Tuesday, September 15, 2020

वाराणसी से दिल्ली की वन्दे भारत ट्रेन से यात्रा और उसका अनुभव

मैं आज खुद अपने अनुभव को साझा करने की कोशिश कर रहा हूं। जब 22 मार्च को एक दिन के लिए लाकडाउन का आदेश माननीय प्रधानमंत्री जी ने किया था। उसी दिन मैं गाजियाबाद से अपने गांव लौटा था। उस वक्त मण्डुआडीह से आते बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ा था। मेरे जैसे तमाम लोग कैण्ट स्टेशन तक पैदल हीं चलकर पहुंचने को मजबूर हुए थे।  तो उसी कड़ी में आज मुझे आफिस के काम से दिल्ली जाना हुआ। पहले तो बिहार से आने वाली एक रेल में टिकट बुक किया लेकिन वो प्रतिक्षा सूची की श्रेणी में था। जिस पर यात्रा करने का अधिकार नहीं था। तो 12 तारिख सितंबर के महिने से "वन्दे भारत" रेल को चलाने का आदेश रेल विभाग की तरफ से पारित किया गया। और मैं तीन दिन बाद यानी 15 तारीख का टिकट खरीदा। जैसा कि विदित हो कि इस ट्रेन में मेरे जीवन की पहली यात्रा थी। मेरे जैसे समय के मारे और भी बेचारे इसी सफर में मेरे साथ थे। जो राज्य के अनेक जिलों एवं पड़ोसी राज्य बिहार से भी थे। दोपहर 3 बजे अपने पूर्व निर्धारित समय के अनुसार ट्रेन ने पटरी पर रेंगना शुरू कर दिया। हर यात्री जो पहली बार इस रेल में सफर कर रहा था। वो कौतूहल बस अपने परिजनों एवं रिश्तेदारों को रेल की खूबी के बारे बता रहा था। तो मेरे मन में भी विचार आया कि मैं भी कुछ लिखूं -

यह ट्रेन आधुनिक जरूरतों से परिपूर्ण है। वातानुकूलित डिब्बा, डिब्बों की उन्नत साफ-सफाई, रेलवे स्टाफ के लोगों का यात्रियों के प्रति मर्यादित आचरण वन्दे भारत ट्रेन के चलाने की सार्थकता को पूरा करता है। यात्रियों का रेल इस के संबंध में एक सकारात्मक राय निकल कर सामने आई। मेरे समेत दर्जनों यात्रियों ने गर्व के साथ बोला कि भले हीं इसके चेयर कार का किराया 1460 रूपया प्रति यात्री है, पर सफर करके मजा आ गया। अभी ट्रेन इलाहाबाद से आगे दिल्ली की तरफ लगभग 100 किलोमीटर आगे की तरफ निकल चुकी है। ट्रेन इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में आधिकारिक स्टाप के बाद मानो चिता की तरह हवा के वेग को चीरते हुए आगे बढ़ रही है।

वन्दे भारत रेल में सफर करते हुए एक सवाल मेरे मन में बार-बार कौंध रहा है कि जब वन्दे भारत उसी रेलवे की पटरियों पर चलकर मात्र 8 घंटे में वाराणसी से दिल्ली का सफर तय कर रही है तो दूसरी तरफ काशी विश्वनाथ, शिवगंगा एक्सप्रेस, महामना, सुहेलदेव जैसी ट्रेनें उन्हीं पटरियों पर उतनी हीं दूरी तय करने में 11 से 15 घंटे क्यों लेती हैं ? यात्रियों का इतना समय जाया क्यों किया जाता है ? क्या ये मन्त्रालय के अधिकारियों के विचार से दूर है ? शायद नहीं ! मेरे ख्याल से फर्क ये है कि वन्दे भारत मोदी जी के निजीकरण का उत्पाद है और अन्य दूसरी ट्रेनें सरकार की सम्पत्ति है। इसलिए उन ट्रेनों में समय जाया नहीं किया जायेगा तो वन्दे भारत जैसे ट्रेनों को घाटा होगा। जो मौजूदा सरकार को पसंद नहीं है।

धन्यवाद


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