता है.

एस निजलिंगप्पा - वह 1968 से 69 तक कांग्रेस अध्यक्ष थे. निजलिंगप्पा देश की आजादी के आंदोलन और कर्नाटक के एकीकरण के प्रमुख सदस्य थे. निजलिंगप्पा प्रखर गांधी वादी थे.

जगजीवन राम - जगजीवन राम जी को 1970 से 1971 तक कांग्रेस अध्यक्ष थे. वह पिछड़े, अछूतों, दलितों और शोषित तबकों के नेता थे. जगजीवन राम जी बाबू जी के नाम से प्रसिद्ध थे. जगजीवन राम जी कांग्रेस की सरकार में केन्द्रीय मंत्री भी थे.

डा. शंकर दयाल शर्मा - शर्मा जी बहुत मृदुभाषी नेता थे. वह 1972 से 1974 तक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे. आगे कालांतर में शंकर दयाल शर्मा जी भारत के नौवें राष्ट्रपति बने.

देवकांता बरुआ - देवकांत बरूआ जी इंदिरा गांधी जी के विश्वासपात्र थे. जिसकी बदौलत आपातकाल के दौरान उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। वह 1975-1977 कांग्रेस अध्यक्ष रहे. उन्होंने एक बार कहा था: "भारत इंदिरा है. इंदिरा भारत है. " हालांकि, बाद में उन्होंने इंदिरा का साथ छोड़ दिया था और कांग्रेस (Urs) में शामिल हो गए थे.

ब्रह्मानंद रेड्डी - वह 1977 से लेकर 1978 तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे थे. यह दौर आपातकाल के अन्तिम समय का था. इसके बाद हुए आम चुनाव में कांग्रेस और इंदिरा जी बुरी तरीके से हार गई थी और जनता पार्टी की पहली गैरकांग्रेसी सरकार बनी थी.

इस दौरान 1978 में कांग्रेस में विभाजन हो गया और बाद में इंदिरा वाले धड़े ने उन्हें फिर से पार्टी अध्यक्ष चुन लिया. इसके बाद एक छोटे से कालखण्ड को छोड़ दिया जाय तो वह 1984 में अपनी हत्या होने तक अध्यक्ष पद पर रहीं थीं. 

राजीव गांधी - इंदिरा जी की 1984 में हत्या के बाद  राजीव गांधी जी ने कांग्रेस की कमान संभाली और 1991 तक खुद की हत्या होने तक कांग्रेस अध्यक्ष पद पर काबिज थे. इसी दौरान वो अध्यक्ष के साथ-साथ प्रधानमंत्री भी रहे.

पी वी नरसिम्हा राव - राजीव गांधी जी की हत्या के बाद नरसिम्हा राव जी 1996 तक कांग्रेस के अध्यक्ष थे. दक्षिण भारत से वह देश के पहले प्रधानमंत्री थे, उनके कार्यकाल में भारत की अर्थव्यवस्था का उदारीकरण हुआ था और "बाबरी विध्वंस" भी उन्हीं के प्रधानमंत्री काल में हुआ था.

सीताराम केसरी - वह 1996 से 1998 तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे थे. सीताराम केसरी के अध्यक्ष रहने के दौरान कांग्रेस में बहुत बड़ी टूट हुई. जिसका नुकसान कांग्रेस पार्टी आज भी उठा रही है.

सोनिया गांधी - कांग्रेस में शरद पवार की बगावत के बाद सोनिया जी 1999 में कांग्रेस अध्यक्ष बनी थीं. उसके बाद लगातार 2017 तक अध्यक्ष पद पर काबिज रही थी.

राहुल गांधी - सोनिया गांधी जी के इस्तिफा देने के बाद 2017 में राहुल गांधी जी ने अध्यक्ष पद को संभाला था और फिर 2019 में लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद इस्तीफा दे दिया था। जिसके बाद एक बार फिर  सोनिया जी को पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया था.


Sunday, August 23, 2020

कल कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक, अध्यक्ष पद पर गहलोत गांधी परिवार के बाद दूसरे संभावित उम्मीदवार

कल दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय पर कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों की बैठक होने वाली है। ये बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण होगी कि सोनिया गांधी जी को कांग्रेस अंतरिम अध्यक्ष बनने के एक साल बाद की जा रही है। यह बैठक कांग्रेस के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण होने वाली है। सुनने में यह आ रहा है कि कांग्रेस के कुछ नये-पुराने कुल २३ नेता सोनिया गांधी जी को संगठन प्रमुख पद के चुनाव के लिए चिट्ठी लिखी है। जिनमें कुछ लोग राहुल गांधी जी को अगला कांग्रेस अध्यक्ष बनने की सिफारिश कर रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस ने और पुराने दो गुटों में बंटती जा रही है। एक ओर जहां पंजाब के मुख्यमंत्री श्री अमरिंदर सिंह, राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत जी सोनिया गांधी का समर्थन कर रहे हैं तो दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेष बघेल जी एवम् असम राज्य प्रमुख रिपुन बोला राहुल गांधी का अध्यक्ष पद के लिए समर्थन कर रहे हैं।

इन सबके बीच राहुल गांधी जी ने बार-बार दोहराया है कि वो अगला कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनना चाहते हैं तो उनके बाद राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत जी दूसरे सर्वमान्य नेता मालूम पड़ते हैं। क्योंकि गहलोत को सोनिया और राहुल दोनों का वरदहस्त प्राप्त है। राहुल, गहलोत को गुजरात चुनाव के बाद और मानने लगे हैं। जिस तरह से गुजरात की एकतरफा लड़ाई को अपने कौशल के दम पर रोमांचक बना दिया था। उसे देखकर राहुल गांधी को गहलोत के उपर और यकीन हो गया। वैसे गहलोत राहुल के पिता स्व. राजीव गांधी जी के जमाने के नेता हैं। 

गहलोत राजस्थान के लिए तीन बार से ज्यादा मुख्यमंत्री की संभाली और प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। इन सबके बीच गहलोत की छवि राजस्थान में एक जनप्रिय नेता के तौर पर रही है। गहलोत राजस्थान की आमों-खास के नेता कहे जाते हैं। हाल हीं में सचिन पायलट और उनके संबंधों को लेकर थोड़ा विरोध किया जा सकता है। फिर भी गहलोत मजबूत स्थिति में नजर आते हैं। गहलोत कांग्रेस के कुछ आसानी से मिलने-जुलने वाले नेताओं में से एक है। कांग्रेस पार्टी में गहलोत दूसरे ऐसे नेता हैं जिनका विरोध पार्टी के भीतर कम होगा। गहलोत के पास संगठन और सरकार चलाने का अनुभव ब्यापक अनुभव है। जो उन्हें कांग्रेस के संभावित मुखिया के तौर पर स्थापित करने में सहयोग कर सकती है बनिस्पत राहुल गांधी अपने पुराने फैसले पर अडिग रहते हैं।

Tuesday, August 18, 2020

फेसबुक की निष्पक्षता पर भारत में बवाल क्यों ?

आजकल देश में सोशल मिडिया को लेकर काफी चर्चा की जा रही है। जिनकी कुछ जायज और कुछ नाजायज वजहें हैं। ताज़ा चर्चा देश में आज फेसबुक को लेकर है। जिसका देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस मुखर होकर चर्चा और बहस कर रही है। अमूमन आप फेसबुक चलाने वाले लोग इस अनुभव से दो-चार हो रहे होंगे कि जब भी आप अपने विचार को फेसबुक के माध्यम से रखतें हैं। तो अगर एक खास विचार धारा (दक्षिण पंथी) को पसंद नहीं आती है तो ऐसे लोग गाली-गलौज करने लगते हैं। जिससे कई बार मैं भी दो-चार हुआ हूं। उनके गन्दे कमेन्ट के बाद कई बार बहुत ग्लानि होती है। पर क्या करें आज का दौर सोशल मीडिया का है।

आइए फेसबुक पर सवाल क्यों खड़े हो रहें हैं ?

  1. फेसबुक जानबूझ कर बीजेपी और संघ समर्थकों के आपत्तिजनक विडियो और लेख अपने प्लेटफार्म से नहीं हटाया।
  2. फेसबुक बीजेपी के बनिस्पत दूसरे पेजों और विडियो पर तत्काल कार्रवाई करते हुए अपने प्लेटफार्म से हटा देता है।
  3. फेसबुक धर्म विशेष के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले बीजेपी नेताओं कपिल मिश्रा, अनंत हेगड़े, डी राजा सिंह के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। जबकि इसी केस में ट्विटर ने अनंत हेगड़े का अकाउंट ब्लाक कर दिया था।
  4. फेसबुक सुरक्षा का आम देखने वाली आंखी दास ने फेसबुक टीम के साथ हुए मीटिंग में यह बात कही कि यदि भाजपा नेताओं के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई की गई तो भारत में फेसबुक की कमाई पर विपरित असर पड़ सकता है।
  5. फेसबुक पर महिलाओं के बारे में ओछी टिप्पणी के सन्दर्भ में आंखी दास ने फेसबुक के एक अमेरिकी अधिकारी को कहा कि, आप इसे रहने दिजिए, भारत में ऐसा होता है।

यदि फेसबुक को पूर्व की भांति जनता का विश्वास बहाल करना है तो बिना किसी भेदभाव के कार्रवाई करनी चाहिए। और नफरती भाषण और लेखों को तुरंत अपने डाटा सेंटर से हटा देना चाहिए। फेसबुक को मैकेनिज्म के माध्यम से फर्जी अकाउंट और उससे होने वाले अशोभनीय कमेन्ट को रोकने की दिशा में कुछ जरूरी सुधार वाले कदम अविलंब उठाने चाहिए।

Monday, August 10, 2020

लौट आए पायलट फिर भी गहलोत जीते

लगभग डेढ़ महीने से चला आ रहा राजस्थान का गतिरोध का आज पटाक्षेप होने को‌ है। जहां एक तरफ राजस्थान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट जी तीन निर्दलीय और १९ कांग्रेस विधायकों समेत मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत जी के खिलाफ बगावत का झण्डा बुलन्द किए हुए थे। आज उसी गहलोत के आगे नतमस्तक हुए हैं। जहां एक तरफ बागियों का प्रतिनिधित्व पायलट कर रहे थे वहीं दूसरी ओर कांग्रेस एवं सरकार का जिम्मा गहलोत के हाथों में आलाकमान ने सौंप दिया था। इस दरम्यान आरोप भी मुख्यमंत्री द्वारा पायलट पर लगाए गए, अमूमन शान्त रहने वाले लोगों गहलोत जी द्वारा पायलट के लिए कुछ कटु वचनों का भी प्रयोग किया गया। इस दौरान पायलट की तरफ से विशेष सावधानी बरती गई। जो शायद पायलट के ग्रूप ने रणनितिक रूप से किया था। जिसकी वजह से आज दोबारा कांग्रेस पार्टी में पायलट की वापसी संभव हुई।

बीते डेढ़ महीने के राजनीतिक अस्थिरता के बीच सचिन पायलट कभी भी कांग्रेस के खिलाफ खुलकर नहीं आए। अलबत्ता रणनितिक रूप से उनके विधायक जरूर मिडिया में नाना प्रकार के मसाला परोसने का काम करते थे। पायलट तो वाकई कांग्रेस से बगावत कर चुके थे। लेकिन भाजपा के साथ जाकर सरकार बनाने लायक उनके पास घोड़ों की संख्या नहीं थी। जिसके कारण विधायकों के दबाव बस या यूं कहें कि मजबूरी बस वो कांग्रेस में लौट आने को मजबूर हुए। अन्यथा वो भी सिंधिया बन गये होते और राजस्थान भी कांग्रेस मुक्त हो गया होता। गहलोत ने अपनी पूरी आस्था कांग्रेस नेतृत्व में दिखाई जिसकी वजह से गहलोत आज पायलट पर भारी दिखाई दे रहें हैं। अब तो एक बात कांग्रेस और भाजपा दोनों को हीं मान लेना चाहिए कि राजस्थान में अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे के कद का कोई दूसरा नेता नहीं है। 

अब जब सभी नाटकों का पटाक्षेप होने वाला है तो सचिन पायलट को कुछ वाजिब सवालों का जवाब राजस्थान की ८ करोड़ जनता को जरूर देना होगा-

१- सचिन पायलट राजस्थान सरकार में उप-मुख्यमंत्री थे और संगठन अध्यक्ष भी थे तो उन्हें कौन सा सम्मान नहीं मिला वो जनता को बताएं ?

२- वह कौन सा मुद्दा था जिसके लिए पायलट को बगावत करने के लिए मजबूर होना पड़ा ? जनता के सामने सत्य आना चाहिए।

३- कोरोना के समय में सभी विधायक बाड़ेबंदी में रहे जबकि उस समय उन्हें अपने क्षेत्र की जनता के साथ रहना चाहिए था। इसके लिए किसको जवाबदार माना जाए ?

४- अब कांग्रेस आपको कौन सा सम्मान देगी ? इसकी क्या गारंटी की आप फिर से बगावत नहीं करेंगे ?

५- अब जबकि पायलट जी आपकी निष्ठा सशंकित हो चुकी है। तो राज्य की जनता आप के उपर क्यों और कैसे विश्वास करेगी ?



Saturday, August 8, 2020

भारत छोड़ो आन्दोलन के शुरुआती दिवस पर महात्मा गांधी जी का दिया गया पहला भाषण

आज मैं भारत की आज़ादी के नायक और महान संत राष्ट्र पिता श्री महात्मा गांधी जी के बारे में बात करना चाहूंगा. आज का दिन भारत के इतिहास का वह स्वर्णिम दिन है जब करोड़ों वासियों ने तय कर लिया था कि अब हमें गुलामी की जंजीरों को तोड़ फेंकना है. उसकी जो भी कीमत हो वो अदा किया जायेगा। जब बापू ने इस तरह के ख्वाब जनमानस के हृदय में जगाया होगा तो उन लोगों के मन में भी एक सवाल  बार-बार यह जरूर उठ रहा होगा कि क्या देश अंग्रेजों के चेलों की बातों पर यकीन तो नहीं करेगा. लेकिन गांधी जी के एक आह्वाहन ने संघ के लोगों का साथ छोड़ गांधी जी की समाज में आ गए और उस स्वर्णिम सफर की यात्रा पर निकल गये। जिसका नाम था "आजादी." भारत छोड़ो  आन्दोलन के शुरू होने से पहले मुबई के गोवालिया टैंक मैदान में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में महात्मा गांधी जी ने जो भाषण दिया था. उसी भाषण को सुनकर सारा देश एक सूत्र में बंध गया था . वह पूरा भाषण मैंने पढ़ा या सुना नहीं था. यह पूरा भाषण एक किताब में दर्ज है. किताब का नाम है डी जी तेन्दुलकर द्वारा लिखित गांधी जी की जीवनी. किताब के  छठवें खंड में पूरा भाषण शब्दशः दर्ज है. महात्मा गांधी ने वह भाषण हिन्दुस्तान की सरल एवं आम भाषा में दिया था. आप कह सकते हैं कि उस कालजयी भाषण में हिंदी,उर्दू और गुजराती के कई शब्द प्रयोग में लाए गये थे. उस किताब में भाषण मूल रूप से अंग्रेज़ी भाषा में लिखा है. फिर बाद में उसे हिंदी भाषा में भी परिवर्तित किया गया. 
यह भाषण 7 अगस्त 1942 को दिया गया था. वह अधिवेशन का पहला दिन था. मौलाना अबुल कलाम आज़ाद कांग्रेस के अध्यक्ष थे. उन्होंने अधिवेशन की शुरुआत की. उसके तुरंत बाद गांधी जी ने अपनी बात कही. करीब हजार शब्दों का भाषण गांधी जी ने उस अधिवेशन में दिया था. "अंग्रेजों भारत छोड़ो" का प्रस्ताव आठ अगस्त को पास हुआ. जिस सुबह यह भाषण हुआ ठीक उसी रात गांधी जी, कस्तूरबा गांधी सहित पूरी कांग्रेस कमेटी को गिरफ्तार कर लिया गया .ब्रिटेन की वार कैबिनेट ने वायसरॉय को यह आदेश दे दिया था कि वायसरॉय जैसा चाहे वैसा कांग्रेस नेताओं के साथ ब्यवहार कर सकता है. इसी कुटिल सोच के कारण हीं वह भारत छोडो आन्दोलन के प्रस्ताव के पास होते ही गांधी जी समेत पूरी कांग्रेस कार्यसमिति को गिरफ्तार करने की फिराक में थे. अंग्रेजी शासकों की मूल योजना थी कि गाँधी जी को देश से बाहर ले जाकर अदन में नज़रबंद किया जाए और बाकी नेताओं को न्यासालैंड में रखा जाए. 9 अगस्त की सुबह 5 बजे सभी नेताओं को एक विशेष ट्रेन से पूना ले जाया गया ,जहां महात्मा जी और उनके साथियों को उतार दिया गया. बाकी नेता अहमदनगर फोर्ट की जेल में ले जाए गए. सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, पट्टाभि सीतारमैय्या और हरेकृष्ण महताब को अलग कमरे मिले थे. जवाहरलाल नेहरू के कमरे में डॉ सैय्यद महमूद थे. शंकर राव देव और प्रफुल्ल चन्द्र घोष एक कमरे में थे. आचार्य कृपलानी, गोविन्द बल्लभ पन्त, आचार्य नरेंद्र देव और आसफ अली को एक साथ रखा गया था. डॉ राजेन्द्र प्रसाद बीमार थे इसलिए आ नहीं सके थे. उन्हें गिरफ्तार करके बिहार में ही रखा गया था. भूलाभाई देसाई और चितरंजन दास को गिरफ्तार नहीं किया गया था क्योंकि इन लोगों ने खुद को भारत छोड़ो आन्दोलन से अलग कर लिया था. तो यह सूची हमारे उन स्वतन्त्रता के महानायकों की है। जिन्होंने हमारे लिए अपनी कुर्बानियां दी और हमें आजाद विचारों के साथ जिन्दा कर गए और खुद अमर हो गए. गांधी, पटेल, नेहरू, अंबेडकर, मौलाना आजाद की कहानी तो हमारी पीढ़ी के लोगों को बस किताबों के माध्यम से हीं मिलेगी। जिसके लिए हमें थोड़ा अधिक उर्जा खर्च करने की आवश्यकता होगी.
गांधी जी का वह पूरा भाषण यहां प्रस्तुत है .महात्मा गांधी ने कहा कि -
” प्रस्ताव पर चर्चा शुरू करने से पहले मैं आप सभी के सामने एक या दो बात रखना चाहूँगा, मैं दो बातो को साफ़-साफ़ समझना चाहता हूँ और उन दो बातों को मैं हम सभी के लिये महत्वपूर्ण भी मानता हूँ। मैं चाहता हूँ की आप सब भी उन दो बातों को मेरे नजरिये से ही देखे, क्योंकि यदि आपने उन दो बातों को अपना लिया तो आप हमेशा आनंदित रहोंगे.
यह एक महान जवाबदारी है। कई लोग मुझसे यह पूछते है की क्या मैं वही इंसान हूँ जो मैं 1920 में हुआ करता था, और क्या मुझमे कोई बदलाव आया है। ऐसा प्रश्न पूछने के लिये आप बिल्कुल सही हो। मैं जल्द ही आपको इस बात का आश्वासन दिलाऊंगा की मैं वही मोहनदास गांधी हूँ जैसा मैं 1920 में था.
मैंने अपने आत्मसम्मान को नही बदला है।आज भी मैं हिंसा से उतनी ही नफरत करता हूँ जितनी उस समय करता था. बल्कि मेरा बल तेज़ी से विकसित भी हो रहा है। मेरे वर्तमान प्रस्ताव और पहले के लेख और स्वभाव में कोई विरोधाभास नही है. वर्तमान जैसे मौके हर किसी की जिंदगी में नहीं आते लेकिन कभी-कभी एक-आध की जिंदगी में जरुर आते है. मैं चाहता हूँ की आप सभी इस बात को जाने की अहिंसा से ज्यादा शुद्ध और कुछ नहीं है, इस बात को मैं आज कह भी रहा हूँ और अहिंसा के मार्ग पर चल भी रहा हूँ.
हमारी कार्यकारी समिति का बनाया हुआ प्रस्ताव भी अहिंसा पर ही आधारित है, और हमारे आन्दोलन के सभी तत्व भी अहिंसा पर ही आधारित होंगे। यदि आप में से किसी को भी अहिंसा पर भरोसा नहीं है तो कृपया करके इस प्रस्ताव के लिये वोट ना करें। मैं आज आपको अपनी बात साफ़-साफ़ बताना चाहता हूँ। भगवान ने मुझे अहिंसा के रूप में एक मूल्यवान हथियार दिया है। मैं और मेरी अहिंसा ही आज हमारा रास्ता है.
वर्तमान समय में जहाँ धरती हिंसा की आग में झुलस चुकी है और वही लोग मुक्ति के लिये रो रहे है, मैं भी भगवान द्वारा दिये गए ज्ञान का उपयोग करने में असफल रहा हूँ, भगवान मुझे कभी माफ़ नही करेगा और मैं उनके द्वारा दिये गए इस उपहार को जल्दी समझ नही पाया। लेकिन अब मुझे अहिंसा के मार्ग पर चलना ही होंगा.
अब मुझे डरने की बजाए आगे देखकर बढ़ना होगा।हमारी यात्रा ताकत पाने के लिये नहीं बल्कि भारत की आज़ादी के लिये अहिंसात्मक लड़ाई के लिए है. हिंसात्मक यात्रा में तानाशाही की संभावनाए ज्यादा होती है जबकि अहिंसा में तानाशाही के लिये कोई जगह ही नही है. एक अहिंसात्मक सैनिक खुद के लिये कोई लोभ नही करता, वह केवल देश की आज़ादी के लिये ही लढता है। कांग्रेस इस बात कोलेकर बेफिक्र है की आज़ादी के बाद कौन शासन करेंगा.
आज़ादी के बाद जो भी ताकत आएँगी उसका संबंध भारत की जनता से होगा और भारत की जनता ही ये निश्चित करेंगी की उन्हें ये देश किसे सौपना है. हो सकता है की भारत की जनता अपने देश को पेरिस के हाथो सौपे. कांग्रेस सभी समुदायों को एक करना चाहता है ना की उनमें फूट डालकर विभाजन करना चाहता है.
आज़ादी के बाद भारत की जनता अपनी इच्छानुसार किसी को भी अपने देश की कमान सँभालने के लिये चुन सकती है. और चुनने के बाद भारत की जनता को भी उसके अनुरूप ही चलना होंगा. मैं जानता हूँ की अहिंसा परिपूर्ण नहीं है और ये भी जानता हूँ की हम अपने अहिंसा के विचारो से फ़िलहाल कोसों दूर है लेकिन अहिंसा में ही अंतिम असफलता नहीं है. मुझे पूरा विश्वास है, छोटे-छोटे काम करने से ही बड़े-बड़े कामो को अंजाम दिया जा सकता है.
ये सब इसलिए होता है क्योंकि हमारे संघर्षो को देखकर अंततः भगवान भी हमारी सहायता करने को तैयार हो जाते है. मेरा इस बात पर भरोसा है की दुनिया के इतिहास में हमसे बढ़कर और किसी देश ने लोकतांत्रिक आज़ादी पाने के लिये संघर्ष किया होगा. जब मै पेरिस में था तब मैंने कार्लाइल फ्रेंच प्रस्ताव पढ़ा था और पंडित जवाहरलाल नेहरु ने भी मुझे रशियन प्रस्ताव के बारें में थोडा बहुत बताया था. लेकिन मेरा इस बात पर पूरा विश्वास है की जब हिंसा का उपयोग कर आज़ादी के लिये संघर्ष किया जायेगा तब लोग लोकतंत्र के महत्त्व को समझने में असफल होंगे.
जिस लोकतंत्र का मैंने विचार कर रखा है, उस लोकतंत्र का निर्माण अहिंसा से होगा, जहाँ हर किसी के पास समान आज़ादी और अधिकार होंगे. जहाँ हर कोई खुद का शिक्षक होंगा और इसी लोकतंत्र के निर्माण के लिये आज मै आपको आमंत्रित करने आया हूँ। एक बार यदि आपने इस बात को समझ लिया तब आप हिन्दू और मुस्लिम के भेदभाव को भूल जाओंगे. तब आप एक भारतीय बनकर खुद का विचार रखोगे और आज़ादी के संघर्ष में साथ दोगे. अब प्रश्न ब्रिटिशों के प्रति आपके रवैये का है। मैंने देखा है की कुछ लोगों में ब्रिटिशो के प्रति नफरत का रवैया है.
कुछ लोगो का कहना है की वे ब्रिटिशों के व्यवहार से चिढ चुके है. कुछ लोग ब्रिटिश साम्राज्यवाद और ब्रिटिश लोगों के बीच के अंतर को भूल चुके है. उन लोगों के लिये दोनों ही एक समान है. उनकी यह घृणा जापानियों की आमंत्रित कर रही है। यह काफी खतरनाक होगा. इसका मतलब वे एक गुलामी की दूसरी गुलामी से अदला बदली करेंगे.
हमें इस भावना को अपने दिलों दिमाग से निकाल देना चाहिये. हमारा झगडा ब्रिटिश लोगों के साथ नही हैं बल्कि हमें उनके साम्राज्यवाद से लड़ना है. ब्रिटिश शासन को खत्म करने का मेरा प्रस्ताव गुस्से से पूरा नही होने वाला.
यह किसी बड़े देश जैसे भारत के लिये कोई ख़ुशी वाली बात नही है की ब्रिटिश लोग जबरदस्ती हमसे धन वसूल रहे है. हम हमारे महापुरुषों के बलिदानों को नही भूल सकते. मैं जानता हूँ की ब्रिटिश सरकार हमसे हमारी आज़ादी नही छीन सकती, लेकिन इसके लिये हमें एकजुट होना होगा. इसके लिये हमें खुद को घृणा से दूर रखना चाहिए.
खुद के लिये बोलते हुए, मैं कहना चाहूँगा की मैंने कभी घृणा का अनुभव नही किया. बल्कि मैं समझता हूँ की मैं ब्रिटिशों के सबसे गहरे मित्रो में से एक हूँ. आज उनके अविचलित होने का एक ही कारण है, मेरी गहरी दोस्ती. मेरे दृष्टिकोण से वे फ़िलहाल नरक की कगार पर बैठे हुए है. और यह मेरा कर्तव्य होगा कि मैं उन्हें आने वाले खतरे की चुनौती दूँ. इस समय जहाँ मैं अपने जीवन के सबसे बड़े संघर्ष की शुरुवात कर रहा हूँ, मैं नहीं चाहता की किसी के भी मन में किसी के प्रति घृणा का निर्माण हो.”
इसके बाद गांधी जी ने 1945 तक  कोई  भाषण नहीं किया क्योकि वे जेल में बंद थे. बापू का आजादी के प्रति समर्पण देख लोग गिरफ्तार होते रहे और नए लोग काम सँभालते रहे .आखिरकार अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा .

Friday, July 24, 2020

राजस्थान में सत्ता की लड़ाई राजभवन पहुंची

पिछले लगभग दो हफ्ते से शुरू हुआ राजस्थान की सियासत का झगड़ा आज राज्यपाल महोदय के आंगन में पहुंच हीं गया। सचिन पायलट और अशोक गहलोत जी के बीच राजनैतिक वर्चस्व की लड़ाई इस हद तक पहुंच जायेगी कि पार्टी में हीं बगावत हो जायेगी‌। इस बात का अंदाजा शायद कांग्रेस आलाकमान को भी नहीं रही होगी। लेकिन आज राजस्थान के राजनिति में जो कुछ भी घटित हो रहा है। उससे सबसे ज्यादा निराश राजस्थान की बेचारी जनता होगी। विधायक जयपुर से लेकर दिल्ली तक होटलों में कैद हैं और उनके क्षेत्र की मासूम जनता अनेक परेशानियों से रोज दो-चार हो रही है। उसका किसी को शायद अंदाजा नहीं है।
जब भी सरकार कोई गिरती या गिराना होता है तो उसमें भाजपा का हीं नाम आता है। और सारा दोष भाजपा के सिर पर मढ़ने की कोशिश कांग्रेस की तरफ से की जाती है। जिसे मैं तर्क संगत नहीं मानता। क्योंकि कांग्रेस ने संगठन के नेताओं को तवज्जो न देते हुए विरासत वालों को तवज्जो देती रही है। विरासत होने की वजह से कुछ वफादार लोग उनके भी चुनकर आते हैं। जो अपनी वफादारी साबित करने के लिए किसी भी स्तर तक जाने के लिए तैयार रहते हैं। जिसका परिणाम पहले मध्य प्रदेश और अब राजस्थान में देखने को मिल रहा है। विरासत वाली राजनीति को लेकर जो गलती कांग्रेस ने की वहीं अब बीजेपी कर रही है। जब वो कांग्रेस के विधायकों को इस्तीफे के बाद अपनाती है तो उसके साथ एक शर्त भी जुड़ी होती है कि फलां क्षेत्र का टिकट शामिल (बागी) होने वाले को हीं दिया जायेगा। जिसके फलस्वरूप बीजेपी का जमीनी कार्यकर्ता निराश होने लगता है और अपने घर में बैठ जाता है। अब तक बीजेपी को संगठन और कार्यकर्ताओं की पार्टी कहा जाता रहा है पर कुछ सालों में बीजेपी के चरित्र में घोर परिवर्तन आया है। जो कल कांग्रेस की तरह बीजेपी के लिए भी दुखदाई साबित होगा।
माना कि राजस्थान में जादूई आंकड़ा कांग्रेस और गहलोत के पक्ष में है। फिर भी उन्हें और कांग्रेस आलाकमान को कुछ चीजें नजदीक से देखना चाहिए था। कांग्रेस आलाकमान शायद मध्य प्रदेश के तख्तापलट से कुछ सिखा नहीं। खैर पिछे जो हुआ उसे भूलाकर कांग्रेस कम से कम अब से सबक सिखाते हुए अपने नेताओं पर पैनी नजर रखे तो भविष्य को संवारा जा सकता है और फिर से अपने पुराने रौं में कांग्रेस पार्टी लौट सकती है। राजस्थान की सरकार फिलहाल तो सुरक्षित दिख रही है पर अब तक ? भाजपा जब तक चाहे तब तक। भाजपा के अन्दर सत्ता की बहुत भूख हो गयी है और कहीं न कहीं संविधान संशोधन और हिन्दू राष्ट्र की तरफ बढ़ने का छिपा एजेंडा भाजपा इस रणनीति में दिखाई पड़ती है।

Tuesday, July 14, 2020

भाजपा के सह पर पायलट कहीं के नहीं रहे

राजस्थान में कांग्रेस नीत सरकार में पिछले तीन दिनों से बहुत उथल-पुथल मची हुई है। इस उथल-पुथल के पिछे युवा नेता और उप-मुख्यमंत्री श्री सचिन पायलट जी की बढ़ती हुई महत्त्वाकांक्षाएं है। मध्य प्रदेश की तरह पिछे से भाजपा ने उनको हवा दिया और अपने समर्थक विधायकों की गिनती किए बिना बगावत कर दिल्ली में डेरा डाल रखा है। और उधर पुराने, मंझे हुए तीन बार के मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत जी थे। जिन्हें पायलट ग्रुप के विद्रोह की भनक बहुत पहले हीं पता चल गई थी। उसी के मद्देनजर गहलोत जी ने भी अपना चौरस बिछाना शुरू कर दिया था। जिसमें सचिन पायलट और उनके समर्थक फंसते चले गए और परिणाम आज सबके सामने है।
बीजेपी ने पायलट को अन्दर खाने हवा देने का काम काफी समय पहले से शुरू कर दिया था। और अभी तक सफलता पूर्वक आगे भी बढ़ रहें हैं। सचिन पायलट और गहलोत के बीच संघर्ष की पटकथा दिसंबर 2018 में हीं लिखी जा चुकी थी। जब पायलट पर तरजीह देकर गहलोत को राजस्थान का मुख्यमंत्री बना दिया गया था।

Friday, July 10, 2020

विकास दूबे पुलिसिया शैली के इनकाउंटर में मारा गया और नेता बच गए

जैसी की पहले से उम्मीद थी कि विकास दूबे भागते हुए एनकाऊंटर में मारा जायेगा। ठीक वैसा हीं हुआ। आज भागते हुए अपराधी मारा गया। वैसे जब कुत्ते को भागना हीं था तो सरेंडर क्यों किया ? सरकार को यह नोट कर लेना चाहिए कि अब कानून, संविधान की कोई आवश्यकता देश में रही नहीं। इसलिए कानूनी प्राविधान को हमेशा के लिए खत्म कर देना चाहिए!
आज जिस विकास दूबे को उत्तर प्रदेश की पुलिस अदालत तक नहीं पहुंचा सकती। उससे आप उम्मीद करते हैं कि वो आपको जिन्हें लायक सुरक्षित माहौल मुहैय्या करवायेगी‌ तो आप मूर्ख हीं नहीं महामूर्ख हैं। विकास दूबे तो मारा गया लेकिन जो नेता, वर्दीधारी, विधायक उसकी उसकी चाकरी करते थे। उनका खात्मा कब होगा ? विकास को मारकर पुलिस का इकबाल पहले से और कम हो गया है। जनता को खुश करने के लिए भले हीं इस तरह के अन्याय भरे फैसले लिए गए हों पर संविधान और न्याय प्रणाली के अनुसार पूरी तरह से गलत है। 
विकास दूबे को उसके किए की सजा निश्चित तौर पर मिलना चाहिए था। लेकिन न्याय के‌ दायरे में। आज पुलिस के इस बात पर किसी को भी यकीन नहीं हो रहा है कि गाड़ी पलटने के बाद वो पिस्टल छोड़कर भागने की कोशिश किया। जिसमें पुलिस की तरफ से जबाबी हुई और विकास मारा गया। विकास के मारे जाने के बाद पुलिस पर कुछ गंभीर सवाल उठ रहे हैं। जिनकी जानकारी सरकार ‌‌‌‌‌जनता से साझा करें।
पुलिस इनकाउंटर पर उठते कुछ गंभीर सवाल -
जो पुलिस के लोग रिश्र्वत लेते थे उनसे विकास का सामना क्यों नहीं करवाया गया ?
जो अपराधी खुद से आत्मसमर्पण किया हो, वो क्यों भागेगा ?
7 दिन तक वो किस प्रभावशाली ब्यक्ति के सम्पर्क में रहा और पुलिस उसे पकड़ नहीं पाई, अब उसका सच देश की जनता के सामने कैसे आयेगा ?
जिस गाड़ी में वो उज्जैन से आ रहा था उस गाड़ी को क्यों बदला गया ? 
पुलिस वैन के साथ चल रहे मीडिया के लोगों को इनकाउंटर वाली जगह से 20 किलोमीटर पहले क्यों रोका गया ? 
5 लाख के ईनामी दुर्दांत अपराधी के हाथ पुलिस वैन में खुले हुए क्यों थे ? 
उसे गिरफ्तार करने के बाद पुलिस द्वारा उसे हथकड़ीयां क्यों नहीं लगाई गई थी ? 
क्रेन से गाड़ी को गिरे हुए साइड से रगड़ते हुए पुलिस ने क्यों खिंचवाया ? 
आखिरकार सरकार किसे बचाना चाह रही है ?

Thursday, July 9, 2020

विकास दूबे उज्जैन में गिरफ्तार हुआ या प्रायोजित समर्पण किया

सुबह 10 बजे के करीब आज तक खबरी चैनल के माध्यम से एक खबर ब्रेक हुई कि कानपुर में हुए हिंसा जिसमें कि DSP समेत 8 बहादुर पुलिस कर्मी मारे गए थे, उसका मुख्य आरोपी आज 7 वें दिन उज्जैन में महाकाल के दर्शन के बाद पुलिस के सामने समर्पण कर दिया। यह बात कुछ हजम नहीं हो रही है कि इतना शातिर खूनी कैसे हाई अलर्ट के बाद यूपी से मध्यप्रदेश पहुंच गया ? इसी में साजिश की बू आ रही है कि कैसे एक हाई प्रोफाइल आरोपी प्रदेश की सीमा को लांघते हुए उज्जैन पहुंचा ? वो भी तब जब कल हीं पुलिस और मिडिया के लोग बता रहे थे कि वो फरीदाबाद था तो इतनी जल्दी उज्जैन। बात कुछ समझ नहीं आई।
जब सिस्टम के अन्दर गन्दगी जड़ों तक समा गई हो तो उसका परिणाम विकास दूबे जैसा हीं निकलता है। विकास दूबे के आगे पूरा का पूरा पुलिस थाना नतमस्तक हुआ करता था। जिन 8 पुलिस के जवानों को मारा गया उसमें भी पुलिस के लोगों की हीं मिलीभगत थी। लगता है कि विकास दूबे का सरेंडर एक तरह से प्रायोजित था। सरेंडर के बारे में मैं कुछ ज्यादा नहीं लिखूंगा। उसे आप लोग आज पूरे दिन से देख रहे होंगे। लेकिन वोट देते समय अब जरूर सोचिएगा। 

Monday, July 6, 2020

सावन में मठ, मन्दिर बंद होने से मठ, मन्दिरों पर निर्भर लोग बेहाल

सभी देशवासियों को सावन मास की हार्दिक शुभकामना। मा. मुख्यमंत्री जी मैं आपके संज्ञान में लाना चाहता हूं कि मठ, मन्दिरों को बन्द करते समय आपको उससे जुड़े लोगों की आजीविका के बारे में भी विचार करना चाहिए। लाकडाउन जैसी वैश्विक समस्या के साथ जूझते हुए लोग सावन मास में प्रसाद, फूल-मालाएं, खिलौने इत्यादि बेचकर अपना पेट पालने की जुगत में लगे थे। अचानक उन मजबूर और बेबस लोगों के पास मंदिर प्रशासन की तरफ से सूचना आई कि पूरे सावन मास तक मठ, मन्दिर बंद रहेगा। जिसे सुनकर उन्हें बहुत दुःख से गुजरना पड़ रहा है। मेरा सुझाव ये है कि सोमवार और तेरस को छोड़कर गांव के मन्दिरों को यदि कुछ सावधानियों के साथ खोल भी दिया जाय तो आपकी प्रिय जनता के लिए बहुत राहत मिल जाएगी। मैं जौनपुर जिले का निवासी हूं। मैं गांव में हीं हूं, तो मंदिर से जुड़े लोगों की परेशानियों को नजदीक से देख और समझ पा रहा हूं।

मैं अपने क्षेत्र के मन्दिर त्रिलोचन महादेव की हीं बात कर लेता हूं। जिसमें पण्डा, पुजारी, माली, बनिया समुदाय से जुड़े लोगों की संख्या तीन से चार सौ की है। लेकिन एक महीने तक के लिए मन्दिर बंद होने से सबकी आजीविका को खतरा उत्पन्न हो गया है। सब परेशान हैं कि अब धान की खेती कैसे होगी ? मन्दिर पर निर्भर लोगों से बात करो तो यही हर साल जब मन्दिर चलता था तो हम लोग लोग अपना सारा काम (खेती-बाड़ी से लेकर अन्य कार्य) मन्दिर पर हुई कमाई से कर लेते थे। जो कि इस साल संभव नहीं दिख रहा है। मुख्य रूप से मन्दिर पर ये लोग लड्डू, लाचीदाना, नारियल, अगरबत्ती, फूल-माला, बेलपत्र, खिलौना, छोला, समोसा, चाय-पान का धन्धा करते थे। जिनमें मैं कुछ नामों का उल्लेख करना जरूरी समझता हूं। जो कुछ इस तरह हैं बृजलाल गिरि, प्रशान्त गिरि, दिनेश गिरि, मनोज गिरि, उमेश गिरि, महाबीर गिरि, लौटू गिरि, गुलाब सेठ, धिरेन्द्र गिरि, अमित गिरि, काशी गिरि, रूक्मीना, विकास अग्रहरि, गोपाल अग्रहरि, जयहिंद माली, नखड़ू माली, राजनाथ गिरि, रमेश गिरि, पारस साधु, प्रमोद माली, दरोगा माली, अरविंद प्रजापति, इत्यादि और लोग भी हैं। ये सभी लाकडाउन के शिकार शुरूआती दिनों से हीं हैं। अब इनका ख्याल या तो हमारे आराध्य शिव जी रखें या हमारे मत द्वारा चुनी हुई सरकार रखें। सरकार और पार्टी से उपर उठकर इनके बारे में सोचने की आवश्यकता है।

हर हर महादेव

Friday, July 3, 2020

यू पी के रामराज्य में आज रात एक डीएसपी समेत आठ जवान शहीद

आज सुबह जैसे हीं आंख खुली हमेशा की भांति देश-प्रदेश का हाल जानने के लिए मोबाईल हाथ उठाया और ट्विटर को खोला। ट्विटर खोलते हीं जो पहली खबर आंखों के सामने आई सहसा उस पर यकीन हीं नहीं हुआ। फिर धैर्य के साथ पढ़ा एवं कुछ और पत्तलकार भाईयों के अकाउंट को चेक किया तो उन सबमें एक घटना कामन थी और वो थी कानपुर एनकाऊंटर की घटना। सबसे पहले मैं उत्तर प्रदेश के शहीद पुलिस के जवानों को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि भेंट करता हूं तथा आशा करता हूं कि इनके हत्यारे को पुलिस पाताल से निकालकर यमलोक की सैर करायेगी। हमें हमारे पुलिस के जवानों की क्षमता पर पूरा विश्वास है।
यह एनकाउंटर आज प्रसाशन और सरकार पर बहुत से सवाल खड़े कर रही है कि इतनी बड़ी घटना को एक अपराधी कैसे अन्जाम दे दिया ? सवाल ये भी उठता है कि कहीं पुलिस के बीच से हीं किसी की अपराधी विकास दूबे के साथ मिलीभगत तो नहीं थी ? ऐसे अनेकों सवाल प्रदेश के हर नागरिक के मन में बिजली की तरह कौंध रहा है कि आखिरकार इन शहीदों की शहादत के लिए कौन जिम्मेदार है ? जैसा कि खबर निकलकर आ रही है कि अपराधी विकास दूबे पर 50 से ज्यादा गंभीर मुकदमे प्रदेश में दर्ज है। फिर भी वो बेल्लौस होकर बाहर घूमता रहा और आज उसकी हिमाकत तो देखिए वो पुलिस वालों पर हीं कहर बनकर टूट गया। आखिर एक अपराधी में इतनी ताकत आती कहां से है ? यह सवाल भी उठना चाहिए और एक निर्णायक स्तर पर जाकर रूकना चाहिए। हम पुलिस को दोष देते हैं लेकिन ये क्यों नहीं समझते हैं कि वो किसी सत्ता, सरकार के अधीन हैं। और उस सरकार के अंग विकास दूबे जैसे कई गंभीर धाराओं वाले अपराधी भी हैं। सत्ता का वो रंग है जहां लोग अपने-अपने तरीके से अपने को अपराध मुक्त करवाते हैं और कहते हैं कि ये मुकदमे राजनीतिक प्रतिशोध के माध्यम से करवाया गया था। लेकिन सच जो है वो हर शख्स को पता होता है।
आज हम विभिन्न तरीकों से इन शहीद पुलिस के जवानों को श्रद्धांजलि देंगे और अपराधी को कोसेंगे, सत्ता को कोसेंगे लेकिन कल से हम फिर किसी विकास जैसे पागलों का गुणगान गाना शुरू कर देंगे। हमें सिस्टम को मजबूत और पारदर्शी बनाने के लिए एक लम्बे संघर्ष की आवश्यकता है, बिना संघर्ष के 'ढाक के तीन पात' वाली कहानी चरितार्थ होगी।
पुलिस के शहीद वीर जवानों को सिर झुकाकर नमन !


Thursday, June 18, 2020

LAC की गलवान वैली पर चीन दावा

बहुत ब्यस्तता के बीच आज कोरोना से बचते हुए ब्लॉग लिख रहा हूँ. बहुत दुःख के साथ लिखना पड़ रहा है कि हमारे देश की सीमा जो की लद्दाख में है. उसमें चीनी सैनिकों ने घुसपैठ की. घुसपैठ  तो की साथ-साथ टेंट भी डाल कर वहीं डेरा जमा लिया। लेकिन जो सबसे पीड़ादायक बात ये हुई कि सीमा पर झड़प के दौरान हमारे 20 बहादुर लाल मारे गए अर्थात वीर गति को प्राप्त हुए. यह उरी बाद दूसरी सबसे बड़ी हृदय विदारक घटना हमारे सामने आयी. फर्क बस इतना है कि उरी के वक्त पाकिस्तान और यहां चीन है. कुछ मीडिया रिपोर्ट को आधार बनाकर मानें तो दुश्मन देश चीन के भी 43 या तो झड़प  दौरान मारे गए या घायल है. अब तो चीन पूरी गलवान पहाड़ी पर अपना दावा जता रहा है. हमें चीन के इस घिनौनी करतूब से पहले  हीं  चौकन्ना रहने की जरूरत थी.
 

Thursday, May 21, 2020

राहुल का सपना साकार कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ की जनता को दिया न्याय

@INCIndia की छत्तीसगढ़ सरकार के जनप्रिय नेता @bhupeshbaghel जी ने @RahulGandhi जी के #न्याय के सपने को साकार किया है। जो गरीबों के लिए वरदान साबित होने वाली है। आपकी दूरदर्शिता को सलाम है। राहुल गांधी ने 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान न्याय योजना कि खूब प्रचार किया था। लेकिन कांग्रेस वह केन्द्रीय चुनाव बुरी तरीके से हार गई थी। लेकिन कोरोना जैसी महामारी ने पूरे भारत को लाकडाउन की स्थिति में ला दिया। जिसकी वजह से समूचे विश्व को आर्थिक शक्ति सुधारने के लिए नये सिरे है से सोचने को मजबूर कर दिया। जिसकी वजह से राहुल गांधी ने रघुराम राजन और नोबेल विजेता बनर्जी से अर्थब्यवस्था पर चर्चा की। जिसमें उन्होंने कांग्रेस पार्टी को सुझाव दिया कि आप अपने राज्य सरकारों से कहें कि वो 2019 के न्याय को लागू करें। जिससे जनता के हाथ में नगद पैसा जायेगा और उनकी क्रय शक्ति बढ़ेगी। जिसका माकूल असर राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
आज छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने आज राजीव गांधी की जयंती पर न्याय योजना को छत्तीसगढ़ की जनता को समर्पित कर दिया। अब समाज में इसके सकारात्मक असर का आंकलन आने वाले समय में किया जायेगा।
#CongressGivesNyay

Sunday, May 17, 2020

लाकडाउन 4.0 में मजदूरों की अनदेखी

आज लाकडाउन के चौथे चरण का सन्देश दे दिया। जो कल से प्रभावी होगा। लेकिन इस बार भी पूर्व की भांति गरीब, निरिह मजदूरों को फिर से बेसहारा छोड़ दिया गया‌। सरकार ने लाकडाउन तो बढ़ाया पर घरों से निकल चुके सड़कों पर चल रहे बेबस मजदूरों को बिना किसी सहुलियत के सड़क पर छोड़ दिया। कम से कम सरकार को गरीब मजदूरों को उनके घर तक सकुशल पहुंचाने का प्रबंध किया जाना चाहिए था। उसके बाद सरकार लाकडाउन बढ़ाने का फैसला करना चाहिए था।

Tuesday, May 12, 2020

फेसबुक के नियमों में घातक बदलाव

फेसबुक अपने सर्वर पर कुछ बदलाव करने जा रहा है। और उसका असर ये होगा कि हमारी सारी जानकारी को वह मनचाही एजेंसी के साथ साझा कर सकेगा। हम उम्मीद करते हैं कि फेसबुक हमारी चिंताओं पर ध्यानपूर्वक विचार करेगा।
मैं फेसबुक से सख्त लहजे में अनुरोध करता हूं कि बिना मेरी सहमति के मेरा विवरण जैसे फोटो, पोस्ट, कमेन्ट, ब्यवहार पता किसी भी अन्य एजेन्सी के साथ साझा न करें।
यदि फेसबुक के द्वारा ऐसा किया गया तो मुझे मजबूरन अपना फेसबुक अकाउंट डिलीट करना पड़ेगा। अगर आज आप, हम फेसबुक के इस कदम के खिलाफ उठ खड़ा नहीं हुए तो ये हमारी निजता पर अब तक का सबसे बड़ा प्रहार हो

Sunday, May 10, 2020

मां

मां सिर्फ़ एक शब्द नहीं, बल्कि समस्त ब्रह्माण्ड का ज्ञान है।मां के चरणों में दण्डवत रहें तो आप हमेशा कष्ट से महफूज रहेंगे। कुछ बरस से ये रिवायत चली आ रही है कि कुछ लोग जिनकी संख्या बहुत है। वो सोशल मिडिया के माध्यम से मां के प्रति अपने प्यार और सम्मान दिखा रहे हैं। जो अच्छी बात है। ऐसा नहीं कि पहले के लोग अपनी मां से प्यार नहीं करते थे। लेकिन पहले के लोग दिखावा नहीं करते थे। उस जमाने की बात को पुख्ता करने के लिए सबसे प्रमुख बात ये थी कि उनके वक्त में कोई वृद्धाश्रम नहीं होता था। मां दुनियां की इकलौती ऐसी इंसान हैं। जो बिना निज स्वार्थ के अपने बच्चों के लिए आठों पहर समर्पित रहती है। "मां" को किसी शब्द के माध्यम से परिभाषित नहीं किया जा सकता है। मां खुद भूखे पेट रहकर अपनी संतान को खाना देती है।
मैं खुद अपना और अपनी मां का अनुभव साझा करना चाहूंगा। मेरा बचपन केराकत तहसील के मटियारी गांव मेरे ननिहाल में हुआ। मेरे नाना एक प्रतिष्ठित ब्यक्ति थे। क्योंकि वो एक अध्यापक थे।

Thursday, April 30, 2020

कल इरफ़ान आज ऋषि ने दुनिया को अलविदा कहा

2020 भारत समेत दुनिया के लिए एक अपशकुन सा रहा है. पहले तो कोरोना का प्रकोप साल के शुरुआत में जो रफ्तार पकड़ा अब तक उसी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है. परन्तु हमारे देश के लिए कोरोना के साथ-साथ एक-एक करके दो झटके बड़े लगे. कल इरफ़ान खान और आज ऋषि कपूर दुनिया छोड़कर चले गए. बॉलीवुड समेत भारत के लिए ये एक बड़ा झटका है. दोनों अभिनेता कैंसर नामक बीमारी से पीड़ित थे. लेकिन दोनों में एक बात समान थी कि दोनों जिंदादिल और हंसमुख इंसान थे. इरफ़ान खान बेहद गरीबी से उठकर टी वी सीरियल में काम किया और हमारे बचपन में मशहूर धारावाहिक "चंद्रकांता" में इरफ़ान का रोल बहुत दमदार था. उनकी एक्टिंग का हम सब बचपन से कायल थे. 'पान सिंह तोमर' में इरफ़ान का बागी के रूप में निभाया गया किरदार उनकी दमदार एक्टिंग की वजह से अमर हो गया. इरफ़ान का अंतिम फिल्म 'अंग्रेजी मीडियम' थी.  
ऋषि कपूर भारतीय सिनेमा में एक अध्याय है. उन्हीं के पूर्वजों ने देश में फिल्म निर्माण के लिए जो सोच दिया। उसी पर आज पूरा बॉलीवुड टिका है. ऋषि कपूर बेहद खुशमिजाज और मजाकिया इंसान थे. वो तीन भाई थे. जिनका नाम शशि, शमी और ऋषि कपूर था. स्व. श्री पृथ्वीराज कपूर जी इनके दादा थे. ऋषि जी की शादी नीतू सिंह जी से हुई थी. ऋषि जी का फ़िल्मी सफर 'मेरा नाम जोकर' से शुरू होकर हाल हीं में रिलीज हुई फिल्म '100 नाट आउट' थी. जिसमें अमिताभ बच्चन जी के बुजुर्ग बेटे का किरदार ऋषि जी ने निभाया था. ऋषि जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. भगवान इन दोनों सितारों को स्वर्ग में सर्वोच्च स्थान प्रदान करें।

इन दोनों सितारों को विनम्र श्रद्धांजलि 
    

Tuesday, April 14, 2020

कोरोना का कहर और लाकडाउन भाग -2

जनता कर्फ्यू से होते हुए हम देशवासियों ने 24 मार्च से 14 अप्रैल तक पूरे देश में 21 दिन का लाकडाउन देखा. इस दौरान प्रधानमंत्री जी के आग्रह पर कोरोना को भगाने के लिए पूरे देश में ताली-थाली और दीपोत्सव का सफल आयोजन किया गया. उसके बाद भी दिन-ब-दिन स्थिति गंभीर बनती गयी। जिसका परिणाम ये रहा कि आज से फिर 3 मई तक के लिए लाकडाउन 2.0 को बढ़ा दिया गया है। जनता अब हताश होती नजर आ रही है. लोगों का धैर्य अब टूटने लगा है.

देश की जनता का सब्र टूट अब टूट रहा है-
देश जिस विकट स्थिति से गुजर रहा है. उसने जनता के सब्र की सीमा को लांघते हुए बहुत ऊपर जा पहुंचा है. वो ज्वालामुखी की तरह कब विस्फोट कर जाएगा ? इसका निश्चित अनुमान किसी सरकार या सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी के पास नहीं है. उसी का नतीजा ये रहा कि आज जैसे हीं प्रधानमंत्री जी द्वारा लाकडाउन को सुबह 10 बजे 3 मई तक बढ़ाने का बाकायदा एलान किया गया. तो शाम होते-होते उस बेचैनी का असर महाराष्ट्र में दिखने लगा. जहां बांद्रा रेलवे स्टेशन पर (निकट जामा मस्जिद) प्रवासी मजदूरों की भीड़ हजारों की संख्या में एकत्रित हो गयी. जो कोरोना संक्रमण को देखते हुए एक गंभीर समस्या नजर आने लगी. जो अपने-अपने घरों को लौटने के लिए बेताब थे. कुछ मेरे भी रिश्तेदार जो गाजीपुर जिले के रहने वाले हैं. वो भी बंबई में बहुत परेशान नजर आ रहें है. वो लोग किसी भी कीमत पर गाँव वापस आने के लिए तैयार हैं. हो सकता है कि उनके जैसे लोग हीं उस भीड़ का हिस्सा हों. अंततः भीड़ को तितर-बितर करने के लिए महाराष्ट्र पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा.  
महाराष्ट्र सरकार के युवा मंत्री आदित्य ठाकरे जी ने इस घटना का जिम्मा केंद्र सरकार पर फोड़ने की कोशिश की. आदित्य ठाकरे ने कहा कि "केंद्र सरकार ने लाकडाउन को बढ़ाते हुए दिहाड़ी और प्रवासी मजदूरों का ख्याल नहीं रखी. महाराष्ट्र सरकार सबको भोजन देने  प्रतिबद्ध है. पर केंद्र सरकार को उनका ख़याल रखना चाहिए. यूपी और बिहार के प्रवासी मजदूरों की संख्या महाराष्ट्र में बहुत ज्यादा है. वे सभी लोग अपने घर पहुंचने को बेताब हैं. कुछ ऐसी हीं तस्वीर 24 मार्च के लाकडाउन के बाद दिल्ली , नोएडा और देश के अन्य भागों में देखने को मिला था. जिसमें लाखों लोग सैकड़ों मील दूर अपने-अपने घर के लिए पैदल हीं निकल लिए थे. बाद में जिनके लिए कुछ बसें इत्यादि चलाकर उनके मंजिल तक पहुंचाने का निर्णय राज्य सरकारों ने लिया था. अहमदाबाद, मुंबई, कर्नाटक जहां भी प्रवासी मजदूर फंसे हैं सब पैदल हीं यूपी, बिहार के लिए निकल लिए है.

सुझाव-
  • ऐसे वक्त में हम जितना सम्भव हो सके अपने घरों में रहें.
  • ये महामारी देश को लाशों का टीला बना सकती है, यदि हमने सरकार का साथ नहीं दिया। हम अपने आस-पास के लोगों को भी घर में रहने के लिए प्रोत्साहित करें. 
  • राज्य सरकारें स्वयं सेवी संस्थाओं की सकारात्मकता के साथ उपयोग में लाये.
  • केंद्र सरकार को हर पीएफ धारी के खाते में एक निश्चित रकम आने वाले कुछ महीनों तक जमा करें.
  • राज्य सरकारें, केंद्र सरकार के सहयोग से यह सुनिश्चित करें कि शहर में रह रहे किसी भी किरायेदार को किराया देने के लिए अनावश्यक दबाव न बनाएं.
  • राज्य के मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और केंद्र के मंत्रियों को डाक्टर, पुलिस की तरह सड़क पर उतरकर जनता से सीधा संवाद स्थापित करने की जरूरत है. 


Sunday, April 12, 2020

कोरोना का कहर और लाकडाउन भाग -1

विश्व भर में जनवरी महीने से शुरू हुआ कोरोना का कोहराम आज कहर ढा रहा है. और परिणाम ये है कि हमारे देश में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या 7 हजार पार  कर चुकी है. केंद्र सरकार का ढुलमुल रवैया अभी तक जारी है. 200 से ज्यादा मरीजों की इस वायरस से मृत्यु भी हो चुकी है. लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि कोरोना के संक्रमण को फैलने पर थोड़ा बहुत रोक जरूर लगी है. सरकार लाकडाउन के अलावा और कोई दूसरा तरीका अब तक ईजाद नहीं कर पायी है. देखना है लाकडाउन के भरोसे सरकार कब तक लोगों के बीच में अपने आपको प्रस्तुत कर पाती है.

कोरोना को रोकने में गैर-भाजपाई दलों की सरकारें आगे -

अब तक जिन सरकारों ने इस महामारी को रोकने में सफलता हासिल की है या कहें कि कुछ हद तक वायरस को फैलने से रोका है. उनमें गैर-भाजपाई सरकारों का मुख्य भूमिका रहा है. बात चाहे कांग्रेस शासित राज्य छत्तीसगढ़, राजस्थान की करें या लेफ्ट शासित केरल की. इन सब राज्यों ने कोरोना को रोकने में काफी हद तक सफलता अर्जित की. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने होली बाद से हीं सिनेमा घरों, माल, स्कूल, कॉलेज को बंद करा दिया था. जिसका परिणाम ये हुआ कि छत्तीसगढ़ में मरीजों की संख्या सिमित होकर रह गयी. केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने सुसंगठित तौर पर बहुत हीं बढ़िया काम किया। जब भारत में कोरोना का आगमन हुआ उस समय केरल में मरीजों की संख्या पूरे देश में पहले स्थान पर थी. जो विजयन की प्रशासनिक क्षमता की वजह से आज कंट्रोल करते हुए तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है. इनके अलावा राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने कोरोना से निपटने के लिए एक "भीलवाड़ा" मॉडल तैयार किया। जिसका सफलता का जिक्र देश भर में किया जा रहा है. भीलवाड़ा में एकाएक मरीजों  संख्या में काफी इजाफा हुआ था. जिसे कम वक्त में हीं सामान्य कर दिया और पूरे राज्य में तीव्र गति से कोरोना की नि:शुल्क जांच करवाई। जो पूरे में देश में सर्वाधिक संख्या जांच वाला प्रदेश बना.    
विजयन जी को इस तरह की आपदा से निकलने का बहुत अनुभव है और उनके अनुभवों से केंद्र समेत अन्य राज्यों को सीखने की जरूरत है. 2018 में आये निपाह से निपटने का अनुभव विजयन जी के प्रशासन के पास है. निपाह के वक्त केरल ने हीं पूरे राज्य को तीन जोन येलो, ऑरेंज, ग्रीन में बांटकर उसे खत्म किया था. वही मॉडल आज महाराष्ट्र से झारखंड, छत्तीसगढ़ तक अपनाया जा रहा है. 

बीजेपी के मुख्यमंत्री लाचार क्यों ?

इन सबके बीच बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री कहीं नजर नहीं आ रहें हैं. बीजेपी से अकेले मोदी जी हीं नजर आ रहे हैं. क्योंकि उनकी मजबूरी ये है कि अगर वो कोई प्लान लेकर सामने आते हैं तो सरकार उनकी ही पार्टी पर उठने शुरू हो जाएंगे। आप देखेंगे कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश में स्थिति कितनी भयावह बनी हुई है. शिवाय घोषणा के जमीन पर कोई काम नजर नहीं आ रहा है. बीजेपी मुख्यमंत्रियों के पास भी इस लड़ाई से लड़ने के लिए अच्छे विचार है. पर चाह कर भी उसे वो जनता के सामने नहीं ला पा रही है. 

कांग्रेस आगे बढ़ कर कोरोना पर लड़ाई लड़ती हुई दिख रही है 

कांग्रेस पार्टी कोरोना के मुद्दे पर आगे बढ़ते हुए लड़ाई लड़ते हुए दिखना चाह रही है. उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस ने एक चाल के मुताबिक अपने राज्यों को मीडिया के सामने ला रही है और बारी-बारी से पत्रकार वार्ता करवा रही है. जिनमें सवाल-जबाब का सिलसिला भी रखा जाता है. इसी तरह की एक पत्रकार वार्ता में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने कहा कि 'हमारे नेता राहुल गांधी जी ने काफी पहले हीं तैयारी करने का निर्देश दे दिया था. जिसकी वजह से हमारी सरकारों ने इससे निपटने में सफलता पाई. भूपेश बघेल ने ये कहते हुए सरकार से भी सवाल पूछ लिया कि "यदि विदेश से आने वालों को सरकार हवाई अड्डे हीं रोक लेती और चेक करती तथा हवाई जहाज़ों को रद्द कर देती तो आज इतनी बुरी स्थिति देखने को नहीं मिलती. इससे एक बात स्पष्ट तौर पर दिख रहा है कि कांग्रेस अब सरकार को घेरना शुरू कर चुकी है. 

Tuesday, April 7, 2020

मौसम का बदलता मिजाज और देश में कोरोना का कहर

मौसम का बदलता मिजाज और देश में कोरोना का कहर एक साथ घटित हो रहा है. रोज-रोज देश के अनेक हिस्सों से नए केस आ रहें हैं. लेकिन अब  सरकार ने इसका कोई ठोस इलाज नहीं निकल सका है. लेकिन मुँहजोरी चारो तरफ से जारी है. जहां विपक्ष सत्ता पर ऊँगली उठा रहा है वहीं सत्ता अब अपनी अकड़ कम करते हुए विपक्ष के नेताओं से मेल-मिलाप और वार्तालाप करने की कोशिश कर रहा है. मुझे लगता है कि मोदी १ और मोदी २ के कार्यकाल में विपक्ष को साधने की ये पहली कोशिश है. सरकार अब विपक्ष की महत्ता को समझने लगी है और विपक्ष से कोरोना से निपटने के लिए राय भी मांगना शुरू कर दिया है. जो देश की राजनीति के लिए एक अच्छी बात है. मीडिया खबरों से पता चला कि दो दिन पहले मोदी जी ने सोनिया समेत समस्त विपक्ष के नेताओं से बात की और कोरोना से लड़ने के लिए उन नेताओं से सुझाव भी मांगे. आज कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी जी द्वारा ५ सुझाव भी दिया गया. जिस पर यदि सरकार अमल करती है तो समाज में एक अच्छा संदेश जाएगा.
मोदी एंड कम्पनी को चाहिए कि इस आफत की घड़ी में अपने अहम को त्यागकर देशहित में सोचें और अपने अज्ञानी प्रवक्ताओं को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भड़काऊ बयानबाजी करने से रोके. और सरकार को निम्न बातों की तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहिए -
1. सरकार को कोरोना टेस्ट की गति बढ़ाने की तरफ बहुत जल्दी कदम उठाने की आवश्यकता है.
2. ग्रामीण क्षेत्रों में जांच के लिए स्वास्थ्यकर्मियों की प्रशिक्षित टीम का एक टास्क फ़ोर्स बनाना चाहिए। जो गांव के हर नागरिक का घर-घर जाकर टेस्ट करें.
3. जो लोग संक्रमित नजर आए. उनको कुछ दिनों नसरकारी निगरानी में रखा जाय.
4. देश के समस्त नागरिकों को अनाज और जरूरी सामान की उपलब्धता सुनिश्चित करना सरकार के प्रमुख अजेंडे में शामिल करना होगा.
5. दिहाड़ी मजदूरों को उनके खाते में किश्तों में नगद भुगतान का प्रबंध सरकार को करना चाहिए.
6. छोटे और मझोले उद्योगपतियों को उद्योग में कर एवं अन्य तरिके से कुछ सरकारी रियायत देकर ब्यवसाय को बूस्ट करने के लिए नियमों में ढील देने की आवश्यकता है.
7. लकडाउन में फंसे लोगों को निकालने के सरकार को एक पारदर्शी एवं सहूलियत भरा फैसला करना चाहिए.
   



















Sunday, April 5, 2020

क्या मोदी को कोई विपक्ष का नेता टक्कर दे पायेगा

कल भारत के प्रधानमंत्री ने देश के अधिकतर अपने समर्थकों को दिया जलाने के काम पर लगा गया. जिसे भक्त मंडली ने बखूबी अंजाम दिया. एक बात समझ में नहीं आयी या ये कहें तो भक्तों ने ये नहीं सोचा कि कोरोना जैसी महामारी से बचने के लिए दिया नहीं दवा की जरूरत है. प्रधानमंत्री के दिया और थाली बजाने वाले अभियान का उनके समर्थकों ने इतने शिद्द्त से निभाया कि मानो कोरोना अब देश छोड़कर भाग हीं जाएगा. सब लोग सोशल मीडिया पर दिया की फोटो अपलोड करने लग गए और अपने आप को सच्चे देशभक्त के रूप में प्रदर्शित करने लगा गए. सोशल मीडिया के माध्यम से कुछ ऐसी तस्वीरें भी देखने को मिली कि कुछ अति उत्साही भक्त सर पर दिया लेकर मोदी-मोदी चिल्ला रहे हैं तो कुछ सिलेंडर जलाकर उजाला करने लगे. हैदराबाद से बीजेपी विधायक राजा सिंह तो दिया जलाकर प्रधानमंत्री जी के सोशल डिस्टेंसिंग का खुला मजाक उड़ाते हुए मशाल जुलूस भी निकाल दिया.
शायद प्रधानमंत्री जी को अपने समर्थकों पर पूरा यकीन था. जभी तो ताली-थाली के बाद दिया जलाने के काम पर लगा दिया. और उसका भरपूर उपयोग भी किया गया. मुझे ये लगे लग गया है कि मौजूदा दौर में विपक्ष का कोई और नेता नजर नहीं आता है। जो मोदी जी की लोकप्रियता को चुनौती दे सके. ऐसा मैं अपने घटित अनुभवों के आधार पर कह रहा हूँ. मैं ताली-थाली और दिया जलाने तक के प्रधानमंत्री के दोनों अभियानों के वक्त अपने पैतृक गाँव में था. उस दौरान मैंने एक बात देखीं कि लोगों ने जातियों के विभेद को तोड़ते हुए ताली-थाली भी बजाया और आज रात बिजली बंद करके दिया, मोमबत्ती भी जलाया. हमें आलोचना करनी चाहिए लेकिन अगर किसी का कुछ आकर्षण है तो उसकी प्रशंसा भी खुले दिल से करना चाहिए.

Saturday, April 4, 2020

कोरोना ने रोज कमाने खाने वालों को किया निर्धन

मैं गांव में देख रहा हूँ कि कोरोना नामक महामारी ने रोज कमाने खाने वालों को किया निर्धन कर दिया है. आज त्रिलोचन महादेव के एक ऐसे हीं ब्यक्ति से मुलाक़ात हुई. जिनका नाम पप्पू है. जाति से वो 'अग्रहरि' हैं. परन्तु वो रोज कमाकर खाने वालों में से हैं और बीजेपी के पक्के सपोर्टर भी हैं. आज जब उनसे मंदिर पर मिला तो उनकी पीड़ा अपने आप बाहर निकल गयी. उन्होंने मुझे सम्बोधित करते हुए कहा कि बाबा अब कुछ भी नहीं बेच पा रहा हूँ. और खाने के लिए घर में एक अधेला भी नहीं। ऊपर से गैस भी खत्म हो गयी. इन सब के एवज में मेरे पास मात्र एक हजार रूपया है. लगभग इतने पैसों से बस गैस को भरवा सकता हूँ. पर उसके बाद क्या खाऊंगा ? इस बात की चिंता है. अगर ये लाकडाउन १४ अप्रैल के बाद भी आगे बढ़ता है. तो हम जैसों के लिए जानलेवा साबित हो जाएगा।
ऐसे में सरकार को चाहिए कि जितने भी कार्ड धारक नागरिक हैं. वो चाहे किसी भी श्रेणी के हों सबको कम से कम हर महीने एक निश्चित अनुपात में अनाज, तेल, दाल और गैस की उपलब्धता अधिकारीगण के माध्यम से सुनिश्चित कराये। इस कदम से जनता का सरकार में इकबाल भी बुलंद होगा और ख़ुशी-ख़ुशी इस महामारी को देश के लोग मिलकर हरा भी देंगे। मैं खुद एक नौकरी पेशा (प्राइवेट) इंसान हूँ. मैं अपने भविष्य को लेकर खुद आशंकित हूँ. हमारे क्षेत्र का एक उसूल है कि आप अगर अपनी सैलरी का १० गुना काम कर दोगे तो आपको उसका दसवां हिस्सा वेतन के रूप में दिया जाएगा। इन दिनों जब हम काम हीं नहीं कर पा रहें हैं तो बास हमें वेतन किस बात का देगा ? पप्पू जैसे करोड़ों लोगों की यही ब्यथा है. राम जाने अब आगे होता है  क्या ?

Thursday, March 26, 2020

नोटबन्दी के बाद कोरोना से देशबन्दी, मजदूर बेहाल

कोरोना का प्रकोप दिनों-दिन महामारी का रूप लेता जा रहा है. सरकार ने २१ दिन भारत बंद का घोषणा करते हुए शायद इस बात का ध्यान सम्भवतः नहीं दिया था. वरना सरकार को ये जरूर समझ में आ गया होता कि इस फैसले से कौन-कौन से लोग कितने प्रभावित होंगे ? भारत बंदी नोट बंदी का दूसरा रूप है. मीडिया रिपोर्टों से कुछ खबरें निकलकर सामने आ रहीं हैं. जो अत्यंत हृदय विदारक है. दिल्ली में दिहाड़ीं मजदूरी करने वाले देश के अन्य भागों की तरह परेशान हैं. जो असंगठित क्षेत्र के कामगार हैं उनके सामने खुद को ज़िंदा रखने की सबसे बड़ी चुनौती साबित हो रही है. एक न्यूज़ चैनल की खबर को आधार मानकर अगर मैं बात करूँ तो आज की स्थिति नोटबंदी से भी भयावह हो गयी है. लोग दिल्ली से अपने घर के लिए पैदल हीं ठेले पर सामान लेकर निकल पड़े हैं. उनकी चिंता सरकार को  नहीं हैं या ये कहें कि सरकार अंधी हो चुकी है. वो कुछ न तो देखना चाहती है और न हीं सुनना चाहती है.
प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में एक गाँव कोइरीपुर आता है. जिसमें गाँव के मुसहर जाति के बच्चे अपने पेट को भरने के लिए घास खा रहें हैं. ऐसे निरीह लोगों तक सरकार की निति अगर नहीं पहुंची तो इसके लिए हम किसे जिम्मेदार माने ? क्या इसके लिए हम सरकार को के लोगों  दोष नहीं दे सकते ? मैं खुद गाँव में हूँ और गाँव के लोगों के मन में ब्याप्त भय आसानी से पढ़ पा रहा हूं. सरकार के इस फैसले से लोगों के मन में उहा-पोह की स्थिति में जी रहें हैं. ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को खाद्यान की चिंता सताने लगी है. गाँव में लोगों के पास साग-सब्जी की कमी होने लगी है. अगर उदाहरण स्वूपरूप मैं अपनी बात हीं रखू तो ३१ मार्च को मेरे दादा जी की तेहरवीं है. उनके तेरहवीं के लिए जरूरी सामान भी मेरे बाजार में उपलब्ध नहीं हो पा रहा है. मेरा बाजार त्रिलोचन महादेव क्षेत्र में एक जाना-माना बाजार है. ऐसी हीं ब्यथा मेरे जैसे सैकड़ों लोगों की है. कुछ तो पुलिस प्रशासन के रवैये से परेशान हो रहे हैं. जैसे कल त्रिलोचन महादेव मंदिर पर भैयालाल राजभर को पुलिस ने गाली-गुप्तार दिया और बाजार में बस स्टैंड के पास पीपल के पेड़ के निचे चार डंडा मार भी दिया। इस तरह से लोगों के मन में बहुत भी ब्याप्त है.
मुझे कहीं भी देखने या पढ़ने को नहीं मिला है कि आजादी के बाद पूरे भारत को कभी बंद किया गया हो. अगर ऐसा हुआ तो इसी मजबूत सरकार के दौर में देखने को मिला। मैं सरकार के इस बंद का समर्थन करता हूँ पर विलम्ब करने को लेकर मेरी नाराजगी भी है. राहुल गांधी ने 12 फरवरी को हीं सरकार को चेता दिया था. पर ये घमंडी सरकार उनकी बात को इग्नोर करती गयी. जिसका परिणाम आज पूरे देश में तालाबंदी के रूप में देखने को मिल रहा है. यदि एहतियातन सरकार ने एक महीने पहले हीं विदेश से आने-जाने वाली उड़ानों पर प्रतिबंध लगा दिया होता। तो आज भारत बंद करनी की आवश्यकता नहीं होती। इस बंद देश का कितना नुक्सान होगा ? उसका अंदाजा चाटुकार, दरबारी मीडिया वालों को तो है. पर वो जनता के सामने असलियत बताने से बच रही हैं. और सरकार की तरफदारी करते-करते देश के साथ गद्दारी कर रही है. देश की अर्थब्यवस्था वैसे हीं गर्त में डूबी पड़ी थी और इस आर्थिक मंदी के बाद अब रसातल में भी पहुंचने की संभावना निश्चित है. अकेले कोरोना के झटके से उबरने में सरकार को कम से कम १ साल का समय लग सकता है.

Tuesday, March 24, 2020

कोरोना पर मोदी जी फिर हुए अवतरित

हर देशवासी जानता है की कोरोना आज समाज के हर तबके के बीच घुस चुका है. गांव से लेकर शहर तक यह महामारी का रूप धारण कर चुका है. इसे रोकने के लिए कुछ कड़े फैसले की जरूरत थी. जिस पर अमल भी हुआ. २१ तारीख की मध्य रात्रि २२ मार्च की मध्य रात्रि तक प्रधानमंत्री महोदय जी ने जनता १४ घंटों के लिए जनता कर्फ्यू का ऐलान कर दिया. जिसमें ये होना था कि २२ की सुबह को सड़क पर कोई भी सरकारी या प्राइवेट वाहन नहीं चलेंगे. आदेश तो यहां तक था कि लोगों को घर से निकलने के लिए रोका जाय. इसी बीच मेरे दादा जी का देहावसान हो चुका था. मैं दिल्ली से मंडुआडीह चलने वाली रेल में टिकट भी ले चका था. जिसमें मेरे साथ परिवार के अन्य सदस्य भी यात्रा में जुड़ने वाले थे. गाजियाबाद से हम सबने अपनी यात्रा शुरू की और हम बनारस के लिए निकल गए. जहां से हमें अपने गांव जाना था. जो जौनपुर-वाराणसी राजमार्ग पर स्थापित था. इस बीच जब हम मंडुआडीह स्टेशन पहुंचे तो वहां परिवहन का कोई भी साधन मौजूद नहीं था. लोग घंटों वाहनों के इन्तजार में थे. कुछ लोग तो पैदल हीं लहरतारा होते हुए कैंट रेलवे स्टेशन की तरफ जा रहे थे. जिसमें बूढ़े लोग भी शामिल थे. उन्हें पैदल चलने में काफी तलकीफ का सामना करना पड़ रहा था. क्योंकि एक तो मंडुआडीह से कैंट की दूरी तकरीबन चार किमी थी ऊपर सर दोपहर के १२.३० बज चुके थे. सूरज सर पर चढ़ कर नांच रहा था. उन लोगों की आँखों में देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा थी कि सरकार का ये फैसला सही था पर उसका क्रियान्यवन सही नहीं था.
जैसे हीं जनता ने एक दिन का 'जनता कर्फ्यू' झेला. उसके बाद थोड़ी राहत की सांस लेनी चाही तो २४ मार्च की शाम को भक्तों के देव पुरूष श्री मोदी जी अपने पसंदीदा समय रात्रि के ८ बजे फिर से उपस्थित होंगे। ऐसा समाचार भक्तगड़ों समेत देशवासियों को पता चला. हर कोई आशंकित हो गया कि मोदी जी अपनी आदतों के अनुरूप कुछ तो घोषणा करेंगे. और हुआ भी वही. साहेब तय समय पर उपस्थित हुए और ऐलान कर दिया कि ये कर्फ्यू आगे २१ और दिनों के लिए के लिए बढ़ाया जा रहा है. फिर क्या था ? भक्त प्रसन्न हो गए और मोदी जी को देव् अवतार बताने में जुट गए. पर जब उनसे ये सवाल किया गया कि जब १२ फरवरी को कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राहुल गांधी जी ने कोरोना को लेकर चेता दिया था. तो सरकार ने क्या किया ? ऐसे सवाल का जबाब न दे पाने की स्थिति में भक्त तिलमिलाने लगे और अपने संस्कारों के अनुरूप गाली-गलौज करने लगे.

  

Friday, March 20, 2020

बाबा आपका जाना एक सदी का जाना है

19 मार्च 2020 को मेरे दादा जी का देहावसान हो गया। यह दुखद खबर मुझे मेरे आफिस से शाम को घर आने के बाद मिली। घर से पिता जी और छोटे भाई मोनू का फोन मेरे पास आया था। बाबा अक्सर कुछ महीनों से बीमार रहने लगे थे तो होली के दिन सोनू ने बाबा के कष्ट को देखा और मुझे फोन किया। जब मैं उसे बोला कि बाबा की जांच-पड़ताल बीएचयू में करवाईए। उसके बाद सोनू-मोनू गाड़ी करके घर से बाबा जी को बीएचयू ले गये और दो दिन बाद बदहाल ब्यवस्था से जंग लड़कर हम हार गये पर इलाज तो दूर कोई खाट भी नहीं मिली। अन्त में हार मानकर उनका बनारस के हीं किसी प्राइवेट अस्पताल में जांच पड़ताल करवाया गया। जांच की तीन दिन बाद उनकी रिपोर्ट आई। जिसमें दादा जी के अस्त होने की कहानी लिखी गई थी। जांच में पता चला कि दादा जी को कर्क रोग की शिकायत है। इसी के बाद हम सब समझ चुके थे कि अब वो ज्यादा दिन नहीं जीने वाले हैं।
अन्ततः कल के दिन हमारे परिवार का सूरज अस्त हो गया। नि:संकोच आप किसी के लिए अच्छे तो किसी के लिए बुरे रहे होंगे। लेकिन हमारे लिए आप सच्चे नायक रहे हैं। मैं बहुत से लोगों को जानता हूं जो आपको नापसंद करते थे। उसका कारण उनका निजी स्वार्थ हुआ करता था।
आपके हीं संस्कार की वजह से हमने एक भाई का दूसरे भाई के प्रेम को देखा, समझा और जाना। आपका और छोटे बाबा (सिपाही) का प्रेम तो गांव के लोगों और हमारे सगे-संबंधियों के बीच में एक उदाहरण हुआ करता था। लेकिन एक बात सत्य है कि आपका मोह आपके अन्तिम समय में भंग होने लगा था। जो आपके देहावसान के महज कुछ घंटे पहले आपके शब्दों से प्रतीत हुआ। बाबा आप जहां भी रहोगे ईश्वर वहां आपको खुशहाल रखेंगे।

Wednesday, March 18, 2020

लोकतंत्र के क्या मायने जब विधायक जनता के प्रति निष्ठावान न हो

अगर इसी तरह चुनाव के बाद 5-10 सीट कम रह जाय और कुछ असंतुष्टों को तोड़कर एक नई सरकार का गठन विपक्ष के द्वारा किया जाय तो लोकतंत्र कहाँ बचा ? उदाहरण स्वरूप 2013 के छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव हुए. जिसमें 90 विधान सभा सीट आती हैं. ऐसे में बीजेपी ने 49 सीटों पर जीत दर्ज की और कांग्रेस ने 41 पर. फिर भी पांच सालों एक बीजेपी की सरकार बिना किसी कठिनाई के चली. ऐसा इसलिए संभव हो सका कि कांग्रेस के नेतृत्व ने कोई कुटिल खेल नहीं खेला. वरना मध्य प्रदेश की तरह मात्र 5 असंतुष्टों को प्रलोभन देकर बीजेपी की सरकार को बड़ी हीं आसानी सी अस्थिर कर सकती थी. पर की नहीं क्योंकि ऐसा करने पर जनता के मत का अपमान होता. खैर इस मामले में कांग्रेस का नया नेतृत्व काफी उदार है. 
आज जैसे सुबह-सुबह खबर मिली की कांग्रेस के कई नेता और मंत्री बागी विधायकों से मिलने कर्नाटक पहुंचे. जिनमे मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह, श्री कांति लाल भूरिया, कैबिनेट मंत्री जीतू पटवारी, घनघोरिया, सज्जन सिंह वर्मा, कुणाल चौधरी समेत 13 विधायक और मंत्री कर्नाटक पहुंचे. जिनकी आगवानी कर्नाटक प्रदेश अध्यक्ष डी. के. शिवकुमार ने किया. जिस होटल में बागी रुके हैं उसके कुछ किमी दूर कांग्रेसी नेताओं को कर्नाटक पुलिस रोक लेती है और दिग्विजय समेत सभी नेताओं को पुलिस हिरासत में ले लेती है. अगर ऐसा लोकतंत्र में चलता रहा तो हमें अपने जनप्रतिनिधि का चुनाव करना बंद कर देना चाहिए. लोकतंत्र के क्या मायने जब विधायक जनता,पार्टी और विचार के प्रति निष्ठावान न हो ? आज मध्य प्रदेश कर्नाटक के बाद दूसरा लोकतंत्र की हत्या करने वाला राज्य बना है. इन दोनों जगहों पर बीजेपी हीं विपक्ष में थी. इसे संयोग नहीं कह सकते. ये एक कुटिल प्रयोग है. दिग्विजय सिंह कोई छोटे कार्यकर्ता नहीं हैं. वो पूरे देश में एक जाना-पहचाना चेहरा है. 1993 से 2003 तक कांग्रेस की सरकार में मुख्यमंत्री के रूप में मध्य प्रदेश की सेवा की है. वर्तमान में वो मध्य प्रदेश कोटे से हीं राज्य सभा सांसद हैं. उन जैसे नेता के साथ भाजपा शासित सरकार का ये रवैया निंदनीय है.
मध्य प्रदेश को लेकर अदालत से सड़क तक दोनों तरफ से संघर्ष किया जा रहा है. सरकार बनाने के लिए भाजपा वाले क्यों इतने आतुर है ? जो अपने भविष्य को भी नहीं देख पा रहें हैं. मान लें कि आज कांग्रेस की सरकार गिर जाती है और 22 सीटों पर फिर से चुनाव होंगे. कुछ सीटें कांग्रेस जरूर जीतेगी. यदि कांग्रेस का आँकड़ा सैकड़ें में फिर से पहुंच जाता है तो क्या गारंटी कि कांग्रेस भाजपा के असंतुष्टों को नहीं तोड़ पाएगी ? क्योंकि बीजेपी में भी तो महात्वाकांक्षी लोग है ? उनको भी तो मंत्री बनना है. जब पार्टी प्रेम का पैमाना एक तरफ नहीं है तो दूसरी तरह होगा. क्या इसका कोई पैमाना है ? ऐसे कृत्य करके आप अपने भी पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहें हैं. अगर ये प्रयोग चल निकला तो आने वाले भविष्य में भाजपा समेत क्षेत्रीय दलों के लिए शुभ संकेत नहीं है. ऐसे कारकों को अमलीजामा पहनाने से सत्ताधारी दल को बचना चाहिए. अन्यथा लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं बचेगा. लोकतंत्र एक मजाक बन जाएगा.
     
   

Monday, March 16, 2020

एम पी में कमलनाथ सरकार का बचना मुश्किल बीजेपी हुई एक्टिव

मध्य प्रदेश में जब से महाराज के नाम से विख्यात ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पलटी मारते हुए कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए हैं. तब से मध्य प्रदेश में राजनैतिक रूप से उथल-पुथल मचा हुआ है. राज्यपाल ने कल मुख्यमंत्री कमलनाथ को आज यानी 16 मार्च को 'फ्लोर टेस्ट' कराने को कहा था, जिस पर कमलनाथ ने 'कोरोना' और बेंगलुरू में बैठे सिंधिया खेमें के विधायकों को अपना मुद्दा बनाया. आज विधान सभा में राज्यपाल महोदय का अभिभाषण हुआ. फिर हंगामें के बाद 'कोरोना' के नाम पर 26 मार्च तक सदन को स्पीकर ने स्थगित कर दिया. फिर दोनों पार्टी के लोग जोर आजमाइश करने लगे. बीजेपी ने अपने विधायकों की परेड राज्य पाल आफिस तक परेड करा दिया. बीजेपी के एक्टिव होने का असर ये हुआ कि शाम होते-होते 5 बजे तक महामहिम ने कल तक बहुमत साबित करने के लिए दुबारा कमलनाथ जी को पत्र लिखा. जबकि बीजेपी सुबह हीं इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट जा चुकी है. और अब सुनने में आ रहा है कि कांग्रेस भी इसी मामले में सरकार के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुकी है.   
देखिये बीजेपी आज जो कह रही है वो 1947 से अब तक किये गए कांग्रेस के कार्यों के पीछे छुप रही है. पर याद रखना होगा कि जो बीजेपी आज कर रही है वो निश्चित तौर पर आने वाले भविष्य में बीजेपी को भी भोगना पड़ेगा. मतलब कांग्रेस की केंद्र में जब सरकार होगी. तब बीजेपी आज की हीं तरह चिल्लायेगी और कुछ नहीं कर पायेगी. आज कांग्रेस की सरकार को जिस तोड़-फोड़ के माध्यम से गोवा, मणिपुर, अरुणांचल के बाद कर्नाटक और अब मध्य प्रदेश सरकार को जिस तरह से गिराया जा रहा है. वो देश के राजनीति के लिए शुभ संकेत नहीं हैं. कांग्रेस जब भी केंद्र की सत्ता में आएगी बीजेपी को भी इसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा.
अब निश्चित तौर पर लग रहा है कि कमलनाथ की सरकार मध्य प्रदेश की सत्ता को नहीं बचा पाएगी. परन्तु इसका जो असर होगा वो दशकों तक भारतीय राजनीति में देखने को मिलेगा. इसका असर ये होगा कि एक तरह जिसकी केंद्र में सत्ता होगी वो निर्लज्जता के साथ अपने विरोधी की राज्य सत्ता को महज कुछ राजयसभा सीटों के लिए हथिया लेगा. और विपक्षी पार्टियां बस संविधान की दुहाई देती रह जाएंगी. निश्चित तौर पर कांग्रेस ने जो किया उसी रास्ते पर बीजेपी दौड़ रही है. तो बीजेपी का भी हस्र आज नहीं तो 5 साल बाद कांग्रेस की तरह होगा. अगर कांग्रेस एक बार दिल्ली की सत्ता में आ गयी तो न जाने कितने ऐसे सिंधिया पानी भरते मिलेंगे. बीजेपी को भी ये समझ जाना चाहिए कि दल-बदलू नेता किसी के ख़ास नहीं होते। वो सावन के अंधे की तरह होते हैं. उन्हें हर जगह हरियाली नजर आती है. 
कांग्रेस के समर्थकों को निराश होने की जरूरत नहीं हैं. उन्हें मेहनत करने की जरूरत है. अब जनता खुद समझने लगी है और कांग्रेस के साथ जुड़ने लगी है. हाल में हुए चुनाव को देखें तो हरियाणा से लेकर झारखण्ड, मुम्बई तक जनता कांग्रेस के साथ जुड़ रही है. कार्यकर्ताओं को ये समझने की आवश्यकता है कि आपकी मेहनत रंग ला रही है. आप निराश मत होइए एक सिंधिया गया है. आप हर कार्यकर्ता में एक सिंधिया बसता है. जो भी कांग्रेस के विधायक इस समय कांग्रेस के साथ वो सच्चे कांग्रेसी है. बाकी तो सिंधिया निकले. कांग्रेस की तरफ से दिग्विजय सिंह बड़ी हीं खामोशी के साथ अपना काम कर रहें हैं. कुछ न कुछ खेल तो कांग्रेस भी अंदरखाने खेल रही है. कांग्रेस के जितने भी बड़े नेता हैं. जैसे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, जीतू पटवारी, पी सी शर्मा सब बड़ी खामोशी से अपना काम कर रहें हैं. उनकी मेहनत 'फ्लोर-टेस्ट' के वक्त दिख जाएगा.