Friday, November 1, 2019

Whatsapp की जासूसी में सरकार की भूमिका

व्हाट्सएप जासूसी का जो मामला नजर में आ रहा है. वो हमारे अधिकारों के लिए एक गंभीर खतरा उत्प्नन करने वाला लगता है. यह उन्मादी सरकार जनता के मौलिक अधिकारों पर भी डांका डाल रही है. इसलिए इसका नाम "भारतीय जासूस पार्टी" होना जायज लगता है. व्हाट्सअप जासूसी मामला इस सरकार के लिए नया नहीं है. इस सरकार ने निजता के अधिकार पर बार-बार हमला किया है. एक वाकया आधार मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में सरकार की तरफ से पेश अटार्नी जनरल रोहतगी जी ने कहा था कि 'इंसान का उसके शरीर पर भी हक नहीं है'. तो ऐसे लोग जासूसी नहीं तो और क्या करेंगे ? इस जासूसी काण्ड में अगर ठीक ढ़ग से जांच की गयी तो बहुत बड़े-बड़े खुलासे मुमकिन लगते हैं. मैं ऐसा जासूसी करने वाली कम्पनी के बयानों के आधार पर कह रहा हूँ.
जिस इजराइली कम्पनी पर जासूसी का आरोप लग रहा है उसका कहना है कि वो अपना सॉफ्टवेयर केवल सरकारों को बेंचती है. तो भारत में अगर सरकार सरकार ने नहीं खरीदा तो किसने खरीदा ? कथित कम्पनी किसी और को बेचने का नाम क्यों नहीं ले रही है ? जबकि उसका ब्यापार विश्व भर में तकरीबन १ अरब डालर से ज्यादा का है और वो किसी गैरसरकारी कम्पनी या संगठन को अपना सॉफ्टवेयर नहीं बेचती है. भारत सरकार की तरफ से दूर संचार मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद इसे सरकार को बदनाम करने की साजिश करार दे चुके हैं और ४ नवंबर तक व्हाट्सएप से आखिरी जबाब माँगा है. पत्रकारों के सवाल पर मंत्री साहब मुखर्जी जी की जासूसी से लेकर विक्रम सिंह तक का जबाब तो दे दिया कि कांग्रेस ने एक परिवार के लिए इनकी जासूसी करवाई थी. पर ये बता पाने में विफल रहे कि देश के १४०० मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, वकीलों और बुद्धजीवियों के व्हाट्सएप काल की निगरानी क्यों और कैसे की गई? अगर जल्द से जल्द इसकी स्वतंत्र जांच नहीं करवाई गयी तो ये सत्ता के लिए बहुत घातक होगा.
जासूसी असंवैधानिक है. हमारे संविधान ने हमें हमारे लिए कुछ मौलिक अधिकारों का ख्याल रखा है. जिनका क्षरण किसी भी दशा में नहीं हो सकता. संविधान कहता है कि हम कैसे जिए, क्या खाये, क्या पहने, किस्से बात चीत करें ? ये हमारे विचार पर निर्भर करता है. इस पर कोर जोर-जबरदस्ती नहीं कर सकता है. परन्तु ये सरकार कुछ लोगों के साथ मिलकर हमारी स्वंत्रता पर अंकुश लगाने की भरपूर कोशिश कर रही है।. इस घटना का माननीय सर्वोच्च न्यायालय को स्वयं संज्ञान में लेना चाहिए और अपने निगरानी में एक स्वतंत्र जांच करवानी चाहिए.

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