दिल्ली में मीडिया में चल रही सुर्ख़ियों के अनुसार आज एक अहम और अप्रत्याशित घटना घटित होने जा रही है और वह है कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का आगामी लोक सभा चुनाव के लिए गठबंधन। यह घटना अभूतपूर्व इसलिए भी है कि आम आदमी पार्टी का जन्म २०१२ में घोर कांग्रेस विरोध में अन्ना आंदोलन के वक्त हुई थी और आज वही दोनों पार्टियां एक-दुसरे के साथ फिर से जुड़ रही है. केजरीवाल से कांग्रेस के साथ होने वाले संभावित गठबंधन को लेकर सवाल तो जरूर पूछे जाएंगे कि जिस कांग्रेस पार्टी को आपने पानी पी-पी कर कोसा था वो आज अचानक आप के लिए इतनी अच्छी कैसे लगने लगी तो निश्चित तौर पर केजरीवाल और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं के पास इसका कोई जबाब नहीं होगा। क्योंकि दिल्ली विधान सभा चुनाव केजरीवाल ने कांग्रेस की सरकार और पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जी के खिलाफ भ्र्ष्टाचार के आरोप लगाकर हीं लड़ा था और दोनों बार विजयी भी हुए थे. वो बात अलग है कि दूसरी बार सत्ता में आने के बाद उन तमाम नेताओं से केजरीवाल ने लिखित माफी मांगी थी जिन पर उन्होंने ने चुनाव में भ्र्ष्टाचार का आरोप लगाकर वोट मांगे थे उनमें से एक श्रीमती शीला दीक्षित जी भी है जो आज दिल्ली कांग्रेस इकाई की अध्यक्ष भी हैं.
सोशल मीडिया और कांग्रेस समर्थकों के बीच मैं इस गठबंधन को लेकर अलग-अलग राय निकलकर सामने आ रही है. कुछ का कहना है कि कांग्रेस को आप से दूर रहना चाहिए और कुछ का कहना है कि कांग्रेस को आप से गठबंधन कर लेना चाहिए। सभी लोग अपने-अपने तर्कों के साथ अपनी बात को समझाने की कोशिश कर रहे हैं. पर कोई भी ऐसा नहीं कोई है जो आज के जमीनी हकीकत को परख कर बात कर रहा हो. आज हर तरफ सर्जिकल स्ट्राइक और मोदी की बात हो रही है लोग बीजेपी को भूल चुके है बस मोदी याद है तो ये समय की मांग है की गठबंधन कर लिया जाए और एक साथ मिलकर भाजपा और संघ का मुकाबला किया जाय. जैसे १९७८ में देश की सारी पार्टियां एक दुसरे के विरोध को भूलकर एक मंच पर आकर कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा था और जीता था. उस वक्त जनता पार्टी, लेफ्ट की तमाम पार्टियां और जे पी आंदोलन के समस्त क्षत्रप कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हुए थे और एक मंच पर इकट्ठा हुए थे. परन्तु उस समय उन्हें कांग्रेस के किसी नेता ने सांप-छछूंदर, सांप-नेवला , मिलावट की जोड़ी ऐसा कोई उपनाम नहीं दिया था जैसा कि आज दिया जा रहा है. ये समस्त विपक्षी दिग्गज उस वक्त एक साथ आये थे जब कांग्रेस आपातकाल के बाद चुनाव में जा रही थी और ऐसा भी नहीं था कि कांग्रेस कमजोर हो गयी थी अपितु कांग्रेस उस वक्त में एक वट वृक्ष थी.
जो लोग दिल्ली में कांग्रेस और आप के गठबंधन का विरोध करते हैं मैं उनसे दावे से पूछता हूँ कि दिल्ली के समर्पित कार्यकर्ता कांग्रेस के अकेले लोक सभा चुनाव लड़ने पर कितनी सीटें जीता सकते है शायद एक भी नहीं क्योंकि वोटों का जितना अधिक से अधिक बटवारा होगा बीजेपी को उतना अधिक फायदा होगा। इसका उदाहरण हम मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हुए चुनाव में देख सकते हैं. इन राज्यों में मुकाबला केवल कांग्रेस और बीजेपी में था और परिणाम कांग्रेस के हक में गया और असम, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश जहां-जहां वोटों का बटवारा हुआ वहां परिणाम भाजपा के पक्ष में गया. तो उन उत्साही कार्यकर्ताओं को इन घटनाओं से सिखने और पढ़ने की जरूरत है जभी वो एक परिपक्व राजनितिक ब्यक्तित्व बन सकते हैं कि न कि भावों में बहकर उत्तेजित और मुखर होने से.
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