Wednesday, March 27, 2019

मोदी जी का देश के नाम सन्देश और गोदी मीडिया में कयासों का दौर

आज साढ़े 11 बजे के आस-पास सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा "राष्ट्र के नाम संदेश" का एक ट्वीट आया और देखते हीं देखते गोदी मीडिया इस पर अपने परम धर्म का निर्वहन करते हुए सरकार के पक्ष में तर्कों का पुल बाँधने लगी. मैं करीब एक घंटे तक आज तक हिंदी न्यूज़ चैनल को देखा कि सूट-बूट धारी एंकर ने इस एक बहुप्रतिक्षित सन्देश का सारा सार राष्ट्रीय सुरक्षा पर दाल दिया और ये अपने तर्कों में दाऊद को भी भारत ले कर आ गए थे, सीमा पार किसी बड़े आतंकी संगठन पर कार्यवाई भी करवा दी थी, मणि पुर सीमा पर म्यांमार में सर्जिकल स्ट्राइक करवा दी और तो राहुल गाँधी के "NYAY" की काट और बीजेपी की चुनावी जीत की भी परिकल्पना गढ़ दी. इस तरह के न जाने कितने तर्कों और विशेषणों के माध्यम से सरकार के पक्ष में एक घंटे तक खूब हवा बाँधी पर जब प्रधानमंत्री जी सामने आये तो बात कुछ दूसरी निकली। जो बात प्रधानमंत्री के संदेश में निकली वो कोई कम नहीं थी बहुत हीं ऐतिहासिक थी पर इन गोदी मीडिया वालों के तर्कों से सीधे उलट थी.   
जब साढ़े 12 बजे के आस-पास मोदी जी टीवी पर अवतरित हुए तो उन्होंने ये सन्देश दिया कि "DRDO और ISRO के कर्मठ वैज्ञानिकों और कर्मचारियों को सलाम और बधाई, कुछ समय पूर्व हमारे वैज्ञानिकों ने लो अर्थ ऑर्बिट में लाइव सेटेलाइट को मार गिराया. भारत अंतरिक्ष शक्ति हासिल करने वाला अमेरिका, रूस, चीन के बाद चौथा देश बना, हमें हमारे वैज्ञानिकों पर गर्व करते हैं."
निश्चित तौर पर एक राष्ट्र के लिए खबर बहुत बड़ी और मन को शुकून देने वाली रही कि हम उन देशों में शामिल हो गए हैं जो अपने सरहद की रक्षा जल, थल, नभ से प्रभावी रूप से कर सके. एक देशवासी होने के नाते हमें अपने वैज्ञानिकों द्वारा अर्जित किये गए इस अविश्वसनीय सफलता के लिए उन्हें बधाई और सलामती की दुआ करनी चाहिए। आज का ये गौरव पूर्ण पल हमारे वैज्ञानिकों के सालों-साल के अथक मेहनत का नतीजा रहा है जिनके बल पर आज हम अपने आपको विश्व की चौथी अंतरिक्ष शक्ति के तौर पर स्थापित किये हैं. परन्तु निराशा गोदी मीडिया के रवैये से हुई. गोदी मीडिया के तर्कों को देखकर अब ऐसा प्रतीत होने लगा है कि यह देश के चौथे खम्भे के चरित्र में क्षरण है. मीडिया वाले अब पत्रकारिता का नहीं बल्कि चटुकारिकता का काम करने में ज्यादा गौरवान्वित महशूस करने लगे है. अपनी मेहनत से सच खबर ढूढ़ना अब इनकी आदत में नहीं रह गया है.   

जय भारत 
जय विज्ञान     

Monday, March 25, 2019

भारत के चुनाव में जीत के लिए पाकिस्तान की महत्वपूर्ण भूमिका

जब एक तरफ हम कहते हैं कि हमारे युवा बहुत हीं समझदार और पढ़े-लिखे सुलझे हुए चरित्र वाले है ठीक उसी समय भारतीय लोकतंत्र में नेताओं के चुनावी भाषणों में पाकिस्तान की महती भूमिका क्यों बढ़ती जा रही है. कल सहारनपुर में राष्ट्रवादी पार्टी के राष्ट्रवादी मुख्यमंत्री श्री आदित्यनाथ योगी (अजय विष्ट) जी ने 2019 लोकसभा चुनाव में पाकिस्तान के आधिकारिक प्रवेश ऐलान कर दिया और कांग्रेस के स्थानीय लोकसभा प्रत्यासी इमरान मसूद के टाईटल को पाकिस्तानी आतंकी मसूद से जोड़ते हुए कहा कि "अगर आप इमरान मसूद को वोट डोगे तो वोट आतंकी मसूद को जाएगा क्योंकि कांग्रेस प्रत्यासी इमरान मसूद आतंकी मसूद के दामाद है." जो बिलकुल सफ़ेद झूठ है इन दोनों मसूद में कोई भी पारिवारिक, ब्यवसायिक रिश्ता नहीं है. इस तरह के बयान असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए होते है और अब जनता इसे भली भांति जान चुकी है. ये झूठ ठीक उसी तरह है जैसे योगी जी सन्यासी (योगी) हैं. इनके एक और मुख्यमंत्री जिनके जिम्मे गुजरात की सत्ता है कल वो भी गुजरात की एक पब्लिक रैली में कहा कि "अगर यहां से कांग्रेस जीत जाती है तो दिवाली पाकिस्तान में मनेगी और अगर मोदी जी जीत जाते हैं तो पकिस्तान में खौफ होगा." मैंने वर्तमान सत्ताधारी के कुछ हालिया बयानों का अध्ययन किया तो एक बात पाया कि भाजपा क्यों बार-बार पाकिस्तान के नाम का सहारा लेती है तो उससे पता चला कि जब इन्हें लगता है कि ये चुनाव में मुंह की खाने वाले है और इनकी करारी हार होने वाली है तो ये पाकिस्तान को ऐसे ले कर आते हैं जैसे लक्ष्मण की मूर्छित होने पर हनुमान जी सुखेन वैद्य के कहने पर पूरा पर्वत उठा लाते है. 

पाकिस्तान की भारतीय राजनिति में प्रवेश की कहानी का एक बड़ा किस्सा बिहार विधान सभा चुनाव 2015 में देखने को मिला। इस चुनाव में गौर करने वाली बात ये है कि लगभग दो दशकों तक भाजपा के सहयोगी रहे नितीश कुमार (JDU) इस चुनाव में कांग्रेस, राजद का हिस्सा थी और भाजपा को आभास हो चुका था कि उसे इस चुनाव में मुँह की खानी पड़ेगी। ठीक उसी समय भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रिय अध्यक्ष श्री अमित शाह बिहार की एक पब्लिक रैली में कहा कि "अगर महागठबंधन बिहार में ये चुनाव जीत जाएगा तो पाकिस्तान में होली मनेगी" यह बयान रिकॉर्ड में है. इसके बावजूद बीजेपी ये चुनाव हार गयी ये बात अलग है कि चोर दरवाजे से आज नितीश जी के साथ सत्ता सुख भोग रही है और नितीश जी बिहार के जनादेश का अपमान कर अवसरवादिता का उत्कृष्ट उदाहरण पेश किया है.

दूसरा बड़ा उदाहरण 2017 के अंत में हुए गुजरात चुनाव के दौरान हुआ जब दिल्ली में एक दिन रात के खाने पर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री मन मोहन सिंह जी ने पाकिस्तान के कुछ अधिकारियों समेत भारतीय थल सेना के पूर्व प्रमुख को खाने पर बुलाया था और उसी रोज गुजरात में चुनाव प्रचार जोरों पर था तब बीजेपी/संघ को लगा कि उनके हाथ से सत्ता अब जाने वाली है तब बीजेपी के शीर्ष नेता श्री मोदी जी ने पाकिस्तान के रूप में अपना ब्रम्हास्त्र चल दिया और पब्लिक रैली में कहा कि "कांग्रेस पार्टी के पूर्व प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ मिलकर मुझे हराने की साजिश रची है." मोदी जी के इस बयान से उनकी पार्टी को फायदा भी हुआ और चुनाव हारते-हारते जीत गयी. ये बात अलग है जब विपक्ष खासकर कांग्रेस के नेताओं ने प्रधानमंत्री श्री मोदी जी से मनमोहन सिंह के खिलाफ उनके उनके द्वारा लगाए गए आरोपों पर सुबूत पेश करने की मांग कि तो एक बार फिर सत्ता धारी दल विफल साबित हुआ और कई दिन संसद गतिरोध के बाद राज्य सभा के सत्ता पक्ष के नेता श्री अरुण जेटली जी को सरकार की तरफ से प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दिए गए बयान पर माफी (खेद) मांगना पड़ा. यह वाकया भी संसद की आधिकारिक कारवाही में दर्ज है.   

इन कुछ बहुमूल्य वाक्यों को सुनने अथवा पढ़ें के बाद आप वाकई समझ गए होंगे कि पाकिस्तान की हमारे देश में चुनावी मौसम में कितना महत्वपूर्ण योगदान है. जब भी मूल मुद्दों से ध्यान भटकान हो पाकिस्तान को ले आओ सब शांत। आज स्वायत्त संस्थाओं द्वारा किये गए सर्वे और दावे के अनुसार 45 सालों में सबसे ज्यादा बेरोजगारी दर 2018-2019 में है, किसानों की आत्महत्या में बढ़ोत्तरी हुई है, सीमा पर जवानो के शहीद होने की संख्या में भारी इजाफा हुआ है, कश्मीर की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है, महिलाओं के खिलाफ अत्याचार, दलितों के खिलाफ उत्पीड़न के मामले नित नए मुकाम हासिल कर रहें है. तो इन सब से ध्यान हटाने के लिए सत्ता के लिए पाकिस्तान हीं एक मात्र उपयुक्त औजार साबित हो रहा है. 

Friday, March 22, 2019

बीजेपी के लौह पुरुष की विदाई, आडवाणी युग का दुखद अंत

कल भारतीय जनता पार्टी ने आगामी आम चुनावों के संदर्भ में देश के 20  प्रांतों के लगभग 184  सीटों का ऐलान शाम 7  बजे किया लेकिन उसमें सबसे चौकाने वाला नाम बीजेपी के लौह पुरुष कहे जाने वाले और स्वर्गीय श्री अटल जी के साथ साये की तरह रहने वाले और भूतपूर्व पार्टी अध्यक्ष श्री लालकृष्ण आडवाणी का रहा. जिनका टिकट इस चुनाव में गांधी नगर से काट दिया गया और उनकी जगह वर्तमान पार्टी अध्यक्ष श्री अमित शाह को दिया गया. बीजेपी के इस एक फैसले से राजनितिक पंडितों ने तरह-तरह कयासों को जन्म देना शुरू कर दिया है. बहरहाल इस फैसले के पीछे की वजहें चाहे जो रही हों पर अब आडवाणी युग का अंत हो गया है इसे मान लेने में अब कोई हर्ज नहीं है, आडवाणी युग के एक और चर्चित नेता जो उत्तर प्रदेश के कानपुर से सांसद डॉ मुरली मनोहर जोशी जी का भी पता साफ़ है यानी कि उनका भी टिकट कटना लगभग तय है. आडवाणी जी गांधी नगर की सीट से 6 बार सांसद चुने जा चुके हैं. अटल जी हीं वो एकलौते शख्स रहें हैं जिन्होंने बीजेपी को 2 सीट से 180 तक और 2014 के सत्ता शिखर तक पहुंचाने में अहम एवं सबसे महत्वपूर्ण योगदान दिया है. आडवाणी ने 1992 की अयोध्या रथ यात्रा निकाल कर बीजेपी की राजनीति में धार दी थी और एक हिन्दू संगठन या हिन्दू हितैषी पार्टी होने का खुलेआम दावा किया था और वो अपनी नफरत भरी बात को जनता को समझाने में काफी हद तक कामयाब भी रहे और इस नफरत ने हमारे समाज में अपनी जड़ें इतनी गहरी कर ली कि देश के माथे पर एक काला दाग लगा दिया. इसी रथयात्रा के बाद होने वाले अगले चुनाव में बीजेपी को अप्रत्याशित लाभ मिला और सीटों की सख्या में बहुत बड़ा इजाफा हुआ जो निरंतर आ तक चल रहा है. लेकिन एक बात ये भी सत्य है आडवाणी जी ने देश के भाई-चारे को तोड़ने के लिए जो आग लगाई थी वो आज भी सुलग रही है. उन्हीं की रथयात्रा मुहीम ने देश में आपसी सद्भाव में जहर घोलने का काम किया और उन्ही की आंदोलन की एक विभीषिका बाबरी मस्जिद का विध्वंश होना था. जिस विवाद की वजह से देश किए दो समुदायों में उग्र तेवरों की शुरुआत हुई और कई बार ऐसी टकराहट हुई की दोनों सम्प्रदाय के मानने वालों को भरी जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा. शायद अब जब आडवाणी जी राजनितिक से दूर होने के बाद जब कभी अकेले बैठकर सोचेंगे तो उन्हें अपने किया पर शर्म बहुत आएगी और अगर नहीं आयी तो ये समझ लेना चाहिए कि वो इंसान कहलाने के लायक नहीं हैं. मेरा मानना है कि आडवाणी का इससे ज्यादा अपमान कोई नहीं हो सकता जो उनको इस चुनाव से दूर करके किया गया है ठीक वैसे हीं जैसे इन्होने (आडवाणी और वाजपेयी) कभी बलराज मधोक को औकात दिखाई थी . नफरत के जन्मदाता का अपमान सतयुग, द्वापर, त्रेता या यूं कहें कि हर युग में हुआ है. 

Wednesday, March 20, 2019

वंशवाद पर प्रधानमंत्री के शब्दों में खोखलापन

आज सुबह-सुबह जब गोदी मीडिया का हाल देखा तो बहुत दंग रह गया देश के प्रधानमंत्री ने एक ब्लॉग लिखा और कांग्रेस, गांधी, नेहरू परिवार पर कटाक्ष करते हुए अपने ब्लॉग में लिखा था कि कांग्रेस ने संविधान से लेकर, प्रेस और न्यायपालिका में वंशवाद को बढ़ावा दिया और देश के संस्थानों को बर्बाद किया। मैं ब्यक्तिगत तौर पर प्रधानमंत्री के इस बयान की घोर निंदा करता हूँ क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी जी का इस तरह अपने लेख में जिक्र करना संविधान निर्माताओं का अपमान है, न्यायपालिका का अपमान है, देश के लोकतंत्र का अपमान है. क्योंकि ये सब इस लिए प्रधानमंत्री जी से बुलवाया जा रहा है क्योंकि पूरा देश जानता है कि प्रधानमंत्री जी जिस संगठन आरएसएस से संबंध रखते हैं उसके सभी शीर्ष नेता अंग्रेजों के साथी रही हैं उनसे माफियां भी मांगी थी तो अपने उस कलंकित दाग को कम करने के लिए प्रधानमंत्री जी और उनका मातृ संगठन आरएसएस झूठ फैलाते हैं. संघ वैसे तो १९४७ से झूठ का सहारा लेना शुरू किया था जो जाकर २०१४ में पूरा हुआ.

वंशवाद के मुद्दे पर संघ और हमारे प्रधानमंत्री से कुछ जरूरी सवाल है-
  • वंशवाद की परिभाषा क्या है ?
  • वंशवाद का स्वरूप कैसा होता है ?
  • नेहरू जी की तीन पीढ़ियां प्रधानमंत्री बनी क्या आपके अनुसार ये वंशवाद है ?
  • स्वर्गीय पंडित मोतीलाल नेहरू और स्वर्गीय जवाहरलाल नेहरू जी स्वतंत्रता संघर्ष में अनेकों-अनेक बार जेल गए, तो आप पिता-पुत्र के इस रिश्ते को किस श्रेणी में रखना चाहेंगे ?
  • क्या वंशवाद की वजह से कोई देश का प्रधानमंत्री बनता है ?
आपके लेख के अनुसार २०१४ में देश में पहली बार देश में गैर वंशवाद की सरकार बनी, ऐसा कहकर आप स्वर्गीय श्री जवाहरलाल नेहरू, स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी, स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री, स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह, स्वर्गीय चंद्रशेखर सिंह, देवगौड़ा जी, मनमोहन सिंह जी जैसे पूर्व प्रधानमंत्रियों का अपमान तो नहीं कर रहें हैं. अगर आपने इस लेख में भूल वश इन प्रधानमंत्रियों को अपमानित करने कार्य किया है तो आपको खेद जताना चाहिए, अगर आप अपनी राजनितिक विचारधारा के आधार पर इस बात को लिखते हुए इस पर बल देना चाहते है तो भी इसमें से नेहरू परीवार के प्रधानमंत्री रहें लोगों के नाम हटा सकते थे. जहां तक इतिहास की लघु जानकारी मुझे है उसमें स्वर्गीय नेहरू जी के पिता जी किसी देश के प्रधानमंत्री नहीं थे हो सकता है कि आपके और आरएसएस के पास कोई ऐसा दस्तावेज हो जिसमें स्वर्गीय मोतीलाल नेहरू जी को किसी देश का प्रधानमंत्री बताया गया हो. ऐसा हीं इंद्रा जी और राजीव को छोड़कर देश के अन्य पूर्व और वर्तमान प्रधानमंत्रियों के संबंध में भी है. मुझे ये नहीं समझ है कि आपके पास ऐसे कौन से दस्तावेज लग गए जिसमें आप अपने पार्टी के पहले अध्यक्ष को भी वंशवाद की पहचान बता बैठे। हम जानते थे कि अटल जी एक सम्मानित नेता और प्रधानमंत्री थे और उनके पिता जी किसी भी राष्ट्र के प्रधानमंत्री नहीं थे.

हम जनता के रूप में चुप रहकर एक ऐसी संस्कृति को बढ़ावा दे रहें हैं जिसमें लोग सिर्फ और सिर्फ भेड़िये के रूप में परिवर्तित होते जा रहे हैं. लोग झूठ बोलने से अपने आपको सम्मानित महशूस करने लग गए हैं. क्या हम और आप ऐसे हीं देश की कल्पना करते हैं. आइये हम अपनी जिम्मेदारी को समझे और एक सपनों के भारत का निर्माण करें.

Tuesday, March 19, 2019

आवारा पशु किसान का दुश्मन

गवईं (गाँव के) अर्थशास्त्र का सबसे बड़ा स्रोत किसानी और पशु-पालन हुआ करता था पर अब देखने को मिल रहा है कि किसान इन दोनों मदों से अपने लिए कोई भी फायदा अर्जित नहीं कर पा रहा है क्योंकि आवारा पशुओं का इतना आतंक हो चूका है वो सारी फसल को चर (खा) जाते है. किसान बेबसी की नजरों से अपनी खेतों को खड़ा होकर बस देखता है और अपनी छाती पिटता है क्योंकि उसकी सारी लागत और मेहनत इन आवारा पशुओं के पेट में चला जाता है. इसके लिए इस सरकार के नियम जिम्मेदार है क्योंकि अब गाय और बछड़ों को कोई खरीदना नहीं चाह रहा है क्योंकि फ़ालतू या बकेना जानवरों को पालना लोगों के लिए इस महंगाई के दौर में किसी विभीषिका से कम नहीं है. भूसा 9 सौ रुपया कुंटल मिल रहा है चलउना (चुनी) 19 रुपया किलो तक हो गयी है. किस गाँव के किसान के पास इतना पैसा होगा कि वो ठाठ (बिना दूध) देने वाली गाय को पाल सके. मजबूर होकर किसान इन जानवरों खासकर गाय, बछिया, बछड़े को अपने गाँव तालुका से दूर छोड़ आते हैं जहाँ वो खेत में खड़ी फसलों को सत्यानाश कर देते हैं और किसान को मजदूरी या आत्महत्या करने पर पर विवश कर देते हैं. मेरा गाँव जौनपुर जिले में त्रिलोचन महादेव नामक स्थान पर पड़ता है. बचपन में मै देखता और सुनता था कि हमारे क्षेत्र में चना, मटर, रहर (अरहर), उर्दी (उड़द) की अच्छी खेती होती थी और हम लोग इनकी रोटी बना कर बड़े ही स्वाद से खाते थे पर ये चीजें आवारा जानवरों की वजह से अब बस सपने में हीं बची है. आवारा पशुओं में केवल गाय और सांड की संख्या है जो लोगों के लिए अब सड़क मार्ग पर दुर्घटना का भी कारण बन रही है. हम बहुसंख्यक लोग गाय और सांड में अपने देवी-देवता की परछाई देखते हैं और पूजते भी है पर वही अब जानलेवा साबित हो रही है. लोग अपने घर से इन्हे हाँक देते है ये सड़क, नदी नाला पार करते हुये बहुत दूर तक विचरण कर आती है. आज के 5 साल पहले तो इनकी छुट्टा पशुओं की संख्या इक्का-दुक्का देखने को मिलती थी पर अब तो इनकी तादाद इतनी बढ़ गयी है जितनी किसान के खूटे पर भी नहीं होगी। मैं पिछली साल के नवंबर में गाँव गया हुआ था धान का सीजन था तो एक सुरकनी लेने के लिए मैं और मेरे चाचा पिंडरा बाजार जा रहे थे जो की बाबतपुर हवाई अड्डे से एक कोस (3 किलोमीटर) दूर था और घर से 8 किलोमीटर। रास्ते में मेरे गाँव के बाद और फूलपुर से पहले एक जगह डिग्घी  पड़ता है वहां नजारा देखकर दंग रह गया कि एक खेत में कम से कम 25 से 30 गाय-बछड़े थे जो रेड़ा पर चढ़े हुए धान को खा रहे थे. यह नजारा देखकर मेरे आँखों में खून उतरने लगा और मैं अपनी मोटरसाइकिल रोक कर उन्हें खेत से दूर खदेड़ा और जब नजदीक से जाकर खेत को देखा तो 6 बिस्वा जमीन पर खड़ी फसल पूरी तरह तबाह हो चुकी थी. यह देखकर मुझे बहुत पीड़ा हुई क्योंकि मैं भी एक किसान हूँ और खेती में होने वाली मेहनत और लगने वाली लागत का अहसास मुझे भी होता है. मेरी तो इस सरकार से यही दरख्वास्त होगी कि हम गाँव वासियों को इन आवारा पशुओं के आतंक से बचा दे बाकी तो जिविकोपार्जन हम खुद से कर लेंगे.

Monday, March 18, 2019

पर्रिकर जी को नमन एवं भावभीनी श्रद्धांजलि

कल शाम कैंसर जैसी घटक बिमारी से जूझ रहे गोवा के वर्तमान मुख्यमंत्री और देश के पूर्व रक्षामंत्री श्री मनोहर पर्रिकर का असामयिक देहांत हो गया. जैसे ही उनकी मृत्य की खबर उनके परिवार के लोगों को डाक्टरों द्वारा दी गई तो देखते हीं देखते पूरे देश में यह खबर आग की तरह फ़ैल गयी और फैलना भी चाहिए क्योकि मेरी नजर में आज के राजनीति के दौर में पर्रिकर और माणिक राव सरकार दो हीं ऐसे नेता थे जो वास्तव में जन नेता कहे जा सकते है. इन दोनों की दिनचर्या और कार्य करने की शैली में भी बहुत समानता देखने को मिलती है. जैसे ये दोनों नेता मुख्यमंत्री होते हुए भी जनता के लिए हमेशा शुलभ रहें है, इनके साथ सुरक्षा का कोई बहुत बड़ा तामझाम भी नहीं होता था. ये दोनों नेता रिक्शा की सवारी और अकेले स्कूटर और पैदल भी निकलने से नहीं हिचकते थे. आज मैं मनोहर पर्रिकर को भाजपा का हीं नहीं अपितु देश के कुछ अत्यंत शिष्ट नेताओं में गिनती करता हूँ. 

मनोहर पर्रिकर के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण बिंदु :
  • एक मध्यमवर्गीय परिवार में 13 दिसंबर 1955 को मनोहर पर्रिकर का जन्म हुआ था. पर्रिकर जी की शुरूआती शिक्षा लोयोला हाई स्कूल से शुरुआती शिक्षा हासिल की थी.
  • आईआईटी-बंबई से इंजीनियरिंग में स्नातक की पढ़ाई पूरी की. 
  • आईआईटी डिग्री धारी देश के पहले मुख्यमंत्री बनने का गौरव पर्रिकर जी को प्राप्त हुआ था.
  • मनोहर पर्रिकर जी की छोटी उम्र में हीं आरएसएस से रिश्ता जोड़ लिया था और वह स्कूल के अंतिम दिनों में आरएसएस के ‘मुख्य शिक्षक’ बन गए थे. 
  • मनोहर पर्रिकर जी 1994 में भाजपा से अपनी राजनीति की पारी का शुरुआत किये और पणजी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के टिकट पर चुनाव जीता.
  • मनोहर पर्रिकर जी 24 अक्टूबर 2000 को गोवा के पहली बार मुख्यमंत्री बने.
  • कुल 4 बार पर्रिकर जी गोवा के मुख्यमंत्री रहे.
  • मनोहर पर्रिकर जी को साइकिल का बेहद शौक था. वो खाली वक्त में साइकिल चलाया करते थे. 
  • हवाई चप्पल और हाफ शर्ट मनोहर पर्रिकर जी की अमिट पहचान थी. 
  • खेलों की बात करें तो पर्रिकर जी को फ़ुटबाल खेलना बहुत पसंद था.
ये थी कुछ परिकर जी से जुड़ें हुए अति-महत्वपूर्ण तथ्य.

मनोहर पर्रिकर जी निश्चित रूप से अपनी विचारधारा और अपनी पार्टी के लिए नेता थे. उसका सबसे बड़ा उदाहरण 2017 के गोवा चुनाव में भी देखगे जा सकता है. जब गोवा विधान सभा का चुनाव हुआ और उस चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी और बीजेपी दुसरे नंबर की पार्टी रही और जब सरकार बनाने के लिए बीजेपी ने संभावनाएं तलाशनी शुरू की तो गोवा के निर्दलीय और क्षेत्रीय पार्टियां जैसे MGP, MFG ने बीजेपी नेतृत्व को साफ़ शब्दों में कहा था कि मनोहर पर्रिकर को वापस दिल्ली से गोवा लेकर आओ तो हम बीजेपी को समर्थन देने के लिए तैयार हैं और जब पर्रिकर जी को यह बात बताई गयी तो बिना देर किये पर्रिकर जी गोवा आने के लिए तैयार हो गए और वहां पर एक बार फिर से बीजेपी की सरकार बनाने में अपनी अहम भागीदारी का निर्वहन किया. पर्रिकर जी के कुछ बड़े फैसले रहे हैं जब वो देश के रक्षमंत्री रहे. जब उरी हमले में हमारे 17 से ज्यादा जवान आतंकियों के कायराने हमले में शहीद हुए थे उस उस वक्त पूरा देश गुस्से से उबल रहा था और हर तरफ से सरकार पर सवालों का बौछार हो रहा था तब परिकर जी बहुत शांत चित्त थे पर उनके दिमाग में कुछ बड़ा चल रहा था. उरी हमले के दो हफ्ते बाद भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सीमा के भीतर घुसकर उन्हें बहुत गहरा घाव दिया था जिसमें उनके सेना और कई आतंकी लोग मारे गए थे. जिसे "सर्जिकल स्ट्राइक" नाम दिया गया था और इस आपरेशन को हमारे जवानों ने बिना किसी क्षति के बहुत हीं सफलता पूर्वक अंजाम दिया था. मनोहर पर्रिकर जी का नाम उरी हमले के बाद पाक में की गयी सर्जिकल स्ट्राइक से इतिहास के साथ अमर हो गया है. दूसरा जो बड़ा कार्य पर्रिकर जी ने किया वो भूत पूर्व जवानों के लिए ओ आर ओ पी को भी कुछ कमियों के साथ लागू करने का फैसला था.

मैं अपनी समझ के अनुसार अपनी लेखनी के माध्यम से श्री पर्रिकर जी को श्रद्धांजलि दे रहा हूँ. भूल वश किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ.

जय हिन्द      

Wednesday, March 13, 2019

दांडी मार्च के दिन प्रियंका का हिट शो

कल के दिन कांग्रेस ने तकरीबन ५८ साल बाद कांग्रेस में निर्णय लेने वाली बड़ी संस्था कांग्रेस वर्किंग कमेटी के बैठक आहूत की. यह बैठक इस लिए और खास थी की यह  बैठक महात्मा गाँधी की जन्म भूमि, कर्म भूमि साबरमती गुजरात में रखी गयी गयी थी और उसी स्थान पर रखी गयी थी जहां से १२ मार्च सन १९३० में अंग्रेजों के बनाये गए नमक कानून के खिलाफ दांडी की पदयात्रा के शुरुआत की थी और कल कांग्रेस उसी १२ मार्च की तिथि को बैठक के लिए चुना था. ख़ास बात ये है कि जब १२ मार्च सन १९३० में गाँधी जी ने दांडी यात्रा की शुरुआत की थी उस समय आरएसएस (संघ) ने गाँधी जी के इस पदयात्रा को घोर विरोध किया था पर गाँधी जी के हौसलों को तोड़ना उनके बस की बात नहीं थी. गाँधी जी के दांडी मार्च को अपार सफलता मिली थी और अंग्रेजों को नमक पर बनाये अपने कानून को वापस लेना पड़ा था. कांग्रेस के इस एक निर्णय की वजह से प्रतीकों की लड़ाई फिर से जोर पकड़ेगी ऐसी संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता. क्योंकि कांग्रेस ने पटेल स्मृति भवन में अपनी मीटिंग रखी थी और जब कांग्रेस के बड़े नेता श्री आनद शर्मा ने मीटिंग की बात जब मीडिया के माध्यम से जब जनता को बता रहे थे तो बार-बार पटेल जी और गांधी जी के नामों को सम्बोधित कर रहे थे. हाल हीं में देखा गया था कि संघ/बीजेपी पटेल और गांधी की विरासत को अपनाने की कोशिश कर रही थी तो बीजेपी/संघ को जबाब देने के लिए कांग्रेस ने इस जगह का चुनाव किया और इन महा पुरुषों पर अपना दावा दोहराया जो उन्ही के है क्योंकि संघ ने आजीवन गाँधी, पटेल की खिलाफत करती रही है.

राजनितिक तौर पर कांग्रेस पार्टी में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि गांधी परिवार का कोई VIP किसी आम कार्यकर्ता के साथ कार्यकर्ताओं के बीच में बैठता हो. इसकी अनूठी बानगी कल गाँधीनगर में बापू के आश्रम में  मिली जब प्रियंका गाँधी वाड्रा एक आम कार्यकर्ताओं की तरह दूसरे पंक्ति में जा बैठी जहाँ अल्पेश ठाकोर, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य जैसे युवा नेता बैठे थे. प्रियंका गाँधी के एक छोटे से कदम से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में एक अलग सा जोश देखने को मिला। वैसे कांग्रेस को अब पुरानी परम्परा से निकल कर आगे बढ़ने की और कार्यकर्ताओं के बीच तक पहुंचने जरूरत है.
     
कल गुजरात की धरती से प्रियका जी ने सार्वजनिक जीवन में पदार्पण के बाद पहली राजनैतिक रैली को सम्भोधित किया। इस रैली के माध्यम से उन्होंने अपनी एक अलग छाप छोड़ी है. प्रियंका गाँधी ने बड़ी हीं कुशलता, चतुराई और शालीनता के साथ देश के असल मुद्दों को चुनाव से जोड़ दिया और तो और उन्होंने बीजेपी/संघ के आक्रामक राष्ट्रवाद के मुद्दे की हवा निकालते हुए उसे राष्टभक्ति और जागरूकता से जोड़ दिया। मैंने तो कभी इंदिरा जी को सुना नहीं पर उनका भाषण युटुब पर जरूर देखता हूँ पर एक बात सच कहूँ जब प्रियंका ने बोलना शुरू किया तो तो सहसा कुछ आवाज की खनक बरबस हीं याद आ गयी और वो याद प्रियंका गांधी की दादी और पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा जी की थी. हम इस बहस से बाहर निकलते हुए प्रियंका के दिए गए भाषण का आंकलन करते हैं तो पाते है कि उनका पहला भाषण बेहद संतुलित और अत्यधिक धार वाला था. अपने भाषण के दौरान भले हीं उन्होंने सत्ता पक्ष या सरकार के किसी नुमाइंदे का नाम न लिया हो परन्तु उन पर धारदार हमला किया। शायद इसी वजह से कांग्रेस पार्टी के समर्थक उनमें इंदिरा जी की छवि देखते हैं.     

Monday, March 11, 2019

लोकतंत्र के महापर्व का ऐलान

लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व लोकसभा चुनाव २०१९ के दिन का ऐलान कल शाम चुनाव आयोग द्वारा कर दिया गया. अब  सभी क्षेत्रीय पार्टियों समेत राष्टीय पार्टियां अपनी-अपनी थाली सजाकर जनता के बीच में जाने की कोशिश कर रही है जो मुमकीन है कि दो-एक दिन में दिख भी जाए. मेरी नजरें जहां तक देख पा रहीं हैं ये चुनाव ऐतिहासिक चुनाव होने वाला है. मेरा ऐतिहासिक से यह तात्पर्य है कि अगर भाजपा/संघ इस चुनाव को जीत जाता है तो आजाद हिन्दुस्तान में एक नए इतिहास को लिखा जाएगा कि ७० सालों में कोई गैर-कांग्रेसी सरकार होगी जो सत्ता को रिपीट करगी. अगर भाजपा/संघ यह चुनाव हार जाती है तो भी यही इतिहास लिखा जाएगा कि जनता ने बदलाव के लिए वोट किया और परिपक्वता दिखाई. बहरहाल जो भी हो एक आम नागरिक के लिए लोकतंत्र के सबसे बड़े त्यौहार में पूरे उत्साह के जुड़ जाना चाहिए और अपने भविष्य की बातों पर चर्चा करनी चाहिए. क्योंकि एक बार अब चूक गए तो फिर अगली बार ५ साल बाद यह पर्व आएगा जब तक अपने आप को घर बैठे कोसते ही रहोगे. इससे अच्छा यही होगा कि आप लोगों के साथ एक समिति के माध्यम से अपने-अपने मुद्दों पर चर्चा करें, एक मत होने पर जो भी उम्मीदवार आपके क्षेत्र में वोट मांगने के लिए आये उनके सामने अपने स्थानीय मुद्दों को पुरजोर तरिके से रखें, अगर आपको लगता है कि उम्मीदवार आपके साथ जुड़ रहा  है तो ठीक है नहीं तो आपके पास और दुसरे मौके भी होंगे जिनका अब अपने अनुसार फायदा उठा सकते है. लेकिन जैसे हीं आप झांसे में आये तो ये पक्का मान लेना कि आप झांस (ठग) लिए गए हो.

 यह चुनाव एक ऐसा चुनाव हो चुका है जो किसी के भी अनुमान से ऊपर है यहां सटीक-सटीक कोई यह आंकलन नहीं कर सकता है कि ऊंट किस करवट बैठेगा. यूपीए की सरकार आएगी या एनडीए की. खैर जनता को आनंद लेना चाहिए इस पर्व का और अपने हक का इस्तेमाल एक दूरदर्शी नेता को चुनने के लिए करना चाहिए. जो उनके (मतदाताओं) के आकांक्षाओं को पूरा कर सके. सपने दिखाने का काम तो कोई भी कर सकता है परन्तु सपने को पूरा करने वाला ही मसीहा बनता है.  जनता की कुछ मूलभूत जरूरतें होती हैं जैसे पानी, बिजली, मकान और एक रोजगार। इनके अलावा जनता को किसी बात से कोई मतलब नहीं होता है न तो वो पाकिस्तान से मतलब रखता है और न हीं अमेरिका से.

इस चुनाव में आप अपने मताधिकार का प्रयोग खूब सोच-समझकर करें न की किसी को खैरात में बाटने का. आपका एक वोट आपके राष्ट्रवाद के विचार का प्रवर्तक होगा.     
    

Saturday, March 9, 2019

काशी को क्योटो बनाना हमारी विरासत का अपमान

हमने सरकार को चुना था जन सरोकार के लिए न कि हमारी अपनी विरासत को नष्ट करने के लिए. आप महान प्रधान मंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री, संतरी बनने के चक्कर में हमारी काशी की विराट मनमोहक छवि को क्यों तहस-नहस करना चाह रहे हो. मेरे ख़याल से सत्ता में बैठे लोग इतने अज्ञानी भी नहीं (उनमें एक योगी भी हैं जो इस सूबे के मुख्यमंत्री) हैं कि जिन्हें काशी के खण्ड-खण्ड में रची-बसी हजारों लाखों साल की गाथा और उसकी पहचान से वाकिफ न हो. कल NDTV पर रात ९ बजे  रविश कुमार का शो देख रहा था तो उसमें वहां के निवासियों की ब्यथा देख दिल भर आया. कुछ तो महिलायें, पुरुष ऐसे थे जो रो रहे थे और उनका कहना था कि ये घर मकान और मंदिर मेरे दादा परदादा की निशानी थी. हमारी ६ या उससे ज्यादा पुस्ते इसी मकान में रह रही थी और हर मकान में एक मंदिर था, जिसे पकड़ कर कई लोग रट बिलखते नजर आ रहे थे. उनक का कहना था कि हमारी काशी की पहचान तो सिर्फ बाबा विश्वनाथ, मणिकर्णिका घाट, दशाश्वमेध घाट, हरिश्चंद्र घाट, अस्सी घाट तथा यहां की सकरी गलियों से थी. जब हमारी यहीं पहचान हमसे छीन ली जायेगी तो काशी और बम्बई, दिल्ली, कलकत्ता में क्या अंतर् होगा. सरकार की इस पहल से तो हमारा अस्तित्व हीं खत्म हो जाएगा. सरकार का ये कार्य बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर के नाम हमारी आस्था के साथ मजाक है. जो हम भक्तों के लिए असहनीय है. ये दर्द स्थानीय निवासियों और बाबा के भक्तो के हैं अब विकास के आगे इनके सनातनी आस्था को कौन समझेगा.
विकास के नाम पर हमारे काशी को क्यों बर्बाद किया जा रहा है. काशी में जितने छोटे-बड़े मन्दिर है सब पुरातन संस्कृति का हिस्सा और अमिट विरासत हैं. तो उन विरासत के साथ खिलवाड़ क्यों किया जा रहा है ? मेरी समझ के अनुसार सरकार का यह कृत्य हमारी संस्कृति और आस्था के साथ खिलवाड़ करने जैसा है.
मेरा भी काशी में बहुत ज्यादा वक्त बीता है. तो मेरे अनुभव के अनुसार काशी की खूबसूरती की धूरि बाबा विश्वनाथ हैं और उनके आस-पास के क्षेत्र जैसे मणिकर्णिका घाट, कचौरी गली, हरिश्चंद्र घाट, अस्सी घाट, संत रविदास मंदिर, राम नगर का किला, बाबा अवधूत की कुटिया, बाबा काल भैरव, दुर्गाकुंड, राम चरित मानस मंदिर, श्री संकट मोचन मंदिर, बी एच यू के अलावा हर वो छोटी-बड़ी गलियाँ और मंदिर हैं जो इस काशी परिक्षेत्र की परिधि में आते हैं. हजारों साल से काशी के बारे में ये कहावत प्रचलित हैं कि वो अविनाशी (जिसका कभी विनाश नहीं हुआ हो) रही है. काशी के घाटों पर प्राचीन भवनों में जो छोटे-छोटे मंदिर पाए जाते हैं. उनके बारे में ये कहानी है कि वे सभी मंदिर ग्रह और नक्षत्र के अनुसार बाबा भोलेनाथ ने खुद बसाये है. दुःख के खबर ये है कि मंदिर क्षेत्र के विकास के नाम उन भवनों और मंदिरों को तोड़ा जा रहा है जिनमें ये अति प्राचीन मूर्तिया १२ सौ साल या उससे ज्यादा वक्त पहले स्थापित की गयी थी. इस तरह का विकास चाहने वाले लोगों कों मार्बल, संगमरमर जैसी सुंदरता तो मिल जायेगी पर पहले जैसी आस्था कहाँ से लाएंगे. वो आस्था कि कहीं और किसी भी गली में एक छोटे ताख पर एक मूर्ती रख कर कोई चला जाता था तो उस मूर्ति पर भी लोग श्रद्धा के साथ जल चढ़ा देते थे. इस सरकारी विकास से तो अब मूर्तियों को स्थापित करने की जगह हीं नहीं मिलेगी.
सरकार के इस कदम से बहुत से बाबा के भक्तों का दिल टूटा है मेरे विचार से इन अति प्राचीन भवनों और मंदिरों को तोड़े बिना भी बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर को बनाया जा सकता था. लेकिन दुर्भाग्य है कि हिन्दू धर्म, हिन्दू आस्था की प्रबल समर्थक पार्टी होने का दावा करने वालों के द्वारा इस तरह का कृत्य किया जा रहा है. जिस तरह मंदिरों को तोड़ने का सिलसिला काशी में चलाया जा रहा है ठीक उसी तरह औरंजेब ने भी किया था पर हमारे पूर्वजों ने औरंगजेब से तो बचा लिया पर मोदी और योगी से नहीं बचा सके.      

Thursday, March 7, 2019

बीजेपी सांसद ने बीजेपी विधायक को जूते से दिया भरपूर आशीर्वाद

जूते का इससे बढ़िया इस्तेमाल कभी नहीं हुआ था न भूतो न भविष्यते क्योंकि अब मोदी है तो मुमकिन. राष्ट्रवादी जूता मारने वाले भाई साहब अरे माफ़ करना माननीय महोदय भारतीय जनता पार्टी के शरद त्रिपाठी जी है ये बहुत राष्ट्रवादी पुरुष है इनके पिता जी श्रीमान पंडित जी उत्तर-प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी जी है. सोचने वाली बात ये है कि ये सब के सब प्रचंड राष्ट्रवादी है और संघ के कर्मठ सिपाही और और सावरकर वाले राष्ट्रवाद के सच्चे द्योतक है. दूसरे मतलब जूते की सम्मान बढ़ाने वाले और जूते को सीधा मष्तक और गाल पर खाने वाले राष्ट्रवादी विधायक जी का नाम श्री राकेश सिंह बघेल है. मेरा किसी की सम्मान को कम करने का कत्तई इरादा नहीं है वो चाहे जूता मारने वाले संस्कारी राष्ट्रवादी श्री त्रिपाठी जी हों या जूते की शान में खुद को झुका देने वाले परम् संस्कारी विधायक श्री बघेल हो यहां तक की मैं जूते के सम्मान को भी ठेस पहुंचाने की हिमाकत नहीं कर सकता.
हवा में खबर तैर रही है शायद झूठी होगी कि इन दोनों संस्कारी नेताओं में पुलवामा हमले के बाद देश को हुए घाव की भरपाई करने के लिए बात-चीत की जा रही थी. इतने में कहीं से ये आवाज आयी शायद राकेश जी थे कि सबसे पहले मैं पाकिस्तान में जाऊंगा और उनके देश को हनुमान जी की तरह तबाह करके हीं वापस आऊंगा. इतना सुनते हीं दूसरे वाले महान राष्ट्रवादी संसद श्री त्रिवेदी जी का भी खून खौला और उन्होंने ये बोलते हुए संस्कारी विधायक को ४ सेकेण्ड में ७ जूते मार दिए कि मेरे रहते हुए तुम कैसे जा सकते हो बस फिर फैसला हो गया और जूते का सम्मान भी भी बढ़ गया.
गजब का इत्तेफाक घटा कल जूता भी कोई मामूली नहीं था और जूता खाने वाला सिर और गाल भी मामूली नहीं था. पंडित जी के चरण का जूता था और बाबू साहेब का सिर वैसे आप सब बुरा और अपमान मानेंगे पर पंडित जी ने हमारी सनातन परम्परा की रक्षा की है और ठाकुर साहेब को आशीर्वाद दिया था. समझे आप लोग. आप लोग बस जूता-जूता कह कर विधायक जी का बस मजाक उड़ाने में लग गए थे लेकिन ये नहीं सोच सके की पंडित जी ने अपनी चरण पादुका से आगामी चुनाव के लिए आर्शीवाद दिया था. अगर आपको याद न हो तो मैं आपकी याद ताजा करते हुए कलयुग में घटित एक घटना की याद दिलाता हूँ जब २०१८ में छत्तीसगढ़ में विधान सभा का चुनाव था उस समय डॉ रमन सिंह जी ने कलयुग के सबसे बड़े मुख्यमंत्री कम योगी ज्यादा का चरण-स्पर्श कर आशीर्वाद लिया था. तब यही भाजपाई इसे संस्कार कह रहे थे. तो कल की घटना उसी से प्रेरित थी ये कोई जूता काण्ड नहीं था ये एक ब्राह्मण का एक क्षत्रिय को आशीर्वाद था. जो देशद्रोहियों को समझ नहीं आएगा चमचों इसे समझने के लिए आपको संघ में जाना पड़ेगा, भाजपा का सदस्य बनना पड़ेगा। सावधान आगे से कोई इसे जूता काण्ड का नाम नहीं देगा जिसे भी कुछ बोलना होगा अगर जरूरी हो तो वो 'पंडित जी का आशीर्वाद' बोल सकता है.           
भाई मै जूता काण्ड का अब कोई जिक्र नहीं करना चाहता, अब आप लोग तो समझ हीं गए होंगे ! उत्तरप्रदेश के वाराणसी निवासी गाँव खेवली के सुदामा पांडेय 'धूमिल' की रचना "मोचीराम" शीर्षक नाम की एक कविता याद आती है जो हिंदी में पूर्वांचल विश्व विद्यालय के बी ए द्वितीय वर्ष में सम्मिलित थी. वो कल के भाजपा नेताओं के आपसी प्रेम के बाद बरबस ही याद आ गयी -


मोचीराम

राँपी से उठी हुई आँखों ने मुझे
क्षण-भर टटोला
और फिर
जैसे पतियाये हुये स्वर में
वह हँसते हुये बोला-
बाबूजी सच कहूँ-मेरी निगाह में
न कोई छोटा है
न कोई बड़ा है
मेरे लिये,हर आदमी एक जोड़ी जूता है
जो मेरे सामने
मरम्मत के लिये खड़ा है।

Tuesday, March 5, 2019

आप और कांग्रेस में गठबंधन की सुबगुबाहट, कार्यकर्ताओं में बेचैनी

दिल्ली में मीडिया में चल रही सुर्ख़ियों के अनुसार आज एक अहम और अप्रत्याशित घटना घटित होने जा रही है और वह है कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का आगामी लोक सभा चुनाव के लिए गठबंधन। यह घटना अभूतपूर्व इसलिए भी है कि आम आदमी पार्टी का जन्म २०१२ में घोर कांग्रेस विरोध में अन्ना आंदोलन के वक्त हुई थी और आज वही दोनों पार्टियां एक-दुसरे के साथ फिर से जुड़ रही है. केजरीवाल से कांग्रेस के साथ होने वाले संभावित गठबंधन को लेकर सवाल तो जरूर पूछे जाएंगे कि जिस कांग्रेस पार्टी को आपने पानी पी-पी कर कोसा था वो आज अचानक आप के लिए इतनी अच्छी कैसे लगने लगी तो निश्चित तौर पर केजरीवाल और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं के पास इसका कोई जबाब नहीं होगा। क्योंकि दिल्ली विधान सभा चुनाव केजरीवाल ने कांग्रेस की सरकार और पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जी के खिलाफ भ्र्ष्टाचार के आरोप लगाकर हीं लड़ा था और दोनों बार विजयी भी हुए थे. वो बात अलग है कि दूसरी बार सत्ता में आने के बाद उन तमाम नेताओं से केजरीवाल ने लिखित माफी मांगी थी जिन पर उन्होंने ने चुनाव में भ्र्ष्टाचार का आरोप लगाकर वोट मांगे थे उनमें से एक श्रीमती शीला दीक्षित जी भी है जो आज दिल्ली कांग्रेस इकाई  की अध्यक्ष भी हैं. 
सोशल मीडिया और कांग्रेस समर्थकों के बीच मैं इस गठबंधन को लेकर अलग-अलग राय निकलकर सामने आ रही है. कुछ का कहना है कि कांग्रेस को आप से दूर रहना चाहिए और कुछ का कहना है कि कांग्रेस को आप से गठबंधन कर लेना चाहिए। सभी लोग अपने-अपने तर्कों के साथ अपनी बात को समझाने की कोशिश कर रहे हैं. पर कोई भी ऐसा नहीं कोई है जो आज के जमीनी हकीकत को परख कर बात कर रहा हो. आज हर तरफ सर्जिकल स्ट्राइक और मोदी की बात हो रही है लोग बीजेपी को भूल चुके है बस मोदी याद है तो ये समय की मांग है की गठबंधन कर लिया जाए और एक साथ मिलकर भाजपा और संघ का मुकाबला किया जाय. जैसे १९७८ में देश की सारी पार्टियां एक दुसरे के विरोध को भूलकर एक मंच पर आकर कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा था और जीता था. उस वक्त जनता पार्टी, लेफ्ट की तमाम पार्टियां और जे पी आंदोलन के समस्त क्षत्रप कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हुए थे और एक मंच पर इकट्ठा हुए थे. परन्तु उस समय उन्हें कांग्रेस के किसी नेता ने सांप-छछूंदर, सांप-नेवला , मिलावट की जोड़ी ऐसा कोई उपनाम नहीं दिया था जैसा कि आज दिया जा रहा है. ये समस्त विपक्षी दिग्गज उस वक्त एक साथ आये थे जब कांग्रेस आपातकाल के बाद चुनाव में जा रही थी और ऐसा भी नहीं था कि कांग्रेस कमजोर हो गयी थी अपितु कांग्रेस उस वक्त में एक वट वृक्ष थी.
जो लोग दिल्ली में कांग्रेस और आप के गठबंधन का विरोध करते हैं मैं उनसे दावे से पूछता हूँ कि दिल्ली के समर्पित कार्यकर्ता कांग्रेस के अकेले लोक सभा चुनाव लड़ने पर कितनी सीटें जीता सकते है शायद एक भी नहीं क्योंकि वोटों का जितना अधिक से अधिक बटवारा होगा बीजेपी को उतना अधिक फायदा होगा। इसका उदाहरण हम मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हुए चुनाव में देख सकते हैं. इन राज्यों में मुकाबला केवल कांग्रेस और बीजेपी में था और परिणाम कांग्रेस के हक में गया और असम, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश जहां-जहां वोटों का बटवारा हुआ वहां परिणाम भाजपा के पक्ष में गया. तो उन उत्साही कार्यकर्ताओं को इन घटनाओं से सिखने और पढ़ने की जरूरत है जभी वो एक परिपक्व राजनितिक ब्यक्तित्व बन सकते हैं कि न कि भावों में बहकर उत्तेजित और मुखर होने से.   

Monday, March 4, 2019

वायुसेना का पराक्रम और शाह का आंकड़ा

पाकिस्तान पर हवाई हमला हुए अभी चंद रोज हीं बिता है कि राजनीति सारी मर्यादाओं को पार कर जवानों के पराक्रम को संदेह में लाकर मापने लगे हैं. यह कोई एक दल नहीं कर रहा अब तो इसमें सभी लगे हुए है क्या बीजेपी, क्या कांग्रेस, क्या टीएमसी, क्या आप ? सबने अब एक सुर में अपनी-अपनी तरिके से राजनितिक पत्ते फेटने शुरू कर दिए हैं. शुरुआत होती है केंद की सत्ता धारी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह के द्वारा कल अमित शाह अपने गृह राज्य गुजरात के दौरे पर थे और वहां एक सम्बोधन में उन्होंने मंच से कहा कि हमारी वायु सेना ने दुश्मन देश पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को नष्ट कर दिया और 250 से ज्यादा आतंकी मारे गए. अब इसके बाद वही हुआ जो आप और हम सब देख रहें है. उनके एक इस असंवेदनशील बयान की वजह से उन राजनितिक पार्टियों को मौक़ा मिल गया जो सेना के नाम पर जुबान खोलने में अपने आप को असहज महशूस कर रही थी. 

अमित शाह जी का बयान इसलिए हास्यास्पद है कि एयर स्ट्राइक के बाद जब 27 तारीख को सेना ने अपनी ओर से पत्रकार वार्ता की तो उसमें हताहतों की संख्या देने से साफ़-साफ़ मना कर दिया था और आज भी एयर चीफ ने बोला है कि हम अपना निशाना लगाते हैं न कि लाश गिनते है. अब सारा गड़बड़झाला यहीं से शुरू होता है और विपक्ष के नेता अमित शाह पर ये आरोप लगाने से नहीं चुके कि अमित शाह को सेना पर विश्वास नहीं है जब सेना के मुखिया संख्या बताने से इंकार कर रहें हैं तो अमित शाह के पास कौन सा आधार है जो वो 250 आतंकियों के मौत का ब्यौरा दे रहें हैं. विपक्ष के कुछ नेताओं के शब्द मैं यहां कोट करना चाहता हूँ फिर अपनी बात आगे रखूंगा -

अरविन्द केजरीवाल :

क्या अमित शाह के मुताबिक़ सेना झूठ बोल रही है?

सेना ने साफ़ साफ़ कहा है कि कोई मरा या नहीं मरा या कितने मरे, ये नहीं कहा जा सकता।

अपने चुनावी फ़ायदे के लिए क्या अमित शाह और भाजपा सेना को झूठा बोल रहे हैं?

देश को सेना पर भरोसा है। क्या अमित शाह और भाजपा को सेना पर भरोसा नहीं?
                                                                                                       
                                                                                                              (ट्विटर से)
कपिल सिब्बल :

Modiji :

Is international media :

1) New York Times
2) London based Jane's Information Group
3) Washinton Post
4) Daily Telegraph
5) The Guardian
6) Reuters

reporting no proof of militant losses at Balakot pro-Pakistan ?

You are guilty of politicising terror ?
                           
                                                             (from twitter)

मनीष तिवारी 

AVM RGK Kapoor said "it would be premature to say that what is the number of casualties that we have been able to inflict on those camps and what is the number of deaths," BUT @AmitShah says over 250 Terrorists killed in airstrike. Is this not milking Air Strikes for Politics????

                                                                                                             (from twitter)

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के दावों की पोल खुद उन्हीं के बंगाल से सांसद और केंद्र सरकार में मंत्री S S अहलूवालिया ने खोल दिया. अहलूवालिया के अनुसार सरकार और मंत्री ने कोई बयान जारी नहीं किया कि कितने मरे और  घायल हुए तो मै नहीं जानता की शाह के पास आंकड़ें कहाँ से आये है. उन्होंने कहा कि पकिस्तान में हम किसी को मारने के लिए नहीं घुसे थे हम बस उन्हें दिखाना चाहते थे कि हम कुछ भी कर सकते हैं. अब किस की बात पर यकीन किया जाये अब आप सब जनता को हीं तय करना होगा क्योंकि चुनाव में महज कुछ गिने हुए दिन बचे हैं तो राजनीति तो होगी हीं. अब सच कौन है अमित शाह या जवान मैं नहीं जानता पर मुझे अपने जवानों पर ज्यादा विश्वास है बनिस्पत अमित शाह, केजरी वाल, कपिल सिब्बल के.
जय हिन्द
जय जवान