Tuesday, December 31, 2019

2019 की महत्वपूर्ण झलकियाँ

कल 20 वीं सदी के दूसरे दशक के अंतिम साल में हम प्रवेश करने वाले है. कल से एक नए साल की शुरुआत हो जायेगी. तो 2010 से 2020 तक का सफर अपने अंतिम पड़ाव पर होगा. जैसा कि सर्व विदित है कि साल 2019 बहुत से महत्वपूर्ण धटनाक्रमों को अपने में समेटे हुए है. जनवरी 2019 की शुरूआत एक साधारण दिन की तरह होती है और फरवरी के आधे महीने तक सामान्य दिनों की तरह चलती है. लेकिन उसके बाद कुछ कुछ बहुत बड़ी घटनाएं घटित होती हैं. जो हमें अंदर से झकझोर कर रख देती है और हमारी आत्मा हमसे खुद हमसे कुछ सवालों का जबाब ढूढ़ने लगती है.

कुछ महत्वपूर्ण झलकियाँ -

प्रियंका गांधी का सक्रिय राजनीति में आना
फरवरी महीने में गांधी परिवार की एक और सदस्य श्रीमती प्रियंका गांधी वाड्रा ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा. जैसा कि सबको पता है कि अब तक प्रियंका गांधी अपनी माँ श्रीमती सोनिया गांधी जी और श्री राहुल गांधी जी के क्षेत्रों तक हीं खुद को सिमित कर के रखा था. अमेठी और रायबरेली में हीं चुनावी चुनावी बिसात बिछाती थी और लोगों से संवाद स्थापित करती थी तथा सफलता भी प्राप्त करती थी. कांग्रेस के लिए साल की ये सबसे अच्छी खबर थी. अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत उन्होंने लखनऊ में रोड शो के माध्यम से किया और समर्थकों की बहुत अच्छी खासी संख्या भी देखने को मिली थी. उनकी चुनौतियां कांग्रेस को निराशा से उबारने की थी. जिस पर वो अपना पूरा ध्यान आज भी केंद्रित की हुई हैं.

पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों पर कायराना हमला, 37 जवान शहीद
फरवरी महीने की 14 तारीख को देश में एक ऐसी घटना घटी जिससे हर हिन्दुस्तानी का कलेजा काँप उठा. कुछ आतंकवादियों ने जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में अर्धसैनिक बलों के काफिले पर बिस्फोटक भरी कार से हमला कर दिया. जिसमे हमारे 40 से ज्यादा माँ भारती के सपूत शहीद हुए. यह खबर देखते, पढ़ते, सुनते हीं हर भारत वासी स्तब्ध था. धमाका इतना ताकतवर था कि सेना के वाहनों की परखचे तक उड़ गए थे. हमारे कुछ वीरों के अंग भी क्षत-विक्षत हो गए थे. इस घटना के बाद देश के नागरिकों में बहुत उबाल था. जो स्वाभाविक था. कितनी माओं ने अपने आँचल के प्यार को खो दिया, कितनी बहनों ने राखी की कलाई खो दी और कितनी देवियों ने अपने सिन्दूर को भी खो दिया। मेरे अनुसार ये पूरे साल का सबसे बड़ा घटनाक्रम रहा है.

भारत का पाक में घुसकर एयर स्ट्राइक
पुलवामा हमले पर देश में उपजे हुए असंतोष का बदला लेते हुए सरकार की मंजूरी से भारतीय वायुसेना ने पाक के अंदर घुसकर आतंकी ठिकानों को गोले-बारूद से ध्वस्त कर दिया। यह सेना का बहुत बड़ा पराक्रम था. भारत के इस जबाब के बाद सीमा पर बहुत तनाव था. इसी कर्म में पाक की उन्नत फाइटर प्लेन फ-१६ को सुखोई से विंग कमांडर अभिनंदन ने मार गिराया और इसी कोशिश में वो पाकिस्तान की सीमा में विमान में गड़बड़ी की वजह से चले गए थे. जिनके साथ पाकिस्तान ने बहुत बुरा बर्ताव किया था परन्तु भारत के दबावों के आगे झुकते हुए पाक ने महज कुछ दिनों के अंदर विंग कमांडर को भारत को सौप दिया था.

मनोहर परिकर जी का चला जाना
मार्च के महीने में गोवा के मुख्यमंत्री श्री मनोहर परिकर का अंततः लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया. आज के दूषित राजनीतिज्ञों में मैं मनोहर जी और माणिक सरकार को सच्चा जनसेवक मानता हूँ. परिकर जी बहुत हीं सभ्य, शालीन और पढ़े-लिखे राजनीतिज्ञ थे. परिकर जी राजनीति में आने से पहले इंजीनियरिंग के छात्र थे. इनका जाना भाजपा के साथ-साथ देश को भी काफी कष्टदायक रहा.

यू पी लोकसभा चुनाव में माया की बसपा और अखिलेश की सपा का तालमेल
लोक सभा चुनावों से पहले राजनीति में एक और घटना घटी. जो पूरे राजनैतिक परिप्रेक्ष में अलौकिक और अप्रत्याशित घटना थी. विधान सभा में करारी हार के बाद सपा और बसपा का गठजोड़ हुआ. जो हर राज्य वासी को अचंभित करने वाली थी. दोनों पार्टियों ने मिलकर चुनाव लड़ा, परन्तु उम्मीद के मुताबिक़ सफलता न मिलने के कारण लोकसभा चुनाव के बाद गठबंधन टूट गया और बाद के विधानसभा उपचुनाव में दोनों पार्टियां अलग-अलग लड़ी.

लोकसभा चुनावों में बीजेपी को अपार सफलता
पांच वर्षों में एक बार आने वाला देश के लोकतंत्र का सबसे बड़ा चुनाव अप्रैल से शुरू हुआ और मई के तीसरे हफ्ते तक चला. जिसमें जनता ने नरेंद्र मोदी के दिल खोलकर वोट दिया। बीजेपी के हिस्से ५० प्रतिशत से ज्यादा सीटें आई और बीजेपी 2014 के 282 सांसदों की संख्या को पीछे छोड़ते हुए 303 तक बढ़ाकर ले आई. वहीं कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष पिछले आम चुनाव की भांति अपने हीं भार के निचे दबा रहा. कांग्रेस अपनी पिछली संख्या को मामूली तौर पर बढ़ाकर 44 से 52 तक ले आयी. फिर भी विपक्ष का पद हासिल करने लायक संख्या नहीं थी.

सोनभद्र में आदिवासियों का नरसंहार 
19-20 जुलाई के आस-पास सोनभद्र जिले के उम्भा गाँव में एक बहुत हीं दर्दनाक घटना देखने को मिली. जहाँ दो पक्षों के बीच में जमीन का विवाद दशकों से चला रहा था. इस गाँव के मुख्य निवासी आदिवासी थे और जो दूसरी पार्टी थी वो दबंग था और साथ हीं साथ प्रधान भी था. एक दिन प्रधान अपने साथ सैकड़ों लोगों के दर्जनों ट्रैक्टर में भरकर ले जाता है और विवादित जमीन पर हल चलाने लगता है जिसका ग्रामीणों ने विरोध किया. जिस पर हथियारों से लैस गुंडों की टीम ने आदिवासियों/दलितों पर धुंआ धार गोलियों की बौछार कर दी. जिसमें कई दलितों की जान चली गयी. यह सरकार के कानून-ब्यवस्था के मुंह पर तमाचा था. जिस पर राजनीति भी खूब हुई. कांग्रेस महासचिव प्रियंका यादव भी पीड़ितों से मिलने के लिए गयी, परन्तु पुलिस ने उन्हें जाने से रोक दिया। तो वो अपने समर्थकों समेत वहीं धरने पर पूरी रात बैठी रही. अंततः प्रशासन ने पीड़ित परिवार को मिर्जापुर में लाकर प्रियंका गांधी से मिलवाया। पीड़ित परिवारों का दुःख देखकर कलेजा फट रहा था. 
           
कश्मीर से धारा 370 की विदाई
5 अगस्त को लोकसभा में एक संशोधन के जरिये सरकार ने कश्मीर से धारा 370 और 35 A को समाप्त करने का निर्णय लिया। जिसे सफलतापूर्वक संसद के दोनों सदनों में पास भी करवा लिया। इस कृत्य के बाद कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्रियों को उनके घर में नजरबंद कर दिया गया है और इंटरनेट तथा फ़ोन पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी गयी है. सरकार कश्मीर के हालात ठीक होने का दावा तो करती है पर पुरानी चहल-पहल बहाल होती नहीं दिख रही है.

राम मंदिर के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का फैसला
490 साल पुराने अयोध्या मामले पर अन्ततः आज 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के अगुवाई में 5 जजों की टीम ने हमेशा-हमेशा के लिए इस विवाद का निपटारा कर दिया. राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का मसला हल होने के बाद देश के सभी लोगों ने शान्ति कायम रखी. जो हमारे देश के गौरवशाली लोकतंत्र को प्रदर्शित करता है. न्यायालय ने सरकार को तीन महीने के भीतर मंदिर निर्माण के लिए एक बोर्ड गठित करने का आदेश दिया है. उम्मीद है कि अब देश में अमन-चैन आएगा.

महाराष्ट्र में राजनैतिक उलटफेर 
महारष्ट्र में अक्टूबर में विधान सभा का चुनाव हुआ. जिसमें एक तरफ सेना पोर बीजेपी का गठबंधन था तो दूसरी तरफ कांग्रेस और शरद पवार की अगुवाई वाली नेशनलिष्ट कांग्रेस थी. चुनाव दोनों गठबंधनों ने एक-दूसरे गठबंधन के खिलाफ लड़ा. पर जैसे हीं चुनाव का परिणाम आया तो पता चला कि मामला त्रिशंकु विधान सभा की तरफ जा रही है और किसी पार्टी को बहुत तो नहीं मिल रहा है पर सेना-बीजेपी गठबंधन को बहुमत से ज्यादा मिल रहा है. ऐसी स्थिति को भांपते हुए सेना ने मुख्यमंत्री का पासा बीजेपी के तरफ फेंक दिया कि अगर सरकार बनानी है तो आधे समय के लिए सेना के साथ मुख्यमंत्री का पद बांटना पड़ेगा. जिस पर बीजेपी तैयार नहीं हुई. क्योंकि बीजेपी को लगता था कि सेना की मजबूरी है और वो लौट कर बीजेपी के पास आएगी। पर उधर तो संजय राउत और नवाब मलिक अलग हीं मोड़ पर जाने की सोच रहे थे. सरकार गठन को लेकर सेना, कांग्रेस और एनसीपी में मीटिंग का दौर चल हीं रहा था कि अचानक २३ नवम्बर को खबर आयी की एनसीपी के अजित पवार ने बीजेपी को समर्थन दे दिया और रात में हीं प्रधानमंत्री ने अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए राष्ट्रपति शासन हटा दिया और देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री और अजीत पवार उपमुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले ली. ये खबर टीवी पर आते हीं एनसीपी,सेना, कांग्रेस में भूचाल आ गया.
फिर बिना समय गवाए शरद पवार पावर में आये और अजित पवार को छोड़ अपने सभी विधायकों की मीडिया के सामने परेड करवा दी. उधर सेना अविलम्ब फ्लोर टेस्ट की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट चली गयी. अंततः 80 घंटे बाद देवेंद्र फडणवीस बिना बहुमत साबित किये सरकार से इस्तीफा दे दिया। फिर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में महराष्ट्र में सेना, कांग्रेस, एनसीपी की नई सरकार का गत हुआ. इसी के साथ महाराष्ट्र के नाटक का अंत हुआ.

नागरिक संशोधन बिल पर संग्राम
संसद के आख़िरी सत्र में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश में धर्म के आधार पर प्रताड़ित हिन्दू, सिख, जैन, बुद्ध, पारसी और ईसाई जो 2014 से पहले भारत में आकर बस गए हैं उनको संविधान में इस संशोधन के द्वारा नागरिकता देने का प्रावधान किया गया. सरकार इसे संविधान के अनुरूप बता रही है तो विपक्ष और अन्य संगठन इसे संविधान की मूल आत्मा के खिलाफ बता रहे है. देश के चारों दिशाओं में इस बिल का घोर विरोध हो रहा है. जिसमें दर्जनों लोगों की जानें जा चुकी हैं और पूरे देश में लाखों चिन्हित, अचिन्हितों के खिलाफ मुकदमें कायम किये गए है. इस आग से देश के नामी विश्वविद्यालय भी नहीं बच सके. अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया, जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय के छात्र कड़ाके की ठंड में भी बिल के खिलाफ अपना विरोध बुलंद किये हुए हैं. पुलिस विश्व विद्यालय के अंदर घुसकर छात्रों के साथ बर्बरता की. जिनकी जाँच विश्व विद्यालय की आंतरिक कमेटी द्वारा की जा रही है। नागरिक संशोधन बिल का विरोध आज भी बदस्तूर जारी है.

कोई मेरी भाषा से, वाणी से आहत हुआ है तो गुजरने वाले साल के अंतिम दिन में मैं उन लोगों से क्षमा चाहता हूँ.         

Saturday, December 28, 2019

ओ पी भैया और दीपक का भैया सादर स्नेह

भैया प्रणाम !

छोटे हैं आवेश में आ गए होंगे. मुझे उनके इन शब्दों से कोई ग्लानि नहीं हैं. धीरे-धीरे सीख जाएंगे. आप जैसे अग्रज के सानिध्य से सब ठीक हो जाएगा. ऐसा मेरा विश्वास है भैया. इसे पढ़ने वाले जान लें कि मैं और बड़े भैया (दीपक जी) एक-दूसरे को नहीं जानते कि हम किस गाँव-क्षेत्र के निवासी हैं, हमारी विचारधारा भी अलग है. फिर भी हम अपनी अभिब्यक्ति को, अपनी आलोचनात्मक टिप्पणी को लिखते समय शब्दों और संस्कारों का विशेष ध्यान देते हैं. आदरणीय भैया के सानिध्य में रह कर मैं अपनी वाणी पर और ध्यान देता हूँ. 
दीपक भैया से अब काफी अच्छी जान-पहचान हो चुकी है. हम एक-दूसरे से काफी वाद विवाद भी करते हैं, परन्तु अपने संस्कारों को कभी नहीं खोते. भैया हमेशा हर छोटे को 'अनुज' के नाम से हीं सम्बोधित करते हैं और उनके द्वारा की हुई त्रुटियों को सुधारने के लिए स्नेहपूर्वक आग्रह करते हैं. भैया की टिप्पणी देख कर लगा कि आज आपके के बारे में दो शब्द लिखना चाहिए. जिसकी गुस्ताखी मैं यहां कर रहा हूँ. भैया किसी भी त्रुटि के लिए मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ. 
दीपक भैया आपकी तरह हमारे एक ओम प्रकाश भैया (ओ पी वर्मा) हैं. जो आजकल दिल्ली सरकार में सहायक लेखाधिकारी (AAO) हैं. जो मूलतः छत्तीसगढ़ के निवासी हैं. वो भी अपने शब्दों के माध्यम से मुझे चिढ़ाते रहते हैं. उन्हें जब भी मुझे छेड़ना होता है तो कांग्रेस विरोध की एक खबर मेरे व्हाट्सअप्प पर डाल देते हैं. फिर हम दोनों शुरू हो जाते हैं. कई बार तो जब भाभी जी नहीं होती हैं और वो अकेले रहते हैं तो समय बिताने के लिए एक संदेश साझा करते हैं फिर मैं भी खाली बैठा होता हूँ तो दोनों लग जाते हैं. फिर ओ पी भैया कहते हैं "गिरि" मैं खाली बैठा था सोचा तेरे साथ समय काट लूँ. ओ पी भैया से भी मुझे नौकरी के शुरुआत के दिनों में काफी सहायता मिली है. जब मैं भैया से पहली बार दिल्ली में मिला था उस समय आप एक सरकार कार्यालय में 'केयर टेकर' के पद पर कार्यरत थे. भैया अब आप लोगों की अच्छाइयों के बारे में विस्तृत तौर पर बाद में लिखूंगा.

आप दोनों बड़े भाइयों को पुनः प्रणाम ! 

Monday, December 23, 2019

झारखण्ड बीजेपी मुक्त कांग्रेस गठबंधन युक्त हुआ

आज झारखण्ड चुनाव का परिणाम जनता के सामने आ रहा है. वह परिणाम अपेक्षित है. क्योंकि यह सरकार झारखण्ड में अलोकप्रिय हो चुकी थी. इस सरकार ने बहुत से गलत निर्णय किये हुए जिसे "पत्थलगढी" और आदवासियों का प्रमुख रोष रहा है. जब नोटबंदी के बाद बीजेपी चुनाव जीत जाते है तो बोलती है कि जनता ने फैसले पर मुहर लगा दिया, जीएसटी के बाद जीती तो बोली की जनता ने फैसले पर हमारा साथ दिया. तो अब हमें मान लेना चाहिए कि "नागरिक संशोधन बिल" के बाद चुनाव लड़े और हार गए. इसका मतलब जनता ने बीजेपी को नकार दिया. शायद मैं ऐसा नहीं कह सकता क्योंकि बीजेपी अच्छा लड़ रही है. दोनों पार्टियों की सीटें घट-बढ़ रहीं हैं. जैसे-जैसे सीटें घट-बढ़ रहीं हैं. संबंधित समर्थकों की बेचैनियां बढ़ जा रहीं हैं. इस ठंड में में भी भाजपा का सिकुड़न जारी है. देशहित में जनता बेहतर निर्णय ले रही है. 
भाजपा को सबसे बड़ा नुकसान ईमानदार छवि के मालिक श्री सरयू राय जी से हुआ. जिन्होंने बीजेपी की सरकार में पूरे पाँच साल मंत्री रहे और सरकार के अंदर रहकर सरकार का विरोध करते रहे. सरयू राय जी ने हीं लालू यादव को जेल (कारवास) भिजवाया था. लालू जी के भ्रष्टाचार को उजागर करने और जन-जन तक पहुंचाने का श्रेय जाता है. संघ में रहते हुए सरयू राय जी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ हमेशा मुखर होकर आवाज उठाई थी. वही सरयू राय उपेक्षित होकर बीजेपी से निकल गए और वर्तमान मुख्यमंत्री श्री रघुबर दास के खिलाफ जमशेद पुर पूर्व से चुनाव लड़े और दोपहर तक वो रघुबर दास को पीछे धकेलने में कामयाब रहें हैं. सरयू राय ने सरकार के खिलाफ इतना बढ़-चढ़कर प्रचार किया. उन्होंने तो विपक्ष के मुख्यमंत्री के उम्मीदवार हेमंत सोरेन के लिए प्रचार किया.
बीजेपी  जाना चाहिए कि मोदी-शाह की जोड़ी जो कहेगी वो जनता मान लेगी. धारा 370 और राम मंदिर पर फैसला आने के बाद तीन चुनाव महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखण्ड में हुए जिसमें हर जगह बीजेपी को अपनी पुरानी सीटों का नुकसान तो हुआ हीं परन्तु मात्र 6 महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में विधान सभा क्षेत्रों पर हुई बढ़त को भी गवा दिया. झारखण्ड की जनता ने और हरियाणा की जनता ने इनको सबक सिखाया कि हम पाकिस्तान के दर से वोट नहीं देंगे, हम कांग्रेस मुक्त भारत के लिए वोट नहीं देंगे. अब वो सरकार से सवाल पूछना शुरू कर दिए हैं. वो सरकार से रोजगार पर सवाल करते हैं, आलू, प्याज की महंगाई की बात कर रहें हैं. झारखण्ड और हरियाणा के गांवों में रहें वाले लोगों और किसानों ने अपने हक का सवाल पूछा है और परिणाम आप जनता के सामने है. झारखण्ड के 8 में से 4 मंत्री आज का चुनाव हार रहें हैं. जिनमें मुख्यमंत्री समेत आदिवासी नेता लुईस मरांडी, मीरा यादव समेत बड़े नेता हैं.
झारखण्ड चुनाव में बीजेपी की हार का कारण शायद संघ भी रहा. संघ के लोग पूरी तरह से चुनावी मोड में नहीं आये. बीजेपी की जो मूल ताकत है वो संघ की ताकत है. रघुबर दास की छवि एक घमंडी और अड़ियल इंसान की रही है. उनके बारे में ये कहा था कि वो अपने कार्यकर्ताओं से गलत बर्ताव करते थे. जिसकी वजह से कार्यकर्ता उस तरह से चुनाव में नहीं जुटे जैसे लोकसभा चुनाव में जुटे थे. रघुबर को केंद्र का पूरा-पूरा समर्थन हासिल था. जिसकी वजह से रघुबर दास बेलगाम हो गए. बीजेपी के हारने का सबसे बड़ा कारण बीजेपी का गैर आदिवासी चेहरे को तरजीह देना और आदिवासियों को उससे वंचित रखने की कोशिश करना था. आदिवासियों के मन में ये डर गया कि बीजेपी उनके हस्ती को, उनके वजूद को मिटा रही है. भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इस चुनाव में पूरा जोर लगा दिया था. प्रधानमंत्री जी ने लगभग आधा दर्जन चुनावी रैलियां की. उसमें से भी हेमंत सोरेन को हराने के लिए मात्र 100 किलोमीटर के अंतर पर दो रैली की. इस हार से उनके छवि को धक्का लगने की पूरी-पूरी गुंजाइश है. क्योंकि लोग धीरे-धीर प्रधानमंत्री जी की बातों को मानना बंद कर देंगे.
  

Thursday, December 19, 2019

नागरिक संशोधन बिल का विरोध और इमरजेंसी की याद ताजा

माननीय प्रधानमंत्री जी देश के करोड़ों नागरिक आपसे कुछ सवालों के जबाब जानना चाहते हैं. प्रमुख गांधीवादी और इतिहासकार रामचंद्र गुहा जी को आज बैंगलोर में किस आधार पर ग्रिफ्तार किया ? जबकि रामचंद्र गुहा जी गांधी जी की फोटो हाथ में लेकर शान्ति के साथ अपना विरोध दर्ज करा रहे थे. उस दौरान पुलिस ने किस हक से उनको गिरफ्तार किया गया ? पुलिस योगेन्द्र यादव, कांग्रेस के पूर्व सांसद संदीप दीक्षित, लेफ्ट के बड़े नेताओं सीताराम येचुरी, वृंदा करात और पोलित ब्यूरो के सदस्य समेत सभी साथी जो विरोध प्रदर्शन शांति के साथ कर रहें हैं. उनको आप क्यों गिरफ्तार कर रहें हैं ? इस देश को गांधी का देश रहने दें. उन्हें अपनी आवाज शान्ति के साथ रखने दें. विमर्श तो होने दें. सरकार को अगर जब लगता है कि जिन लोगों को लगता है कि वो देश के लोगों को गुमराह कर रहें हैं तो सरकार अपने ब्यापक तंत्र का उपयोग करके लोगों के भ्रम को दूर क्यों नहीं कर रही है ? आरोप लगाने से क्या होता है ? उसका समाधान निकालें. माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी कल कहा कि सरकार को अफवाहों पर लगाम लगाने के लिए ब्यापक तौर पर प्रचार अभियान चलाये और लोगों के मन में ब्याप्त शंकाओं को दूर करे. 
नागरिक संशोधन बिल अब क़ानून का शक्ल ले चुका है. इस बिल पर संसद के भीतर सरकार का सहयोग करने वाले नवीन पटनायक की बीजू जनता दल, नितीश की जनता दल यूनाइटेड, अकाली दल अब इस बिल को अपने राज्यों में लोगों करने के खिलाफ हैं. क्या ये लोग मिलकर संविधान के साथ धोखा नहीं दिए ? क्या अमित शाह जी आप इन लोगों को नक्सल समर्थक घोषित करेंगे ? अमित शाह ने बंगाल की रैली में ये क्यों कहा कि नागरिक संशोधन बिल और एनआरसी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं ? आज जब देश में माहौल खराब हो रहा है उस वक्त कल से सरकार अपील कर रही है कि एनआरसी और नागरिक संशोधन बिल दोनों अलग-अलग चीजें हैं. आप जो कल से बोल रहें हैं वो पहले से बोलते तो आप नागरिकों को अपनी बात अच्छे से समझा चुके होते.
आज जो प्रदर्शन हो रहें है उसे प्रधानमंत्री जी, गृहमंत्री और मंत्री, सरकार के प्रवक्ता सब लोग इसे कांग्रेस और राजनितिक पार्टियों द्वारा प्रायोजित और जनता को गुमराह करने का आरोप लगा रहें है. तो जनता जानना चाहती है कि माननीय गृहमंत्री जी पूरे देश के कोने-कोने में जितने लोग भी सड़क पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे है, क्या वो सारे आपकी नजर में नक्सलवादी हैं ? क्या सारे कांग्रेस के बहकावे में सड़क पर उतरे हैं ? माननीय मंत्री जी आपसे विनम्र निवेदन है कि कम से कम प्रदर्शनकारियों की आवाज तो मत छीनो. संविधान की धारा 14 का उपयोग वाली जनता की संवैधानिक अधिकार तो मत छीनो। कांग्रेस सरकार के खिलाफ भी बड़े से बड़े आंदोलन हुए है. लेकिन उस वक्त ऐसा माहौल नहीं देखा गया था ? इस देश में कांग्रेस सरकार द्वारा थोपी गयी "इमरजेंसी" भी देखा है. जिसमें एक नागरिक के सभी अधिकारों को छीन लिया गया था. वही हालात तो आज भी हैं. आप अपने खिलाफ उठ रही जनता की आवाज को सुनना पसंद नहीं कर रहे हैं. आप संघ के अजेंडे में इतने अंधे हो चुके हैं कि आपको अपने देशवासियों की चीख-पुकार, चीत्कार तक सुनाई नहीं दे रही है. साहब ऐसा हठ मत करो. जितने लोग भी इस देश में है सब लोग इस मिट्टी से प्यार करने वाले हैं.  
देश के हर हिस्से में उग्र प्रदर्शन हो रहा है. क्या उत्तर ? क्या दक्षिण ? सब जगह ठहराव हो गया है. पुलिस शांति बहाल करने के लिए पुरजोर पसीने में बहा रही है. जिसकी मैं सराहना करता हूँ. हमारे फ़ोर्स के भाई-बहन हमें सुरक्षित रखने के लिए हमारे हिस्से की चोट अपने साइन पर खा रहें हैं. सरकार साफ़-साफ़ कह दे कि जो भी एनआरसी में नहीं आ पाएंगे वो सारे बाहर जाएंगे. उनका धर्म कुछ भी हो, वो घुसपैठिया है. जनता को इसी बात से गुमराह किया जा रहा है. मेरा सबसे निवेदन है कि क़ानून अपने हाथ में न लें और प्रसाशन की मदद करें. हिंसा फैलाने से किसी का भला नहीं हो सकता. हालात इस कदर बिगड़े हुए हैं कि देश की राजधानी दिल्ली के कुछ क्षेत्रों में इंटरनेट, मोबाईल सेवा को बर्खास्त कर दिया गया है. देश अपना है. उसे सवारने की जिम्मेदारी भी हमारी है.
निश्चित तौर पर अब जब भी इतिहास लिखा जाएगा तो नागरिकता संशोधन बिल की खिलाफत करने वाला आंदोलन उसमें स्वर्णिम अक्षरों में जरूर लिखा जाएगा। जो इस वक्त घर में छुप कर बैठ गया है. इतिहास में इसलिए दर्ज होगा कि इस संशोधन का विरोध बहुसंख्यक कर रहा था. जो अल्पसंख्यकों में भरोसा पैदा करने के लिए लड़ रहें हैं. इतिहास उन्हें कायरों की भाँति परिभाषित किया जाएगा। जैसे कि आजादी के आन्दोलनों में जैसे संघ और उसके नेता माफी मांगकर अंग्रेजी फ़ौज की मदद करते थे. जिनका नाम इतिहास की किताब में एक गद्दार के रूप में दर्ज है. आखिर संघ सत्ता जो चाहती थी वही हुआ. इस बिल को टुकड़े-टुकड़े और माओवादी बोला जा रहा है न कि देशद्रोही। ऐसा इसलिए हो रहा है कि इसका विरोध बीजेपी शासित असम समेत पूरा पूर्वी भारत कर रहा है. वर्ना अभी तक तो एक समुदाय को देशद्रोही, पाकिस्तानी अथवा नाना प्रकार के संज्ञाओं से नवाज दिया गया होता.


      

Tuesday, December 17, 2019

नागरिक संशोधन बिल पर जामिया के बाद सीलमपुर में बवाल

नागरिक संशोधन बिल पिछले हफ्ते तो देश के दोनों सदनों से पास हो गया, पर अब देश जल रहा है. बिल से पहले तो केवल असम समेत देश के उत्तर-पूर्व के राज्यों में विरोध की आवाज बुलंद थी. परन्तु यह आग अब असम, मेघालय, त्रिपुरा, नागालैण्ड से होते हुए अब देश के हिंदी भाषी क्षेत्रों उत्तर प्रदेश और दिल्ली तक पहुंच गयी है. दो दिन पहले जामिया यूनिवर्सिटी के सामने विरोध प्रदर्शन किया। जो देखते हीं देखते उग्र हो गयी. वहां दिल्ली सरकार की कुछ बसों को आग के हवाले कर दिया गया. जिस पर पुलिस ने भी बल प्रयोग किया और इस क्रम में पुलिस जामिया मिलिया  यूनिवर्सिटी के अंदर पहुँच गयी और लाइब्रेरी में पढ़ रहे छात्र- छात्राओं के उपर  बर्बरता पूर्वक लाठीचार्ज किया गया. इस तरह का आरोप छात्रों ने लगाया है. जिसकी जांच दिल्ली पुलिस द्वारा जारी है. नागरिकता संशोधन की आग देश में भड़कती जा रही है. जामिया के छात्रों के समर्थन में देश के लगभग 22 विश्विद्यालयों के छात्र विभिन्न प्रदेशों में हड़ताल/ जूलूस निकालना शुरू कर दिया। जिसमें दिल्ली विश्व विद्यालय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, जाधवपुर विश्व विद्यालय, राजस्थान विश्व विद्यालय के कुछ कॉलेजों ने खुलकर जामिया के छात्रों का समर्थन किया.
यह आग वहां से निकलकर आज देश के गली-चौराहों पर आ गयी है. आज दोपहर बाद की घटना दिल्ली के सीलमपुर इलाके में घटित हुई. जहाँ नागरिक बिल का विरोध करने वाले और पुलिस के बीच तीखी बहस हुई और मामला अराजकता की तरफ बढ़ गया. छिट पूट घटनाएं भी देखी गयी. देखते हीं देखते देश में अराजकता बढ़ती जा रही है. यदि मीडिया रिपोर्टों को आधार मानें तो अब तक अकेले असम में प्रदर्शन से चार नागरिकों की मौत हो चुकी है. परन्तु सरकार अपनी कुम्भकर्णी नींद से नहीं जाग पा रही है. सरकार देश में संघ के विचारों को फैलाना तो चाहती है  पर इतनी जिद्दी हो चुकी है कि उस विचार के फैलाव के लिए कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार है. सरकार के विरोध कोई मायने नहीं रखता है. बस उसे तो अपने मूल अजेंडे में इजाफा करना है.
32 प्रतिशत लोगों ने सरकार को चुना जबकि 68 प्रतिशत लोगों ने सरकार का विरोध किया था. पर वो विरोध अब मायने नहीं रखता. क्योंकि सरकार संख्याबल के माध्यम से बहुत मजबूत है. शर्म आनी चाहिए सरकार और उसके सहयोगियों को. सरकार और उसके सहयोगियों के पास संविधान की कसम खाने और गांधी जी का नाम लेने का नैतिक अधिकार नहीं हैं. जब सदन में संविधान को तोड़ा जा रहा था तब जेडीयू (नितीश), एजीपी (प्रफुल्ल कुमार महंत) और बीएसपी (मायावती) जैसों ने बिल का समर्थन किया और आज दो दिन से सदन के बाहर वो घड़ियालू आँसू बहा रहे है. विपक्ष की जो 12 पार्टियां संविधान के लिए लड़ रहीं हैं. उनके लिए हम देशवासियों का दायित्व बनता है कि उनको समर्थन दे और दूसरों को भी समर्थन  प्रेरित करें। संविधान नहीं रहेगा तो हमारा हक भी नहीं रहेगा. सरकार को आम की डाली की तरह लचीचा होना चाहिए न कि गन्ने की तरह.


  

Saturday, December 14, 2019

रामलीला मैदान में कांग्रेस की सफल रैली

कांग्रेस की आज की रामलीला मैदान में "भारत बचाओ रैली" शीर्षक के साथ आयोजित रैली की जिसमें इकट्ठी भीड़ को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह रैली दिल्ली में आयोजित सफलतम रैलियों में से एक है.  इस रैली में लाखों की भीड़ थी, भीड़ मैदान के बाहर तक खड़ी थी. इस रैली में कांग्रेस की तरफ से तमाम नए से पुराने दिग्गज नेताओं ने अपनी बात रखी. परन्तु ओजस्वी और युवा नेता एवं राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बहुत ही ओजपूर्ण तरिके से अपनी बात रखी. सिंधिया ने तो एक नारा दिया जो बहुत हीं दिलचस्प नारा है. जो इस तरह है "बदला नहीं बदलाव चाहिए". यदि कांग्रेस प्रयोग करना चाहे तो सिंधिया का यह नारा कांग्रेस के लिए बहुत हीं उपयोगी हो सकता है.
इस रैली में एक और बात देखने को मिली जिसमें जिसमें कांग्रेस के नए पीढ़ी के नेताओं प्रियंका गांधी, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुरजेवाला और स्वयं राहुल गांधी ने काफी देर तक बात रखी और आक्रामकता के साथ रखी. इन सबके शब्दों में एक तीखापन तो था पर संयमित था. इन चारों मुख्य वक्ताओं ने हाल ही में घटित घटनाओं का जिक्र करते हुए अपने भाषणों में वजन पैदा कर दिया. राहुल गांधी ने कल की घटना जिसकी अगुवाई स्मृति ईरानी कर रही थी. उनके बहाने एक बार फिर संघ पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि "मैं माफी नहीं मागूंगा. क्योंकि मेरा नाम राहुल सावरकर नहीं ? राहुल गांधी है". सावरकर का जिक्र करके राहुल ने संघ के दोगलेपन को फिर से उजागर करने की कोशिश की. आज भाषण देते समय राहुल गांधी ज्यादा सहज और संतुलित दिख रहे थे. उनके भाषणों में शब्दों का चयन भी शानदार था और शारीरिक भाषा भी आक्रामक थी. आने वाले दिनों में राहुल गांधी एक बार फिर पार्टी के शीर्ष पर नजर आएंगे.
कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष श्रीमती सोनिया जी भी अपने चिरपरिचित अंदाज में देश के उन सारे मुद्दों पर कार्यकर्ताओं का ध्यान आकर्षित कराया जो आज देश में ज्वलंत है. अर्थब्यवस्था के वर्तमान हालात से लेकर, धारा ३७०, महिला सुरक्षा, बढ़ती बलात्कार की घटनाएं, जीएसटी, नागरिक संशोधन बिल जैसे तमाम हालियों मुद्दों पर कार्यकर्ताओं से लड़ने की अपील की और उनका साहस बढ़ाया। अगर हम सब एक साथ मिलाकर देखें तो ये पता चलता है कि कांग्रेस को अब कुछ संभावनाएं दिखनी लगी है और आने वाले दिनों में वो राज्य दर राज्य रैली/ आंदोलन करती हुई दिखाई देने वाली है.   

Tuesday, December 10, 2019

नागरिक संशोधन विधेयक बिल पर देश में बवाल

नागरिक संशोधन विधेयक बिल 2019 पर दो-चार दिनों में देश के भीतर बहस बहुत तेजी से शुरू हो गयी है. आखिर ये 'सिटीजन अमेंडमेंट बिल 2019' है क्या ? जिस पर इतना संग्राम छिड़ा हुआ है. इस बिल के माध्यम से सरकार संविधान के मूल भावना को बदलने की कोशिश कर रही है, जिसका रास्ता हिन्दू राष्ट्र की तरफ जाता है. इस संविधान में सरकार ने पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं, सिखों, पारसी, जैन और क्रिश्चियन को भारत का नागरिक होने का प्रमाण देना चाहती है. सरकार का कहना है कि हम वहां के अल्पसंख्यकों को अपना नागरिक इसलिए बनाना चाहते हैं कि उन्हें उनके देश में धर्म के आधार पर प्रताड़ित किया जाता रहा है. जिसकी वजह से वे लोग भारत में एक शरणार्थी का जीवन जी रहे हैं. हम उन्हें उनका अधिकार देना चाहते हैं.    
यहां तक तो ठीक है. लेकिन गड़बड़ वहां से शुरू होता है जब ये चीन, मालदीव, भूटान और श्रीलंका में बसे (तमिल) हिन्दुओं का जिक्र नहीं करते। इस बिल से सरकार मुस्लिमों को बिलकुल अलग रखना चाहती है या यूं कहें कि उनके साथ खुले तौर पर भेदभाव कर रही है. जो स्प्ष्ट तौर पर दिखाई भी दे रहा है. हमारा देश एक धर्म निरपेक्ष देश है. जो जाति, धर्म, लिंग के आधार पर किसी को पहचान नहीं देती। जो हमारे यहां आता है तो उसे हमारा संविधान हर नागरिक को समानता का अधिकार देती है. वो ये नहीं देखती है कि नागरिक का धर्म क्या है ? किस राष्ट्र से आया है ? उसका लिंग क्या है ? हमारे संविधान की धारा 14 नागरिक अधिकारों की रक्षक है और धारा 21 उसे और सुरक्षित बनाती है.
अगर सरकार का दिल साफ़ है तो धर्म को हटाकर संविधान के अनुरूप सभी धर्मों, लिंगों के लिए एक बेहतर शरणार्थी क़ानून ले कर आये. जिस पर एक सार्थक चर्चा हो. सरकार ऐसा दिखाने की कोशिश कर रही है कि मानों उपरोक्त देशों से आने वाले लोगों को अब से पहले नागरिकता नहीं दी जाती थी. जो सरासर गलत और भ्रामक है. पहले भी अपने-अपने देशों में सताये हुए लोगों को भारत की नागरिकता लेने का कानूनी प्रावधान है. जिसमें मुख्य प्रावधान ये है कि " जो कोई बाहरी ब्यक्ति देश में एक शरणार्थी की तौर पर शरण लिया हुआ है. तो उसके ब्यवहार को देखा, जांचा जाता है. उसके उपरान्त उसे देश में 11 साल रहने के बाद तय मानकों पर खरे उतरने के उपरान्त, शरणार्थी के आवेदन पर उसे विधिवत भारत की नागरिकता प्रदान कर दी जाती है. पर सरकार इतनी जल्दी में है कि उसमें 6 साल की निवास सीमा रखना चाहती है और मुस्लिमों को उससे दूर रखना चाहती है. 
कल संसद में देखा गया कि नागरिकता संसोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और गृह मंत्री की तरफ से गलत तथ्य रखा जा रहा था. जिसकी सत्यता जांचने के लिए मैं देश के कुछ प्रमुख इतिहासकारों के लेख को संलग्न कर रहा हूँ. जो देश के प्रितिष्ठित अखबारों में लिखे गए हैं -  
धर्म के आधार पर जिस दो राष्ट्र के सिद्धांत का प्रतिपादन माफी वीर सावरकर ने अहमदाबाद में 1935 को किया था. आज उसी पर उनके शिष्यों की सरकार आगे बढ़ रही है. दूसरे जिन्ना का जन्म संघ ने फिर किया है. देश की धर्म निरपेक्ष छवि को बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है. देश की संविधान खतरे में हैं. बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के सोच को मिटाकर 'मनु स्मृति' को लागू करने की कोशिश है.
नागरिक संसोधन विधेयक 2019 का देश के पूर्वोत्तर के राज्यों में जबरदस्त विरोध हो रहा है. भाजपा नीत असम और मणिपुर में तो प्रदर्शनकारी मुख्य मार्गों को जामकर सड़क पर बैठे हुए है. सड़क पर विरोध स्वरूप टायर जला रहे हैं. पूर्वोत्तर के राज्यों में  आज के बंद का जन-जीवन पर ब्यापक असर पड़ा है. क्षेत्रों की परीक्षाएं रद्द कर दी गयी हैं. राज्य के अनेक जिलों में धारा 144 लगा दिया गया है. ये सब घटनाक्रम प्रत्यक्ष तौर पर देखी जा सकती हैं. फिर भी कल संसद में सरकार की तरफ से गृह मंत्री ने साफ़ झूठ बोला कि पूर्वोत्तर के राज्यों में इस बिल का कोई विरोध नहीं हैं.           


Friday, December 6, 2019

हैदराबाद बलात्कार के आरोपियों का पुलिस एनकाउंटर

आज तड़के जब सो कर उठा तो टीवी पर एक खबर देखने को मिली। जिसमें पिछले दिनों हैदराबाद में एक महिला डॉ प्रियंका रेड्डी की कुछ दरिंदों ने पहले उसकी अस्मत लूटी फिर उसे ज़िंदा जला दिया। इस आरोप में एक तर्क ड्राइवर समेत कुल चार आरोपी पुलिस द्वारा पकड़े गए थे. परन्तु आज की रात को भोर में हैदराबाद पुलिस उन आरोपियों को उक्त घटना स्थल क्राइम सीन दोहराने के नाम पर पर ले गयी. उसका परिणाम ये हुआ कि उन अभियुक्तों का एनकाउंटर कर दिया गया. यह खबर जैसे हीं देश के सामने आयी उस पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आने लगी. कुछ लोग पुलिस के इस कृत्य को सराह रहे थे तो कुछ लोग इसे गलत ठहरा रहे थे. हर किसी के अपने-अपने तर्क थे.         
इन सबको देखने के बाद मैं यह महसूस करता हूँ कि देश में अब कानून को खत्म कर देना चाहिए और हर जिले की पुलिस को यह आदेश दे देना चाहिए कि जिस किसी को आप मारना चाहते हैं, उसे मार दो. उसके किये की सजा शरिया क़ानून की तरह तुरंत दो या दुसरे शब्दों में कहें तो उसके किये की सजा भीड़ तंत्र के विचार अनुरूप दें. मैं मानता हूँ कि उन्होंने जघन्यतम अपराध किये थे. परन्तु उनके अपराध अब तक साबित नहीं हुए थे. अगर पुलिस जो संविधान बचाने की कसम खाती है. वही सविधान को आघात पहुंचाने लगे तो देश का क्या होगा ? भीड़ तंत्र देश के संविधान पर हावी हो जाएगा और मानवता बिखर जायेगी.
आप या हम कैसे किसी आरोपी को सजा दे सकते हैं. पुलिस की भूमिका खुद इस मामले में संदिग्ध लग रही है. पुलिस एनकाउंटर करने के अलावा अकाट्य तथ्य जुटाकर उसे फांसी की सजा दिलवा देती और उसके बाद जनता के बीच ले जाकर किसी चौक-चौराहे पर उसको फांसी पर लटका देती. इससे पुलिस का इकबाल भी बना रहता, संविधान की मर्यादा भी बची रहती तथा दोषियों को उनके किये की अंतिम सजा भी मिल जाती. परन्तु पुलिस के इस कदम से शायद हीं इनमें से किसी पहलुओं का निवारण हुआ हो. जनता हमेशा आक्रोश में आकर नेताओं पर, प्रशासन पर दबाव बनाती है. लेकिन ऐसी परिस्थिति में शासन-प्रसाशन को अपने विवेक के अनुसार सभी मर्यादाओं की पालन करते हुए कदम उठाने की उम्मीद की जाती है.

नए भारत में आपका स्वागत है !  

Thursday, December 5, 2019

सरकार पियजिया पाकिस्तान हो गईल

आज कुछ महीनों से प्याज एक महत्वपूर्ण मुद्रा बन गयी है. जो प्याज कभी एक गरीब -मजदूर के थाली की शोभा हुआ करती थी., वो आज अमीरों की शान हो चुकी है. प्याज के दाम विगत तीन महीनों में सोने से भी तेजी से बढ़ा है. आज प्याज तीन अंकों में पहुंच कर इतरा रहा है. प्याज को भी अब घमण्ड होने लगा है कि वो अमीरी की पहचान सेब और अनार से भी महंगा हो गया है. अतीत में प्याज एक बार और महंगा हुआ था. जब अटल जी की दिल्ली में सरकार थी. लोग कहते हैं कि तब प्याज की महंगाई के वजह से हीं अटल जी की सरकार चली गयी थी. उस समय मनोज तिवारी एक उभरैत हुए भोजपुरी गायक थे. जिन्होंने एक गाना भी प्याज के ऊपर गया था. उसके बोल कुछ इस प्रकार थे (हे ! अटल चाचा पियजिया अनमोल हो गईल). जो आज भी यूट्यूब पर मौजूद है. वही मनोज तिवारी आज बीजेपी दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष हैं. आज सत्ता में है तो वो भी प्याज को अनार मान बैठे हैं. आज फिर वही प्याज  इतरा रही है और सरकार में शामिल लोगों को मुंह चिढ़ा रही है. 
प्याज के इतराने का पता तो तब चला जब देश की महिला वित्त मंत्री ने कहा कि "मैं इतना लहसुन, प्याज नहीं खाती हूँ जी. मैं ऐसे परिवार से आती हूँ, जहां अनियन से मतलब नहीं रखते". उनके इस कथन के बाद तो मानों प्याज के अरमानों को पंख लग गए. वो संसद की चहारदीवारी पर बैठ मंत्री, संतरी, प्रधानमंत्री को मुँह चिढ़ाने लगी. प्याज की ये हरकत सरकार को पसंद नहीं आयी और सरकार के लोग प्याज को देशद्रोही साबित करने लग गए. देशद्रोही से याद आया न, वही पाकिस्तान यार. प्याज आज आम लोगों की रसोइयों से निकलकर अमीरों के घर की शान बढ़ाए रहें है. 
आज कल आप किसी बड़ मनई (रईस/अमीर) के घर जाओ तो उनके हाल में सेब/अनार/अंगूर की जगह प्याज रखा हुआ मिलता है. जिसके घर में आपको न दिखे तो ये मत समझ लेना कि ये घर निर्मला सीतारमण जी का है (मतलब की वो प्याज नहीं खाती हैं ना तो रखेंगी क्यों). वो घर किसी आम इंसान का भी हो सकता है, जिसकी हैसियत में प्याज नहीं आती हो. निर्मला ताई ने तो जो नुख्सा देश को दिया है. अगर आप देशवासी हैं तो अब भी सम्भल जाए और अपने मन में ये बिठा ले कि अब सवाल पूछना मना है. अगर जेब में दमड़ी है तो प्याज खरीदों वरना निर्मला सीतारमण बन जाओ. अब तो प्याज भी देशद्रोही हो गया है जो भक्तों को कश्मीर में प्लाट ख़रीदने से रोक रहा है. सारे देशभक्त नाराज हैं कि प्याज भारत माता कि बेइज्जती करवा रहा है. कुछ देशभक्त तो ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि प्याज को पाकिस्तान भेज देना चाहिए और कुछ ऐसे भी हैं जो कह रहें हैं कि अगर मोदी जी आलू को प्याज बोल दें तो पूरा विश्व आलू को प्याज बोलेगा. इस तरह प्याज की समस्या खत्म हो जायेगी और भारत माता का अभिमान बच जाएगा.

Friday, November 29, 2019

आतंक की आरोपिनी का संसद में माफी राग

परसों बीजेपी के मध्य प्रदेश भोपाल की सांसद महोदय एवं आतंक की आरोपी साध्वी प्रज्ञा गांधी जी हत्या करने वाले आतंकी गोडसे का महिमामंडन करते हुए सदन में उसे देशभक्त बताया था और कल तक जो भक्त कह रहे थे कि प्रज्ञा ठाकुर ने गोडसे को देशभक्त कहा वो सही था और उसका समर्थन कर रहे थे. वो अपनी दोनों आँख खोलकर देख लें आज वही आतंक की आरोपी साध्वी प्रज्ञा संसद में माफी मांग रहीं हैं और गांधी जी के विचारों को सम्मान करने को बोल रहीं है. यही गांधी की जीत है. यही तो गांधी है. यही तो देश की आत्मा है. वो गांधी हीं थे जो अनेक बर्बरता के बाद भी किसी पर हथियारों का उपयोग नहीं किया. गांधी वो थे जब उन्हें डरबन (दक्षिण अफ्रीका) के रेलवे स्टेशन पर रंग भेद के कारण उतार दिया गया था. तब भी उन्होंने उसका हिंसक रूप से जबाब नहीं दिया और माफ़ करते हुए आगे की लड़ाई की लकीर खींच दी. 
गांधी जी ने तो हमेशा घटिया और गंदी सोच वालों को अपने अच्छे विचारों से परिवर्तित किया है. ऐसे में राहुल गांधी ने जो सोशल मीडिया पर कहा उससे मैं पूरी तरह से सहमत हूँ. एक आतंक की आरोपी को कैसे कोई सांसद का चुनाव लड़ सकता है ? आज सदन में महिला और सन्यासी होने का जो रोना रो रही हैं. वो उस वक्त खा गया था ? जब आप एक बार नहीं बार-बार गांधी जी को अपमानित कर रही थी. आज भी जब प्रज्ञा ठाकुर ने शर्तों के साथ माफी मांगी तो उसमें भी "तोड़-मरोड़ करके पेश करने का आरोप लगाया, और उसके संदर्भों के साथ छेड़-छाड़ करने का आरोप भी लगाया".
हद तो तब हो गयी जब आतंक की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर के बयान के संदर्भ में  वरिष्ठ सांसद श्री निशिकांत दूबे जी ने एक और आपत्तिजनक बयान दे दिया. दूबे ने कहा "एक महिला का अपमान करना गांधी जी हत्या करने से भी ज्यादा बड़ा अपराध है". ऐसा उन्होंने राहुल गांधी के "आतंकवादी" वाले ट्वीट के संदर्भ में कहा था. दिक्क्त ये नहीं है कि किसने क्या कहा ? परन्तु दिक्क्त ये है कि उन्हें सत्ता और संघ का वरद हस्त हासिल है. प्रज्ञा और उनके जैसे लोग आतंकी गोडसे को देश की रौशनी के बीच लाना चाह रहे हैं और गांधी जी के समकक्ष खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं. संघ/बीजेपी के लोग आज मजबूरीवश दिखावे के लिए गांधी जी को अपनाने की कोशिश करते हैं परन्तु उनके हृदय में बापू का हत्यारा गोडसे हीं निवास करता है. संसद बाधित है, होनी भी चाहिए. क्योंकि जो देश, समाज अपने विरासत को संभालने में नाकाम रहता है तो उसका मस्तक ऊपर नहीं उठ सकता.

      

Tuesday, November 26, 2019

पवार ने महाराष्ट्र में बीजेपी की मिट्टी पलीद की

पवार परिवार बीजेपी को डूबा दिया. अजित पवार ने महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दिया और भाजपा को शर्म से डूब मरना चाहिए. 80 वर्षीय जवान शरद पवार ने पूरा खेल हीं बदल कर रख दिया. चाणक्य तो पवार साहब हीं हैं कोई शाह-वाह नही. पवार साहब के अलावा एक नाम और चाणक्य के रूप में उभरा है जिसका नाम है संजय राउत. बीजेपी महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए इतनी उतावली थी कि उसे नैतिकता और अपनी पार्टी के सबसे बड़े नेता की छवि को मिट्टी में मिला दिया. अजित पवार ने बीजेपी के सपने को मात्र 78 घंटे में हीं चकनाचूर कर दिया. बीजेपी कैसे चूक गयी ? संघ/बीजेपी के रणनीतिकारों से ये ऐतिहासिक चूक कैसे हो गयी ? संघ/बीजेपी ने महाराष्ट्र को बदनाम करने की कोशिश की थी. जिसे वहां की सम्मानित जनता कभी स्वीकार नहीं करती. जो भी हो संघ/भाजपा छवि को महाराष्ट्रऔर देश में कीचड़ में मिल हीं गयी है. वैसे प्रचारमंत्री जी को कीचड़ काफी पसंद है. वो कीचड़ में कमल खिलाने को बहुत उत्सुक रहते हैं.
आधी रात में प्रचारमंत्री महोदय आपातकाल के समय की स्थिति को लागू करते हुए अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए आधी रात में राष्ट्रपति शासन हटाने की मंजूरी दी, रात में ही राष्ट्रपति महोदय ने प्रधानमंत्री के विचार को अपने हस्ताक्षर से वैध कर दिया और 5.18 भोर में गृह मंत्रालय ने गजट जारी कर दिया. उसके बाद तोता रूपी राज्यपाल महोदय ने आनन-फानन में 22 नवंबर को फडणवीस और एनसीपी के बागी अजित पवार को मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिला दिया और उसका परिणाम आज 26 को दोपहर बाद सारा देश देख रहा है. इस मामले में बीजेपी की प्रतिष्ठा तो धूमिल होगी हीं परन्तु इस मामले में प्रधानमंत्री महोदय खुद को मुख्य भूमिका में लेकर आये थे. क्यों अपने विशेष अधिकार का प्रयोग करते हुए प्रधानमंत्री ने बिना कैबिनेट के संतुस्ती पर राष्ट्रपति शासन हटाने की मंजूरी दी थी और भोर के 5.18 पर गृह मंत्रालय ने सरकारी गजट निकाल दिया. ये सब आनन-फानन में हुआ.
बीजेपी को हाल के दिनों में चार बहुत बड़े झटके लगे हैं. जिसकी शुरुआत उत्तराखंड और अरुणांचल प्रदेश अदालत में मोदी सरकार को मुँह की खानी पड़ी. उसके बाद अपने जिद की वजह से कर्नाटक में येदुरप्पा को मुख्यमंत्री पद का शपथ दिलवा दिया और बहुमत साबित करने से पहले से हीं एक भगोड़े/कायर की भाँति सभा छोड़कर भाग गए. उसके बाद 24 अक्टूबर को भाजपा-सेना के पक्ष में आये परिणाम के बाद कुछ मतभेदों की वजह से साथ छूटने के बाद आनन-फानन में 23 की सुबह मुख्यमंत्री पद की शपथ फडणवीस को दिलवा दी और आज पूरी संभावना है कि फडणवीस भी एक रणछोर की भाँति सभा छोड़कर भाग जाएंगे. ये तो पहले दिन से तय था कि एक हारा हुआ योद्धा कभी नहीं जीत सकता.
यहाँ सबसे बड़ा फायदा अजित पवार को हुआ है. पहला फायदा तो ये हुआ कि उन्हें सिंचाईं घोटाले जैसे संगीन मामले में क्लीन चिट मिली है. क्योंकि सिंचाईं घोटाले को चुनावी मुद्दा खुद फडणवीस ने बनाया था और हर सभा में पवार को आर्थर जेल में बंद करने को कहते थे. फडणवीस और विनोद तावड़े ने सिंचाईं मुद्दे को बहुत बड़ा विषय बना दिया था. फडणवीस तो खुद मशहूर फिल्म शोले का मशहूर डायलॉग "चक्की पीसिंग, चक्की पीसिंग, चक्की पीसिंग" हर सभा में बोलते थे, पर 22 नवंबर को हुआ उससे ठीक उल्टा, उलटे अजीत पवार के समर्थन से मुख्यमंत्री बने और उन्हें उप- मुख्यमंत्री बना दिया और अजित पवार को सिंचाईं घोटाले से बरी भी हो गए. इसे कहते हैं चालाकी. अब अजीत बीजेपी के लिए 'पवित्र' हो चुके हैं, क्योंकि क्लीन चिट तो भाजपा की देशभक्त सरकार ने हीं दिया है.

Tuesday, November 19, 2019

जेएनयू को बर्बाद करने की नाकाम साजिश

धीरे-धीरे एक बात अब स्पष्ट होती जा रही है कि संघ/भाजपा की सरकार जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को बर्बाद और बदनाम करने की नाकाम कोशिश कर रही है। परन्तु जेएनयू के साहसिक छात्र उनकी कोशिशों को बार-बार सफलता पूर्वक असफल करते जा रहे हैं. आज जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय का नाम पूरी दुनिया में शान के साथ लिया जाता है. क्योंकि इस विद्यालय ने देश को ऐसी-ऐसी प्रतिभा दिए है जो दुनिया भर के कोने-कोने में भारतवर्ष का नाम रोशन कर रहें हैं. सबसे कमाल की बात तो तब होती है जब मोदी 2.0 में वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभाल रही निर्मला सीतारमण जी जवाहरलाल नेहरु के समर्थन में आवाज नहीं उठाती और मौन धारण करके अपनी रजामंदी विश्वविद्यालय का दुष्प्रचार करने वालों को देती हैं. 

Thursday, November 14, 2019

चाचा नेहरू का बाल प्रेम

आज का दिन १४ नवंबर देश के पहले प्रधानमंत्री श्री पंडित जवाहरलाल का जन्म हुआ था. आज देश पंडित जवाहरलाल नेहरू जी का १३० वां जन्मदिन मना रहा है जिसे देशवासी बाल दिवस के रूप में मनाते हैं. नेहरू जी एक विशाल ह्रदय के मालिक थे और प्रतिभा के धनी थे. नेहरू जी को बच्चों से बहुत लगाव था. जिसकी वजह से बच्चे उन्हें प्यार से चाचा नेहरू पुकारते थे. जिस पर नेहरू जी काफी आह्लादित होते थे. नेहरू जी एक बड़े स्वतंत्रता सेनानी रहें थे. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी देश को समर्पित कर दिया था. नेहरू जी के पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी. नेहरू जी लंदन के प्रतिष्ठित स्कूल 'ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी' से पढ़ाई की थी. उनके पिता श्री मोतीलाल नेहरू जी लंदन के एक प्रतिष्ठित वकील थे. जिनके पास अथाह सोहरत थी. लेकिन अपने युवाकाल में नेहरू जी महात्मा गांधी जी से काफी प्रभावित थे. जिसकी वजह से उन्होंने अपनी वकालत के पढ़ाई के बाद उस पेशे को ज्यादा समय नहीं दिया और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए.
देश की आजादी के ७२ साल बाद आज हम देखें तो नेहरू जी को गाली दिया जाता है, उनके बलिदानों को खारिज करने की कोशिश की जा रही है, उनके विचारों पर पाबंदी लगाई जा रही है. इसे हम विडंबना हीं कह सकते हैं. जो नेता अपना सारा यश, वैभव माँ भारती को आजाद कराने के लिए कुर्बान कर दिया हो, उसके साथ इस तरह का ब्यवहार अपमानजनक किया जा रहा है. उनके बलिदानों को संघ/भाजपा अपने घृणित मानसिकता के साथ नाकरने की कोशिश कर रही है और उनके बारे में सोशल मीडिया से लेकर तमाम जगह केवल झूठ, भ्रम और अफवाह फैला रहे है. जैसा कि आज हीं देखने को मिल रहा है कि सत्ता से समर्थन प्राप्त कुछ झूठे लोगों का एक समूह ट्विटर पर #ठरकी_नेहरू ट्रेंड करा रहें हैं. जो हमारे लिए बेहद अपमानजनक स्थिति है. 
नेहरू जी के जन्मदिवस पर आज गुरु/शिष्य या प्राइवेट कंपनियों में काम करने अफसरान अपने मातहतों को कुछ न कुछ खिलाकर नेहरू जी के प्रति अपनी कृतग्यता जाहिर कर रहें हैं. जिसे देखकर लगता है कि नेहरू जी के प्रति तमाम नकारात्मकता फैलाने के बाद भी उनको याद करने वाले अब भी बचे हुए हैं. मैं जब ये  लेख लिख रहा था तभी उसी दौरान मेरे मातहत काम करने वाले शुभम श्रीवास्तव की कोई रिश्तेदार गोरखपुर से फ़ोन की और बता रही थी कि उसके विद्यालय में भी चाचा नेहरू जी के जन्मदिवस को बाल दिवस के रूप में धूम-धाम से मनाया जा रहा है. जो मुझ जैसे देशवासी के लिए एक सुकून देने वाली बात है. क्योंकि हमारे विभूतियों का सम्मान हमें हर हाल में करना होगा। नेहरू जी के योगदान को कभी कोई नकार नहीं सकता और देश का हर नागरिक आज भी उनका ऋणी है.

जय हिन्द     
              

Tuesday, November 12, 2019

कांग्रेस को सेना के साथ मिलकर सरकार बनानी चाहिए

हमारी पार्टी के तथाकथित क्षत्रपों, आदरणीय महानुभावों आपने क्या किया इतने दिनों में उत्तर प्रदेश और बिहार में ? जो आज आप महाराष्ट्र में सेना से हाथ मिलाने से डर रहें हैं. महानुभावों आप पार्टी को बचाओ अपनी महत्वाकांक्षी भावना का परित्याग करो. कांग्रेस पार्टी यह समझने में नाकाम क्यों हो रही है कि धीरे-धीरे धर्म की राजनीति हाशिये पर जा रही है. हमें उन चीजों से बाहर निकलकर सोचना पड़ेगा। कल अगर कांग्रेस की जगह भाजपा को किसी राज्य में इस तरह का सरकार बनाने का आमंत्रण मिलता तो बीजेपी अब तक शपथ लेकर मंत्रालयों का बटवारा कर रही होती। लेकिन कांग्रेस अब तक अपना मन साफ़ नहीं कर पायी है. मैं कांग्रेस की सेकुलर छवि का समर्थन करता हूँ परन्तु मौके की नजाकत ये है कि कांग्रेस को सरकार में शामिल हो जाना चाहिए। इसी में कांग्रेस का भला है. अन्यथा मुंबई में भी गोवा की पुनरावृत्ति जल्द देखने को मिल सकती है.
कांग्रेस के जो छत्रप कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया जी को बता रहें हैं वो जमीनी सच्चाइयों से कोसों दूर है. जब आपके दो तिहाई से ज्यादा विधायक बोल चुके हैं कि हमें सरकार में शामिल होना चाहिए न कि बाहर से समर्थन दें. इसके बाद भी कांग्रेस में उहापोह की स्थिति बताती है कि कांग्रेस के वेटरन नेता आज की सोच के साथ नहीं जा पा रहें हैं. सही समय पर सही निर्णय ना लेने से कांग्रेस को नुकसान होता है. निर्णय लेने में देरी हम करते हैं और जब भाजपा सरकार बना लें जाती है तब कहते हैं कि वो विधायकों को खरीद लिया है। भाई मौका दोगे तो वो कांग्रेस नहीं है, समर्थन लूट लेगी. जब आपके ४४ में से ३९ विधायक सरकार में जाने को सोच रहें हैं तो आप उन्हें कब तक टोक पाओगे ? आपको खुद समझ लेना चाहिए कि ये विधायक कही भी जा सकते हैं, फिर उनको संभाल कर रखना कांग्रेस नेतृत्व के लिए नामुमकिन सा होगा.
जब बीजेपी ऐन-केन प्रकारेण सरकार बना ले जाती है तो हम संविधान की दुहाई देते हैं. जो अब सरासर गलत लगता है. कांग्रेस ने कल मौक़ा खो दिया है. कांग्रेस के पास कल अपनी छवि को भी सुधारने का एक सुनहरा मौक़ा था, जो कल अन्धेरा होते हीं धुंध में बदल गया. कांग्रेस, एनसीपी और सेना की सरकार बनाने के ढेर सारे कारण हैं. जिसमें भयंकर बारिश के बाद किसानों की बदहाल स्थिति, कुछ सूखाग्रस्त इलाकों में किसानों का संकट। इस तरह की जायज दलीलों के साथ थोड़ा वैचारिक मतभेद होते हुए भी ये एक साथ आकर जनता की सेवा कर सकते हैं. जिसमें कोई बुराई नहीं है. लेकिन ये तब होगा जब दिल्ली के अकबर रोड पर एसी कमरों में रहने वालों को जमीन की सच्चाई का स्वतंत्र आंकलन हो. फैसले में देर होना कहीं न कहीं कमजोरी की तरफ इशारा करता है.  
आज कांग्रेस को शिव सेना अछूत लगने लगी है पर अगर हम देखें तो सेना ने इमरजेंसी में कांग्रेस का साथ दिया, १९७७ में साथ दिया, १९८० में कांग्रेस को समर्थन करते हुए सेना ने अपने प्रत्याशियों की घोषणा नहीं की थी. ये तो तो तीन दशक से ज्यादा पुरानी है और २००७ में सेना ने राष्ट्रपति के चुनाव में प्रतिभा सिंह पाटिल का समर्थन किया. जो कांग्रेस की प्रत्याशी थी. २०१२ में एक बार सेना ने राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए कांग्रेस प्रत्याशी डॉ प्रणव मुखर्जी का समर्थन किया था. क्या तब सेना अछूत नहीं थी ? माना की बाला साहेब ठाकरे ने कांग्रेस के लिए कभी अपशब्द कहा था लेकिन अगर १० सालों का उद्धव ठाकरे का कार्यकाल का इतिहास देखें तो हमें प्रतीत होगा कि सेना ने कांग्रेस के खिलाफ न तो कटु वचनों का उपयोग किया है और न हीं अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़काऊं विचार रखरण हैं. अलबत्ता महाराष्ट्र के २०१९ के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज मुस्लिम नेता सेना के टिकट पर जीत कर आएं हैं. तो अब कांग्रेस के लिए कोई ज्यादा सोचने की बात नहीं बचती है.
उत्तर भारतियों के खिलाफ शिव सेना का रूख कभी बाला साहेब के जमाने में था पर वो अब गुजरी बात हो गयी है. गैर मराठों पर कड़ा रूख अब मनसे रखती है. सेना का उत्तर भारतीयों के प्रति नरम रूख इस बात से देखने को मिलता है कि अब बकायदा सेना के कार्पोरेटर और विधायक महाराष्ट्र में छठ पूजा का आयोजन कराते हैं और उद्धव ठाकरे 'सामना' के माध्यम से छठ व्रतियों को धन्यवाद देते हैं. तो एक बात स्पष्ट हो जाती है कि अब बाला साहेब की सेना और उद्धव जी की सेना के विचार में काफी परिवर्तन आ चुका है.
सेना के जिस उग्र हिंदुत्व की बात से कांग्रेस डर रही है और उसकी केरल इकाई सेना के साथ जाने में अल्पसंख्यकों का हवाला दे रही है. उसका पटाक्षेप तो हो चुका है. अगर इतिहास उठाकर देखें तो शिव सेना का मूल रूप से तीन विचार रहा है. जिसके लिए हम उसे उग्र हिंदुत्व वाली पार्टी बोलते थे. उसमें पहला राम मंदिर निर्माण, दूसरा कश्मीर से धारा ३७० का हटाना और तीसरा मराठा मानुष। जिसमें मराठी सम्मान की राजनीति तो चलती रहेगी और बाकी दोनों मुद्दे तो अब हल हो चके है. इसी महीने की ९ तारीख को मंदिर निर्माण का रास्ता सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया है और लगभग ढाई महीने पहले सरकार ने कश्मीर से धारा ३७० को भी हटा दिया है. अब कोई कांग्रेसी विद्वान बताएं कि सेना की कौन सी राजनितिक अजेंडा उग्र वाली है. मुझे तो नहीं लगता है कि अब कुछ और बचा है जिससे अल्पसंख्यकों को डरने की जरूरत है.





Saturday, November 9, 2019

रामलला टाट से ठाट तक

490 साल पुराने अयोध्या मामले पर अन्ततः आज 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व में 5 जजों ने निपटारा कर दिया. आज भगवान राम और बाबरी मस्जिद के मुकदमें का एक अच्छे फैसले के साथ पटाक्षेप हो गया. यह फैसला इतना महत्वपूर्ण था कि दशकों तक इससे देश की राजनिति प्रभावित होती रही. हमे तो समाचार पत्रों और मीडिया के अन्य माध्यमों से पढ़ने और सुनने को मिलता है. उसमें 12 वीं शताब्दी तक या उससे पहले तक का भी कागजी जिक्र देखने-सुनने को मिला. आज कोर्ट उन सबको जबाब दे दिया और विवादित जमीन को हिन्दू पक्षों को समर्पित कर दिया। इससे उम्मीद की जानी चाहिए कि समाज में अब हिन्दू-मुस्लिम की खाई जो समुद्र जितनी चौड़ी हो चुकी है. वो जल्दी भर जायेगी.
दिन-ब-दिन यह मुद्दा बढ़ता गया और अंततः भावुकता में बदल गया. मेरी उम्र महज 5 साल रही होगी जब उक्त स्थान पर निर्मित मस्जिद जिसका नाम 'बाबरी' था. उसे  शिव सेना, संघ/बीजेपी के लोगों ने 6 दिसंबर 1992 को ढहा दिया. उस वक्त राज्य में बीजेपी की सरकार थी. जिसके मुखिया कल्याण सिंह थे. जिन्होंने कोर्ट में हलफनामा भी दिया था कि उनकी सरकार हर हाल में बाबरी मस्जिद की हिफाजत करेगी। परन्तु अपनी कुटिल मंशा की वजह से उन्होंने आतताई भीड़ पर कोई अंकुश लगाने की कोशिश नहीं की. उसका परिणाम अब आप सबकी सामने है. जिसके बाद नरसिम्हा राव की सरकार ने कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया और कोर्ट की अवमानना के आरोप में कल्याण को जेल भी जाना पड़ा था.
कल्याण सरकार जाने के बाद बाबरी विध्वंश पर अदालती सुनवाइयों का दौर चला और मामला फैजाबाद की जिला अदालत से होते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट तक पहुंचा फिर 2010 में सुप्रीम कोर्ट तक आया और आज अपने अंतिम सफर पर पहुंचा. इसमें भी बड़ी दिलचस्प बात ये है कि जिला अदालत के आदेश पर पुअर प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी जी ने राम मंदिर का दरवाजा खुलवाया था. बाद में बाबरी विध्वंश का कुछ कारक मुस्लिम समाज राजीव गांधी की मानता है. बाबरी विध्वंश के बाद कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार ने विवादित जमीन के अलावा 63 अकड़ के आस-पास जमीन अधिगृहित की थी. जो आज तक काबिज है. अब तक राम मंदिर पर खुलकर न बोलने की वजह से संघ/बीजेपी कांग्रेस की छवि मुस्लिम परस्त बनाने में काफी हद तक सफल हो गयी थी. इसलिए आज के फैसले पर पहले से चौकन्नी बैठी कांग्रेस ने कल की बजाय आज हीं सीडब्लूसी की बैठक आहूत की और संघ/बीजेपी से पहले राम मंदिर के बारे में अपना मन्तब्य दिया.      

कांग्रेस पार्टी का पक्ष भी अयोध्या मामले पर आ गया और वो इस निर्णय का समर्थन करती है और पार्टी मर्यादा पुरषोत्तम भगवान राम के भब्य मंदिर का समर्थन करती है. कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि "भगवान राम सदाचार हैं, भगवान राम त्याग हैं, भगवान राम करूणा हैं, भगवान राम प्रेम हैं. जो इन्हें बांटने की कोशिश करता है वो भगवान श्री राम की मर्यादा को नहीं समझता."


कोई नहीं जीता, नहीं कोई हारा 
देश जीता, देश का संविधान जीता  

Friday, November 8, 2019

बीजेपी की चाल से शिव सेना हुई दूर

जब ८० के दशक में अछूत माने जाने वाली बीजेपी को कोई नहीं पूछता था उस वक्त शिव सेना उनके साथ जुडी और फिर अकाली दल जुड़ा. आज वही शिव सेना है जिसका हाल आज बीजेपी ने 'न घर के न घाट के' वाली स्थिति वाली कर दी है. बीजेपी का चरित्र मोदी-शाह के आने के बाद बदल गया है. जिसे अब उनके सहयोगी भी समझने लगे हैं. आज के दौर में भी कुछ पार्टियाँ कांग्रेस से सहानुभूति तो रखती है लेकिन जैसी हीं बीजेपी के नंबर थोड़े ज्यादा आते हैं. वो बीजेपी की तरफ किसी तरह मोड़ दिए जाते हैं. जिसे आजकल शाह पालिटिक्स का नाम दिया जा रहा है. परन्तु महाराष्ट्र में अबकी बार बीजेपी तीन अंकों की पार्टी लगातार दूसरी बार बनकर उभरी है परन्तु वहां बीजेपी इस लिए सरकार बनाने में अब तक नाकाम रही है कि वहां देश के अक्खड़ हिंदूवादी पार्टी शिव सेना मौजूद है. जो अपने जिद के लिए जानी-पहचानी जाती है.
वैसे शिव सेना की ढाई साल के मुख्यमंत्री की मांग जायज लगती है. क्योंकि बीजेपी का पूरा शीर्ष नेतृत्व ज्यादा से ज्यादा सीट जीतने की कोशिश कर रहे थे ? वहां बीजेपी को पता था कि अगर हम पहले के नंबर को बरकरार रखते हैं तो सेना की सरकार में भूमिका सिमित हो जायेगी. बीजेपी पूरी तरह आत्मविश्वास में थी कि वो अपने दम पर महाराष्ट्र में सरकार बनाएगी और बीजेपी की उस मंशा को सेना के नेता-कार्यकर्ता भी भाँप गए थे. इसलिए वो बीजेपी के खिलाफ जमीनी स्तर पर काम कर रही थी. जिसका फायदा शरद पवार की पार्टी एनसीपी और कांग्रेस को काफी हद तक हुआ. आप प्रचार के दौरान के वाकये को अगर समझना चाहें तो पाएंगे कि उद्धव या सेना इस चुनाव में शरद पवार जी पर बहुत नरम रही और जो उन्होंने मूसलाधार बारिश में भाषण दिया वो चुनाव के दो-तीन दिन पहले का दिन था. जब शिव सेना ने 'सामना' के जरिये उनकी तुलना मराठा शेर सी की थी. अब महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन होने वाला है. जिसमें कांग्रेस, एनसीपी और कट्टर हिंदुत्व का मिलन हो सकता है. यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है. इसका जबाब शायद अयोध्या मामले का फैसला आ जाने की बाद मिल जाएगा.       

Tuesday, November 5, 2019

दिल्ली में वकीलों पुलिस में भिड़न्त

देश में क्या हो रहा है ? दिल्ली कहने को तो देश का दिल है. लेकिन चार दिन से दिल्ली की सड़कों पर जो नंगा नाच हो रहा है. जिसकी शुरुआत तीस हजारी कोर्ट में हुआ जिसमें एक पुलिस ने एक वकील के ऊपर गोली चला दी और यह घटना यहां से निकल कर साकेत कोर्ट तक पहुंच गयी. जिसमें लोकतंत्र के मजबूत स्तम्भ एक पुलिस विभाग और न्याय के लिए लड़ने का दिखावा करने वाले वकीलों के बीच एक मामूली पार्किंग की बात को लेकर झगड़ा हुआ. जो बढ़ते-बढ़ते बहुत बड़ा विकराल रूप ले लिया है. मीडिया या अन्य लोगों के माध्यम से जो बातें सामने आ रहीं हैं उसमें एक पुलिस वाले ने वकील को मारा. जिसके बाद ज्यादा संख्या में वकीलों ने नजदीक के एक थाने पर हल्ला बोल दिया और एक पुलिस के जवान को बुरी तरह मारा और उसे अधमरा करके छोड़ा. लेकिन कल साकेत कोर्ट के बाहर से एक झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आयी. जिसमें एक दिल्ली पुलिस का जवान अपनी वर्दी में मोटरसाइकिल से से आता दिखता है और वकीलों की भीड़ उसे घेरकर कर मारने लगती है.

यह सब गृहमंत्री और प्रधानमंत्री के आँखों के निचे दिल्ली में हो रहा है और उन लोगों को कुछ दिखाई नहीं दे रहा है. सरकार न तो वकीलों को समझा पा रही हो और न हीं प्रशासन को. मुझे लगता है कि सरकार को अपने वोट की चिंता है. जो अगले साल के शुरुआत में दिल्ली विधान सभा का चुनाव होने वाला है. बीजेपी सरकार को लगता है कि इस समय चुप्पी साधकर रखना हीं सबसे बड़ा अनुशासन हो सकता है. चाहे भले हीं दिल्ली की गलियां लाल रंगों में तब्दील क्यों न हो जाय. बीजेपी का चुप रहना दिल्ली के नागरिकों के लिए सबसे बड़ा झटका है. निश्चित तौर पर जब बीजेपी चुनाव में जनता के सामने जायेगी तो उनसे जनता कुछ कड़े सवाल जरूर पूछेगी.

जैसा कि हर जागरूक नागरिक जानता है कि दिल्ली की प्रशासनिक ब्यवस्था लेफ्टिनेंट गवर्नर के माध्यम केंद्र की सरकार के हाथ में होती है और दिल्ली की सत्ता में विराजमान 'आम आदमी पार्टी' हमेशा केंद्र के इस कदम की विरोध करती है. तो जो चार दिनों से पुलिस और वकीलों का हिंसक झगड़ा शुरू हुआ है. उसमें आप विधायक 'सौरभ भारद्वाज' ने उम्मीदों के अनुरूप वकीलों का समर्थन करना शुरू कर दिया है और दिल्ली पुलिस को बीजेपी का एक समर्थक विंग बता दिया है. तो आप यहां पर बाजी मारती हुई दिख रही है. जिसका कुछ न कुछ असर आगामी चुनाव में जरूर पड़ने वाला है. लेकिन बीजेपी की रहस्यमयी चुप्पी कब टूटेगी ? इसका हर कोई बेसब्री से इन्तजार कर रहा है. बीजेपी की चुप्पी यह बता रही है कि इस मुद्दे पर वह फंस गयी है.    

Friday, November 1, 2019

Whatsapp की जासूसी में सरकार की भूमिका

व्हाट्सएप जासूसी का जो मामला नजर में आ रहा है. वो हमारे अधिकारों के लिए एक गंभीर खतरा उत्प्नन करने वाला लगता है. यह उन्मादी सरकार जनता के मौलिक अधिकारों पर भी डांका डाल रही है. इसलिए इसका नाम "भारतीय जासूस पार्टी" होना जायज लगता है. व्हाट्सअप जासूसी मामला इस सरकार के लिए नया नहीं है. इस सरकार ने निजता के अधिकार पर बार-बार हमला किया है. एक वाकया आधार मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में सरकार की तरफ से पेश अटार्नी जनरल रोहतगी जी ने कहा था कि 'इंसान का उसके शरीर पर भी हक नहीं है'. तो ऐसे लोग जासूसी नहीं तो और क्या करेंगे ? इस जासूसी काण्ड में अगर ठीक ढ़ग से जांच की गयी तो बहुत बड़े-बड़े खुलासे मुमकिन लगते हैं. मैं ऐसा जासूसी करने वाली कम्पनी के बयानों के आधार पर कह रहा हूँ.
जिस इजराइली कम्पनी पर जासूसी का आरोप लग रहा है उसका कहना है कि वो अपना सॉफ्टवेयर केवल सरकारों को बेंचती है. तो भारत में अगर सरकार सरकार ने नहीं खरीदा तो किसने खरीदा ? कथित कम्पनी किसी और को बेचने का नाम क्यों नहीं ले रही है ? जबकि उसका ब्यापार विश्व भर में तकरीबन १ अरब डालर से ज्यादा का है और वो किसी गैरसरकारी कम्पनी या संगठन को अपना सॉफ्टवेयर नहीं बेचती है. भारत सरकार की तरफ से दूर संचार मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद इसे सरकार को बदनाम करने की साजिश करार दे चुके हैं और ४ नवंबर तक व्हाट्सएप से आखिरी जबाब माँगा है. पत्रकारों के सवाल पर मंत्री साहब मुखर्जी जी की जासूसी से लेकर विक्रम सिंह तक का जबाब तो दे दिया कि कांग्रेस ने एक परिवार के लिए इनकी जासूसी करवाई थी. पर ये बता पाने में विफल रहे कि देश के १४०० मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, वकीलों और बुद्धजीवियों के व्हाट्सएप काल की निगरानी क्यों और कैसे की गई? अगर जल्द से जल्द इसकी स्वतंत्र जांच नहीं करवाई गयी तो ये सत्ता के लिए बहुत घातक होगा.
जासूसी असंवैधानिक है. हमारे संविधान ने हमें हमारे लिए कुछ मौलिक अधिकारों का ख्याल रखा है. जिनका क्षरण किसी भी दशा में नहीं हो सकता. संविधान कहता है कि हम कैसे जिए, क्या खाये, क्या पहने, किस्से बात चीत करें ? ये हमारे विचार पर निर्भर करता है. इस पर कोर जोर-जबरदस्ती नहीं कर सकता है. परन्तु ये सरकार कुछ लोगों के साथ मिलकर हमारी स्वंत्रता पर अंकुश लगाने की भरपूर कोशिश कर रही है।. इस घटना का माननीय सर्वोच्च न्यायालय को स्वयं संज्ञान में लेना चाहिए और अपने निगरानी में एक स्वतंत्र जांच करवानी चाहिए.

Wednesday, October 30, 2019

यूरोपियन जमूरों का कश्मीर दौरा और विपक्ष नजरबंद

जैसा कि यूरोपियन सांसदों की कश्मीर जाने की कुछ खबरें अपुष्ट रूप से छन-छनकर बाहर आ रहीं थी. तो कल से वह पुष्ट हो गईं हैं. जिन 23 सांसदों का दल यूरोप से कश्मीर भ्रमण को आया है. उनमें से 17 सांसद मुस्लिमों के खिलाफ काफी आपत्तिजनक भाषा में ट्वीट किये हुए हैं और मुस्लिम समाज के खिलाफ नजरिया रखते हैं. ऐसे लोगों को हमारे देश की संघ/बीजेपी की सरकार ने कश्मीर के हालात के मुआयने के लिए बुलाया है. जब देश के विपक्षी पार्टियों के नेता अपने कश्मीरी भाइयो/बहनों से मिलने के लिए श्रीनगर जाना चाह रहे थे. तो उन्हें जबरन वापस लौटा दिया. वैसे अंग्रेज प्रेम का संघ/बीजेपी का रिश्ता बहुत पुराना रहा है. चाहे माफीवीर सावरकर रहें हों या अब भागवत. इन सबका आदर्श अंग्रेज हीं रहें हैं. पता नहीं ये लोग अंग्रेजों पर इतना यकीन क्यों करते हैं ?

बहरहाल बात ये होनी चाहिए था कि जब कश्मीर हमारे देश का आंतरिक मामला था. तो उसे साक्ष्य भारत के नेताओं और कश्मीर के जनता से मिलना चाहिए था न कि विदेशी और दक्षिण पंथी सांसदों का. जो क्रीमिया में रूस के अतिक्रमण का खुला समर्थन करते हैं. हम कैसे मान लें कि कश्मीर में सब कुछ सामान्य है. कल हीं आतंकियों ने बंगाल से 5 मजदूरों को पंक्ति में खड़ा करके गोली मारकर उन्हें मौत की नींद सुला दिया. तो सरकार और नाजीवाद के समर्थक धुर दक्षिणपंथी सांसदों की बात पर कैसे यकीन किया जाय. संघ का राष्ट्रवाद के राष्ट्रवाद की परिभाषा अब अपने मूल विचार के बिलकुल विपरीत हो चुकी है. जिसे हम देशवासियों को समझने की जरूरत है. कहीं सरकार के लोग एक अंतरराष्ट्रीय दलाल जिसका नाम 'मैडी शर्मा' है. कहीं उसके हाथ खेल तो नहीं रहें हैं, कहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता तो नहीं किया जा रहा है. मुझे शक हैं कि कहीं न कहीं यह सरकार दलालों के हाथ की कठपुतली भर बनकर रह गई है. 

संघ/बीजेपी का राष्ट्रवाद 
  • अपने देश के सांसदों को जबरन हवाई अड्डे से मारकर भेज देना 
  • महिला पत्रकारों के साथ अभद्रता करना 
  • कश्मीर के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों को नजर बंद करना 
  • पठानकोट में आईएसआई को जांच के लिए बुलाना 
  • मोदी जी का केक खाने के लिए पाकिस्तान जाना
  • असहमति रखने वालों को पाक परस्त बताना 
  • विरोध के स्वर को दबाना 
  • सन्यासी का वस्त्र धारण करे हुए ने महिला यौन शोषण के आरोपियों को संरक्षण देना 



Friday, October 25, 2019

सरकारी एग्जिट पोल को जनता ने नकारा

आज मैं बात करना चाहूंगा ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल पर. क्या ओपिनियन पोल करने वाली एजेंसियां देश की जनता को गुमराह करती है ? क्या एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियां मासूम जनता के सामने झूठ परोसती है ? अगर हाँ तो हमारे देश के लोकतंत्र करे लिए ये किसी बहुत गहरे संकट की आहात है. उदाहरण के तौर पर हरियाणा में 'इण्डिया टूडे' को छोड़कर लगभग आधा दर्जन चैनलों के पोल ने बीजेपी को 75 से 83 सीटें जीता रही थी. ऐसा एग्जिट पोल्ल में नहीं बल्कि ओपिनियन पोल पोल में भी दिखा रही थी और ओपिनियन पोल मतदान से मात्र 48 घण्टे पहले टीवी पर प्रसारित किया गया था. क्या इन मीडिया घरानों ने देश की जनता को गुमराह करने का काम नहीं किया है ? क्या इनके झूठ के लिए इन पर कोई जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती ?

 ओपिनियल पोल की कुछ भ्रामक तस्वीरें संलग्न कर रहा हूँ -







हरियाणा जैसा हीं हाल महाराष्ट्र में भी मीडिया वाले दिखा रहे थे. जहां बीजेपी को अकेले 140 सीट से ज्यादा और बीजेपी, सेना युति को 240 से ज्यादा सीटें जीतती हुई दिखा रहे थे तथा कांग्रेस, एनसीपी गठबंधन को 50 के निचे का आँकड़ा दे रहे थे. हकीकत क्या हुआ आप अपनी आँखों से खुद देखें और सोचे कि क्या आज की मीडिया वाकई आजाद मीडिया की तरह काम कर रही है या किसी के दबाव में काम कर रही है. 
हरियाणा की जनता ने किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत न देते हुए वहां त्रिशंकु विधानसभा का खाका खींच दिया है. बीजेपी और सेना ने मिलकर महाराष्ट्र में बहुमत के आंकड़े को तो पार कर लिया है परन्तु हरियाणा में पेंच फंसा हुआ है. जहां बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने सरकार गठन की सभी संभावनाओं को तलाशना शुरू कर दिया है. कुछ हद तक बीजेपी को इसमें सफलता भी मिल रही है. जब कुछ निर्दलीय विधायक जिनमें 'गोपाल काण्डा' एक प्रमुख नाम हैं. उनके समेत पांच निर्दलीयों ने मिलकर खटटर को सरकार बनाने के लिओए समर्थन का दावा किया है. काण्डा के काण्ड के चर्चे मैं निश्चित तौर पर अगले लेख में करना चाहूंगा.

ओपिनियन पोल और मिलता-जुलता परिणाम ये रहा -



Wednesday, October 23, 2019

हरियाणा, महाराष्ट्र के चुनाव सम्पन्न, आतंकी हमला टला

वक्त-बेवक्त पाकिस्तान का खतरा हमारे देश पर आ हीं जाता है और वो तब आता है जब देश के किसी हिस्से में चुनाव अपने शुरुआती समय में होता है. तब से खतरा बढ़ता जाता है और धीरे-धीरे महज मतदान से बमुश्किल एक या दो दिन पहले देश की सुरक्षा पर गंभीर खतरा छा जाता है. पाकिस्तान हैवी हथियारों से हमारे क्षेत्र में बम बारूद बरसाता है और हम फिर पाकिस्तान को मुंहतोड़ जबाब देते हैं और पाक अधिकृत कश्मीर में चार, छः पाक जवानों की पोस्ट गिरा देते हैं. उसमें १०-बीस आतंकी जहन्नुम में पहुंचा दिए जाते है. ये सब मीडिया और सरकारी प्रवक्ताओं की जुबान होती है. यही हाल २१ अक्टूबर को सम्पन्न हुए महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव से पहले भी देखने को मिला। जहां कुछ आतंकी देश में घुस आये थे. पाक सेना की पीओके में कई पोस्टें तबाह कर दी गयी जिसमें पाक के कई जवान और आतंकी मारे गए. 

परन्तु एक बात समझ नहीं आती कि जैसे हीं चुनाव सम्पन्न हो जाता है. वैसे हीं सीमा पर सबकुछ सामान्य क्यों हो जाता है ? क्या कभी आपने ध्यान दिया ? क्या आपको नहीं लगता कि सत्ता मीडिया द्वारा अपने पक्ष में प्रचार करवाती है ? उदाहरण के तौर पर मैं एक मशहूर हिंदी समाचार पत्र की कटिंग मैं इस लेख के साथ संलग्न करूंगा. जवानों के शौर्य पर कोई क्षमता नहीं है. उनके द्वारा किये गए बहादुरी के कार्य पर अटूट श्रद्धा है. उनके द्वारा बोला गया हर वाक्य सत्य और पवित्र है. परन्तु जब सत्ता उनके शौर्य पर राजनितिक रोटियां सेकने लगे जब थोड़ी आपत्ति जरूर होती है और आपत्ति होनी भी चाहिए. क्योंकि हमारे जवान हमारी भारत भूमि की रक्षा हेतु सर वक्त तैयार रहते हैं न कि किसी चुनावी रैली में अपने नाम के सम्बोधन के लिए.

Saturday, October 19, 2019

हिन्दू नेता कमलेश तिवारी की हत्या

मैं कमलेश तिवारी की गतिविधियों से सहमत नहीं हूँ और न हीं मैं किसी भी कट्टरपंथ का समर्थक हूँ. वो चाहे हिन्दू हो या मुस्लिम. उत्तर प्रदेश में बाबा योगी के राज में जघन्य अपराधों की संख्या अपने चरम पर पहुंच चुका है. कल लखनऊ जैसे शहर में 'हिन्दू समाज पार्टी' के नेता कमलेश तिवारी की निर्ममता से हत्या कर दी जाती है. वो भी तब जब उनको सरकारी सुरक्षा प्राप्त है. मैं मानता हूँ कमलेश तिवारी किसी एक धर्म के बारे में विवादित बयान दिए थे या एक धर्म का रक्षक खुद को बताते थे. ये उनकी आजादी का अधिकार था. परन्तु इसका मतलब ये कत्तई नहीं कि उनकी हत्या कर दी जाए. ऐसे घिनौने कृत्य करने वाले को तत्काल पकड़ कर सख्त से सख्त सजा सजा दिया जाना चाहिए. ऐसे मानसिक रूप से बीमार लोग समाज में नफरत को भड़काते हैं. अगर कमलेश तिवारी ने कुछ गलत भी किया था तो उनको उनके किये की सजा देने का अधिकार केवल न्यायालय को था.
हाल के दिनों में देखा गया है कि उत्तर प्रदेश में इस तरह के अपराधों में बेतहाशा वृद्धि हुई है. इस पर लगाम लगना चाहिए. मेरे जैसे हम अमन पसंद नागरिक का यही विचार है और इसका उत्तरदायित्व तो शासन-प्रशासन के हाथ में है. बहरहाल प्रशासन ने आज पत्रकार वार्ता में बताया कि वो तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है. बाकी दो पर नजर रख रही है. यह पुलिस महकमे के लिए अच्छी बात है. उसके लिए मैं प्रशासन की तारीफ़ करता हूँ. अब प्रशासन इन दरिंदों को कड़ी से कड़ी सजा दिलवाने का पर्यटन करें। जिससे कि अन्य आरोपियों की हिम्मत इस तरह के जघन्य अपराध के लिए न हो सके.                    
  

Wednesday, October 16, 2019

राम जन्म भूमि विवाद पर सुनवाई का अन्तिम दिन

इसमें कोई शक नहीं कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम देश के आदर्श नहीं है. हमने और  हमारे जैसे करोड़ों लोगों ने हमेशा राम को भगवान माना है. पर क्या ये जरूरी था कि राम जी के नाम को भी विवादित बना दिया जाय. बहरहाल अब प्रतीत होता है कि लगभग डेढ़ सौ साल बाद एक बहुत हीं पुराने और और विश्व भर में चर्चित राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के मुद्दे का पटाक्षेप होने का वक्त नजदीक आता दिख रहा है. अंग्रेजों के जमाने से शुरू हुआ यह मामला आजादी के बाद भी चलता रहा. एक लम्बे ट्रायल के बाद २००९-१० में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने २.७७ एकड़ विवादित जमाने को तीन हिस्सों में बाँट दिया. जिसमें दो हिस्सा हिन्दू पक्ष तो एक हिस्सा मुस्लिम पक्ष को दिया. उसके बाद दोनों पक्ष अपनी असन्तुष्टिता को प्रदर्शित करते हुए सर्वोच्च अदालत में उच्च अदालत के फैसले के खिलाफ अपील दायर की. जिस पर रोज सुनवाई होने और अंतिम नतीजे तक पहुंचने में लगभग ९ साल का समय बीत गया. 
अंत में वो दिन आ हीं गया जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीस श्री रंजन गोगोई ने अपने नेतृत्व में ५ सीनियर जजों की एक बेंच गठित की. जिसकी अगुवाई वो खुद कर रहें है. जिनमें न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति बोबडे, न्यायमूर्ति अब्दुल नजीर, न्यायमूर्ति चंद्रचूण समेत पांच जज शामिल हैं. यह सुनवाई आज ४२ वें दिन लगातार चल रही है. रविवार के अवकाश को छोड़कर ये बहस रोज चलती रही. जो आज अपने अंतिम परिणाम की तरफ बढ़ती दिख रही है. आज अंतिम दिन की सुनवाई शाम ५ बजे खत्म हो जायेगी। इसके बाद माननीय जजों को १ महीने का वक्त अपने फैसले को अंतिम रूप देने और लिखने का समय रह जाएगा. लेकिन एक बात तो सत्य है कि आज 16 अक्टूबर को इस सुनवाई का पटाक्षेप होना संभावित दिख रहा है.
गोदी मीडिया में मैं सुबह से देख रहा हूँ कि राम राज्य, राम मंदिर और अन्य तरह के नाम से प्रोग्राम चला रहें हैं. मानों वो देश के नागरिकों की भावनाओं को भड़का रहें है. उसी का एक छोटा सा उदाहरण मैं आपके सामने रखने की कोशिश कर रहा हूँ. जो इस तरह है. मैं आज तक हिंदी न्यूज़ चैनल को देख रहा था. वहां पर एक सीनियर एंकर रोहित सरदाना है. जिस अयोध्या में बैठकर ये बैठक कर वहां संघ और साधु संत तथा कुछ मुस्लिम लोगों को बैठाकर को सवाल जबाब कर रहे थे. उस दरम्यान कांग्रेस पार्टी का कोई नेता या प्रवक्ता वहाँ नहीं बैठा था. परन्तु किसी पैनलिस्ट ने कहा कि ये देश को हिन्दू तालिबान बनाना चाहते हैं. उसकी बात को लेकर ये चीखने लगे कि ये कांग्रेस का बयान है, परन्तु जो जिस बात को कांग्रेस की बात बता रहे थे वहां पर तो कांग्रेस का कोई आदमी था हीं नहीं। तो आप सोचिये ये कांग्रेस को बदनाम करने के लिए भाजपा/संघ के एजेंट की तरह काम नहीं कर रहें थे ?  ऐसा क्यों प्रतीत हो रहा है आप अपनी जिम्मेदारी से भाग रहें हैं ?

जय सियाराम 

Saturday, October 12, 2019

चीनी सामान का बहिष्कार कब से

जैसे-जैसे दीवाली का त्योंहार नजदीक आ रहा है. वैसे-वैसे मन में एक अजीब कशमकस सी मची हुई है कि कुछ राष्ट्रवादी संगठनों जैसे विहिप, बजरंग दल, हिन्दू रक्षा मंच, आरएसएस, भारतीय मजदूर संघ जैसे परम पराक्रमी बयान वीरों से सुसज्जित संगठनों के द्वारा कब एलान किया जाएगा कि चीनी सामानों का बहिष्कार किया जाना चाहिए. मेरा दिल ये सोचकर बैठा जा रहा है कि ये वीर अब तक किस कोठरी में छुपे पड़ें हैं. जबकि चीनी राष्ट्रपति तमिलनाडू में हमारे संघ की पाठशाला से निकले और स्वदेशी के सबसे बड़े झंडाबरदार के शिष्य श्रीमान मोदी जी के साथ 'महाबलीपुरम' में बैठकर ब्यापार बढ़ाने की बात पर जोर दे रहा है और श्रीमान प्रधानमंत्री महोदय उसकी हामी में हामी भरते जा रहे हैं.

चीनी सामानों का बहिष्कार करने की अलख जगाने वाले वीरों अब तक आप शांत क्यों बैठे हैं ? आपकी क्या मजबूरी है ? जो आप चीनी सामानों के बहिष्कार का ऐलान करने में देरी कर रहें हैं. क्या आप इन्तजार करना चाहते हैं कि 'शिन पिंग' अपने देश चाइना पहुंच जाए. तब हम उसकी बखिया उखेड़ेंगे या संघ समर्थित अत्यंत पराक्रमी संगठनों ने इस बार ये फैसला किया है कि चीन निर्मित सामानों को भारतीय बाजार में आसानी से बेचने दिया जाए. क्योंकि देश में मंदी घनघोर रूप ले चुकी है, बेरोजगारी सुरसा डायन की तरह अत्यंत विकराल रूप धारण कर चुकी है. ऐसे में सरकार के समर्थन में चुप रहना हीं इन संगठनों के लिए फायदेमंद होगा.
स्वदेशी से याद आया ! आज कल बाबा रामदेव कहाँ हैं ? जो नजर हीं नहीं आ रहें है. भारतीय बाजार में चीनी सामानों का बहिष्कार करने के मामले में बाबा जी लम्पटों के "ब्राण्ड एम्बेस्डर" हुआ करते थे. आजकल उनकी आवाज बहुत शांत हीं कहीं कुछ सुनाई नहीं दे रहा. हो भी क्यों नहीं उनका भी तो 'पतंजलि' का धंधा पिट गया है. अब बाबा बोले तो बोले किस मुंह से. मुझे पूरा यकीन है बाबा जी स्वदेशी अपनाने के लिए बोलेंगे जरूर पर वक्त भी बाबा का होगा और जबान भी बाबा की होगी.

Thursday, October 10, 2019

मन का रावण कोई मारता क्यों नहीं

दशहरा बीत चुका है. आज हम आत्मंथन करें कि हममें से कितने लोगों ने हमारे अंतःकरण से रावण को मारा है. रावण का अर्थ भय, बेईमानी, छल-कपट, चोरी, क्रोध, दुराचार से हैं. क्या हम जितने लोग सोशल मीडिया या रामलीला, झांकी या मेले के रावण को देखा ? क्या उसका अंत कर दिया. हाँ. अगर कर दिया तो बहुत बढ़िया किया परन्तु जिन लोगों ने नहीं किया उनका क्या ? हम समाज के लोगों को कुवार के नवरात्रि के महीने में हीं रावण क्यों नजर आता है ? हम इसी दौरान रावण को मारने के लिए इतने उत्सुक क्यों रहते है ? क्यों नहीं हम हर, दिन हर क्षण अपने अंदर बैठी रावण रुपी बुराइयों को मारने की कोशिश नहीं करते या हम दशहरे में रावण के पुतले को जलाकर अपनी कमियों को छुपाना चाहते हैं. जहां दुधमुँहीं बच्चियों के साथ दुराचार किया जा रहा हो, जहां हमारी बेटियों को मात्र कुछ पैसों और जेवरों के लिए मौत की नींद सुला दिया जाता हो, वहां उस रावण को दण्ड देने के बजाय हम पुतले को जलाकर जश्न मना लेने मात्र से हीं खुश हो जाते हैं. अरे भाई सोच को बदलो, समाज में परिवर्तन दिखने लगेगा. यह परिवर्तन हमें खुद से शुरू करना होगा न कि किसी का इन्तजार करने के बाद.

Saturday, October 5, 2019

राजघाट पर दूबे जी से एक संक्षिप्त वार्तालाप

कौन कहता है कि आज गांधी का अस्तित्व मिटने की कगार पर है. मैं ऐसे लोगों की राय से इत्तेफाक नहीं रखता। सौभाग्य से 2 अक्टूबर के दिन परिवार के साथ मुझे राजघाट गाँधी समाधि स्थल जाने का मौक़ा मिला. जो मेरे लिए बड़े हर्ष का विषय रहा. मैं वहां पहुंचा तो लोगों का भारी हूजूम इकट्ठा था और वो समय सुबह के बमुश्किल साढ़े 10 बजे का रहा होगा. जाहिर सी बात है बापू की जयंती थी और वो भी 150 वीं तो विभिन्न राजनितिक पार्टियों का प्रेम भी गांधी जी के प्रति उमड़ा था. उनमें से कुछ दो-चार साल पहले से गांधीवादी बनने की कोशिश करने वाले भी थे. जो उससे पहले गोड़सवादी हुआ करते थे. इन राजनितिक कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर भी दिया जाय तो देश के अन्यान्य हिस्सों से हर उम्र के लोग आये हुए थे. एक दूबे जी प्रयागराज के तेलियरगंज से हाथ में जलती हुई मसाल लेकर आये थे. उनसे गांधी जी के सिद्धांतों पर बात करने से पता चला कि गांधी जी का असर उनके मानने वालों के मन-मष्तिष्क पर किस कदर हावी हो जाता है. मैं और छत्तीसगढ़ से आये एक प्रखर गांधीवादी विचारक श्रीमती नजमा अजीम जी थी. जो कि बीजेपी के विचारों से प्रभावित थी पर हम सब एक थे और एक साथ थे. दूबे जी से मेरे वार्तालाप के कुछ अंश इस प्रकार हैं -


मैं - दूबे जी प्रणाम 
दूबे जी - खुश रहो 
मैं - आप कहाँ से आये हो ?     
दूबे जी - इलाहबाद, तेलियरगंज से आया हूँ. आप तेलियरगंज को जानते हैं.
मैं - हां 
दूबे जी - आप कहाँ से हो ?
मैं - जौनपुर से हूँ.
दूबे जी - फिर तो आप मेरे पड़ोसी हैं.   
मैं - आप राजघाट किस लिए आये हैं और आपके हाथ में ये क्या है ?
दूबे जी - मैं गांधीवादी विचार से जुड़ा हूँ. मैं बापू जी का दर्शन करने आया हूँ. आप जो ये देख रहें हैं ये जलती हुई मसाल है. जिसे मैं इलाहबाद से लेकर आया हूँ.
मैं - जब आप गांधीवादी है तो क्या आप बता सकते हैं कि गांधी जी की विचारों पर गोड़से के विचार कैसे हावी हो गए ?
दूबे जी - कुछ पल ठहरने के बाद ! हाँ मैं आपकी बात से सहमत हूँ कि आज के दौर में भी गांधी जी के विचार क्षीण नहीं हुए हैं. बस उन्हें झूठलाने की कोशिश की जा रही है. बापू जी के आदर्शों को पूरा विश्व अपनाने की कोशिश कर रहा है. क्या अमेरिका, क्या चाइना सब किसी भी बड़ी से बड़ी समस्या का हल बैठ कर शांति से सुलझाने की अपील कर रहें हैं. यही तो हमारे गाँधी जी है. जो संघ/बीजेपी वाले कल तक गांधी के अस्तित्व को नकारते थे आज वही लोग गांधी जी के समर्थन में रैली और तमाम तरह के सार्वजनिक कार्यक्रम का आयोजन कर रहें है. यही तो गांधी जी के विचारों की जीत हैं.
मैं - बाबा जी आपने मूल प्रश्न का उत्तर नहीं दिया.
दूबे जी - गांधीवादी विचार धारा को दबाने का काम सरकारों ने किया. मैं सभी सरकारों को इसका कसूरवार मानता हूँ. इतना कहते हीं उनकी आँखें गीली हो गयी.
मै भी उनसे माफी लेकर उनके साथ एक फोटो लिया और हम गेट खुलने का इन्तजार करने लगे. क्योंकि वीआईपी का इन्तजार वहां भी था. 

Wednesday, October 2, 2019

हे बापू तुम अमर हो

सर्वप्रथम बापू जी के जन्मदिवस पर उनके चरणों में सादर नमन. आज बापू जी का १५० वां जनमोत्स्व दिवस है. हमने बापू के विचारों को आत्सात किया है परन्तु कुछ राजनितिक दल और संगठन बापू के नाम पर आज जो दिल्ली की सड़कों पर ढोंग रचा रहे हैं. कभी उनके हीं राजनितिक पुरखों ने गांधी जी को मौत के घाट उतार दिया था. आज गांधी जी के विचारों के सबसे बड़े पैरोकार बनने की नाकाम कोशिश कर रहें हैं. जिस पार्टी/संगठन के लोग आतंक की आरोपी और बापू को अपशब्द कहने वाली अपनी सांसद को पार्टी से निकाल नहीं सकते। उन्हें बापू के नाम पर ढोंग रचाने का कोई अधिकार नहीं है.
बात आजादी के प्रारम्भिक दौर की है. गांधी जी कांग्रेस पार्टी के आजीवन सदस्य थे. तब आरएसएस नामक एक संगठन जिसके पास आज अपरोक्ष रूप से सत्ता है. वो गांधी जी के हर कदम का विरोध करती थी और उनके नेतृत्व में होने वाले आन्दोलनों से अपने को अलग कर लेती थी. हद तो तब हो गयी जब देश के अनेक वीर क्रांतिकारी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफत करते हुए जेलों में ठूंस दिए गए थे. तब संघ के सबसे बड़े नेता सावरकर ब्रिटिश हुकूमत से माफी मांगकर जेल से बाहर आये हुए थे और अंग्रेजी शासन का साथ देने तक की कसम खाते थे। बटवारे के वक्त जब गांधी जी देश को सभी धर्मों के रहने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे. तब संघ के तत्कालीन प्रमुख गोलवरकर मुसलमानों को लेकर बहुत हीं आक्रामक और अविवेक पूर्ण बयान देते थे और इतना कहते हुए गांधी जी खत्म करने की चेतावनी भी देते थे. जिसकी परिणीति १९४८ में गांधी जो अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. इस संदर्भ में प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा "कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी" लिखते हैं कि - गांधी को अब आरएसएस के बारे में कोई भ्र्म नहीं था. संघ (RSS) ने जो घृणा महात्मा गांधी के लिए पिछले कई महीनों से पाले रखा था उसके प्रति और ताकत के साथ मुखर हो गया" 
रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि - "दिसम्बर १९४७ के पहले सप्ताह में, एम एस गोलवरकर ने दिल्ली में आरएसएस की एक बैठक को सम्बोधित किया। यहां गोलवरकर ने 'मुसलमानों का जिक्र' करते हुए एक टिप्पणी की, "पृथ्वी पर कोई भी शक्ति उन्हें हिन्दुस्तान में नहीं रख सकती है. उन्हें ये देश छोड़कर जाना हीं पड़ेगा। महात्मा गांधी मुसलमानों को भारत में रखना चाहते थे कि चुनावो के वक्त कांग्रेस को मुसलमानों के वोट का लाभ हो सके, लेकिन, उस समय तक, भारत में एक भी मुसलमान नहीं बचेगा। महात्मा गांधी उन्हें गुमराह नहीं कर सकते। हमारे पास ऐसे साधन हैं, जिनसे ऐसे लोगों को तुरंत खामोश किया जा सकता है. लेकिन, यह हमारी परम्परा है कि हम हिन्दुओं के लिए अयोग्य न हो. लेकिन हमें मजबूर किया गया, तो हमें उस काम को भी अंजाम देना पड़ेगा।
लेकिन ३० जनवरी १९४८ को उन्हें खामोश कर दिया गया. यह काम आरएसएस के पूर्व सदस्य नाथूराम गोडसे द्वारा हमेशा के लिए कर दिया गया. इसके तुरंत बाद हीं आरएसएस को प्रतिबंधित कर दिया गया और गोलवरकर समेत इनके तमाम नेताओं को जेल भेज दिया गया.
महात्मा गांधी अमर रहे 
हत्यारा गोड़से मुर्दाबाद

Tuesday, October 1, 2019

बापू के विचारों की जीत

गांधी और उनसे जुड़ें विचारधारा के लोगों की इससे बड़ी जीत और क्या होगी कि गांधी जी को 30 जनवरी 1948 की शाम खामोश करने वाली सोच खबरों के मुताबिक़ कल रैली और रोड शो का आयोजन करेगी. खबर ये है कि बीजेपी (जो कि आरएसएस की संतान है) अध्यक्ष अमित शाह कल दिल्ली में गांधी जी के 150 वें जन्म वर्ष पर रैली करेंगे. हम गांधीवादी विचार धारा के लोगों के लिए यह जीत का एक अवसर है. माना की दिल में इनके नाथूराम और माफीवीर सावरकर बस्ते हैं परन्तु गांधी जी के उच्च मानदंडों के अनुसार वो अपने गोड़से प्रेम का इजहार छुपाकर करते हैं और ढोंग रचाकर गांधी जी का सम्मान करते हैं.
खैर ! उन भक्तों को इस खबर से बड़ी निराशा हुई होगी कि संघ/बीजेपी वाले कान में कहते हैं कि गोड़से की जय-जयकार करो और सामने आकर गांधी जी के सम्मान में रैली और तमाम तरह के सार्वजनिक आयोजनों का इंतजाम करो. ऐसे में भक्तों की हालत नेवले जैसे हो जाती होगी. मैं तो बस कल्पना कर सकता हूँ महशूस तो भक्त गण और शाखा में जाने वाले हीं कर सकते हैं. वो बेचारे आज से बहुत लज्जित महशूस कर रहे होंगे कि अब किस मुंह से वो गांधी जी के बारे में अपशब्द कहेंगे.
जैसा कि ऊपर की लाइनों में मैंने जिक्र किया है कि ये संघ/बीजेपी के लोग मजबूरी बस दिखावा मात्र का प्रेम गांधी जी के लिए कर रहें हैं. असल में तो गोडसे का हीं गुणगान करते हैं. मैं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल से पूरी तरह सहमत हूँ कि "जिस दिन मोहन भागवत गोडसे मुर्दाबाद का नारा बुलंद कर देंगे। उस दिन हम मान जाएंगे कि संघ/बीजेपी वाले दिल से गांधी जी का सम्मान करते हैं". यही तो हमारे जैसे तमाम लोग चाहते हैं. पर ऐसा होगा. मुझे नहीं लगता.
असल तो ये है कि आतंक की आरोपी (मालेगांव ब्लास्ट) और मध्य प्रदेश भोपाल से बीजेपी प्रत्याशी और अब सांसद जब खुलेआम हत्यारे नाथूराम गोड़से को वीर बताती हैं और बापू जी को अपमानित करती है. तब जब देश के लोगों ने भाजपा के प्रति नाराजगी जाहिर की तब देश के चौकीदार ने कार्रवाई करने के लिए उन्हें 10 दिन का नोटिस दिया था. जिसकी मियाद खत्म हुए 90 दिन से ज्यादा बीत गए हैं. जब उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकी तो यही बापू के सम्मान का ढोंग जनता के संख खुलकर आ जाता है.

महात्मा गांधी अमर रहे
हत्यारा गोड़से मुरादाबाद

  

Monday, September 23, 2019

ह्यूस्टन में मोदी की रैली में नेहरू का बखान

कल विश्व पटल और गोदी मीडिया के लिए रात एक न्य जश्न लेकर आयी थी जो अमरीका में टेक्सस राज्य के ह्यूस्टन शहर में आयोजित की गयी थी. उस जश्न वाली जगह का नाम 'हाउडी मोदी' कार्यक्रम रखा गया था जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक साथ साझा रैली को सम्बोधित किया. जिसमें लगभग 50 (मीडिया रिपोर्टों के अनुसार) अमेरिकी और भारतीय लोग इकट्ठा हुए थे. जाहिर सी बात है आयोजन बड़ा था तो खर्च भी बड़ा हुआ होगा. वैसे मोदी जी की अपनी एक अलग हीं शैली है. जिसके दम पर औरों को बौना साबित करने की कोशिश करते हैं. साझा भीड़ को दोनों नेताओं ने सम्बोधित किया और भारत की तर्ज पर 'अबकी बार ट्रम्प सरकार' का नारा हमारे प्रधानमंत्री ने ह्यूस्टन की धरती से उद्घोष किया. यह सोचने का सवाल है कि क्या हमारे प्रधानमंत्री अब अमेरिका में भी चुनाव लड़ेंगे या ट्रम्प के समर्थन में रैली करेंगे ? अगर ट्रम्प फिर भी हार जाते हैं तो क्या वहां का अगला राष्ट्रपति भारत के सामान्य रिश्ता रखेगा ? क्या अब हर उस जगह हमारे प्रधानमंत्री जी प्रचार करने जाएंगे जहां चुनाव होगा। वो भले हीं विश्व के किसी भी देश में हो. क्या अमेरिका की जनता ट्रम्प को देशद्रोही का तमगा नहीं देगी ? क्या ट्रम्प से वहां का जनमानस ये नहीं सवाल करेगा कि हमारे चुनाव को बाहरी आदमी कैसे मैनेज कर सकता है ? शायद ! पूछेगी और तब ट्रम्प के पास उसका जबाब नहीं होगा। क्योंकि ट्रम्प भी दक्षिणपंथी विचारों के प्रवर्तक हैं और हमारे प्रधानमंत्री जी भी.

संघ, साहब, गोदी मीडिया के लिए कल उसी शो में शर्मिंदगी का सामना उस वक्त करना पड़ा. जब अमेरिका के निचले सदन में बहुमत के नेता हॉउस आफ रिप्रेज़ेंटेटिव और डेमोक्रेट सांसद स्टेनी होयर ने कहा, ''अमरीका की तरह भारत भी अपनी परंपराओं पर गर्व करता है. जिससे वह अपने भविष्य को गांधी की शिक्षा और नेहरू की उस सोच जिसमें भारत को धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बनाने की बात है, उसका बचाव कर सके, जहां प्रत्येक व्यक्ति और उसके मानवाधिकारों का सम्मान किया जाएगा.'' जब यह वाकया हुआ उस वक्त मोदी जी वहीं खड़े थे और उन्हीं के स्वागत का कार्यक्रम चल रहा था. जब मंच से नेहरू और गांधी के नाम का जिक्र हुआ तो उस समय मोदी जी के चेहरा देखने लायक था. वो बिलकुल अधीर थे क्योंकि हत्यारे गोडसे , माफीवीर सावरकर और उपाध्याय का कहीं कोई जिक्र नहीं आया.



नेहरू की प्रसंशा सुनने के बाद भक्तों में अजीब तरह की बेचैनी छा गयी. हो भी क्यों न जब करोड़ों रूपये लगाकर मंच सजाया गया हो और उस मंच से उस आदमी का सम्मान किया जाए जिसे हमारे देश में गाली दिया जाता है और गाली देने वाला और कोई नहीं प्रधानमंत्री जी खुद सामने हों और नेहरू, गांधी का जिक्र हो जाय तो शर्म से मरने वाली बात हो जाती है. हमारे देश में हर समस्या का जड़ मोदी जी और उनकी पार्टी नेहरू जी को मानती है. दर्द तो तब और होता है जब नेहरू जी पीछा अमेरिका तक नहीं छोड़ते हैं. भक्त और संघ के लोग हलकान हैं कि ये नेहरू अपनी मृत्यु के बाद भी हमें शर्मिंदा करने से नहीं चूक रहा है.
          

Friday, September 20, 2019

ब्यापारियों का चुनावी चंदा सरकार ने किया वापस

जैसा की सर्वविदित है कि हमारी अर्थब्यवस्था दिनों-दिन गर्त में धंसती जा रही है. सरकार और वित्त मंत्री महोदया रोज नए-नए झुनझुने लेकर मीडिया के मार्फत जनता के बीच उपस्थित हो रहीं हैं. उसी कड़ी में आज भी माननीया वित्त मंत्री महोदया चैनलों के माध्यम से जनता के समक्ष अवतरित हुई और ढेर सारा बात कह गयी जिससे कि अर्थब्यवस्था को पटरी पर लाया जा सके और देश के उद्योगपतियों को टैक्स में छूट दे दिया और तर्क देने लगी कि इससे उद्योग के लिए पैसे लगाने में सहूलियत होगी। पर मेरा मत उनसे अलग है और अलग क्यों हैं ये भी मैं आप को बताना चाहूँगा.
दरअसल बात ये है कि इन्हीं ब्यापारिक घरानों ने मतलब की जिनका आज टैक्स कम हुआ हैं उन्होंने हीं तो बीजेपी को 2014 और 2019 में चुनाव लड़ने का पैसा दिया था. जिसे अब वो मय ब्याज वसूल रहें हैं और सरकार जनता को बता रही है कि हम अर्थब्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए पैसा दे रहें है. तो सवाल ये उठता है कि फिर आपने अर्थब्यवस्था को कमजोर करने वाले कदम उठाये हीं क्यों ? क्या आपके पास इसका कोई जबाब है या नहीं ? अगर नहीं है तो इसके बारे में भी साहस कर के बोल दो कि 'मोदी है तो मुमकिन है'. जब मैं आपकी साहस को मानूंगा। बोल दो कि देश की अर्थब्यवस्था मुझे बदहाल हालत में मिली थी. अब तो कुछ दिनों से सरकार के प्रवक्ता, गोदी मीडिया और मंत्री जी मानाने लगे हैं कि देश मंदी के चपेट में है. इससे पहले विरोध का कोई नेता मंदी की बात करता था तो समूचा सत्ता तंत्र उसका मजाक बनाता था. अनेक-अनेक मजाक के शब्दों से उसकी छवि को धूमिल करने का प्रयास करते थे.
आज सुबह आज तक के एक कार्यक्रम में सड़क परिवहन मंत्री श्री नितिन गडकरी जी ने भी माना कि देश के कुछ सेक्टर में सुस्ती है. उसमें हाऊसिंग सेक्टर की सुस्ती सबसे ज्यादा चिंता जनक है. उसके लिए उन्होंने मुंबई का भी जिक्र करते हुआ कहा कि जब किसी एक सेक्टर में सुस्ती आती है तो अपने साथ-साथ कइयों को सुस्त कर जाती है. तो सवाल ये उठता है कि आपने इतने गलत निर्णय लिए कैसे ? आज की खराब अर्थब्यवस्था के पीछे आपने बेशर्मी से कुछ ऐसे निर्णय लिए जिनका खामियाजा आज देश भुगत रहा है. उनमें नोटबंदी और जीएसटी प्रमुख हैं. नोटबंदी से देश को क्या हासिल हुआ ? नोटबंदी की सच्चाई देश के सामने कब आएगी ? जीएसटी से सरकार का कितना टैक्स जमा बढ़ा ? आखिर इन मुद्दों पर बात कब होगी ? कब तक गोदी मीडिया के लोग नेहरू जी के नाम का माला जपते रहेंगे ? नेहरू जी और कांग्रेस ने जो किया वो देश के सामने है. आपने क्या किया उसे देश को तो दिखाइए ? आपका विकास लापता है. रोजगार में 5 दशक का सबसे बड़ा संकट हैं. नोटबंदी के बाद लगातार अर्थब्यवस्था गिरती जा रही है. ऐसी मेहनती और ईमानदार सरकार से वो बेईमान और सुस्त सरकार हीं अच्छी थी.         

Tuesday, September 17, 2019

गांधी के सत्याग्रह का जन्म भाग-2

गाँधी जी के बारे जितनी भी बातें कही, लिखी या बोली जाए वो कम होगी. क्योंकि गाँधी जी का ब्यक्तित्व हीं ऐसा था कि उनके आस-पास के सभी विचार उनके समावेशी हो जाते थे. गाँधी जी के ऊपर लिखी अथवा छपी किसी भी किताब को अगर पढ़ा जाय तो आप आसानी से उनके विचारों का जुड़ाव समाज के प्रति समझ सकते हैं. गाँधी जी ने कोई भी काम बिना लक्ष्य के नहीं करते थे. जिस काम को करने की ठान लेते थे. उसे उसके अंजाम तक ले जाते थे. हम गाँधी जी के 'सत्याग्रह' को हीं समझने की कोशिश करें तो ऐसा प्रतीत नहीं होता कि सत्याग्रह की नींव गाँधी जी हमारे अपने देश में डाली थी, अपितु 'सत्याग्रह' एक सुसंगठित आंदोलन की तरह योजनाबद्ध तरिके से चलाया गया था. गांधी जी ने 18 जुलाई सन 1914 तक अफ्रिका में तमाम आंदोलनों की अगुवाई कर रहे थे. जिनमे वहां भारत से जाकर बसे ब्यापारी बंधु, गिरमिटिया मजदूर, खानों में मजदूरी करने वाले तथा नस्लवाद की खिलाफत करने करने वाले आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई थी.
गाँधी जी के विचारों का क्षेत्र बहुत विस्तृत है. बापू के विचारों को समझने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप अपने आस-पास की बातों को समझें. गांधी जी ने किसी बातों को समझाने के लिए तर्क के रूप अपना उदाहरण देते थे और उसमें अनेक कड़ियाँ अपने आप जुड़ती जाती थी. जभी तो कृपलानी जी ने लिखा है कि ‘‘गांधीजी ने तर्क और गणित के आधार पर तैयार किया गया ऐसा कोई सिद्धान्त प्रस्तुत नहीं किया... गांधीजी इतनी द्रुतगति से विचार करते थे कि तर्क को श्रृंखलाबद्ध करनेवाली बीच की नेक कड़ियों को जोड़ने का उन्हें ध्यान ही नहीं रहता था. इन कड़ियो को उनकी जगह बिठाने का काम तो उन विचारों को कार्यान्वित करनेवाले कार्यकर्ताओं या उनका सैद्धांतिक अध्ययन-विवेचन करने वाले व्यक्तियों को ही करना पड़ता था,जो अपनी बुद् तथा अपने पर्यवेक्षण और अनुभव से ऐसा करते थे". 
विदेशी इतिहासकार लुई फिशर कहते है कि " अगर उस अंग्रेज के बच्चे को ये मालूम होता कि जिस आदमी को वो ट्रेन के डिब्बे से बाहर फेक रहा वहीं आदमी एक दिन अंग्रेजी हुकूमत को पूरे ग्लोब से बाहर फेक देगा. तो ऐसी गलती कभी नहीं करता.
गांधी जी का विचार वैश्विक समाज के लिए बहुत हीं उपदेशी था. गांधी जी कहना था कि " आँख के बदले आँख फोड़ने से तो पूरी दुनिया हीं अंधी हो जायेगी". गाँधी जी कहते थे कि हम हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब एक माँ की हीं संतान है. अगर हम आपस में लड़ेंगे तो दमनकारी अंग्रेजी हुकूमत से हमारी माँ को कौन आजाद कराएगा ? परन्तु आज के परिवेश में कुछ विध्वंशक विचार धारा के लोग निरंतर गाँधी जी को अपमानित करने का कार्य करते हैं. परन्तु वो भूल जाते हैं कि दुनियाँ के सामने जब भी कोई घातक सामाजिक चुनौती आती है तो विश्व के लोग गाँधी जी के बताये हुए सिद्धांत का अनुसरण करने पर जोर देते हैं न कि बदले की बात करने की. 

       

Saturday, September 14, 2019

हिंदी हमारी पहचान है

आज 14 सितंबर है जिसे हम भारतवासी एक पवित्र दिन "हिंदी दिवस" के रूप में याद करते हैं. वैसे तो हमारे संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है परन्तु हम हिंदी बोलने वालों के लिए यह हमारी मातृ भाषा है, प्राण भाषा है, पवित्र भाषा है. क्योंकि हम देशवासियों का हाथ अंग्रेजी में उतना हीं ढीला है जितना कि अंग्रेजों का हमारी मातृ भाषा में. मैं ये नहीं कहता कि सभी लोगों को हिंदी बोलनी चाहिए या उन्हें बोलने के लिए अनिवार्य कर देना चाहिए. अपितु मैं उन लोगों से स्वतः निवेदन करता हूँ कि आप अपनी भाषा का सम्मान करें और बोलें परन्तु हमारी भाषा को भी समझे. हिंदी हीं एक ऐसी भाषा है जो हमें देश के हर कोने में बोलने-सुनने को मिल जाती है. मैं हिंदी का उपासक हूँ क्योंकि मेरा परिवेश हिंदी भाषी लोगों से भरा पड़ा है. देश का हर पाँचवाँ देशवासी हिंदी बोलता है. तो हिंदी कितनी वृहद भाषा है इसका अंदाजा हमें सहज हीं लगा लेना चाहिए. देश के जितने भी हिंदी बोलने और लिखने वाले लोग हैं उन सभी को मेरी तरफ से "हिंदी दिवस" की हार्दिक बधाई. हिंदी का हमारे स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में बहुत अहम रोल रहा था तभी तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने साल 1918 में हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने को कहा था. इसे गांधी जी ने जनमानस की भाषा भी कहा था और गांधी जी ने ये भी कहा था कि हिंदी के बिना राष्ट्र गूंगा रहेगा. मैं अपने उन हिंदी के महान साधकों को नमन और प्रणाम करता हूँ जिन्होंने हिंदी भाषा को आम इंसान के जुबान की भाषा बनाने में अपना अतुल्यनीय योगदान दिया उनमें कालिदास से लेकर गोस्वामी तुलसीदास, मीरा, रसखान, कबीर, तानसेन, निराला, महादेवी वर्मा, हरिवंश राय बच्चन, पंत और आधुनिक काल के लेखक और गायक/वाचक श्रेष्ठ है. 
  

Wednesday, September 11, 2019

गांधी के सत्याग्रह का जन्म भाग-1

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का नाम ले लेकर तो आज लाखों लोग ढोंग रचा रहें हैं और उनमें वो लोग भी शामिल है जिनके राजनैतिक बाप-दादा स्वंवतंतता के समय खुलेआम गाँधी जी की सत्याग्रह और आजादी के उनके प्रयासों का विरोध करते थे. उनमें सत्ताधारी को पीछे के दरवाजे से अपनी पूरी ताकत देने वाला संघ परिवार भी गाँधी जी की विरोध करने के मामले में अग्रिम पंक्ति में स्थान बनया था. परन्तु आज वक्त ने ऐसा पासा बदला कि जो 1948 तक बापू जी के विरोध में आगे खड़े रहते थे वो आज उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा किये बिना नहीं रहते. क्योंकि इसे गैर राजनीतिक संगठन को पता है कि आजादी के आंदोलनों के वक्त ऐसे संगठनों की भूमिका संदिग्ध रही है. जिनके अनेकों प्रमाणित दस्तावेज है. माफी मांगने से लेकर सेलुलर जेल तक. आजकल समाज में गांधी जी को अपशब्द कहने को लेकर एक नया चलन शुरू हो चुका है. कुछ सप्ताह पहले मध्य प्रदेश, भोपाल से बीजेपी सांसद प्रज्ञा ठाकुर (आतंक की आरोपी) ने गांधी जी को खलनायक बताते हुए हत्यारे गोडसे की देशभक्त बोली थी. क्योंकि वो भी उसी तरह की देशभक्त हैं जिस तरह का देशभक्त गोडसे था. गोडसे राष्ट्रपिता का हत्यारा था और प्रज्ञा आतंक की आरोपी। तो उन्हें तो गोडसे प्यारा लगेगा ही.

बापू जी हमेशा हीं सत्य के पुजारी रहें है. जीवन पर्यन्त उन्होंने हमेशा सत्य की हीं बात की और उसी रास्ते पर चले. सत्याग्रह उसी का एक बहुत स्वर्णिम अध्याय है. सत्याग्रह के तीन अति महत्वपूर्ण कारक (तत्व) होते हैं, जिनमें 1.सत्य,2.अहिंसा और 3. साधन-शुद्धि। साधन और शुद्धि एक दूसरे की पूरक हैं. साधन में नैतिकता का विशेष ध्यान रखा जाता है क्योंकि इसके बिना आपका बाहरी स्वरूप कैसा भी पर आंतरिक स्वरूप सही नहीं है तो आपके द्वारा की गई चेष्टा निरर्थक हैं. सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ हीं 'सत्य के साथ चलना' होता है.
  • सत्य का आग्रह अर्थात सत्य को समेट लें या सत्य का हीं हो लिया जाए. जहां किसी तरह के शक की गुंजाइश हीं न बचे.  
  • सत्याग्रह में दूसरा स्थान अहिंसा का आता है जिसका मतलब होता है कि आप किसी को चोट नहीं पहुचायेंगे, चाहे वो शारीरिक हो या मानसिक। सत्याग्रही कभी भी किसी काम को छुपा कर करने में यकीन नहीं रखता अपितु उसे खुले तौर पर करता है.   
  • साधन नैतिकता का हीं एक उच्च विचार है जिसमें समस्त चुनौतियों से पार पाने की जुगत होती है और यथासंभव शक्ति के अनुरूप कार्य को अपने में ढाल लेती है.
सत्याग्रह का संक्षिप्त वर्णन - 

"सत्याग्रह" मतलब सत्य का आग्रह. इस विचार में गांधी जी कैसे ढले और पैसिव रेज़िस्टेंस शब्द से सत्याग्रह तक बापू जी कैसे पहुँचे, इसका इतिहास उन्होंने स्वयं लिखा है, 'दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास’ में जिस घटनाक्रम का विस्तार पूर्वक बताया गया है उसे एक बार दुबारा पढ़ने की आवश्यकता है. बापू जी ने लिखा है कि ‘‘ उस नाट्यशाला में सभा हुई. ट्रान्सवाल के भिन्न भिन्न शहरों से प्रतिनिधि भी बुलाये गये. पर मुझे स्वीकार करना चाहिए कि जो प्रस्ताव मैंने बनाये थे उनका पूरा अर्थ स्वयं मैं ही न समझ सका था. इसी प्रकार यह अंदाज भी न लगा सका था कि इनका दूरवर्ती परिणाम क्या होगा. सभा हुई. नाट्यशाला में कहीं भी जगह नहीं खाली बची. सबके चेहरे मानों यही कह रहे थे कि कोई नयी बात आज हमें करनी है.’’

गांधी जी आगे लिखते हैं कि - ‘‘ हम में से कोई भी इस बात को नहीं जानते थे कि कौम के इस निश्चय अथवा आंदोलन को किसी नाम से पुकारा जाय. उस समय मैंने इस आन्दोलन का नाम ‘पैसिव रैजिस्टेन्स’ रखा था. मैं उस समय पैसिव रेजिस्टेन्स का महत्त्व भी न तो जानता था और नसमझता ही था। मैं तो केवल यही जानता था कि एक नवीन वस्तु का जन्म हुआ है. पर जैसे-जैसे आन्दोलन बढ़ता गया वैसे–वैसे ‘पैसिव रेज़िस्न्स’ के नाम से घोटाला होने लगा और इस महान् युद्ध को एक अंग्रेजी नाम से पुकारना भी मुझे लज्जाजनक मालूम हुआ. दूसरे कौम को यह शब्द जल्दी याद होने लायक भी न था. इसलिए इस युद्ध के लिए सर्वोत्कृष्ट नाम ढूँढ़नेवाले के लिए मैंने ‘‘इण्डियन औपीनियन’’ में एक छोटे से इनाम की घोषणा की. उत्तर में कितने ही नाम आये. उस समय युद्ध के रहस्य की चर्चा ‘‘इम्डियन ओपीनियन’’ में अच्छी तरह हो चुकी थी. इसलिए उम्मीदवारों के लिए उस शब्द को ढूँढ़ने के लिए प्रमाण की कोई कमी न थी. मगनलाल गांधी ने भी इस प्रतिस्पर्धा में भाग लिया था. उन्होंने ‘ सदाग्रह’ नाम भेजा. इस शब्द को पसंद करने के लिए उन्होंने कारण बताते हुए लिखा था कि कौम का आन्दोलन एक भारी आग्रह है. और यह आग्रह ‘सद्’ अर्थात शुभ है। इसलिए उन्होंने इस नाम को इतना पसंद किया है. मैंने उनकी दलील का सार बहुत थोड़े में दिया है. मुझे यह नाम पसन्द तो आया तथापि मैं उसमें जिस वस्तु का समावेश करना चाहता था उसका समावेश उससे नहीं होता था. इसलिए मैंने उसके ‘द्’ को ‘त्’ बनाकर उसमें ‘य’ जोड़ दिया और ‘सत्याग्रह’ नाम तैयार कर लिया. सत्य के अन्दर शान्ति समाविष्ट मानकर किसी भी वस्तु के लिए आग्रह किया जाय तो उसमें से बल उत्पन्न होता है। इसलिए ‘‘आग्रह’’ के द्वारा उसमें "ब" का भी समावेश करके भारतीय आन्दोलन का नामाभिधान -‘सत्याग्रह’ अर्थात् सत्य और शान्ति से उत्पन्न होने वाला बल –करके उसका प्रयोग शुरू कर दिया. तब से इस युद्ध को ‘‘पैसिव रेज़िस्टेन्स’’ नाम से पुकारना बन्द कर दिया और यहाँ तक कि अँग्रेजी लेखों में भी कई बार पैसिव रेज़िस्टेन्स को छोड़कर सत्याग्रह अथवा उसी अर्थ के अन्य अँग्रेजी शब्द का प्रयोग शुरू कर दिया. ‘सत्याग्रह’ के नाम से पुकारे जाने वाली वस्तु का और सत्याग्रह का जन्म इस तरह हुआ.’’