संसद में पारित किसान बिल के खिलाफ देश का किसान अब इकट्ठा हो चुका है। जो बिल लोकसभा सभा के बाद राज्य सभा में विवादित तरीके से पास किया गया। वो सरकार के प्रति किसानों को आन्दोलित करने वाला था। कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टियां अब किसानों के हक में अपनी आवाज संसद से सड़क तक बुलंद की हुई हैं। जब यह बिल राज्यसभा में ग़लत तरीके से पास कराया जा रहा था तो उस समय विपक्ष के कुछ सांसद वेल में जाकर रूल बुक पिठासीन अधिकारी को दिखा रहे थे। जिसको भी सत्ता पक्ष के उपसभापति श्री हरिवंश सिंह जी द्वारा नकार दिया गया। तो विपक्षी सांसदों ने सदन के अंदर हीं रूल बुक फाड़ दिया गया। सरकारी तंत्र लोकतंत्र का गला घोंटता रहा और उपसभापति उसमें अपनी भागीदारी निभाते रहे।
इस तरह के तीखे विरोध के कारण कांग्रेस, टीएमसी, सीपीएम, और आप के सासंदों राजीव सातव, डेरेक ओ ब्रायन, डोला सेन, हुसैन और संजय सिंह को एक हफ्ते के लिए सदन से निलंबित कर दिया गया। जिसके विरोध में ये तमाम सांसद संसद परिसर के अंदर हीं गांधी प्रतिमा के पास पूरी रात किसानों के हित के लिए खुले आसमां के निचे आन्दोलनरत रहे। परन्तु सरकार को रत्ती भर शर्म का अहसास नहीं हुआ। उधर युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता पूरे देश में ट्रैक्टर के जरिए आन्दोलन कर रहे हैं। जिसमें बड़ी संख्या में किसान भाई भी शामिल हो रहे हैं।
सरकार का कहना है कि किसान बिल पर कांग्रेस और विपक्षी पार्टियां देश को गुमराह कर रही हैं तो एक सवाल का ज़बाब संघ और मोदी जी को जरूर देना चाहिए कि जब निश्चित तौर पर यह बिल किसान हितैषी था तो अपने कैबिनेट सहयोगी अकाली दल को क्यों नहीं समझा पाए ? अकाली दल कोटे से एक मात्र मन्त्री हरसिमरत कौर बादल ने इस बिल को किसान विरोधी बताते हुए आपकी कैबिनेट से क्यों इस्तीफा दे दिया ? शिरोमणि अकाली दल आपकी पांच दशकों से सहयोगी पार्टी रही है उसने इस बिल पर आपसे रिश्ता क्यों तोड़ लिया ? जो अकाली दल आपकी सरकार के पहले और दूसरे दोनों कैबिनेट में शामिल थी। आप उसे इस ऐतिहासिक बिल की खूबियों को क्यों नहीं समझा पाए ? इन सवालों का यदि आप ज़बाब देने में कामयाब हो जाते हैं तब आप कांग्रेस और विपक्षी दलों के उपर किसानों को गुमराह करने का आरोप लगा सकते हैं। अन्यथा आप झूठे मानें जायेंगे और जनता की नजर में गिरते जाओगे।
सरकारी गुण्डागर्दी के विरोध में बसपा को छोड़ सारी विपक्षी पार्टियों ने निलंबन वापस न लेने तक संसद सत्र का बहिष्कार करने का एलान किया। इसके बावजूद संघ की सरकार ने आज विपक्ष की खाली कुर्सियों के बीच कुल सात बिल पास किए। इस नये बिल में मण्डियों को खत्म करके उद्योग पतियों को फसल खरीदने का अधिकार दिया है। फसल नष्ट होने या निश्चित मूल्य से कम में खरीददारी करने पर किसी भी तरह के मुकदमें या भरपाई का कोई जिक्र नहीं है और न किसानों के पास कोई अधिकार है। किसानों को डर सता रहा है कि इस नए कानून के लागू होने के बाद 'न्यूनतम समर्थन मूल्य' की बात बेमानी हो जायेगी। सरकार मौखिक रूप से न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी रहने की बात तो कर रही है लेकिन बिल में डालने से कतरा रही है। यह मौजूदा सरकार सूट-बूट एवं पूंजिपतियों की सरकार है। इसी गुण्डागर्दी के खिलाफ देश भर के किसानों ने 25 सितंबर को रेल रोको एवं भारत बंद का एलान किया है। जिसका समर्थन पूरा विपक्ष कर रहा है और मैं भी स्वयं कर रहा हूं।
किसान एकता जिन्दाबाद
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