Saturday, December 24, 2022

भारत जोड़ो यात्रा का दिल्ली में जलवा

देखते-देखते कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा 108 वें दिन में पहुंच गई। जो केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा से होते हुए आज बदरपुर बॉर्डर से दिल्ली में प्रवेश कर गई। दिल्ली में राहुल गांधी के प्रति लोगों की दीवानगी ऐसी थी कि सड़क के दोनों तरफ आने जाने वाले लोग, वहां के रहवासी अपने घर की छतों एवं सड़कों पर खड़े होकर राहुल गांधी का दीदार कर रहे थे। और उन्हें अपने बीच पाकर एक नेता की कमी की पूरी होने का एहसास कर रहे थे। एक ऐसा राजनेता देशवासियों को चाहिए था जो कि उनके दुःख-दर्द में हमेशा उनके साथ रहे। ऐसा राहुल गांधी को देख कर के वहां के निवासियों ने समझा। राहुल गांधी की यात्रा आश्रम, आईटीओ से होते हुए लाल किले तक पहुंची। लाल किला यात्रा पहुंचने पर राहुल गांधी जी ने एक स्टेट्समैन की तरह भाषण दिया और नफरत को दूर और मोहब्बत करने का पैगाम दिल्लीवासियों को दिया।
वैसे तो लाल किला पहुंचने से पहले राहुल गांधी का आज ही राजघाट और अटल जी के समाधि पर पुष्प अर्पित करने एवं उनके प्रति सम्मान प्रकट करने का कार्यक्रम था। लेकिन कल 25 दिसंबर है, जैसा कि हर कोई जानता है अटल जी का जन्म दिवस है। जो अब हमारे बीच में नहीं है। उसे देखते हुए राहुल गांधी ने राजघाट और अटल समाधि जाने का अपना प्लान बदल दिया। जो संभवतः कल राजघाट जाएंगे। जहां महात्मा गांधी और सदैव अटल बिहारी वाजपेई जी को अपना श्रद्धा सुमन अर्पित करेंगे। इन सब बातों को अगर हम जोड़कर देखें तो पाएंगे कि राहुल के साथ कदमताल करते हुए लोग बेल्लौस जुड़ते जा रहे हैं। यह सिलसिला बदरपुर बॉर्डर से शुरू होकर लाल किले तक निरंतर जारी रही। राहुल पूरी यात्रा के दौरान जो भी अभी तक किया है 2800 किलोमीटर की। उसमें उन्होंने जन सरोकार के मुद्दों को प्रखरता एवं प्रमुखता से उठाए हैं और लगातार उसको आगे बढ़ाते जा रहे हैं। राहुल अपने उठाए हुए मुद्दे पर लगातार कायम हैं।
इस भारत जोड़ो यात्रा से राहुल गांधी एक तरफ अपनी बनाई गई छवि को तोड़ पाने में सफलता हासिल कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ लोकप्रियता हासिल करते जा रहे हैं। राहुल की "पप्पू" वाली छवि को संघ, सरकार और मीडिया ने बहुत दिनों तक एक दुष्प्रचार के माध्यम से स्थापित किया था कि राहुल गांधी गंभीर नेता नहीं है, उन्हें संघर्ष करने नहीं आता, वह कभी दो-तीन महीने टिककर देश में रह नहीं सकते, विदेश घूमने चले जाते हैं। इन सब बातों को धता बताते हुए इस यात्रा के माध्यम से राहुल गांधी ने उन सभी को एक करारा जवाब दिया है। और देश के जनमानस के मस्तिष्क में अपने लिए, अपने स्वरूप के लिए एक नया विमर्श बनाने पर मजबूर कर दिया है। अब हमें देखना होगा किस देश के लोग उनके इस रूप को कैसे लेते हैं? लेकिन एक बात तो तय है राहुल की इस यात्रा में महिला, बुजुर्ग, बच्चे, नौजवान, बुद्धिजीवी, स्वयंसेवी संगठन, सिविल सोसाइटी के लोग भारी मात्रा में जुड़ रहे हैं। यह ऐसे लोग हैं जिन्होंने हमेशा गैर कांग्रेस सरकार की आवाज उठाई थी। लेकिन अब जनमानस को भी सोचना चाहिए जिन्होंने कभी कांग्रेस को पसंद नहीं किया, वह कांग्रेस के साथ क्यों जुड़ रहे हैं ? इसके कितने व्यापक निहितार्थ निकाले जा सकते हैं। इस यात्रा में जिस तरह से लेफ्ट, कम्युनिस्ट और समाजवादी पृष्ठभूमि के लोगों का जुड़ाव हो। वह कुछ सोच को लेकर हीं तो हो रहा होगा।
देश में ऐसे करोड़ों लोग हैं। जिसमें बुद्धिजीवी और सिविल सोसाइटी के लोग भी हैं। जिन्हें अब इस सरकार की गलती का एहसास हो रहा है। 2012-13 में जिन लोगों ने भी अन्ना आंदोलन के वक्त कांग्रेस की खुलकर के खिलाफत की थी। आज वह लोग भी अपने आप को गलत मानते हुए फिर से कांग्रेस के साथ कांग्रेस के मूल्यों के साथ अपने आप को जोड़ रहे हैं। यह भारत जोड़ो यात्रा की सफलता है, इसके अलावा आप सफलता के पैमाने और क्या कर सकते हैं ? जाहिर सी बात है जो इस समय सत्ता में है जैसे भाजपा की सरकार या मोदी की सरकार के नाम से हम जानते हैं। वे लोग यात्रा को सफल क्यों मानेंगे ? ठीक उसी तरह जब अन्ना आंदोलन के वक्त कांग्रेस के कुछ मुट्ठी भर नेता उस आंदोलन को छोटा बता रहे थे। लेकिन उस समय भी कांग्रेस के भीतर कुछ ऐसे नेता थे, जिनमें दिग्विजय सिंह, जयराम रमेश और भी बहुत नाम है। उन्होंने कहा था कि यह सब आंदोलन संघ द्वारा प्रायोजित है। जिनकी बात बाद में सही निकली। 


अन्ना आंदोलन से जुड़े हुए प्रशांत भूषण ने कहा कि इसमें संघ ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उसके बाद हम और आप सब देख रहे हैं कि दिल्ली के अंदर आम आदमी पार्टी का उदय हुआ। जो कि उसी आंदोलन अन्ना आंदोलन की पैदाइश है और केजरीवाल जी जो उस समय अन्ना जी के बाद प्रमुख आंदोलनकारी हुआ करते थे। वह मुख्यमंत्री बने हुए हैं। लेकिन जनता वहीं की वहीं खड़ी है। उस वक्त साथ देने वाले अब समझ रहे हैं कि उन्होंने लोकतंत्र के साथ कितना बड़ा मजाक किया था ? कांग्रेस से शिकायत हो सकती है। सरकारों से शिकायत हो सकती है। लेकिन जो सर्व समावेशी हो उस से शिकायत कैसे हो सकती ?
राहुल गांधी जी आज उसी रास्ते पर हैं जिस रास्ते पर कभी महात्मा गांधी जी चला करते थे। यहां पर राहुल गांधी और महात्मा गांधी जी की तुलना करना बेमानी होगी। क्योंकि महात्मा गांधी जी तो महात्मा थे। राहुल गांधी जी अपने देश के प्रति एक जिम्मेदारी मानते हुए एक लंबी यात्रा पर निकले हैं। और वह सफलता की ओर अग्रसर है। जो 26 जनवरी 2023 को श्रीनगर में ध्खवजारोहण के बाद खत्म होगी। श्रीनगर में ध्वजारोहण किया जाएगा और उसके बाद वहीं से भारत जोड़ो यात्रा की समाप्ति की घोषणा कर दी जाएगी। मुझ जैसे लोगों को यह उम्मीद है कि इस यात्रा की समाप्ति के बाद राहुल गांधी अब चुप बैठने वाले नहीं हैं। अभी दक्षिण से उत्तर की यात्रा के बाद पूर्व से पश्चिम की यात्रा भी करेंगे। जिसमें देश के छूटे हुए प्रदेश शामिल किए जाएंगे।इस तरह मैं अपने शब्दों को विराम देते हुए कांग्रेस को और राहुल गांधी को इस यात्रा के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

जय हिंद
जय भारत 
जय कांग्रेस

Sunday, December 4, 2022

भारत जोड़ो यात्रा एम पी से पहुंची राजस्थान

राजस्थान में हो रहे गहलोत पायलट के झगड़ों के बीच आज शाम राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा आखिरकार राजस्थान में प्रवेश कर हीं गयी. राजस्थान में कांग्रेस भाजपा से राजनैतिक लड़ाई तो लड़ हीं रही है और साथ-साथ दो खेमों  में बटी राजस्थान सरकार अपनों से भी लड़ रही है. एक तरफ गहलोत समर्थक अपने अनुभव की बता करते हैं तो दूसरी तरफ पायलट समर्थक युवा तुर्क की बात करते हैं. कांग्रेस चक्की के दो पाटों की तरह पिस रही है.

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के बाद राजस्थान हिंदी क्षेत्र का तीसरा राज्य है.जहां भारत जोड़ो यात्रा जारी है. एक्सपर्ट की तमाम आशंकाओं को खारिज करते हुए हिंदी भाषी क्षेत्र में भी यात्रा कमाल कर रही है. अपने पूरे दम-खम के साथ यात्रा चल रही है. राहुल गाँधी यात्रा की शुरुआत से हीं कहते आ रहे हैं कि उनकी यह यात्रा गैर-राजनितिक है. लेकिन एक बात जान लेनी बहुत जरूरी है कि राजनिति करने वाले लोग गैर-राजनैतिक कुछ भी नहीं करते. और इसमें कोई बुराई भी नहीं है.

हम जैसे लोग अपने आपको भाग्यशाली मानते हैं कि हमने तो महात्मा गांधी जी की यात्रा नहीं देखी लेकिन राहुल गांधी की यात्रा देख रहें हैं. राहुल की भारत जोड़ों यात्रा की यदि सच्चे मन से विवेचना किया जाय, तो ये पता चलेगा कि यात्रा एकसमुद्र की तरह विशाल रूप ले चुकी है. जिसमें गावों, कस्बों और बड़े-बड़े शहरों से लोग जुड़ते हुए यात्रा को मुकम्मल बना रहे है और इतिहास में अपना नाम दर्ज करा रहे हैं. भारत जोड़ों यात्रा लगभग दो हफ्तों तक राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों से होकर गुजरेगी. उम्मीद है विगत राज्यों की भाँति भारत जोड़ो यात्रा राजस्थान में सफलता का एक नया कीर्तिमान रचेगी.

Wednesday, November 30, 2022

रवीश कुमार

गोदी मीडिया के इस दौर में जनता की आवाज श्री रवीश कुमार जी ने NDTV से इस्तीफा दे दिया। क्योंकि NDTV को अडानी ने पिछले दरवाजे से खरीद तो लिया लेकिन रवीश की ईमानदारी को खरीदने के लिए अडानी की तिजोरी में पैसा नहीं रहा होगा। 
आज के डूबते हुए सूरज के साथ सच की‌ आवाज रवीश कुमार ने भी अपना इस्तीफा NDTV के मालिक को सौंप दिया। ऐसा उम्मीद हर नागरिक को चैनल बिकने वाली खबर के बाद हीं पता लग गई थी। आज के चरण वंदना के दौर में रवीश कुमार ने अपना मेरू दण्ड सीधा रखते हुए जनता की आवाज बनकर सरकार से सवाल पूछा। शायद यही वो वजह रही कि बीजेपी ने रवीश कुमार के शो "प्राइम टाईम" का घोषित बायकॉट कर रखा था। क्योंकि आज की झूठी सरकार को सिर्फ अपनी वंदन पसंद है। सवाल पूछने वालों को शत्रु की नजर से सत्तारूढ़ पार्टी देखती है।
रवीश कुमार के बारे में बस इतना ही कहा जाए कि किसी गरीब शोषित या मजदूरों की बात आई है वहां पर रवीश कुमार उनके हक में खड़े हुए हैं‌। चाहे लाक डाउन का मौका हो या किसानों का आंदोलन, युवाओं की भर्ती का मामला हो या रेलवे ग्रुप डी की भर्ती का मसला। सबको रवीश कुमार अपनी तरफ से टीवी के माध्यम से बल प्रदान किया। उनकी आवाज बने। इसके लिए उन्होंने एक नौकरी सीरीज का लंबा प्राइम टाइम शो किया। जिसकी वजह से हजारों अभ्यर्थियों को उनका जॉइनिंग लेटर मिला। रवीश कुमार के इस शो को देखकर बड़ी खुशी होती थी कि कोई एक ऐसी आवाज तो है, जो मजबूर लोगों की बातों को सुन रहा है और उनकी बातों को जनता तक पहुंचा रहा है। क्योंकि रवीश कुमार एकतरफा बात नहीं करते। वो हमेशा तथ्यों के साथ अपनी बात को रखते हैं। और यही बात सरकार को नागवार लगती है। सरकार ने एक रवीश कुमार से पीछा छुड़ाने के लिए पूरा एनडीटीवी खरीद लिया। जो प्रणव राय कल तक NDTV के मालिक थे तो आज उसी चैनल के मालिक अडानी जी हो गए। अरे वही अडानी जी जिनकी गिनती साहब के तीन-चार मित्रों में होती है। उन्हीं में से एक अडानी जी आजकल एयरपोर्ट से लेकर खदान सबकुछ अपने नाम से खरीद रहे हैं। रवीश कुमार एकाधिकार के खिलाफ एक लड़ाई लड़ रहे थे। जनता का पैसा किसी एक-दो के पास क्यों जाए? हिंदुस्तान के अंदर हजारों लाखों ऐसे ब्यवसायी हैं जिनकी क्षमता हजारों लोगों के लिए रोजगार मुहैय्या कराने की है। लेकिन उनकी तरफ सरकार का ध्यान नहीं जा रहा है।

Wednesday, October 19, 2022

खरगे या थरुर किसकी अर्जी हुई मंजूर

आज 22 सालों बाद कांग्रेस में अध्यक्ष पद चुनाव कराए जाने का निर्णय लिया गया। जिसका नतीजा आज आने वाला है। जिसमें मल्लिकार्जुन खड़गे और श्री शशि थरूर जी आमने-सामने हैं। आज शाम तक यह आ जाएगा कि कांग्रेस जैसे ऐतिहासिक पार्टी का अगला अध्यक्ष कौन होगा ? लेकिन निश्चित तौर पर मैं कह सकता हूं कि भारतीय लोकतंत्र के लिए यह एक अच्छी बात होगी। चाहे हम कांग्रेस के प्रशंसक हो या फिर भाजपा के। हम सबको अपने पार्टी में इस तरह के चुनाव को वरीयता देने का दबाव आलाकमान के ऊपर या सर्वोच्च नेताओं के ऊपर बनाना चाहिए। मुझ जैसे और न जाने कितने करोड़ों लोग जो राजनीति में दिलचस्पी रखते हैं और युवा भी हैं। उन्हें राजनैतिक पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र को स्थापित होते हुए देखना सुखद अनुभव है। कांग्रेस पार्टी ने अध्यक्ष पद का चुनाव का जो साहसिक कदम उठाया है। वह काबिलेतारिफ है। काफी सालों से हम लोगों ने देखा है कि विभिन्न राजनीतिक पार्टियों में मनोनय के आधार पर अध्यक्ष का चुनाव होता आ रहा था। जिसे कांग्रेस ने आज खत्म किया है। पिछले दो दशकों में कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में श्रीमती सोनिया जी उनके बाद श्री राहुल गांधी जी अध्यक्ष के रूप में कांग्रेस की सेवा की। 2019 लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। फिर एक बार दोबारा सोनिया जी अंतिम अध्यक्ष बने। उसके बाद बदले हालात को ध्यान में रखते हुए अध्यक्ष चुनाव की चर्चा शुरू हुई। जिसमें अशोक गहलोत के नाम से चर्चा शुरू होकर अन्ततः मलिकार्जुन खरगे और शशि थरूर पर नामांकन के वक्त जाकर खत्म हुई।
इस दरम्यान राजनीतिक चर्चाओं में हम देखते थे कि भाजपा/संघ और उनके समर्थक संगठनों के लोग कांग्रेस के ऊपर परिवारवाद का आरोप जोरदार ढंग से लगाते थे और कांग्रेस पार्टी को एक परिवार की पार्टी बताते थे। अब शायद उन्हें यह कहने से पहले अपने गिरेबान में झांकना पड़ेगा। जहां की खुद इसी महीने जेपी नड्डा जी को 3 साल के लिए अध्यक्ष पद का कार्यकाल और बढ़ा दिया गया। जिसमें ना चयन हुआ ना चुनाव हुआ। अब देखना सुखद है लग रहा है कि टी वी चैनलों एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में तरह-तरह  की चर्चाएं आयोजित की जा रही हैं। जहां कोई कह रहा है कि नया कांग्रेस अध्यक्ष गांधी नेहरू परिवार के नीचे काम करेंगे। उनके कहने पर काम करेंगे। उन्हीं के सुनेंगे। रिमोट कंट्रोल से चलेंगे। खैर जो भी हो यह लोकतंत्र के लिए कांग्रेस के लिए कांग्रेेस के कार्यकर्ताओं के लिए अच्छा है। हम लोग लगभग दो दशक से एक ही तरह की राजनीति देख रहे हैं। जिसमें एक तरफ हिंदू आस्था तो दूसरी तरफ सेकुलरिज्म की बात होती थी। राजनीतिक विमर्श से सेक्यूलरिज्म शब्द जैसे नदारद से हो चुकाए है। हाल के दिनों में भी देखा जाए तो कांग्रेस ने सेकुलरिज्म की लड़ाई लड़ी है। जिसमें कुछ क्षेत्रीय पार्टियां जैसे सपा, राजद, डीएमके ने भी सेक्यूलरिज्म की बात की और उस पर आगे बढ़ने की कोशिश भी की।
थरूर और खड़गे जी में से जो भी व्यक्ति अध्यक्ष पद का चुनाव जीतकर कांग्रेस जैसी ऐतिहासिक पार्टी के मुखिया का पद संभालेगा। उसके सामने विराट चुनौतियां भी होंगी और अपार संभावनाएं भी होंगी। जिसमें जनता और कार्यकर्ताओं का मनोबल उठाने के लिए कार्य करने भी होंगे। उन्हें जिम्मेदारी भी लेनी होगी। जवाबदेही भी तय करनी होगी। एक तरफ राहुल गांधी जी भारत जोड़ो यात्रा पर निकल चुके हैं। राहुल गांधी की यात्रा 40 दिनों से निरंतर चल रही है। जो 150 दिनों तक चलती रहेगी उसमें राहुल गांधी जी को काफी प्यार और स्नेह मिल रहा है उसे प्यार और स्नेह को समेटने की जिम्मेदारी आने वाले अध्यक्ष क्यों होने वाली है और एक लंबे अंतराल के बाद हम देखेंगे कि कांग्रेस का अध्यक्ष कोई गांधी परिवार से बाहर का बन रहा है।

Sunday, October 2, 2022

मैसूर में भीषण बारिश के बीच राहुल का भाषण

राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा तमिलनाडु, केरल से होते हुए अब कर्नाटक में पहुंच गई है। पिछले दोनों प्रदेशों में इस यात्रा को भरपूर जनसमर्थन मिला। स्वयंसेवी संस्थाओं से लेकर राजनीतिक दलों ने बहुतायत संख्या में यात्रियों के साथ-साथ कदम से कदम मिलाकर चले। यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने विभिन्न वर्गों से वार्तालाप भी स्थापित किया। यह यात्रा कई मायनों में हिन्दुस्तान के लिए अहम होने वाली है।
अब तक देश में अधिकांश लोग राहुल गांधी को गंभीर नेता नहीं मानते थे। मीडिया और सरकार द्वारा राहुल गांधी की छवि को लगातार नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा था। जब भारत जोड़ो यात्रा का विचार देश के सामने आया। जब भी दक्षिण पंथी विचार के लोगों ने इसका मजाक बनाया और कांग्रेस तथा राहुल गांधी के संदर्भ में भ्रामक जानकारियां परोसी गई।
इस नफरत भरे माहौल में एक ऐसा नेता भी है। जिसका नाम राहुल गांधी है। राहुल गांधी भारत यात्रा के दौरान एक नए मानदंड स्थापित किए जा रहे हैं। उसके दूरगामी परिणाम भारतीय राजनीति में देखने को मिलेंगे। हमने और खासकर युवा और बुजुर्गों ने अब तक देखा है कि देश में एक विशेष तबके के खिलाफ नफरत तेजी से बढ़ती जा रही है। ऐसे माहौल में राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा निकालकर वाकई हिंदुस्तान को जोड़ने का एक पुनित कार्य कर रहे हैं। आज मैसूर में हमने देखा कि भीषण बारिश के बीच में राहुल गांधी भीगते हुए बारिश की बूंदों के थपेड़ों को सहते हुए भाषण दे रहे थे और उनको सुनने के लिए भारी मात्रा में वहां जनता भी एकत्रित थी। ऐसी दुर्लभ तस्वीर भारतीय राजनीति के इतिहास में बहुत कम देखने को मिले हैं। मैं भी देख देख रहा हूं कि राजनीति में कटूता है बढ़ती जा रही है। जनता के हित की कोई बात नहीं करता बस अपनी राजनीतिक रोटी सेकने के लिए लोग एक-दूसरे पर निशाना साधते हैं। मैसूर में रात को भीगते हुए भाषण देते हुए राहुल को पूरे देश ने देखा और सोशल मीडिया पर वह वीडियो बहुत तेजी से वायरल हो रहा है। कुछ ऐसा ही वीडियो 2019 में महाराष्ट्र में देखने को मिला था। जहां 75 साल से ऊपर की उम्र पार कर चुके श्री शरद पवार जी सतारा में एक भाषण दे रहे थे और वह भी बारिश के बीचो बीच उनको सुनने के लिए वहां जनता भी भारी मात्रा में एकत्रित थे और ऐसा राजनीतिक पंडितों का मानना है कि शरद पवार के भाषण ने भारतीय जनता पार्टी को महाराष्ट्र में स्पष्ट बहुमत पाने से रोक दिया था।
राहुल गांधी जैसा कि अपनी भारत जोड़ यात्रा में हर धर्म , संप्रदाय, वर्ग, समुदाय के लोगों से सीधा संवाद कर रहे हैं तथा उनके प्रतीक स्थलों पर भी जा रहे हैं। संबंधित वर्गों के नुमाइंदों से, विद्यार्थियों से और सिविल सोसाइटी के लोगों से मिलजुल रहे हैं। यह देश के लिए सुखद संयोग है।


राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा पूरे भारत को एक सूत्र में बांधने का कार्य करेगी ऐसा मेरा और मुझ जैसे करोड़ों लोगों का विश्वास है। हमने देखा है हाल के दिनों में क्या बुजुर्ग क्या युवा सभी लोग एक विशेष पार्टी और एक विशेष नेता के बड़े समर्थक रहे हैं। उन्होंने धर्म-सम्प्रदाय, जाति की बेड़ियों को तोड़कर भाजपा और मोदी जी को जिताने का कार्य किया‌। कुछ समय बाद देश के अंदर बदलाव भी दिखने लगा जो उनके मूल विचार थे। धर्म के नाम पर देश में ध्रुवीकरण किया जाने लगा। अब हमें अगली बार राज्यों के चुनाव एवं देश का चुनाव करते समय बारिश की बूंदों में भीगते हुए राहुल गांधी की और उनके कमिटमेंट की भी कदर करनी होगी और उनके विचारों के साथ हमें जोड़ना होगा। फिर हम मूल्यांकन कर सकते हैं कि हम किस विचार को वोट दें ?राहुल गांधी इस यात्रा के समापन के बाद एक नए अवतार में दिखाई देंगे। यह बात में कोई हवा हवाई नहीं कर रहा हूं।इसके पीछे तर्क यह है कि 150 दिन की यात्रा कश्मीर से कन्याकुमारी तक बिना किसी रूकावट के जब पूरी होगी तो देश के लोगों का राहुल गांधी और कांग्रेस में विश्वास बढ़ेगा यह हमारे देश के लिए हमारे लोकतंत्र के लिए बहुत अच्छा होगा।

Friday, September 30, 2022

खरगे का कांग्रेस अध्यक्ष बनना तय

कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव की सरगर्मियों के बीच चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों की अन्तिम लिस्ट आज सामने आ गई।‌‌ आज अप्रत्याशित रूप से कर्नाटक के अनुभवी नेता और राज्यसभा सांसद, राज्यसभा में कांग्रेस के विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे का नाम निकल कर बाहर आया और उन्होंने मधुसूदन मिस्त्री के समक्ष अपना नामांकन दाखिल किया। खरगे के नामांकन के वक्त  अध्यक्ष पद के दो चर्चित नामों अशोक गहलोत, दिग्विजय सिंह जी के साथ G-23 गुट में शामिल आनंद शर्मा, मुकुल वासनिक, हुड्डा, मनीष तिवारी समेत प्रमोद तिवारी, शुक्ला, पुनिया जैसे दर्जनों लोग खरगे के प्रस्तावक बने।
निश्चित रूप से खरगे जी कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए एक अच्छे उम्मीदवार हैं। इसके साथ-साथ आजकल जो पहचान की राजनीति का फ़ैशन चल चुका है। उसमें भी वो फिट बेड रहे हैं। इतिहास में सबसे सताई हुई दलित जाति से संबंध रखने वाले खरगे कर्नाटक के गुलबर्गा जिले से आते हैं। यदि खरगे जी कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव जीतने में सफल हो जाते हैं तो बाबू जगजीवन राम के बाद दूसरे दलित अध्यक्ष होंगे। मल्लिकार्जुन खरगे साहब के बारे में एक बात कही जाती है कि वो पार्टी आलाकमान के हर आदेशों को बिना किसी शिकायत के स्वीकार करते हैं। उसी का नतीजा है कि आज कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बहुत नजदीक हैं।

Tuesday, September 27, 2022

क्या अब गहलोत बन पायेंगे कांग्रेस अध्यक्ष

भारत जोड़ो यात्रा के बीच राजस्थान से कांग्रेस के लिए बहुत हीं चिंताजनक तस्वीरें सामने आए रही है. कांग्रेस आलाकमान एक तरफ गहलोत को राजस्थान का मुखिया बनाने का मन बना चुका है. तो दूसरी तरफ गहलोत गुट सचिन को किसी भी कीमत पर मुख्यमंत्री बनने से रोकने पर आमादा है. इन सब के बीच राजनितिक हलकों में एक बात बहुत तेजी से तैर रही है कि क्या अब गहलोत कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन पाएंगे ? राजस्थान में हुईं विधायकों के जमघट के पीछे आलाकमान गहलोत को जिम्मेदार मान रही है. कांग्रेस के लिए सोचने की बात ये है कि जिस गांधी परिवार पर गहलोत अटूट आस्था रखते थे. तो दो दिन में ऐसा क्या हुआ कि गहलोत ने पायलट को रोकने के लिए अपनी पूरी बेदाग़ जिंदगी को हीं दांव पर लगा दिया। कांग्रेस के इस बुरे दौर में भी गांधी परिवार के ऊपर G-23 के सस्दस्यों एवं विरोधियों ने हमला किया. तब-तब अपने आलाकमान की तरफ से मुखर होकर मोर्चा संभाला और करारा जबाब दिया.
कांग्रेस के अंदर गहलोत हीं एक ऐसे नेता थे. जिन पर गांधी परिवार अटूट विश्वास रखता था. उन्होंने हीं राजस्थान में आलाकमान को झकझोर कर रख दिया. इससे संशय होने लगा है कि अब गहलोत के ऊपर से आलाकमान का भरोसा उठ चुका है. आलाकमान के लिए इस समय दोहरी मुसीबत है. एक तरफ राजस्थान है और दूसरी तरफ गहलोत और पायलट की जगजाहिर अदावत. जिस तरह से गहलोत के समर्थन में 90 से ज्यादा विधायक एकजुट हुए और गहलोत के समर्थन का खुला ऐलान एवं पायलट की मुखालफत की. गहलोत समर्थक विधायक जुलाई 2020 में पायलट की बगावत को माफ़ करने के मूड में नहीं दिख रहे हैं. उस समय पूरे देश ने देखा था कि कैसे सचिन पायलट अपने समर्थक विधायकों के साथ 35 दिन तक मनेसर के होटल में बंद थे. उस समय पायलट ने कांग्रेस की गहलोत सरकार को बहुमत साबित करने की चुनौती दी थी. इस घटना को सरकार बचाने वाले विधायक भूल नहीं पा रहें हैं और भूलना भी नहीं चाहिए. उससे दिल्ली से भेजे गए दोनों पर्यवेक्षकों अजय माकन और मल्लिकार्जुन खड़गे को नाराज कर दिया. क्योंकि खरगे और माकन जी सोनिया जी के दूत बनकर आये थे. ऐसे में गहलोत की निष्ठा अब सशंकित हो गयी है. आलाकमान अब अपनी साख बचाने के लिए चाहे जितनी भी कठोर कार्रवाई कर ले. लेकिन इस प्रकरण से हुए नुकसान की भरपाई  बड़ी कीमत राजस्थान कांग्रेस को चुकानी पड़ेगी.

Sunday, September 25, 2022

पायलट की उड़ान पर गहलोत का जादू भारी

अशोक गहलोत के कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद राजस्थान का मुख्यमंत्री कौन ? यह सवाल राजस्थान समेत देश के राजनीतिक फिजाओं में तैर रहा है। एक तरफ पायलट के समर्थक विधायक पुरजोर तरीके से पायलट के समर्थन में आवाज बुलंद कर रहे हैं। तो दूसरी तरफ गहलोत गुट ने भी अपने ढ़ीले कल-पूर्जों को कस कर पायलट को रोकने की कोशिश कर रहा है। अब वक्त बताएगा कि राजस्थान में कांग्रेस के मुख्यमंत्री का सेहरा किसके सिर पर बंधेगा ? क्या पायलट उड़ान भर पायेंगे ? या उन्हें जादूगर अपने कौशल से पटखनी दे देंगे। यह देखना काफी दिलचस्प होगा।
आपको याद होगा कि पिछले साल सचिन पायलट अपने १८ समर्थक विधायकों के साथ गहलोत सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया था और महीने भर से ज्यादा दिन तक गहलोत खेमा और पायलट खेमा अपने-२ समर्थक विधायकों के साथ बाड़ेबंदी में रहे थे। अब वही वाकया पायलट के उड़ान भरने में रोड़ा बन रहा है। एक तरह से पायलट के बगावत के बाद राजस्थान की सत्ता कांग्रेस के हाथ से फिसल चुकी थी। लेकिन गहलोत ने अपनी जादूगरी से न सिर्फ वो राजनैतिक संकट टाला बल्कि अपनी सरकार बचाने में भी कामयाब रहे। आज जब पायलट के सिर पर ताजपोशी का एक अवसर बन रहा है। उसमें उनका पुराना कृत्य उनकी ताजपोशी में आड़े आ रहा है। 
मीडिया के माध्यम से खबरें आ रही हैं कि पायलट के नाम पर कांग्रेस के ज्यादातर तो विधायक सहमत नहीं हैं। वे विधायक पायलट और उनके द्वारा किए गए पाप पार्टी को याद दिला रहे हैं। जो मौजूं भी है। जब पूरे देश में बीजेपी/संघ जनता द्वारा चुनी हुई सरकारों को अस्थिर कर रही थी। उस दौर में पायलट ने कांग्रेस के इतिहास में सबसे बड़ा पाप किया। कहा तो यहां तक जाता है कि पायलट भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने के लिए तैयार थे। लेकिन जादूगर के कौशल के आगे पायलट समर्थकों को घुटने पड़े। क्योंकि भाजपा से गठबंधन करने लायक विधायक पायलट नहीं तोड़ पाए। आज जब भी कांग्रेस आलाकमान पायलट की ताजपोशी के बारे में सोचेगा तो उसे एक साल पहले हुए विश्वासघात को भी याद करना होगा।
अभी की मीडिया हेडलाइन्स चल रही है कि राजस्थान कांग्रेस में सचिन पायलट के नाम पर बहुत बड़ी बगावत हो गई है और ९० से ज्यादा विधायक लामबंद होकर विधानसभा अध्यक्ष डा. सी पी जोशी को अनिश्चित काल के लिए अपना इस्तीफा सौंप दिया हैं । यह कांग्रेस नेतृत्व के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। एक तरह से अशोक गहलोत ने सीधे - २ गांधी परिवार को चुनौती देते हुए एक संदेश भेजा है। शायद अब गहलोत जी की उतनी इज्जत आलाकमान की नजरों में ना हो जितनी अब से पहले तक थी। हर किसी राजनीतिक ब्यक्ति को यह पता था कि अशोक गहलोत सचिन पायलट को रोकने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। क्योंकि गहलोत ने पायलट के विद्रोह के बाद बड़ी मुश्किल से अपनी सरकार बचाई थी। उस सरकार को अब वे विद्रोही गुट के हाथों में जाते देखना नहीं चाह रहे। गहलोत वैचारिक रूप से खांटी कांग्रेसी रहे हैं। उनके इस राजनीतिक जीवन को और मौजूदा विवशताओ  को भी कांग्रेस आलाकमान नजर अंदाज नहीं कर सकता।

Thursday, September 22, 2022

कांग्रेस का अगला अध्यक्ष कौन

भारत जोड़ो यात्रा की सुर्खियों की बीच कांग्रेस की एक खबर और भी सुर्खियों में है। वो है कि कांग्रेस का अगला राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन बनेगा? शुरूआती दौर में दो नाम मीडिया और सूत्रों के बीच तैर रहे हैं। जिनमें एक नाम है तिरूवनंतपुरम से मौजूदा सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री शशि थरूर जी एवं दूसरा नाम राजस्थान के मौजूदा मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत जी का। अब देखना दिलचस्प होगा कि अन्तिम परिणाम किसके हक में जाता ? नौ हजार वोटर मिलकर कांग्रेस के नये अध्यक्ष का चयन करेंगे। कांग्रेस अध्यक्ष के साथ - साथ कांग्रेस शासित एक राज्य के मुख्यमंत्री के नाम पर भी खूब अटकलें लगाई जा रही हैं। 
शशि थरूर एवं गहलोत जी के बीच अगर तुलना की जाए तो एक बात स्पष्ट तौर पर साफ होती है कि थरूर जी प्रशासनिक सेवा के एक कुशल अधिकारी रहें हैं और अंग्रेजी के अच्छे वक्ता हैं। थरूर जी मनमोहन सरकार में केन्द्रीय मंत्रिमंडल का हिस्सा भी रह चुके हैं और लगातार तीन बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए हैं। थरूर जी के पास अंग्रेजी का ऐसा शब्द अपने भण्डार है। जो हिन्दुस्तान में बहुत कम लोगों के पास है। कई बार उनके द्वारा बोले/लिखे गए अंग्रेजी शब्द का अर्थ जानने के लिए डिक्शनरी की सहायता लेनी पड़ती है। शशि थरूर जी विवादित G-23 के सदस्य रहें हैं। जिनके ज़्यादातर साथी या तो शान्त होकर बैठ गये या कांग्रेस से बाहर चले गए। जिनमें कपिल सिब्बल और आजाद दो प्रमुख नाम शामिल हैं। थरूर के प्रति जागरूक कांग्रेसियों का रूझान कम रहेगा। उसके दो कारण हैं। पहला कारण ये कि थरूर गैर हिंदी भाषी क्षेत्र से हैं और दूसरा अन्त तक विद्रोही गुट के सदस्य बने रहे 
वहीं अगर अशोक गहलोत जी की बात की जाए तो वो एक खांटी कांग्रेसी हैं। जिनका राजनैतिक पालन-पोषण कांग्रेस में हुआ है। जिलाअध्यक्ष से लेकर एन एस यू आइ, प्रदेश अध्यक्ष, तीन बार सांसद, तीन बार केन्द्रीय मंत्री, संगठन महामंत्री, राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री के पदों को सुशोभित कर चुके हैं या कर रहे हैं। गहलोत को राजनीति का जादूगर कहा जाता है। और ये हकीकत भी है कि गहलोत जी अपने पिता जी के साथ जादू दिखाने का काम करते थे। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के बचपन के दिनों में दिल्ली स्थित घर में गहलोत जी जादू का खेल दिखाते थे और राहुल, प्रियंका प्यार से गहलोत जी को जादूगर अंकल नाम से बुलाते थे। गहलोत जी गांधी/नेहरू परिवार के तीन पीढ़ियों से बहुत विश्वासपात्र रहें हैं। गहलोत इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के साथ काम किए और उनका विश्वासपात्र बने रहे। गहलोत हीं वो जादूगर थे जो पिछले साल सचिन पायलट के बगावत के बाद भी अपनी सरकार बचा ले गए थे और बीजेपी के मंसूबों को नाकामयाब कर दिया था। अशोक गहलोत ने बिकट से बिकट परिस्थिति में भी गांधी परिवार का साथ नहीं छोड़ा। एक तरफ जहां सिब्बल, आजाद, आर पी एन सिंह, जितिन प्रसाद, सिंधिया जैसे लोग सत्ता के के आगे घुटने टेक दिए वहीं गहलोत कमान की तरह गांधी परिवार का कंवच बने रहे।
राहुल गांधी के अध्यक्ष पद की अनिच्छा को देखते हुए यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि थरूर और गहलोत में अध्यक्ष तो बाजीगर हीं बनेगा। उसका मुख्य कारण यह है कि गहलोत कांग्रेस और गांधी परिवार के परम विश्वासी नेता हैं। उनकी छवि भी बेदाग है, हिंदी भाषी श्रेत्र से आते हैं एवं पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। जो भी अध्यक्ष निर्वाचित हो। अब एक बात तो तय है कि 1998 के बाद कांग्रेस को गांधी परिवार से बाहर एक नया अध्यक्ष मिलने वाला है। 

Friday, September 16, 2022

भारत जोड़ो यात्रा नौवां दिन

भारत जोड़ो यात्रा आज अपने नौवें दिन में प्रवेश कर चुकी है। जो कि लेफ्ट के गढ़ केरल के विभिन्न क्षेत्रों में चल रही है। केरल को मैं लेफ्ट का गढ़ इसलिए भी कह रहा हूं कि वर्तमान में केवल केरल हीं एक ऐसा राज्य है जहां लेफ्ट पार्टियां सत्ता में हैं और पिछले विधानसभा चुनाव में लेफ्ट ने लगातार दूसरी बार कांग्रेस नीत गठबंधन को हराकर जनता का विश्वास प्राप्त किया था।‌‌ कांग्रेस को केरल में अभूतपूर्व सफलता मिल रही है। राहुल के साथ पदयात्रा में अपार जनसमर्थन चल रहा है। इस यात्रा ने देश को एक नया रास्ता दिखाने का कार्य आने वाले समय में करेगा। धनबल और चुनाव मैनेजमेंट के दौर में भी लोगों से सीधा संवाद आज भी सफलता की कूंजी है। यह आने वाले वर्षों में लोगों को बताया जाएगा कि कैसे कांग्रेस और राहुल गांधी ने 2022 में जनसंपर्क हेतू पैदल भारत भ्रमण पर निकले थे।
एक तरफ राहुल गांधी और उनके राजनैतिक गुरु दिग्विजय सिंह जी एवं विश्वासपात्र नेता जयराम रमेश जी पदयात्रा की रणनिति बना रहे थे और उसे अंजाम दे रहे थे। तो वहीं दूसरी तरफ संघ/बीजेपी अपना चिरपरिचित काम विधायकों को तोड़ने/खरीदने में मस्त दिखे। यात्रा आगे हीं बढ़ रही थी कि अचानक खबर आई कि गोवा कांग्रेस के ग्यारह में से आठ विधायक भाजपा में शामिल होकर भ्रष्टाचार मुक्त हो गये। खैर कांग्रेस को इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला। क्योंकि न अब राष्ट्रपति/ उप-राष्ट्पति का चुनाव है और न हीं इतने संख्या बल के आधार पर कांग्रेस सरकार बना या बिगाड़ सकती थी। 
भारत जोड़ो यात्रा में टीवी के माध्यम से पता चल रहा है कि पदयात्रा को ऐसे लोग भी अपना समर्थन दे रहे हैं जो आज तक कभी भी कांग्रेस का समर्थन नहीं किया था। ऐसे सिविल सोसाइटी वालों को भी अब लगने लगा है कि वाकई देश का लोकतंत्र बहुत बड़ी मुश्किल में है। आप देखेंगे तो पाएंगे कि इस पदयात्रा में लोग भावनाओं से सराबोर होकर जुड़ रहे हैं और दूसरों लोगों को भी जुड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

Sunday, September 11, 2022

भारत जोड़ो यात्रा पांचवा दिन

राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का आज पांचवा दिन है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि कल चौथे दिन हीं तमिलनाडु से निकलकर यह यात्रा केरल पहुंच गई थी। आज सुबह से यात्रा प्रारम्भ हुआ और तिरूवनंतपुरम की सड़कों पर अपना असर छोड़ रही थी। यहां आपको ये बताना बहुत जरूरी हो गया है कि तिरूवनंतपुरम शशि थरूर जी का संसदीय क्षेत्र है। कुछ दिन पहले तक एक खबर राजनितिक गलियारों में चलती थी कि थरूर जी G-23 गुट के सक्रिय सदस्य हैं। आपकी याद्दाश्त के लिए बता दूं कि ये वही ग्रूप था जिसके मुखिया गुलाम नबी आजाद साहब हुआ करते थे। आज वही थरूर कांग्रेस और राहुल के साथ तिरूवनंतपुरम की सड़कों पर थे।
आज तिरूवनंतपुरम में यात्रा के दौरान राहुल गांधी छात्रों और बुनकरों से मुलाकात कर उनकी बुनियादी समस्याओं को सुना। यह देखकर कितना अच्छा लगता है कि देश में कोई तो ऐसा नेता है जिसे देश की फ़िक्र है। देश के भविष्य की फ़िक्र है। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कांग्रेस भावी पीढ़ी को हिन्दुस्तान की शानदार एवं गौरवशाली इतिहास को बता रही है और वर्तमान में हो रहे क्षरण को भी रेखांकित कर रही है। इस यात्रा और इसमें मिल रहे अपार जनसमर्थन को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हमारा लोकतंत्र अनाथ नहीं है। देश में कुछ जिम्मेदार कंधे हैं जो देश की आकांक्षाओं, आशाओं का बोझ अपने मजबूत कंधों पर उठा सकते हैं और उसके भार को सहन भी कर सकते हैं।
यहां एक बात ध्यान देने योग्य और है कि वो केरल हीं था जो 2019 के चुनाव में कांग्रेस को सबसे ज्यादा (एक प्रदेश से) लोकसभा की सीटों से चुनाव जीताकर संसद में भेजा था। स्वयं राहुल गांधी जी भी केरल प्रदेश से हीं लोकसभा सांसद चुने गए है। तो यहां कांग्रेस के समर्थन में जनसमर्थन स्वाभाविक है। कांग्रेस के संगठन महासचिव श्री के सी वेणुगोपाल जी केरल के स्थाई निवासी हैं। इन सभी समीकरणों को देखते हुए कांग्रेस के मुखर आलोचक भी ये कहने लगे हैं कि राहुल गांधी जी के भारत जोड़ो यात्रा को भरपूर समर्थन मिल रहा है और यह यात्रा निश्चित तौर पर आगामी चुनावों में कांग्रेस के लिए सुखद परिणाम लाएगा।

Saturday, September 10, 2022

भारत जोड़ो यात्रा चौथा दिन

आज भारत जोड़ो यात्रा का चौथा दिन है। अन्य दिनों की भांति आजकी दिनचर्या रही है। आज चौथे दिन के यात्रा की मुख्य बात ये रही कि तमिलनाडु से निकल कर केरल पहुंच चुकी है। केरल वही जगह हैं जहां से राहुल गांधी वर्तमान में सांसद हैं। आज भी राहुल गांधी बेरोजगार युवाओं के एक समूह से मुलाकात की और उन्हें अपने साथ जोड़कर यात्रा में शामिल कर लिया। साथ - साथ चलते हुए राहुल ने उन युवा बेरोजगारों की परेशानियों को सुना और समझा तथा साथ हीं निवारण का तरिका भी बताया। राहुल गांधी आज केरल के विभिन्न दलित संगठनों के साथ भी चर्चा किए और उनकी चिंताओं को करीब से देखा, समझा। 
आज जैसे - जैसे यात्रा आगे बढ़ी तो उम्मीद के मुताबिक भाजपा की तरफ से राहुल पर राजनैतिक हमले भी होने लगे। उसका मुख्य आधार यह था कि केरल के किसी पोप ने राहुल गांधी से कहा कि ईशु हीं ईश्वर हैं बाकी और कोई शक्ति नहीं है‌। वह पादरी एक बार अपने विवादास्पद बयानों के कारण एक बार जेल भी जा चुका है। इस विडियो में राहुल गांधी पादरी से सवाल-जबाब कर रहे हैं। उस पूरे विडियो को न डालकर अपनी सुविधानुसार भाजपा ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर अपलोड किया। फिर हुआ ये कि भाजपा के सभी खाली मंतरी-संतरी अपने पसंदीदा मुद्दा ट्रोलिंग पर लग गये। देखो-देखो भाई राहुल गांधी हिन्दूओं का अपमान कर रहा है, भारत को जोड़ने का नाटक करके भारत तोड़ने वालों के साथ खड़ा है। यही है राहुल गांधी और कांग्रेस की हकीकत वगैरह-वगैरह।
अब इन संघीयों को कौन बताए कि भारत कैसे जोड़ा जा सकता है ? अरे भाई जो हमसे सहमत है वो तो हमारे है हीं। अब जो सहमत नहीं है, उसे हीं तो जोड़ना है। और रही बात धर्म की तो हम जिस भी धर्म के लोगों से संवाद करेंगे। वो अपने हीं धर्म का महिमा मंडन करेंगे न कि दूसरे धर्म का। अगर हमारे किसी धर्मगुरु से कोई कैथोलिक मिलता है तो हमारे गुरु हमारे धर्म को हीं महान बताएंगे। तो बीजेपी को अब ये समझ लेना चाहिए कि धर्म पर राजनीति करने वाले दिन अब लद चुके हैं। आज युवा शिक्षा और रोजगार मांग रहा है, गरीब दो वक्त की रोटी मांग रहा है, किसान अपने उपज का सही मूल्य मांग रहा है, बहन-बेटियां विधायकों से अपने इज्जत की सुरक्षा मांग रही हैं, गृहणियां सस्ता गैस सिलेंडर और सस्ती रसोई का सामन मांग रही है। अब भाजपा औने-पौने जबाब देकर नहीं बच सकती है। जनता जाग चुकी है।

आज की यात्रा का समापन कुछ इस तरह हुआ। मौका मिलते हीं आगे का यात्रा वृत्तांत लिखूंगा।

Friday, September 9, 2022

भारत जोड़ो यात्रा तीसरा दिन

कन्याकुमारी से शुरू हुई कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा आज तमिलनाडु के शहरों में घूम रही है। भारत जोड़ो यात्री और वहां के स्थानीय लोगों का विश्वास कांग्रेस को मिल रहा है। इसकी तस्दीक यात्रा के साथ चलने वाले पत्रकार, यू-ट्यूब ब्लागर, स्वाधीन पत्रकार, स्थानीय चैनल एवं समाचार इस बात की पुष्टि कर रहे हैं। यह यात्रा अभी तीन दिनों तक अपने तय लक्ष्य के अनूरूप चल रही है। इस यात्रा के जो विजुअल आ रहे हैं। वह हमारे लोकतंत्र एवं कांग्रेस के लिए काफी सकारात्मक होने वाले हैं।
इन तीन दिनों की यात्रा में स्थानीय लोग जोश और उत्साह के साथ जुड़ रहे हैं तथा यात्री बनकर साथ भी दे रहे हैं। राहुल गांधी जी के साथ चलने वाले सभी यात्री एक साथ विश्राम करते हैं, एक साथ खाना खाते हैं और रात्रि विश्राम भी टिन के बने कंटेनर में करते हैं। मेरा निश्चित विश्वास है कि राहुल के साथ परमानेंट चलने वाले यात्री आने वाले वर्षों में बहुत बड़े नेता के रूप में स्थापित होने वाले हैं। क्योंकि जो लोग विविधताओं से भरे समाज को देख रहे हैं। उनसे मिल रहे हैं तो उन लोगों से वे यात्री कुछ न कुछ अच्छी बात जरूर सिखेंगे।
आज यात्रा के दौरान हीं दोपहर में विश्राम के वक्त राहुल गांधी ने पत्रकार वार्ता भी की। जिसमें देश और पत्रकारों के मन में यात्रा को लेकर उठ रहे सवालों का बहादुरी के साथ अपने चिरपरिचित अंदाज में जवाब भी दिया और यात्रा की महत्व पर प्रकाश डाला। इसी बीच भाजपा ने राहुल के टी-शर्ट को लेकर (अनुमानित कीमत 41000) सोशल मीडिया पर सवाल खड़े किए। जिसका जबाब कांग्रेस ने भी मोदी जी के सूट, घड़ी और चश्मे के साथ दिया‌। कांग्रेस ने मोदी जी के साथ शाह जी एवं वशुंधरा राजे को भी नहीं बख्शा। अब अनुमान लगाना सहज हो गया है कि जैसे -२ राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा बढ़ती जाएगी वैसे -२ हीं बीजेपी घबराहट में राहुल गांधी पर हमलावर होती जाएगी। यही नियति भाजपा को नुक़सान पहुंचाने का काम करेगी। जब पांच महीने बाद भारत जोड़ो यात्रा कश्मीर में खत्म होगी तब तक राहुल गांधी देश के बड़े नेता के रूप में स्थापित हो चुके होंगे।

इस यात्रा के दौरान घट रही महत्वपूर्ण घटनाओं पर मैं अपने विवेक के अनुसार कुछ न कुछ लिखने की कोशिश अवश्य करूंगा। 

Tuesday, September 6, 2022

भारत जोड़ो यात्रा

कल यानि ७ सितम्बर से कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी जी एवं स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से "भारत जोड़ो यात्रा" पर निकल रहें हैं। जो कल कन्याकुमारी से शुरू होगी और कश्मीर में जाकर पूर्ण होगी। यह यात्रा लगभग ३५०० किलोमीटर से लंबी होगी एवं देश के १२ राज्यों तथा ४ केन्द्र शासित प्रदेशों से होकर गुजरेगी। एक अनुमानित लक्ष्य के मुताबिक इस यात्रा को परिपूर्ण होने में लगभग छः महीने का वक्त लग सकता है। इस यात्रा की सबसे विशेष बात यह है कि भारत जोड़ो यात्री पैदल चलेंगे। इस यात्रा की अगुवाई पूर्ण रूप से राहुल गांधी करेंगे और ध्वज के रूप में राष्ट्रध्वज का उपयोग पूरी यात्रा के दौरान किया जाएगा।
कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा महत्वपूर्ण क्यों है? उसके बारे में मेरे जैसा साधारण जानकार और संविधान में यकीन करने वाला ब्यक्ति आसानी से समझ सकता है। आज के वक्त में तानाशाही चरम पर है। राजनैतिक पतन का चलन अपने चरम पर पहुंच चुका है, विपक्ष एकदम नेपथ्य में जा चुका है, जहां कहीं विपक्ष है तो वहां भी केन्द्र की सत्ता पक्ष द्वारा देश के सभी संस्थाओं, मीडिया, केन्द्रीय संस्थाओं का दुरूपयोग करके या तो सत्ता के साथ जोड़ लिया जा रहा है या उनपर अनेक आपराधिक केस लगाकर कर झूकने पर मजबूर कर दिया जा रहा है। उदाहरण स्वरुप उत्तराखंड, मेघालय, गोवा, अरूणांचल प्रदेश और हाल हीं में २०१९-२० में कांग्रेस की चुनी हुई सरकार को गिराकर अपनी सरकार बनाना, मुंबई में शिवसेना को तोड़ना, अग्निवीर नामक योजना लाकर युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करना, महंगाई का चरम पर पहुंच जाना, शिक्षा, स्वास्थ्य की बदहाली, सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देना, सड़क, बिजली, पानी, धार्मिक सौहार्द को बहाल करना और गरीबों की दयनीय स्थिति भारत जोड़ो यात्रा का मूल अंश है।
राहुल गांधी जी जब कल कन्याकुमारी से यात्रा की शुरुआत करेंगे तो उनके साथ कांग्रेस के सभी बड़े नेता तो मौजूद होंगे हीं तथा तमिलनाडु के मुख्यमंत्री श्री एम के स्टालीन राहुल को तिरंगा देकर यात्रा शुरू करने का मार्ग प्रशस्त करेंगे। आज से हीं कन्याकुमारी राहुल और कांग्रेस के पोस्टर-बैनरों से पट चुका है। टीवी के माध्यम से यह दृश्य हम सूदूर बैठकर भी देख सकते हैं और उसकी अनुभूति कर सकते हैं।

Wednesday, August 3, 2022

तिरंगा रैली

आज सरकार ने और उसके सांसदों ने दिल्ली में संसद भवन से विजय चौक तक तिरंगा रैली का आयोजन किया। जिसे काफिले के साथ गाजे-बाजे और हूजूम के साथ समाप्त कर दिया गया। वैसे तिरंगा समस्त देशवासियों के लिए सम्मान की बात है और तिरंगे का हक हमें करोड़ों बलिदानों और सैकड़ों सालों की कुर्बानी कुर्बानी के बाद हासिल हुआ है‌। तिरंगे की इस तरह प्रदर्शनी लगाकर क्या आज सरकार देशवासियों को अपरोक्ष रूप से राष्ट्रभक्ति साबित करने के लिए कर रही है? उसके संबंध में मेरा सरकार से कुछ सवाल है -
१) संघ के प्रथम संविधान की धारा - ५ में तिरंगे को स्टेट का ध्वज एवं भगवा ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज माना है, ऐसा है तो प्रधानमंत्री जी के इस पर क्या विचार हैं?
२) बीजेपी की मातृ संगठन आर एस एस ने आजादी के ५२ सालों तक अपने नागपुर मुख्यालय पर तिरंगा क्यों नहीं लगाया ?
३) आर एस एस की शाखाओं में तिरंगे को सलामी क्यों नहीं दी जाती?
४) प्रधानमंत्री मोदी जी के आह्वान हर घर तिरंगा अभियान के तहत संघ ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर तिरंगा क्यों नही लगाया?
५) जो तिरंगा सर्व धर्म समभाव को प्रदर्शित करती है, उस विचार को नकारने वालों पर सरकार ने कौन सी कार्यवाही की ?
६) संविधान का अपमान करने वाले कर्नाटक के अपने नेता के ऊपर बीजेपी ने क्या कार्यवाही की ?
७) आतंकवाद के आरोपी बीजेपी की एक सांसद ने जब गांधी जी के बारे में अक्षम्य टिप्पणी की, तो उसके खिलाफ बीजेपी/ संघ ने क्या कार्यवाही की ?
आज तिरंगा यात्रा निकालने के पीछे संघ का छिपा ऐजेण्डा है। संघ/भाजपा के लोगों के ऊपर जो कलंक पिछले ९० सालों से लगता आया है। उस कलंक से पीछा छुड़ाने के लिए ये सब तरह-तरह के जतन कर रहे हैं और तिरंगा यात्रा निकाल रहे हैं और राष्ट्रीय प्रतीकों को प्रयोग करके अपने काले इतिहास से पीछा छुड़ाने की नाकामयाब कोशिश कर कर रहे हैं। अगर सच में तिरंगे से प्यार है तो संघ की शाखाओं में राष्ट्रगान अनिवार्य किया जाना चाहिए।

Friday, June 24, 2022

बुढ़ापे का इश्क पार्ट - 3

पार्ट - २ से आगे की कहानी -

कहानी धीरे - २ आगे बढ़ती है और इन दो दिलों में प्यार की तरंगों का प्रवाह तीव्र होता गया। जब उस महिला/पुरुष को उसके रिश्तेदारों ने समझाने की कोशिश की तो उनके ऊपर उनकी बातों का कोई असर नहीं हुआ। फिर भी चुपचाप सबके आंखों के सामने उनका फोन आता और बात होती। इसी दरम्यान उन दोनों का एक बार फिर सामना होना था। और वो दिन था मंगलवार। उपरोक्त पुरुष/महिला अपने घर से सुबह आठ बजे अपना कागज लेनें के लिए निकल गये थे। उसी दिन उनका पुरूष/महिला साथी अपने कार्यों से निवृत्त होकर दिल्ली जाने के लिए निकले। लेकिन वो दिल्ली नहीं गए। सबको चकमा देते हुए एक सच्चे आशिक की तरह वह रास्ते में एक-दूसरे से मिले और विश्रामगृह में जाकर एकांत में कुछ घंटे ब्यतीत किए। हालांकि विश्राम करने का कोई ठोस सूबूत तो नहीं है लेकिन उनका कूबूलनामा था विश्राम करने का।
बाकी कि सारी बातें उनके चेहरे और हाव-भाव को देखकर उनके कूबूलनामें पर मुहर लगा रही थी। उनका चेहरा थका सा प्रतीत हो रहा था, चेहरे की रंगत उड़ चुकी थी। जो समझने वालों के लिए काफी था। सब समझ चुके थे और जब आनंद बस उनसे और जानने की जिज्ञासा हुई तो वो फिर अपनी बात को थोड़ा घुमाने लगा/लगी। जब तक असलियत का पता और असर हो चुका था। आम तौर पर वो पुरुष/महिला काफी बन-ठन कर रहता/रहती थी। लेकिन उस दिन लौटने के बाद उनका चेहरा बहुत अलग दिखाई दे रहा था। 
उनसे बात करने वालों को बहुत आनंद भी आ रहा था और प्यार से छिंटाकशी भी कर रही थी। लेकिन उनका/उनकी प्यार और परवान चढ़ चुका था।‌‌ उन्हें अब किसी परवाह नहीं थी।‌‌‌ वो सबसे अलग होकर अपने प्यार की दुनिया में मशगूल रहना चाहती थी। जो प्यार करने वालों के लिए सही भी है। एक दिन और गुजरा तो अगले दिन दिल्ली भ्रमण की योजना बनाई गई और उसमें मोहरा बनाया गया एक 15 साल के बच्चे को। जिसे इन सब बातों की कोई खबर तक नहीं थी। वह बालक भी घूमने के नाम पर खुशी-खुशी तैयार हो गया। अन्ततः समय कम होने के कारण घूमने का प्लान रद्द करना पड़ा।


अगला और अंतिम भाग कल लिखूंगा।

Wednesday, June 22, 2022

बुढ़ापे का इश्क पार्ट -2

 पार्ट - 1 से आगे लिख रहा हूँ -

इंसान ये भूल जाता है कि वो जिस जगह जा रहा है. उस जगह भी उसे पहचानने वाला कोई हो सकता है. लेकिन अधेड़ उम्र के चक्कर में पड़कर वो सोचता है कि अब तो शादी भी हो चुकी है, बच्चे और पति भी हैं. लेकिन ये भूल जाता है/जाती है कि ये दुनिया है. यहां के लोग नजरों को देखकर हकीकत पहचान जाते हैं. वो भी तब जब आप अपने काम के लिए सुबह-सुबह किसी और के साथ निकलते हैं और घर से 60 किलोमीटर दूर आपका अधेड़ पुरूष/महिला मित्र पहुँच जाता है. उसके साथ 1 घंटे का सफर 5 घंटे में पूरा करते हैं.

ऐसे अधेड़ लोगों में मैंने मिलने की बहुत तड़प देखी है. दोनों अधेड़ उम्र के आशिक शुक्रवार को बहाने से 5 घंटों तक साथ रहते हैं और फिर शनिवार को इनके दिल में मिलने की इतनी तड़प होती है कि किसी रिश्तेदार के यहां (अपने घर वालों से दूर) बहाने बनाकर बुलाते हैं, फिर रविवार को पीवीआर मॉल में बहाने बनाकर बुलाते हैं और एक अपने रिश्तेदार और उसके छोटे से बच्चे के साथ जाते हैं. ये सब उनके कुछ जानकार लोगों के नजरों के सामने घटित होता है. जिन लोगों के सामने ये जाया करते थे/थी. उनमें से एक उनका जानने वाला भी उनके रिश्तेदारों के आस-पास रहता है. और जब वो पूछता है तो पूर्व की भांति आँखों में आँखें डालकर झूठ बोल देता/देती है कि मैं तो वहाँ गया/गयी हीं नहीं था/थी. आप झूठ बोल रहे हो. आप मुझ पर शक कर रहे हो. मुझे बदनाम कर रहे हो. आपने मुझे कहाँ देखा ? जब देखा तो मुझे बुलाया क्यों नहीं ? अब इन्हें कोई कैसे बताएं कि राह चलते किसी को कोई बुलाकर अपनी जान जोखिम में क्यों डाले ?  वहाँ पहचाने से इंकार कर देती/देते तो जनता उस बेचारे का क्या हश्र करती ? ये न तो आप को अंदाजा होता और न उस बेचारे को. ये शहर है कोई गांव नहीं, जहां आप किसी को रोककर न पहचानने पर भी थोड़े समय में अपना परिचय दे सकते हैं.

ऐसे घट रही घटनाओं को साक्षात देखकर मैं हतप्रभ हो जाता हूँ. क्योंकि, उस घटना का मैं भी उस दिन गवाह था. इन सब बातों को देखकर तो अब रिश्तों से भी विश्वास उठता जा रहा है. जब कोई 40 साल की महिला/पुरूष किसी दूसरे महिला/पुरूष से संबंध बनाने पर इतने उतारू हो जाएँ तो उनमें शर्म कहा बची ? और कोई कैसे विश्वास करें कि उनके बच्चों की उम्र 20 साल हो जाने के बाद भी वो अपने जीवनसाथी पर पूर्ण विश्वास कर सकें ?

उन्होंने ये सारे पैंतरे बड़ी चालाकी के साथ आजमाए थे. लेकिन जब आप किसी से बात करते हैं और घूम किसी और के साथ रहे/रही हैं. तो सामने वाला अपने भी पैंतरें बदलता रहता है. जिसने इस सत्य घटना को लिखने के लिए प्रेरित किया उसके मन को टटोला तो इनको लेकर उसके मन में कोई दुराभाव नहीं था. बल्कि उसका मात्र इतना कहना था कि आप जिस पुरूष/महिला के साथ अपना काम करवाने के लिए गए/गयी. उसके बारे में आप अपने घरवालों को बताकर जाती/जाते। क्योंकि वो जिस पुरूष/महिला के साथ गए/गयी थी. वो भी उनके परिवार वालों को बहुत करीब से जानता था/थी. अभी तो टेलीविजन और किताबों  पढ़ने/देखने को मिलता था कि प्यार की कोई उम्र नहीं  होती, लेकिन अब साक्षात देख भी रहा हूँ. इस स्टोरी में अभी बहुत से रूचिकर मोड़ आने बाकी हैं. जिन्हे आगे -आगे घट रही घटनाओं के आधार पर समेटने का प्रयास करूंगा.

मेरा लेख के माध्यम से  किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का इरादा बिलकुल नहीं हैं, अपितु समाज में घट रही सत्य घटनाओं से सबको परिचित कराने का इरादा है. 

Tuesday, June 21, 2022

बुढ़ापे का इश्क पार्ट - 1

जमाना बहुत बदल गया है. अब कभी किसी को अपने निजी रिश्तों पर विश्वास नहीं रह पायेगा. सोशल मीडिया के इस दौर में देख पा रहा हूँ और तमाम उदाहरण मेरे सामने घटित हुए हैं और वर्तमान में हो भी रहें हैं. पुरूष/महिला अपने साझीदार को छोड़कर दूसरे पुरूष/महिला की तरफ बहुत तेजी से आकर्षित हो रहें हैं. इस प्रकार की मनो: स्थिति में वो क्यों पहुंच रहें हैं ? ये शोध का विषय है. मैं यहां बात युवक/ युवतियों की नहीं बल्कि 40 की उम्र पार कर चुके लोगों की कर रहा हूँ. जिनकी 18/20 साल की अपनी संतानें हैं. ऐसे लोगों में अपने पार्टनर से असंतुष्टि की भावना जागृति होना बहुत आश्चर्यचकित करने वाला हूँ. लेकिन यह घटित हो रहा है. ऐसे लोग अलप समय के लिए थोड़ा सुख तो उठा सकते हैं. लेकिन जब वो अपने चौथेपन में प्रवेश करेंगे तब उनको आज की गलती का अहसास करेंगे.

मैं कोई दूध का धुला नहीं हूँ. हो सकता है कि मैं भी किसी से बात करता हूँ, लेकिन वो बस बात तक हीं सिमित है. पार्टनर बदल-बदलकर मिलने-जुलने, घूमने-फिरने का कोई इरादा भी नहीं हैं और न कभी होगा. उनसे मैं एक अच्छे दोस्त के रिश्ते के दरम्यान बात करता हूँ. वो भी कोई एक होगी, एक से ज्यादा नहीं.

हाँ, मैं बात कर रहा था अधेङ उम्र के प्यार के बारे में. कई बार इस तरह के लोग आँखों देखी हकीकत को झूठ साबित करने के लिए अनेक तरह की बातों का जिक्र करते/करती हैं. और सच देखने वाला जब सबकुछ सोच-समझ कर कहता है कि मैं जो बोल रहा हूँ वो झूठ था. तब उस चरित्र को लोगों के सामने संतुष्टि तो जरूर मिलता/मिलती है, लेकिन मेरा दावा है कि उसकी अंतरात्मा उसे धिक्कारती होगी और कहती होगी कि तुमने तो चार लोगों के सामने उसे झूठा साबित कर दिया. लेकिन अपने जमीर को कैसे समझा पायेगा/पाएगी. हकीकत को तू, मैं और ऊपरवाला तो देख रहा था ना. उसके बाद चालाकी बस स्टेटस पर दो-चार ऐसे परिचित लोगों का चेहरा लगाकर वो फिर से दोहराई जाने वाली उस कहानी को छुपाने का असफल प्रयास करता/करती है. यार स्क्रिप्ट तो पहले से लिखी होती है, बस उसके अनुसार नाटक किया जाता है. आजकल के कैब वाले भी दिन में 11 बजे फ्री होते हैं और उसके बाद अपने ग्राहक को लाने के लिए गंतब्य को निकलते हैं और उचित किराया भी वसूलता है. लेकिन जो यात्री है, वह कहता है कि मैंने कोई किराया अदा नहीं किया है. इसे कैसे सच मान लिया जाय कि इस भागम-भाग की दुनिया में जहां हर किसी के पास समय का अभाव है, उस दौर में नि:स्वार्थ सेवा कौन करता है ? बहरहाल, मैं अपने मुद्दे पर फिर से लौट कर आता हूँ कि आजकल बुढ़ापे में इश्क का बुखार क्यों इतना बढ़ रहा है. मैंने कुछ लोगों को देखा है कि बहुत दूर से चलकर आते हैं और किसी वयस्क पुरूष/महिला से मिलते है और घंटे भर की दूरी को 5-6 घंटों में पूरा करते हैं. मिले हुए 24 घंटे भी नहीं बीतते है और फिर मिलने की बहुत बेचैनी रहती है, फिर कहीं बुलाते हैं और मिलते हैं. ऐसे लोगों को मेरे ख्याल से शायद अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचने से ज्यादा किसी एक इंसान के बारे में सोचने की उत्तेजना रहती है. और वह इंसान अब उनकी जिंदगी में वर्तमान भी नहीं बन सकता.

मेरे अनुमान के मुताबिक़ ऐसी घट रही घटनाओं के पीछे पैसा हीं एकमात्र कारण होता है. अब समझ में आता है कि अगर हमारे पास पैसा है तो दुनिया की हर ख़ुशी हमारे पास होगी वर्ना आप बेकार हैं. मेरी हर किसी से यही प्रार्थना रहती है कि आप इधर-उधर भागने से अच्छा है अपने परिवार के साथ रहें। वो हर हाल में, हर परिश्थिति में आपके साथ होंगे और आपका सहयोग करेंगे।

मेरे लिखें हुए शब्दों से यदि किसी भाई/बहन को तकलीफ पहुंचती है. तो मैं उनसे खेद प्रकट करता हूँ, माफी चाहता हूँ.     

Sunday, March 13, 2022

द कश्मीर फाइल

देश में कुछ लोग भड़काऊ बयान देकर नेता तो बन जाते हैं लेकिन उन लोगों को इतिहास की सही जानकारी भी नहीं होती है। आप में से कितने लोगों को मालूम है कि जिस दिन जम्मू कश्मीर से 4 लाख से अधिक ब्राह्मण हिन्दुओं को कश्मीर से भगाया गया था वह तारीख कौन सी थी ? नहीं ना। तो मैं उस तारीख को आप देशवासियों के सामने रख रहा हूं। वह मनहूस तारीख 19 जनवरी 1990 थी। उस वक्त केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री थे और जनता दल गठबंधन की सरकार थी। कथित राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी के समर्थन से जनता दल की सरकार बनी थी और चल भी रही थी। 

उस वक्त अलगाववादी नेता मुफ़्ती मुहम्मद सईद देश के गृहमंत्री हुआ करते थे। जिनकी बेटी महबूबा मुफ़्ती हैं और उन्हीं के साथ अब से कुछ बरस पहले बीजेपी गठबंधन की सरकार कश्मीर में बनाई थी। उस सरकार में महबूबा मुफ्ती मुख्यमंत्री थी और बीजेपी का उप-मुख्यमंत्री। अब बात मैं तथ्यों की जानकारी के अनुसार लिख रहा हूं। उस दौरान जम्मू कश्मीर के राज्यपाल बीजेपी नेता जगमोहन जी थे। उस समय वहां राज्यपाल शासन था जो कि केंद्र सरकार के अधीन होता है।

अब यहां गौर करने वाली बात ये है कि जम्मू-कश्मीर से पंडित भाईयों के पलायन को रोकने की जिम्मेदारी किसकी थी और हमारे उन भाईयों को भगाए जाने का आरोप किस दल व पार्टी पर लगता है ?

कांग्रेस पर क्यों ? 
सरकार किसकी थी ? 
राज्यपाल किसका था ?
एक्शन किसको लेना था? 
किसकी जिम्मेदारी थी? 
ब्राह्मण हिन्दुओं को सुरक्षा देना किस सरकार की जिम्मेदारी थी....? 

फिर भी अगर कोई इसका आरोप कांग्रेस पर ही लगाए तो समझ लें कि वह जानबूझ कर अंजान है या पब्लिक को बेवकूफ बना रहा हे ।

#TheKashmiriFiles
#kashmir

Thursday, February 24, 2022

रूस-यूक्रेन युद्ध

यूक्रेन और रूस में आधिकारिक युद्ध की घोषणा आज हो गयी. जिसकी खबर आज तड़के मीडिया के माध्यम से प्राप्त हुई. मेरा और मेरे जैसे करोड़ों लोगों का मानना होगा कि युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है. युद्ध में नुकसान केवल और केवल मानवता की होती है. हम जैसे लोग भगवान से बस यही प्रार्थना कर सकते हैं कि जल्द से जल्द इस युद्ध को पूरे विश्व के लोग रोकें और मानवता को संरक्षण दें. यदि बड़े देश ऐसा करने में अक्षम होते है. तो उन्हें विश्व पावर कहलाने का कोई हक नहीं है. एक तरफ जहाँ यूक्रेन में करोड़ों लोगों की जिंदगियां दांव पर लगी हो और वहां विश्व के संप्रभु देश बस रूस पर प्रतिबंध लगाने की बात करके अपनी जिम्मेदारी से बचना चाह रहें हैं.

भारत समेत सभी देशों को युद्ध को शान्ति में बदलने के लिए तत्काल सार्थक कोशिश करनी चाहिए। वर्ना मानव समाज के लिए ये 1945 की तरह एक विभीषिका साबित होगी। मुझ जैसे करोड़ों लोगों ने तो द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका को तो नहीं देखा है, लेकिन उस दौरान हुए विभीषिका को आज महशूस कर सकते हैं और उस दौर में हुई तबाही को आज महशूस कर सकते हैं. द्वितीय विश्वयुद्ध की भयानक त्रासदी को हम किताबों में पढ़ सकते है और उसके असर को जानने-समझने के लिए हम जापान के नाकासाकी-हिरोशिमा के हालात को और सकते हैं. जहां मनुष्यों पर पहली बार परमाणु हथियारों का प्रयोग किया था. उसका असर नाकासाकी में आज भी देखने को मिलता है. जहां आज हरी-भरी जमीनों की जगह बंजरों ने ले लिया है. आज जब भी कोई बच्चा वहां पैदा होता है तो वो अपाहिज होता है.

अब रूस, अमेरिका और यूक्रेन को अपनी हठ छोड़कर शान्ति स्थापित करने में जुट जाना चाहिए तथा मानव जाति को एक विभाषिका से बचाना चाहिए। बड़े देश अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी, चीन बस बयान दे रहें हैं और धरातल पर कुछ ख़ास करते हुए नहीं दिख पा रहें हैं. मेरे अनुमान के मुताबिक़ ये लड़ाई अमेरिका और रूस बादशाहत कायम करने की हो रही है.

Thursday, January 20, 2022

कलयुग में दो राम

जैसा कि मैंने जो शीर्षक रखा है "कलयुग में दो राम" उससे आप सभी पाठक मित्रों को लेखनी के विषय का अन्दाज लग हीं गया होगा। हां। मैं उन्हीं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम जी की बात कर रहा हूं। त्रेता युग में तो केवल मर्यादा पुरुषोत्तम राम हुआ करते थे। जो अयोध्या के राजा महाराज दशरथ के पुत्र के रूप में इस पवित्र भूमि पर अवतरित हुए थे। लेकिन कलयुग में उन्हें दो राम में बांट दिया गया है। एक वो राम जो सौम्य, साहसी, वीर, आज्ञाकारी शिष्य, आज्ञाकारी पुत्र, न्यायप्रिय राजा, सर्वोत्तम भाई और आदर्श पति थे। वो भगवान राम अपने पिता महाराजा दशरथ जी के वचन की रक्षा हेतु अपनी सौतेली मां महारानी कैकेई के कहने पर सब सुख वैभव का परित्याग कर के वन गमन कर गए। उन्होंने पलटकर मां से अपना कसूर भी नहीं पूछा। बल्कि अपने अनुयायियों और सगे-संबंधियों को यही समझाते रहे कि मां के आदेश का पालन हर पुत्र को हर हाल में करना चाहिए।
भगवान श्री राम जी को इस कलयुग ने दो राम के बीच में बांटकर रख दिया है। एक वो आज्ञाकारी राम और कलयुग के पराक्रमी राम। जिन्हें अयोध्या के राजा नाम से जानते हैं। उनका नाम आजकल पिछले तीन दशकों से चुनाव जीतने के लिए उपयोग में लाया जा रहा है। एक वो राम जो सर्वोच्च मानदंड स्थापित कर चुके हैं। अब उनको राजनीति में उपयोग करके सही नहीं किया जा रहा है। आजकल एक विशेष पार्टी के प्रचार में ये देखा-सुना जा सकता है कि "जो राम कै लाए हैं, हम उनको लाएंगे"। क्या इस तरह की बेवकूफी भरी बातें करके हम अपने देवता को अपमानित करने का पाप नहीं कर रहे हैं। अरे हमारी कोई औकात है कि हम अपने माता-पिता को ला सकते हैं, नहीं हमारे माता-पिता हमें ला सकते हैं। अर्थात हमारे भगवान राम ने हम सबको पैदा किया है। हम सबको लेकर इस सृष्टि पर आए हैं। ऐसे घटिया बोल बोलने वाले लोग हमारे राम को अपने फायदे के लिए बदनाम नहीं कर सकते। 
एक राम हैं हमारे सनातन धर्म के ध्वजवाहक और कलयुग के दूसरे राम हैं संघ, विश्व हिन्दू परिषद और उनके वैचारिक सहयोगियों के। हमारे राम तो घट-घट में बसने वाले हैं और उनके राम चुनावी बातों में। मैं समाज के हर तबके के लोगों से हाथ जोड़कर अपील करता हूं कि हमारे भगवान राम को सौम्य, साहसी और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में हीं रहने दें। उन्हें अलग-अलग उद्देश्यों से बांटना बंद होना चाहिए। अयोध्या क्या देश के हर कण में समा श्रीराम जी के विद्यमान होने का सबको अहसास कराएं एवं उनके आदर्शों पर चलने के लिए लोगों को जागरूक करना चाहिए।

Tuesday, January 11, 2022

बीजेपी के स्वामी प्रसाद मौर्य बने बागी

उत्तर प्रदेश बीजेपी में आचार संहिता लागू होते हीं भगदड़ मच गयी. आज पूर्वांचल के विधायक और योगी सरकार में श्रम मंत्री श्री स्वामी प्रसाद मौर्या और उनके साथी विदायक बाँदा जिले की तिंदवारी विधानसभा सीट से ब्रजेश प्रजापति, शाहजहांपुर की तिलहर सीट से रोशन लाल वर्मा और कानपुर के बिल्हौर सीट से विधायक भगवती सागर भगवा कुनबा छोड़कर साईकिल पर सवार हो गए हैं. ये दोपहर के बाद की आज की सबसे बड़ी खबर है. कल हीं विभिन्न चैनलों पर चुनावी सर्वे लाईव किया था. जिसमें भगवा पार्टी की सरकार बनते हुए दिखाया जा रहा था. वो सर्वे ठंडा भी नहीं पड़ा था कि पूस की ठंड में आज स्वामी प्रसाद मौर्या ने पार्टी छोड़कर पूर्वांचल के माहौल को गरमा दिया है. गौर करने वाली बात ये है कि चुनावी नजर में नजर आने वाले सारे महारथी अपनी कर्मभूमि पूर्वांचल की भूमि को हीं बना रखें हैं. जिनमें हमारे प्रधानमंत्री श्री मोदी जी वाराणसी (काशी), श्री योगी जी (गोरखपुर), सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव (आजमगढ़), उत्तर प्रदेश के एक उप मुख्यमंत्री श्री केशव प्रसाद मौर्या (फूलपुर, इलाहबाद), कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राहुल गांधी, श्रीमती प्रियंका गांधी (रायबरेली, अमेठी) प्रमुख सियासी चेहरे हैं. जो पूर्वांचल को अपनी राजनैतिक उपजाऊ जमीन बनाये हुए हैं.


स्वामी प्रसाद मौर्य बीजेपी में आने से पहले बीएसपी में रहे और २०१७ में बसपा छोड़ बीजेपी से जुड़े थे. स्वामी जी एक वरिष्ठ नेता हैं और ५ बार के विधायक रहे. वर्तमान सरकार समेत पिछली सरकारों में भी मंत्री रहे हैं. मौर्या जी बेटी श्री संघमित्रा मौर्या भी बीजेपी से सांसद है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि मौर्या जी का राजनैतिक रसूख कितना बड़ा है. एक तरह से कहें तो सपा प्रमुख श्री अखिलेश यादव पूर्वांचल को अच्छे तरिके से साध लिया है. जो प्रदेश में परिवर्तन की खबर को पुख्ता कर रही है. आगे स्वामी प्रसाद मौर्या अपने साथियों के साथ मिलकर बीजेपी को और कितना नुकसान पहुंचाते हैं ? यह देखना दिलचप होने वाला है. लेकिन इतना तो तय है कि मौर्या ने बीजेपी की किल्ली हिला चुके हैं. अब पूर्वांचल में एक बार फिर अगड़े-पिछड़े की राजनितिक लड़ाई बड़े जोर-शोर से उठेगी. स्वामी प्रसाद मौर्या अपने को पिछड़ों और वंचितों का नेता के रूप में अपने आप को प्रचारित करेंगे. पहले भी इनकी पहचान पिछड़ों के एक बड़े नेता के रूप में रही है. अब सपा को ये कितना फायदा पहुंचा सकते हैं ? इसका आंकलन भविष्य में जरूर किया जाएगा. 

जमीन पर घट रहे घटनाओं पर नजर डाले तो प्रचण्ड बहुमत के घमंड ने बीजेपी को डूबा दिया. बीजेपी अपने निचे की जमीन को देखने की कोशिश नहीं की या यूं कहें कि बीजेपी अपने पैर को देखना को देखना मुनासिब नहीं समझा. अहंकार में बस आँखों के बराबर हीं देखना जरूरी समझा. इतना बड़ा मंत्री और उसके समर्थक विधायक पार्टी को छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हो जाते हैं और बीजेपी शीर्ष नेतृत्व महज मूक दर्शक बना रहता है. ये अहंकार की बानगी है. इस एक नासमझी के कारण बीजेपी चुनाव में अब धीरे-धीरे निचे की तरफ खिसकते जा रही है. खासकर पूर्वांचल का क्षेत्र हमेशा जातियों में बंटकर वोट करता है. जिसका बीजेपी ने २०१७ विधानसभा और २०१९ लोकसभा चुनाव में बहुत अच्छे से उपयोग किया था. लेकिन समय मामला थोड़ा उलटा पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है. इस क्षेत्र के ओम प्रकाश राजभर जो अपनी जाति पर बढ़िया पकड़ रखते हैं. वो बीजेपी का साथ छोड़ अखिलेश के साथ जुड़ चुके हैं. निश्चित तौर पर बीजेपी अब नुकसान में रहने वाली है. जमीन का मुद्दा रोजगार, आवारा पशुओं से निजात, भय मुक्त शासन, महिलाओ का सम्मान, कृषि उपज की बेहतर कीमत, महँगाई इत्यादि है न कि धर्म. जनता अब अपने हक के लिए सरकार से सवाल पूछना शुरू कर दिया है.

Saturday, January 8, 2022

U P समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की हुई घोषणा

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर और पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव की घोषणा आज चुनाव आयोग ने तीन बजे तिथि व चरणवार घोषित कर दिया। अबकी बार यह चुनाव बहुत अलग होने जा रहा है। कोरोना की बढ़ती रफ्तार को मद्देनजर रखते हुए आयोग ने १५ जनवरी तक रोड शो, मेगा शो, रथ यात्रा एवं पब्लिक रैली पर रोक लगा दिया है तथा विधानसभा वार चुनावी खर्च को भी बढ़ा दिया है। यह चुनाव बहुत हद तक सोशल मीडिया पर आधारित होगा। यहां जिसके पास जितना पैसा होगा, जितने व्हाट्सएप विश्वविद्यालय के छात्र एवं अध्यापक होंगे उसकी बात जमीन तक बहुत जल्दी पहुंच पाएगी। इसलिए इस चुनाव में बहुत नयापन दिखने वाला है। 
जिन पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा हुई है उसमें पंजाब को छोड़कर बाकी सभी राज्यों में भाजपा की सरकार है। जिसको बीजेपी के छोटे-बड़े नेता डबल इंजन की सरकार कहकर संबोधित करते हैं। उन‌ राज्यों में फैले अब्यवस्थाओं का असर बस बस जुमलों से  खत्म नहीं होने वाला बल्कि फजीहत भी कराने वाला होगा। सारी राज्य सरकारों पर जनता का गुस्सा भी देखने को मिलेगा। डबल इंजन की सरकारों को तो केन्द्र और राज्य सरकार का भी हिसाब जनता मांगेगी।
मैं उत्तर प्रदेश से हूं और मैं अपने प्रदेश की बात करूंगा। जो मैंने अपनी आंखों से देखा है। उत्तर प्रदेश कोरोना में हुई सरकारिया बदइंतजामी को नहीं भूलेगा। कोरोना में करोड़ों प्रदेश वासी जो अपने घरों से बाहर अन्य प्रदेशों में फंसे थे। वे सब किन कठिनाइयों का सामना करके दो हफ्ते में पैदल, साईकिल से भूखे-प्यासे वापस लौटे। उन्हें वो दर्द आज भी याद है। उसके बाद की बदली परिस्थितियों में बढ़ती हुई महंगाई और ११० रूपया लीटर पेट्रोल, १८३ रूपया किलो सरसो का तेल, इलाहाबाद संगम पर दफनाई गई लाशें, मोक्षदायिनी गंगा में तैरते शव, ८९६ रूपया गैस सिलेंडर को कैसे भूल सकता है ? और तो और पेपर लीक बिना कोई परीक्षा पूर्ण न हो पाना ये सब तो राज्य के युवाओं के जेहन में घर बना कर बैठा है। अब तो हिसाब लोकतांत्रिक तरीके से लिया हीं जाएगा। 

Saturday, January 1, 2022

नया साल का चुनाव और कोरोना का साथ

पुराने भयावह साल के बीतने की ख़ुशी अभी मनाना सही नहीं है ओमीक्रान के रूप में देश के सामने एक नई चुनौती हमारे स्वास्थ्यकर्मियों के लिए उनके सामने आ खड़ी हुई है. क्योंकि पुराने साल की विदाई कोरोना की ज्यादती के साथ हुआ तो नए साल का दस्तक कोरोना के तीसरे रूप ओमीक्रान के रूप में हुआ. आज उत्तर भारत के अधिकाँश प्रदेशों में ओमीक्रान दस्तकंदे चुका है. अभी तो शुरुआत में ओमीक्रान से ग्रसित लोगों की संख्या कम जरूर है लेकिन आने वाले दिनों में ये बढ़ने वाला है. ऐसा कुछ अनुमान वरिष्ठ चिकित्स्क लगा रहें हैं.
ओमीक्रान के साथ-साथ चीन भी हमारे देश के लिए एक नई चुनौती बन कर आया हुआ है. 1962 के बाद चीन एक बार फिर आक्रामक रूप अख्तियार किया हुआ है. पिछले साल के पहले महीने में हीं चीन ने गलवान घाटी में घुसने का दुस्साहस किया था और हमारे वीर सैनिकों के ऊपर कायराना हमला किया था. जिसमें कुछ मान भारती के सुपूत शहीद भी हो गए थे. इस नए साल में देश और भी कई चुनौतियों से जूझेगा, जिसमें महंगाई, बेरोजगारी और किसानी प्रमुख होंगे.
सरकार को अब संवेदनशील होकर जनता की आवाज को सुनने की कोशिश करना होगा। बीते हुए साल में साल में हमने देखा कि कैसे सरकार के हठ के कारण हमारे किसानों को एक साल से ज्यादा वक्त तक अपना घर-खेत छोड़कर दिल्ली की सड़कों पर बैठा पड़ा था. जिसका परिणाम ये हुआ कि राजनैतिक नुकसान को देखते हुए दिल्ली की केंद्र सरकार को आखिरकार अपना कृषि बिल वापस लेना पड़ा था. इस नए साल में इस तरह के किसी भी हठ से बचने का प्रयास सरकार को करना चाहिए.