अगर इसी तरह चुनाव के बाद 5-10 सीट कम रह जाय और कुछ असंतुष्टों को तोड़कर एक नई सरकार का गठन विपक्ष के द्वारा किया जाय तो लोकतंत्र कहाँ बचा ? उदाहरण स्वरूप 2013 के छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव हुए. जिसमें 90 विधान सभा सीट आती हैं. ऐसे में बीजेपी ने 49 सीटों पर जीत दर्ज की और कांग्रेस ने 41 पर. फिर भी पांच सालों एक बीजेपी की सरकार बिना किसी कठिनाई के चली. ऐसा इसलिए संभव हो सका कि कांग्रेस के नेतृत्व ने कोई कुटिल खेल नहीं खेला. वरना मध्य प्रदेश की तरह मात्र 5 असंतुष्टों को प्रलोभन देकर बीजेपी की सरकार को बड़ी हीं आसानी सी अस्थिर कर सकती थी. पर की नहीं क्योंकि ऐसा करने पर जनता के मत का अपमान होता. खैर इस मामले में कांग्रेस का नया नेतृत्व काफी उदार है.
आज जैसे सुबह-सुबह खबर मिली की कांग्रेस के कई नेता और मंत्री बागी विधायकों से मिलने कर्नाटक पहुंचे. जिनमे मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह, श्री कांति लाल भूरिया, कैबिनेट मंत्री जीतू पटवारी, घनघोरिया, सज्जन सिंह वर्मा, कुणाल चौधरी समेत 13 विधायक और मंत्री कर्नाटक पहुंचे. जिनकी आगवानी कर्नाटक प्रदेश अध्यक्ष डी. के. शिवकुमार ने किया. जिस होटल में बागी रुके हैं उसके कुछ किमी दूर कांग्रेसी नेताओं को कर्नाटक पुलिस रोक लेती है और दिग्विजय समेत सभी नेताओं को पुलिस हिरासत में ले लेती है. अगर ऐसा लोकतंत्र में चलता रहा तो हमें अपने जनप्रतिनिधि का चुनाव करना बंद कर देना चाहिए. लोकतंत्र के क्या मायने जब विधायक जनता,पार्टी और विचार के प्रति निष्ठावान न हो ? आज मध्य प्रदेश कर्नाटक के बाद दूसरा लोकतंत्र की हत्या करने वाला राज्य बना है. इन दोनों जगहों पर बीजेपी हीं विपक्ष में थी. इसे संयोग नहीं कह सकते. ये एक कुटिल प्रयोग है. दिग्विजय सिंह कोई छोटे कार्यकर्ता नहीं हैं. वो पूरे देश में एक जाना-पहचाना चेहरा है. 1993 से 2003 तक कांग्रेस की सरकार में मुख्यमंत्री के रूप में मध्य प्रदेश की सेवा की है. वर्तमान में वो मध्य प्रदेश कोटे से हीं राज्य सभा सांसद हैं. उन जैसे नेता के साथ भाजपा शासित सरकार का ये रवैया निंदनीय है.
मध्य प्रदेश को लेकर अदालत से सड़क तक दोनों तरफ से संघर्ष किया जा रहा है. सरकार बनाने के लिए भाजपा वाले क्यों इतने आतुर है ? जो अपने भविष्य को भी नहीं देख पा रहें हैं. मान लें कि आज कांग्रेस की सरकार गिर जाती है और 22 सीटों पर फिर से चुनाव होंगे. कुछ सीटें कांग्रेस जरूर जीतेगी. यदि कांग्रेस का आँकड़ा सैकड़ें में फिर से पहुंच जाता है तो क्या गारंटी कि कांग्रेस भाजपा के असंतुष्टों को नहीं तोड़ पाएगी ? क्योंकि बीजेपी में भी तो महात्वाकांक्षी लोग है ? उनको भी तो मंत्री बनना है. जब पार्टी प्रेम का पैमाना एक तरफ नहीं है तो दूसरी तरह होगा. क्या इसका कोई पैमाना है ? ऐसे कृत्य करके आप अपने भी पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहें हैं. अगर ये प्रयोग चल निकला तो आने वाले भविष्य में भाजपा समेत क्षेत्रीय दलों के लिए शुभ संकेत नहीं है. ऐसे कारकों को अमलीजामा पहनाने से सत्ताधारी दल को बचना चाहिए. अन्यथा लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं बचेगा. लोकतंत्र एक मजाक बन जाएगा.
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