Tuesday, March 19, 2019

आवारा पशु किसान का दुश्मन

गवईं (गाँव के) अर्थशास्त्र का सबसे बड़ा स्रोत किसानी और पशु-पालन हुआ करता था पर अब देखने को मिल रहा है कि किसान इन दोनों मदों से अपने लिए कोई भी फायदा अर्जित नहीं कर पा रहा है क्योंकि आवारा पशुओं का इतना आतंक हो चूका है वो सारी फसल को चर (खा) जाते है. किसान बेबसी की नजरों से अपनी खेतों को खड़ा होकर बस देखता है और अपनी छाती पिटता है क्योंकि उसकी सारी लागत और मेहनत इन आवारा पशुओं के पेट में चला जाता है. इसके लिए इस सरकार के नियम जिम्मेदार है क्योंकि अब गाय और बछड़ों को कोई खरीदना नहीं चाह रहा है क्योंकि फ़ालतू या बकेना जानवरों को पालना लोगों के लिए इस महंगाई के दौर में किसी विभीषिका से कम नहीं है. भूसा 9 सौ रुपया कुंटल मिल रहा है चलउना (चुनी) 19 रुपया किलो तक हो गयी है. किस गाँव के किसान के पास इतना पैसा होगा कि वो ठाठ (बिना दूध) देने वाली गाय को पाल सके. मजबूर होकर किसान इन जानवरों खासकर गाय, बछिया, बछड़े को अपने गाँव तालुका से दूर छोड़ आते हैं जहाँ वो खेत में खड़ी फसलों को सत्यानाश कर देते हैं और किसान को मजदूरी या आत्महत्या करने पर पर विवश कर देते हैं. मेरा गाँव जौनपुर जिले में त्रिलोचन महादेव नामक स्थान पर पड़ता है. बचपन में मै देखता और सुनता था कि हमारे क्षेत्र में चना, मटर, रहर (अरहर), उर्दी (उड़द) की अच्छी खेती होती थी और हम लोग इनकी रोटी बना कर बड़े ही स्वाद से खाते थे पर ये चीजें आवारा जानवरों की वजह से अब बस सपने में हीं बची है. आवारा पशुओं में केवल गाय और सांड की संख्या है जो लोगों के लिए अब सड़क मार्ग पर दुर्घटना का भी कारण बन रही है. हम बहुसंख्यक लोग गाय और सांड में अपने देवी-देवता की परछाई देखते हैं और पूजते भी है पर वही अब जानलेवा साबित हो रही है. लोग अपने घर से इन्हे हाँक देते है ये सड़क, नदी नाला पार करते हुये बहुत दूर तक विचरण कर आती है. आज के 5 साल पहले तो इनकी छुट्टा पशुओं की संख्या इक्का-दुक्का देखने को मिलती थी पर अब तो इनकी तादाद इतनी बढ़ गयी है जितनी किसान के खूटे पर भी नहीं होगी। मैं पिछली साल के नवंबर में गाँव गया हुआ था धान का सीजन था तो एक सुरकनी लेने के लिए मैं और मेरे चाचा पिंडरा बाजार जा रहे थे जो की बाबतपुर हवाई अड्डे से एक कोस (3 किलोमीटर) दूर था और घर से 8 किलोमीटर। रास्ते में मेरे गाँव के बाद और फूलपुर से पहले एक जगह डिग्घी  पड़ता है वहां नजारा देखकर दंग रह गया कि एक खेत में कम से कम 25 से 30 गाय-बछड़े थे जो रेड़ा पर चढ़े हुए धान को खा रहे थे. यह नजारा देखकर मेरे आँखों में खून उतरने लगा और मैं अपनी मोटरसाइकिल रोक कर उन्हें खेत से दूर खदेड़ा और जब नजदीक से जाकर खेत को देखा तो 6 बिस्वा जमीन पर खड़ी फसल पूरी तरह तबाह हो चुकी थी. यह देखकर मुझे बहुत पीड़ा हुई क्योंकि मैं भी एक किसान हूँ और खेती में होने वाली मेहनत और लगने वाली लागत का अहसास मुझे भी होता है. मेरी तो इस सरकार से यही दरख्वास्त होगी कि हम गाँव वासियों को इन आवारा पशुओं के आतंक से बचा दे बाकी तो जिविकोपार्जन हम खुद से कर लेंगे.

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