Friday, December 4, 2020

1988 के बाद किसानों का सबसे बड़ा और आन्दोलन

आजकल अन्नदाता पंजाब एवं दूसरे प्रान्तों से हजारों किलोमीटर दूर चलकर दिल्ली को घेरकर बैठे हुए हैं। उनकी बस एक मांग है कि जो जून महीने में सरकार कृषि संबंधी तीन नया बिल बनाया है। उसे किसी भी कीमत पर सरकार द्वारा वापस लिया जाना चाहिए। किसान दिसंबर की सर्द रात मे डंडे और पानी की बौछारों को सहते हरियाणा होते हुए दिल्ली तक आ पहुंचे हैं। जिसकी चिंता की लकीरें सरकार के माथे पर साफ-साफ महशूस की जा सकती है। जहां आन्दोलन की शुरुआत में सत्ता पक्ष और मिडिया इस आंदोलन को कभी सिर्फ पंजाब से जोड़ने की कोशिश करते थे तो कभी खालिस्तानियों के समर्थन से चलने वाला आन्दोलन बताते थे। वो सब आज किसानों से चार-चार दौर की बात कर रहे हैं। इस बिल से किसानों को बहुत समस्या है। उनमें सबसे बड़ी चिंता "कांट्रेक्ट फार्मिंग" को लेकर है। जिस पर वो एम एस पी पर सरकार से कानून में लिखित गारंटी मांग रहे हैं।

जैसा कि विभिन्न स्रोतों को आधार बनाकर दावा किया जा रहा है कि पूरे देश के लगभग 500 किसान संगठन इस आंदोलन को अपना समर्थन दे रहे हैं। वस्तुत: 1988 के बाद सम्भवतः किसानों का यह पहला बड़ा और सफल आंदोलन मालूम पड़ता है। 1988 में देश भर के लाखों किसान टिकैत जी के नेतृत्व में बोट क्लब पर 10 दिन तक धरना दिया था। जिस का नतीजा ये रहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. श्री राजीव गांधी जी को धरना स्थल पर पहुंच कर किसानों की सभी मांगों को मानना पड़ा था।

आज एक बार फिर से इतिहास दोहराया जा रहा है। किसान अपनी पूरी ताकत से इस आंदोलन को धार दे रहें हैं। आज मैं नई दिल्ली ट्रेन पकड़ने के लिए जा रहा था। तो देखा कि डाबर से यू पी गेट वाले रास्ते को एक तरफ से पूरी तरह बंद कर दिया गया था और पुलिस का सख्त पहरा भी था। इससे प्रतीत होता है कि किसानों से सरकार डर रही है। चार दौर की वार्ता के बाद भी अभी कोई फैसला नहीं निकल पाया है। किसानों की समस्या को अब सरकार ने। एड्रेस करना शुरू किया है। काश यही संवेदनशीलता सरकार संसद में कानून पास करते समय दिखाई होती और चर्चा की होती तो आज यह हाल नहीं देखने को मिलता। 

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