Thursday, April 30, 2020

कल इरफ़ान आज ऋषि ने दुनिया को अलविदा कहा

2020 भारत समेत दुनिया के लिए एक अपशकुन सा रहा है. पहले तो कोरोना का प्रकोप साल के शुरुआत में जो रफ्तार पकड़ा अब तक उसी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है. परन्तु हमारे देश के लिए कोरोना के साथ-साथ एक-एक करके दो झटके बड़े लगे. कल इरफ़ान खान और आज ऋषि कपूर दुनिया छोड़कर चले गए. बॉलीवुड समेत भारत के लिए ये एक बड़ा झटका है. दोनों अभिनेता कैंसर नामक बीमारी से पीड़ित थे. लेकिन दोनों में एक बात समान थी कि दोनों जिंदादिल और हंसमुख इंसान थे. इरफ़ान खान बेहद गरीबी से उठकर टी वी सीरियल में काम किया और हमारे बचपन में मशहूर धारावाहिक "चंद्रकांता" में इरफ़ान का रोल बहुत दमदार था. उनकी एक्टिंग का हम सब बचपन से कायल थे. 'पान सिंह तोमर' में इरफ़ान का बागी के रूप में निभाया गया किरदार उनकी दमदार एक्टिंग की वजह से अमर हो गया. इरफ़ान का अंतिम फिल्म 'अंग्रेजी मीडियम' थी.  
ऋषि कपूर भारतीय सिनेमा में एक अध्याय है. उन्हीं के पूर्वजों ने देश में फिल्म निर्माण के लिए जो सोच दिया। उसी पर आज पूरा बॉलीवुड टिका है. ऋषि कपूर बेहद खुशमिजाज और मजाकिया इंसान थे. वो तीन भाई थे. जिनका नाम शशि, शमी और ऋषि कपूर था. स्व. श्री पृथ्वीराज कपूर जी इनके दादा थे. ऋषि जी की शादी नीतू सिंह जी से हुई थी. ऋषि जी का फ़िल्मी सफर 'मेरा नाम जोकर' से शुरू होकर हाल हीं में रिलीज हुई फिल्म '100 नाट आउट' थी. जिसमें अमिताभ बच्चन जी के बुजुर्ग बेटे का किरदार ऋषि जी ने निभाया था. ऋषि जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. भगवान इन दोनों सितारों को स्वर्ग में सर्वोच्च स्थान प्रदान करें।

इन दोनों सितारों को विनम्र श्रद्धांजलि 
    

Tuesday, April 14, 2020

कोरोना का कहर और लाकडाउन भाग -2

जनता कर्फ्यू से होते हुए हम देशवासियों ने 24 मार्च से 14 अप्रैल तक पूरे देश में 21 दिन का लाकडाउन देखा. इस दौरान प्रधानमंत्री जी के आग्रह पर कोरोना को भगाने के लिए पूरे देश में ताली-थाली और दीपोत्सव का सफल आयोजन किया गया. उसके बाद भी दिन-ब-दिन स्थिति गंभीर बनती गयी। जिसका परिणाम ये रहा कि आज से फिर 3 मई तक के लिए लाकडाउन 2.0 को बढ़ा दिया गया है। जनता अब हताश होती नजर आ रही है. लोगों का धैर्य अब टूटने लगा है.

देश की जनता का सब्र टूट अब टूट रहा है-
देश जिस विकट स्थिति से गुजर रहा है. उसने जनता के सब्र की सीमा को लांघते हुए बहुत ऊपर जा पहुंचा है. वो ज्वालामुखी की तरह कब विस्फोट कर जाएगा ? इसका निश्चित अनुमान किसी सरकार या सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी के पास नहीं है. उसी का नतीजा ये रहा कि आज जैसे हीं प्रधानमंत्री जी द्वारा लाकडाउन को सुबह 10 बजे 3 मई तक बढ़ाने का बाकायदा एलान किया गया. तो शाम होते-होते उस बेचैनी का असर महाराष्ट्र में दिखने लगा. जहां बांद्रा रेलवे स्टेशन पर (निकट जामा मस्जिद) प्रवासी मजदूरों की भीड़ हजारों की संख्या में एकत्रित हो गयी. जो कोरोना संक्रमण को देखते हुए एक गंभीर समस्या नजर आने लगी. जो अपने-अपने घरों को लौटने के लिए बेताब थे. कुछ मेरे भी रिश्तेदार जो गाजीपुर जिले के रहने वाले हैं. वो भी बंबई में बहुत परेशान नजर आ रहें है. वो लोग किसी भी कीमत पर गाँव वापस आने के लिए तैयार हैं. हो सकता है कि उनके जैसे लोग हीं उस भीड़ का हिस्सा हों. अंततः भीड़ को तितर-बितर करने के लिए महाराष्ट्र पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा.  
महाराष्ट्र सरकार के युवा मंत्री आदित्य ठाकरे जी ने इस घटना का जिम्मा केंद्र सरकार पर फोड़ने की कोशिश की. आदित्य ठाकरे ने कहा कि "केंद्र सरकार ने लाकडाउन को बढ़ाते हुए दिहाड़ी और प्रवासी मजदूरों का ख्याल नहीं रखी. महाराष्ट्र सरकार सबको भोजन देने  प्रतिबद्ध है. पर केंद्र सरकार को उनका ख़याल रखना चाहिए. यूपी और बिहार के प्रवासी मजदूरों की संख्या महाराष्ट्र में बहुत ज्यादा है. वे सभी लोग अपने घर पहुंचने को बेताब हैं. कुछ ऐसी हीं तस्वीर 24 मार्च के लाकडाउन के बाद दिल्ली , नोएडा और देश के अन्य भागों में देखने को मिला था. जिसमें लाखों लोग सैकड़ों मील दूर अपने-अपने घर के लिए पैदल हीं निकल लिए थे. बाद में जिनके लिए कुछ बसें इत्यादि चलाकर उनके मंजिल तक पहुंचाने का निर्णय राज्य सरकारों ने लिया था. अहमदाबाद, मुंबई, कर्नाटक जहां भी प्रवासी मजदूर फंसे हैं सब पैदल हीं यूपी, बिहार के लिए निकल लिए है.

सुझाव-
  • ऐसे वक्त में हम जितना सम्भव हो सके अपने घरों में रहें.
  • ये महामारी देश को लाशों का टीला बना सकती है, यदि हमने सरकार का साथ नहीं दिया। हम अपने आस-पास के लोगों को भी घर में रहने के लिए प्रोत्साहित करें. 
  • राज्य सरकारें स्वयं सेवी संस्थाओं की सकारात्मकता के साथ उपयोग में लाये.
  • केंद्र सरकार को हर पीएफ धारी के खाते में एक निश्चित रकम आने वाले कुछ महीनों तक जमा करें.
  • राज्य सरकारें, केंद्र सरकार के सहयोग से यह सुनिश्चित करें कि शहर में रह रहे किसी भी किरायेदार को किराया देने के लिए अनावश्यक दबाव न बनाएं.
  • राज्य के मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और केंद्र के मंत्रियों को डाक्टर, पुलिस की तरह सड़क पर उतरकर जनता से सीधा संवाद स्थापित करने की जरूरत है. 


Sunday, April 12, 2020

कोरोना का कहर और लाकडाउन भाग -1

विश्व भर में जनवरी महीने से शुरू हुआ कोरोना का कोहराम आज कहर ढा रहा है. और परिणाम ये है कि हमारे देश में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या 7 हजार पार  कर चुकी है. केंद्र सरकार का ढुलमुल रवैया अभी तक जारी है. 200 से ज्यादा मरीजों की इस वायरस से मृत्यु भी हो चुकी है. लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि कोरोना के संक्रमण को फैलने पर थोड़ा बहुत रोक जरूर लगी है. सरकार लाकडाउन के अलावा और कोई दूसरा तरीका अब तक ईजाद नहीं कर पायी है. देखना है लाकडाउन के भरोसे सरकार कब तक लोगों के बीच में अपने आपको प्रस्तुत कर पाती है.

कोरोना को रोकने में गैर-भाजपाई दलों की सरकारें आगे -

अब तक जिन सरकारों ने इस महामारी को रोकने में सफलता हासिल की है या कहें कि कुछ हद तक वायरस को फैलने से रोका है. उनमें गैर-भाजपाई सरकारों का मुख्य भूमिका रहा है. बात चाहे कांग्रेस शासित राज्य छत्तीसगढ़, राजस्थान की करें या लेफ्ट शासित केरल की. इन सब राज्यों ने कोरोना को रोकने में काफी हद तक सफलता अर्जित की. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने होली बाद से हीं सिनेमा घरों, माल, स्कूल, कॉलेज को बंद करा दिया था. जिसका परिणाम ये हुआ कि छत्तीसगढ़ में मरीजों की संख्या सिमित होकर रह गयी. केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने सुसंगठित तौर पर बहुत हीं बढ़िया काम किया। जब भारत में कोरोना का आगमन हुआ उस समय केरल में मरीजों की संख्या पूरे देश में पहले स्थान पर थी. जो विजयन की प्रशासनिक क्षमता की वजह से आज कंट्रोल करते हुए तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है. इनके अलावा राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने कोरोना से निपटने के लिए एक "भीलवाड़ा" मॉडल तैयार किया। जिसका सफलता का जिक्र देश भर में किया जा रहा है. भीलवाड़ा में एकाएक मरीजों  संख्या में काफी इजाफा हुआ था. जिसे कम वक्त में हीं सामान्य कर दिया और पूरे राज्य में तीव्र गति से कोरोना की नि:शुल्क जांच करवाई। जो पूरे में देश में सर्वाधिक संख्या जांच वाला प्रदेश बना.    
विजयन जी को इस तरह की आपदा से निकलने का बहुत अनुभव है और उनके अनुभवों से केंद्र समेत अन्य राज्यों को सीखने की जरूरत है. 2018 में आये निपाह से निपटने का अनुभव विजयन जी के प्रशासन के पास है. निपाह के वक्त केरल ने हीं पूरे राज्य को तीन जोन येलो, ऑरेंज, ग्रीन में बांटकर उसे खत्म किया था. वही मॉडल आज महाराष्ट्र से झारखंड, छत्तीसगढ़ तक अपनाया जा रहा है. 

बीजेपी के मुख्यमंत्री लाचार क्यों ?

इन सबके बीच बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री कहीं नजर नहीं आ रहें हैं. बीजेपी से अकेले मोदी जी हीं नजर आ रहे हैं. क्योंकि उनकी मजबूरी ये है कि अगर वो कोई प्लान लेकर सामने आते हैं तो सरकार उनकी ही पार्टी पर उठने शुरू हो जाएंगे। आप देखेंगे कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश में स्थिति कितनी भयावह बनी हुई है. शिवाय घोषणा के जमीन पर कोई काम नजर नहीं आ रहा है. बीजेपी मुख्यमंत्रियों के पास भी इस लड़ाई से लड़ने के लिए अच्छे विचार है. पर चाह कर भी उसे वो जनता के सामने नहीं ला पा रही है. 

कांग्रेस आगे बढ़ कर कोरोना पर लड़ाई लड़ती हुई दिख रही है 

कांग्रेस पार्टी कोरोना के मुद्दे पर आगे बढ़ते हुए लड़ाई लड़ते हुए दिखना चाह रही है. उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस ने एक चाल के मुताबिक अपने राज्यों को मीडिया के सामने ला रही है और बारी-बारी से पत्रकार वार्ता करवा रही है. जिनमें सवाल-जबाब का सिलसिला भी रखा जाता है. इसी तरह की एक पत्रकार वार्ता में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने कहा कि 'हमारे नेता राहुल गांधी जी ने काफी पहले हीं तैयारी करने का निर्देश दे दिया था. जिसकी वजह से हमारी सरकारों ने इससे निपटने में सफलता पाई. भूपेश बघेल ने ये कहते हुए सरकार से भी सवाल पूछ लिया कि "यदि विदेश से आने वालों को सरकार हवाई अड्डे हीं रोक लेती और चेक करती तथा हवाई जहाज़ों को रद्द कर देती तो आज इतनी बुरी स्थिति देखने को नहीं मिलती. इससे एक बात स्पष्ट तौर पर दिख रहा है कि कांग्रेस अब सरकार को घेरना शुरू कर चुकी है. 

Tuesday, April 7, 2020

मौसम का बदलता मिजाज और देश में कोरोना का कहर

मौसम का बदलता मिजाज और देश में कोरोना का कहर एक साथ घटित हो रहा है. रोज-रोज देश के अनेक हिस्सों से नए केस आ रहें हैं. लेकिन अब  सरकार ने इसका कोई ठोस इलाज नहीं निकल सका है. लेकिन मुँहजोरी चारो तरफ से जारी है. जहां विपक्ष सत्ता पर ऊँगली उठा रहा है वहीं सत्ता अब अपनी अकड़ कम करते हुए विपक्ष के नेताओं से मेल-मिलाप और वार्तालाप करने की कोशिश कर रहा है. मुझे लगता है कि मोदी १ और मोदी २ के कार्यकाल में विपक्ष को साधने की ये पहली कोशिश है. सरकार अब विपक्ष की महत्ता को समझने लगी है और विपक्ष से कोरोना से निपटने के लिए राय भी मांगना शुरू कर दिया है. जो देश की राजनीति के लिए एक अच्छी बात है. मीडिया खबरों से पता चला कि दो दिन पहले मोदी जी ने सोनिया समेत समस्त विपक्ष के नेताओं से बात की और कोरोना से लड़ने के लिए उन नेताओं से सुझाव भी मांगे. आज कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी जी द्वारा ५ सुझाव भी दिया गया. जिस पर यदि सरकार अमल करती है तो समाज में एक अच्छा संदेश जाएगा.
मोदी एंड कम्पनी को चाहिए कि इस आफत की घड़ी में अपने अहम को त्यागकर देशहित में सोचें और अपने अज्ञानी प्रवक्ताओं को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भड़काऊ बयानबाजी करने से रोके. और सरकार को निम्न बातों की तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहिए -
1. सरकार को कोरोना टेस्ट की गति बढ़ाने की तरफ बहुत जल्दी कदम उठाने की आवश्यकता है.
2. ग्रामीण क्षेत्रों में जांच के लिए स्वास्थ्यकर्मियों की प्रशिक्षित टीम का एक टास्क फ़ोर्स बनाना चाहिए। जो गांव के हर नागरिक का घर-घर जाकर टेस्ट करें.
3. जो लोग संक्रमित नजर आए. उनको कुछ दिनों नसरकारी निगरानी में रखा जाय.
4. देश के समस्त नागरिकों को अनाज और जरूरी सामान की उपलब्धता सुनिश्चित करना सरकार के प्रमुख अजेंडे में शामिल करना होगा.
5. दिहाड़ी मजदूरों को उनके खाते में किश्तों में नगद भुगतान का प्रबंध सरकार को करना चाहिए.
6. छोटे और मझोले उद्योगपतियों को उद्योग में कर एवं अन्य तरिके से कुछ सरकारी रियायत देकर ब्यवसाय को बूस्ट करने के लिए नियमों में ढील देने की आवश्यकता है.
7. लकडाउन में फंसे लोगों को निकालने के सरकार को एक पारदर्शी एवं सहूलियत भरा फैसला करना चाहिए.
   



















Sunday, April 5, 2020

क्या मोदी को कोई विपक्ष का नेता टक्कर दे पायेगा

कल भारत के प्रधानमंत्री ने देश के अधिकतर अपने समर्थकों को दिया जलाने के काम पर लगा गया. जिसे भक्त मंडली ने बखूबी अंजाम दिया. एक बात समझ में नहीं आयी या ये कहें तो भक्तों ने ये नहीं सोचा कि कोरोना जैसी महामारी से बचने के लिए दिया नहीं दवा की जरूरत है. प्रधानमंत्री के दिया और थाली बजाने वाले अभियान का उनके समर्थकों ने इतने शिद्द्त से निभाया कि मानो कोरोना अब देश छोड़कर भाग हीं जाएगा. सब लोग सोशल मीडिया पर दिया की फोटो अपलोड करने लग गए और अपने आप को सच्चे देशभक्त के रूप में प्रदर्शित करने लगा गए. सोशल मीडिया के माध्यम से कुछ ऐसी तस्वीरें भी देखने को मिली कि कुछ अति उत्साही भक्त सर पर दिया लेकर मोदी-मोदी चिल्ला रहे हैं तो कुछ सिलेंडर जलाकर उजाला करने लगे. हैदराबाद से बीजेपी विधायक राजा सिंह तो दिया जलाकर प्रधानमंत्री जी के सोशल डिस्टेंसिंग का खुला मजाक उड़ाते हुए मशाल जुलूस भी निकाल दिया.
शायद प्रधानमंत्री जी को अपने समर्थकों पर पूरा यकीन था. जभी तो ताली-थाली के बाद दिया जलाने के काम पर लगा दिया. और उसका भरपूर उपयोग भी किया गया. मुझे ये लगे लग गया है कि मौजूदा दौर में विपक्ष का कोई और नेता नजर नहीं आता है। जो मोदी जी की लोकप्रियता को चुनौती दे सके. ऐसा मैं अपने घटित अनुभवों के आधार पर कह रहा हूँ. मैं ताली-थाली और दिया जलाने तक के प्रधानमंत्री के दोनों अभियानों के वक्त अपने पैतृक गाँव में था. उस दौरान मैंने एक बात देखीं कि लोगों ने जातियों के विभेद को तोड़ते हुए ताली-थाली भी बजाया और आज रात बिजली बंद करके दिया, मोमबत्ती भी जलाया. हमें आलोचना करनी चाहिए लेकिन अगर किसी का कुछ आकर्षण है तो उसकी प्रशंसा भी खुले दिल से करना चाहिए.

Saturday, April 4, 2020

कोरोना ने रोज कमाने खाने वालों को किया निर्धन

मैं गांव में देख रहा हूँ कि कोरोना नामक महामारी ने रोज कमाने खाने वालों को किया निर्धन कर दिया है. आज त्रिलोचन महादेव के एक ऐसे हीं ब्यक्ति से मुलाक़ात हुई. जिनका नाम पप्पू है. जाति से वो 'अग्रहरि' हैं. परन्तु वो रोज कमाकर खाने वालों में से हैं और बीजेपी के पक्के सपोर्टर भी हैं. आज जब उनसे मंदिर पर मिला तो उनकी पीड़ा अपने आप बाहर निकल गयी. उन्होंने मुझे सम्बोधित करते हुए कहा कि बाबा अब कुछ भी नहीं बेच पा रहा हूँ. और खाने के लिए घर में एक अधेला भी नहीं। ऊपर से गैस भी खत्म हो गयी. इन सब के एवज में मेरे पास मात्र एक हजार रूपया है. लगभग इतने पैसों से बस गैस को भरवा सकता हूँ. पर उसके बाद क्या खाऊंगा ? इस बात की चिंता है. अगर ये लाकडाउन १४ अप्रैल के बाद भी आगे बढ़ता है. तो हम जैसों के लिए जानलेवा साबित हो जाएगा।
ऐसे में सरकार को चाहिए कि जितने भी कार्ड धारक नागरिक हैं. वो चाहे किसी भी श्रेणी के हों सबको कम से कम हर महीने एक निश्चित अनुपात में अनाज, तेल, दाल और गैस की उपलब्धता अधिकारीगण के माध्यम से सुनिश्चित कराये। इस कदम से जनता का सरकार में इकबाल भी बुलंद होगा और ख़ुशी-ख़ुशी इस महामारी को देश के लोग मिलकर हरा भी देंगे। मैं खुद एक नौकरी पेशा (प्राइवेट) इंसान हूँ. मैं अपने भविष्य को लेकर खुद आशंकित हूँ. हमारे क्षेत्र का एक उसूल है कि आप अगर अपनी सैलरी का १० गुना काम कर दोगे तो आपको उसका दसवां हिस्सा वेतन के रूप में दिया जाएगा। इन दिनों जब हम काम हीं नहीं कर पा रहें हैं तो बास हमें वेतन किस बात का देगा ? पप्पू जैसे करोड़ों लोगों की यही ब्यथा है. राम जाने अब आगे होता है  क्या ?