मैं गांव में देख रहा हूँ कि कोरोना नामक महामारी ने रोज कमाने खाने वालों को किया निर्धन कर दिया है. आज त्रिलोचन महादेव के एक ऐसे हीं ब्यक्ति से मुलाक़ात हुई. जिनका नाम पप्पू है. जाति से वो 'अग्रहरि' हैं. परन्तु वो रोज कमाकर खाने वालों में से हैं और बीजेपी के पक्के सपोर्टर भी हैं. आज जब उनसे मंदिर पर मिला तो उनकी पीड़ा अपने आप बाहर निकल गयी. उन्होंने मुझे सम्बोधित करते हुए कहा कि बाबा अब कुछ भी नहीं बेच पा रहा हूँ. और खाने के लिए घर में एक अधेला भी नहीं। ऊपर से गैस भी खत्म हो गयी. इन सब के एवज में मेरे पास मात्र एक हजार रूपया है. लगभग इतने पैसों से बस गैस को भरवा सकता हूँ. पर उसके बाद क्या खाऊंगा ? इस बात की चिंता है. अगर ये लाकडाउन १४ अप्रैल के बाद भी आगे बढ़ता है. तो हम जैसों के लिए जानलेवा साबित हो जाएगा।
ऐसे में सरकार को चाहिए कि जितने भी कार्ड धारक नागरिक हैं. वो चाहे किसी भी श्रेणी के हों सबको कम से कम हर महीने एक निश्चित अनुपात में अनाज, तेल, दाल और गैस की उपलब्धता अधिकारीगण के माध्यम से सुनिश्चित कराये। इस कदम से जनता का सरकार में इकबाल भी बुलंद होगा और ख़ुशी-ख़ुशी इस महामारी को देश के लोग मिलकर हरा भी देंगे। मैं खुद एक नौकरी पेशा (प्राइवेट) इंसान हूँ. मैं अपने भविष्य को लेकर खुद आशंकित हूँ. हमारे क्षेत्र का एक उसूल है कि आप अगर अपनी सैलरी का १० गुना काम कर दोगे तो आपको उसका दसवां हिस्सा वेतन के रूप में दिया जाएगा। इन दिनों जब हम काम हीं नहीं कर पा रहें हैं तो बास हमें वेतन किस बात का देगा ? पप्पू जैसे करोड़ों लोगों की यही ब्यथा है. राम जाने अब आगे होता है क्या ?
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