Saturday, December 29, 2018

संजय बारू की किताब "द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर" पर बनी फिल्म पर बवाल


बिपिन नंदलाल गिरि 

संजय बारू जो की यूपीए की सरकार के वक्त प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह जी के मिडिया विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे थे तो उन्होंने नौकरी खत्म होने के बाद " एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर" नाम  किताब लिखी थी जो बाजार में 2014 के लोकसभा चुनाव से ठगीक पहले बाजार में आम लोगों के लिए उपलब्ध हुई थी. उस किताब में उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी पर बहुत से संगीन आरोप लगाए थे कि किस तरह से सोनिया गाँधी मनमोहन सिंह के सरकारी काम में बाधा डालती थी, उन पर अपनी मर्जी से काम करने का दबाव डालती थी इस तरह के कई आरोप थे. तो उस किताब पर अब एक फिल्म बनी है और इस फिल्म के मुख्य कलाकारों के नाम और उनके कार्य के अनुसार विवरण प्रस्तुत कर रहा हूँ-

अनुपम खेर- इस फिम में अनुपम खेर मुख्य भूमिका में है इन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का किरदार निभाया है, इनकी धर्म पत्नी महोदया भारतीय जनता पार्टी से पंजाब प्रान्त की वर्तमान लोकसभा सांसद है और अनुपम खेर भाजपा के समर्थक हैं तो ये फिल्म कितनी निष्पक्ष होगी आप दर्शक और श्रोताओं के विवेक के ऊपर मैं छोड़ना चाहता हूँ.

अशोक पंडित- ये इस फिल्म के निर्देशक है और ये अपनों आप को काश्मिरी पंडित कहते है जो कभी कश्मीरियों को देखने तक नहीं जाते और 1990 में हुए कश्मीरी पंडितों के विस्थापन के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार मानते हैं और भाजपा के पिठ्ठू (चमचा) है.

गुट्टे- इस फिल्म का निर्माता है जो ३२ करोड़ की जीएसटी की चोरी करने के  के आरोप में हाल में ही जेल भी जा चुका है तो आप इस बात से भी इनके हैसियत का अंदाजा लगाना कोई कठिन  होना चाहिए।

अपनी किताब में संजय बारू ने लिखा है-पीएमओ में तैनात रहे मेरे पूर्ववर्ती लोगों ने अपने कार्यकाल के दौरान की यादों को कभी किताब की शक्ल देने की कोशिश नहीं की. यहां तक कि कई प्रतिष्ठित पत्रकारों ने भी यह पहल नहीं की. मसलन, कुलदीप नैयर, बीजी वर्गीज, प्रेम शंकर झा, एचके दुआ जैसे नामी पत्रकार कई प्रधानमंत्रियों के साथ काम कर चुके थे. प्रेस सचिव ही नहीं मातहत अफसरों ने भी ऐसी कोई किताब नहीं लिखी, जिससे उनके बॉस के व्यक्तित्व और राजनीति की झलक मिले. जबकि भारत की तुलना में अमेरिका और ब्रिटेन नें कई प्रेस सचिवों ने वहां के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्री के कार्यकाल के बारे में स्वतंत्र रूप से किताबें लिखीं हैं. (Copy)

अब हम फिर से घूम के आते हैं संजय बरुआ की तरफ इस फिल्म में या कह लें तो किताब में संजय बरूआ बताते हुए पाए जा रहें है कि वो इस्तीफा देने जा रहे थे और सोनिया गाँधी राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री बनाना चाहती थी फिर मनमोहन के मुंह से इस्तीफे की बात सुनकर वो कहती हैं कि इस्तीफा देने का ये सही समय नहीं है सरकार पर अभी भ्र्ष्टाचार के आरोप लग रहें है और ऐसे में राहुल  को प्रधानमंत्री कैसे बना सकते है. इस तरह के कुछ विवादस्पद बातें फिल्म के ट्रेलर में देखने को मिल रही है जो सरासर गलत है इस मामले में देश के एक वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई ने "24 Akbar Road: A Short History Of The People Behind The Fall And Rise Of The Congress" किताब में उल्लेख किया है आप अपने आप को समझने के लिए इस किताब को पढ़ें और सही गलत का फैसला करें।
बहरहाल मैं फिर से संजय बरूआ की तरफ मैं फिर से अपना रुख करता हूँ और तर्कों के माध्यम से मई उसे झूठा साबित करता हूँ कि संजय बरूआ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के एक मात्र कर्मचारी थे इससे ज्यादा की उनकी हैसियत नहीं थी और वो सोनिया गाँधी के बेटे तो थे नहीं जो सोनिया गाँधी उनके सामने सारी बात करती थी और तो मनमोहन सिंह जी के पास वो हर वक्त रहते थे उनकी औकात एक सरकारी नौकर की थी और वो वही थी. जब मनमोहन सिंह जी वित्त सचिव थे तब संजय बरूआ के पिता मनमोहन के जी के साथ काम करते थे और इसी आधार पर उन्हें मनमोहन सिंह ने मीडिया एडवाइज़र के पद पर नियुक्त किया था
2013 में लालू प्रसाद को अदालत से सजा होने के बाद तत्कालीन मनमोहन सरकार ने नेताओं को जेल जाने से बचाने और चुनाव लड़ने के पक्ष में एक अध्यादेश ले कर आये थे और उसे राहुल गाँधी ने प्रेस के सामने ये कहते हुए फाड़ दिया था कि ये समाज में गंदगी फैलाएगा और मैं भी गाँधी के इस बात से सहमत था, जब राहुल गाँधी द्वारा ये आर्डिनेंस फाड़ा गया उस समय मै स्नातक की पढ़ाई पूरी करके दिल्ली में हीं जॉब कर रहा था और यह घटना शाम के समय एक पत्रकार वार्ता में हुई थी इसलिए मुझे यह अक्षरशः याद है. यह घटना जब हुई उस समय मनमोहन जी विदेश दौरे पर थे तो इसका भी जिक्र इस फिल्म में मनमोहन जी को अपमानित करने के तरिके से दिखाया है और  इस फिल्म को बनाने का एकमात्र उद्देश्य कांग्रेस पार्टी को नीचा देखने का है और पूर्व प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह के ब्यक्तित्व के माध्यम से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को बदनाम करने की चेष्टा भर है. 
अगर संजय बारू इतने विश्वसनीय थे तो 2008 के बाद मनमोहन सिंह ने उन्हें अपने साथ क्यों नहीं रखा और 2014 में हीं इनकी किताब बाजार में क्यों आयी पहले भी सकती थी और फिल्म 2019 जनवरी में क्यों रही है पहले भी सकती थी. इसमें तथ्य कुछ भी नहीं है क्योंकि मनमोहन सिंह जी ने इन सभी आरोपों को सिरे से नकार दिया था. इस फिल्म में सिवाय राजनीति के और कुछ नहीं है क्यों कि भारतीय जनता ने ट्विटर पर अपने आधिकारिक अकाउंट से ट्वीट किया है तो अब आप अपने विवेक का प्रयोग करे और सत्य-असत्य की पहचान करें।



Thursday, December 27, 2018

संघ समर्पित लोगों की बातों में दोगलापन

शुरुआत में ही मैं यह साफ़ करना चाहता हूँ कि यह लेख कल शाम को अपने साथ हुए अनुभव के आधार पर लिख रहा हूँ और इस लेख का कथानक सौ फीसदी सत्य है और चरित्र का नाम बदला हुआ है.

बात यहां से शुरू होती है मेरे एक रिश्तेदार महोदय दुर्घटना का शिकार हो गए थे भगवान उन्हें जल्द से जल्द स्वस्थ्य करें मेरी मेरे त्रिलोचन बाबा से यही कामना है. इस दुर्घटना में उनका कंधे में फ्रैक्चर हो गया था तो मुझे भी दोपहर में खबर मिली मै बात किया तो पता चला अब हो हस्पताल से घर आ चुके हैं तो मैं उन्हें देखने उनके घर पर गया प्रणाम, आशीष हुआ हाल-चाल जानने के बाद बैठक थोड़ी लम्बी हो गयी तो जिन्हें देखने के लिए मैं गया था उनके बड़े भाई भी दुर्घटना की खबर सुनकर बनारस (मोदी वाला क्योटो) से आनन-फानन में आये थे और वो महाशय संघ समर्थित मजदूर संघ बी एम एस (भारतीय मजदूर संघ) के पदाधिकारी थे वो पूज्य चचा जी बताने लगे की संगठन के काम से पिछले हफ्ते नागपुर गया था वह सब बढ़िया माहौल में बात-चीत हुई इतने में बीच में हीं मैं उन्हें छेड़ते हुए बोला कि चचा जी 'मंदिरवा कब बनी' इतना सुनते हीं सकपका से गए फिर खुद को संभालते हुए बोले 'मंदिरवा त संघ के एजेंडा में रहब ना कयल उ त सरकार बनाई' तब मैं बोल पड़ा कि चाचा जी मैं तो यही सुना था कि संघ, विहिप, हिन्दू महासभा, बजरंग दल इन सबका उद्देश्य तो मंदिर था और अब कैसे बदल गए इसका जबाब उनके पास नहीं था तो उनमें से एक चच्चा जिनको दुर्घटना में चोट लगी थी और तीन लोग संघ, भाजपा समर्थित थे उनकी और मेरी आगे की बात-चीत का ब्यौरा अब शुरू होता है-

छेदी - ऐसा है कि बिपिन का दिमाग किसी कांग्रेसी ने साफ़ कर दिया है और अपनी बात इनके दिमाग में ठूंस-ठूंस कर भर दिया है.
मैं - नहीं चचा आप गलत बोल रहें है किसी कांग्रेसी ने मेरे दिमाग में कुछ नहीं भरा है मैं खुद से गलत सही को  कोशिश करता हूँ.
छेदी - नहीं बेटा तुम्हारा दिमाग तो किसी ने भर रखा है और मेरा मानना है कि कांग्रेस ने तुम्हे आतंकवादी बनाया है, उनको टोकते हुए.... 
मैं - नहीं चचा कांग्रेस आतंकवादी नहीं पैदा करती और नहीं सनातन हिंदुत्व आतंकवादी पैदा करता है हां देश में कुछ कट्टर संगठन दोनों धर्मों में है वही ऐसे हानिकारक तत्व पैदा करते हैं. अब दुसरे का प्रवेश होता है 
रवि - क्यों कांग्रेस ने हीं तो कर्नल पुरोहित, साध्वी प्राची, संत असीमानंद को आतंवादी बता कर फंसाई थी अब सब बरी हो गए हैं.
मैं - हाँ कोर्ट ने बरी किया है तो उसका सम्मान होना चाहिए और समझौता एक्सप्रेस में जो ब्लास्ट हुआ था वो अपने से हो गया था, मक्का मस्जिद का ब्लास्ट अपने से हो गया था इतना सुनते हीं चुप हो गए, फिर 
छेदी - बात पलटते हुए नेहरू जी, गाँधी जी, इंदिरा जी और सोनिया जी के बारे में अपशब्दों की बौछार करने लगें.
मैं - छेदी चचा को टोकते हुए आपके के पास कोई सुबूत है कि ये लोग फला काम में लिप्त थे है तो बताओ, वैसे किसी के चरित्र हनन करने का कार्य आपके संगठन द्वारा बहुत सफाई से किया जाता है, थोड़ा वक्त निकाल कर अटल जी के बारे में पढ़ लेना.
छेदी - बात पलटते हुए आखिर ये बताओ हम हिन्दू तो मंदिर का मुकदमा लड़ने के लिए आरएसएस और विहिप के माध्यम से चंदा देते हैं तो उस मुल्ले को कहां से मिलता है तुम्ही बताओ कांग्रेस मुल्लों को पैसे नहीं देती।
मै - हे चचा जैसे आप अपने संगठन के माध्यम से मंदिर के लिए चंदा देते है वैसे हीं उनका भी कोई संगठन होगा.
रवि - अब तो भगवान को भी अपना जन्म पत्री दिखाना पद रहा है, और वो कांग्रेस हीं थी जिसने राम को काल्पनिक कहा था.
में - ये कहा था तो कांग्रेस की गलती थी पर सुप्रीम कोर्ट वाला हलफनामा आप ने कभी पढ़ा है.
रवि - नहीं 
मैं - फिर एक बार वक्त निकाल कर जरूर पढ़े.
रवि - तुम बताओ राम-मंदिर बनना चाहिए कि नहीं.
मैं - बिल्कुल बनना चाहिए पर बिना खून-खराबे के 
रवि - फिर कांग्रेसी बनने क्यों नहीं दे रहें है ?
मैं - आपको किसने कहा की कांग्रेसी रोक रहे है.
रवि - सब कहते है, इतने में छेदी चचा की फिर से एंट्री होती है       
छेदी - आरएसएस 10 रूपये का चंदा काट रहा था मंदिर के लिए और मैं चार जगह 100 रूपये का अलग-अलग चंदा कटवाया 
मैं - क्यों ?
छेदी - अपने हिंदुत्व की रक्षा के लिए और क्यों न करूं मैं हिन्दू हूँ, तैश में आते हुए.
मैं - अच्छा अब आपकी सरकार में भी हिंदुत्व खतरे में आ गयी वाकई चचा जी ये निकम्मी सरकार है, मुझे टोकते हुए 
छेदी - नहीं हम खुद से देते हैं सरकार बहुत बढ़िया है, उनको रोकते हुए 
मैं -  चच्चा जी सनातन हिंदुत्व खतरे में नहीं है ये 1925 के बाद वाला संघी हिंदुत्व खतरे में है 
छेदी - मतलब हिन्दू तो हिन्दू 
मैं - हाँ चचा हिन्दू तो हिन्दू होता है मेरा वाला सनातन हिन्दू 7000 साल से भी पुराना है और आप जिस हिंदुत्व की बात कर रहे हैं उसकी पैदाइश 1925 में आरएसएस के प्रथम संस्थापक हेडगेवार ने की थी उनकी एक पुस्तक "द बंच ऑफ़ थॉट्स" पढ़िए.
छेदी - चुप और उनके साथ रवि और जो दो लोग बैठे थे वो भी शांत हो गए पर एक महीन से आवाज मंदिर को लेकर फिर आयी, उस महाशय को मैं नहीं जानता था.
मैं - आप जिस मंदिर की बात कर रहे हैं उसे बनाने का तरीका सुलझा लिया गया था और तरीका ये था कि विदेशी तकनीकि के माध्यम से मस्जिद को थोड़ा दूर खिसका दिया जायेगा और उस स्थान पर मंदिर का निर्माण कर दिया जायेगा और ये बात चचा मैं नहीं कह रहा ये शीतला सिंह नामका पूर्वांचल में एक मशहूर पत्रकार ने अपनी किताब में जिक्र किया है जिसे आज तक संघ और बीजेपी के तरफ से कोई चुनौती नहीं मिली है. श्री सिंह अपनी किताब में लिखते है कि-

देवरस और सिंघल के इस कटु वार्तालाप की पुष्टि का दावा मैं नहीं कर रहा अपितु यह वरिष्ठ पत्रकार और अयोध्या में निर्मित विवाद को सुलझाने के लिए बने अयोध्या विकास ट्रस्ट के संयोजक शीतला सिंह जी ने किया है. शीतला सिघ जी फ़ैजाबाद से निकलने वाले अखबार जन मोर्चा के संपादक है. शीतला सिंह जी का फ़ैजाबाद, अयोध्या समेत पूर्वांचल के लोगों में बहुत सम्मान है उन्होंने यह उल्लेख ‘अयोध्या - रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का सच’ नामक अपनी किताब में दर्ज की है.

रवि - अरे छोड़ो यार.
मैं - चाचा जी इसीलिए कहते है कि सुनी-सुनाई बात पर अगर यकीन करोगे तो मुंह की भी कहानी पड़ सकती है.
रवि - ऐसा नहीं है. 
मैं - तो आप जबाब दिजिये कि कांग्रेस ने कब रोका.
रवि - भाई मैं नहीं जानता मैं तो सुन के बता रहा था.
मैं - तो चचा अब से पढ़के बात करना चुटकी लेते हुए बोला.
फिर सब हंसने लगे और मुझे भी मेरे घर जाने का वक्त हो चला था इसलिए मैं बोलै कि हर किसी से उम्मीद करता हूँ चाहे वो किसी भी विचार का हो बिना जानकारी के किसी पर कोई आक्षेप न लगाएं अन्यथा कभी-कभी समस्या खड़ी हो सकती है.
अब वर्क का अंत हो चूका है पैर छूकर मैं भी अपने घर को चल दिया.       

Wednesday, December 26, 2018

समाज की बेचैनी का लाभ अंग्रेजो के मुखबीर उठा रहे है

समाज में आज लोग बहुत परेशान हैं उनकी परेशानी के कारण अनेक हैं और उन्ही कारणों का फायदा उठाकर आज लोग हिन्दू-मुस्लिम में उलझा रहें हैं और लोग उलझ भी रहें है. मंदिर-मस्जिद के अलावा हाल के 10 दिनों में कुछ और मुद्दे बहुत हावी रहे हैं सिवाय रोजी-रोजगार के. एक हफ्ते पहले फिल्म कलाकर नसीरुद्दीन शाह का एक बयान सत्ता और मीडिया को मिर्च-मसाला परोसने का काम किया था उसका अभी निराकरण हुआ भी नहीं था कि कल यानी 25 दिसंबर को नोएडा सेक्टर 58 के एक पार्क में नमाज को लेकर मामला गरम हो गया और टीवी से लेकर हर जगह लोग चटखारे मार रहे थे कि भक्तों के अनुसार देश के सबसे सच्चे कलाकार और संघ, भारत माँ के सच्चे सपूत अक्की उर्फ़ अक्षय कुमार ने टोरंटो (कनाडा) को अपना घर बता दिया और बोले कि बॉलीवुड से रिटायर होने के बाद मैं अपने घर टोरंटो वापस आऊंगा। वैसे बहुत कम लोगों को पता है कि अक्की जी का घर वाकई टोरंटो में है पर भक्तों को ये बताने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि उनकी भावनाएं आहत हो जाएँगी और वो आमिर खान को विदेश भेजने लगेंगे, अब आप लोग भी सोच रहे होंगे कि बात अक्षय, नासिर और मस्जिद की थी तो आमिर ! तो मै आपको बताना चाहता हूँ कि भक्तों को सही गलत की पहचान कहाँ होती है वो तो बस मुस्लिमों में खोट देखते है ये तो अक्की भैया ठहरे देशप्रेमी हिन्दू जो भले हीं टोरंटो वाले हो इससे कुछ नहीं होता पर पकिस्तान या देश से बाहर तो आमिर, सलमान, शाहरूख, नासिर साहेब जैसे लोग हीं जायेंगे.

देश में अब वही सच्चा और सबसे बड़ा देशभक्त कहलायेगा जो जोर-जोर से चिल्लायेगा मोहन भागवत जिंदाबाद और नेहरू गाँधी को जितना अपशब्द बोलेगा वो उतना बड़ा राष्ट्रभक्त कहलायेगा क्योंकि ये यही शोर मचाकर आज झोला छाप देशभक्त बने हुए है. आप को 1942 वाला अंग्रेजों के खिलाफ भारत आंदोलन तो याद हीं होगा उसमें आरएसएस और हिन्दू महासभा ने कितनी बड़ी देशभक्ति निभाई थी जो अंग्रेजो के साथ जाकर खड़े हो गए थे और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले लोगो की जासूसी कर रहे थे ऐसे वीर थे ये और उनकी ये वीरता का प्रमाण देखकर सारे वीर दंग मान जाते थे और जिसकी वजह से इन अंग्रेजी वीरों को आजाद देश में आज तक अपनी एक अदद पहचान बनाने के लिए जूझना पड़ रहा है इसीलिए तो जिन्होंने कभी गाँधी जी को गोली मारने वाले गद्दार गोडसे का समर्थन करते हुए हत्या की खबर सुनकर देश के अनेक हिस्सों में मिठाइयां बाटी थी वो अब अपनी एक अदद पहचान के लिए गाँधी जी को अपनाने की कोशिश कर रहें हैं और तो जिस सरदार वल्लभ भाई पटेल जी गाँधी जी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबन्ध लगया था वो अब पटेल जी को भी अपनी विरासत मानने में तुले हुए हैं तो हुई न बात वीरता की. तो भाइयों ऐसे-ऐसे फर्जी वीर भरे हुए है हमारे समाज में हमें बस इन्हें समझने की जरूरत है और इनको अपने बीच से निकाल फेकने की जरूरत हैं महात्मा गाँधी जी के अनुसार जो जीव-जंतु, मनुष्य इस देश में रह रहा है वो सब देश भक्त है क्योंकि सब के सब किस न किसी रूप से राष्ट्र की सेवा कर रहे है तो ऐसे फर्जी राष्ट्रवादियों को पहचानों और उनसे खुद को तथा समाज से दूर करने का अपना राष्ट्रिय फर्ज निभाएं.


Tuesday, December 25, 2018

राम मंदिर का आंदोलन झूठ और राजनितिक मंशा से चढ़ा परवान : सच की पड़ताल

आज देश में राम मंदिर निर्माण के लिए देश के कुछ कट्टर हिन्दू संगठनों जैसे शिव सेना, विहिप, आरएसएस, श्री राम सेना, हिन्दू युवा वाहिनी खूब जोर-शोर से उठा रहे है कि राजाराम के मंदिर का निर्माण में एक पंथ आड़े आ रहा है और ये लोग उस धर्म को मानने वालों के प्रति बहुसंख्यक लोगों के मन में जहर भरने का काम कर रहें है आइये हम कुछ ऐतिहासिक सन्दर्भों से इस बात को समझते है और लोगों को समझने के लिए उन विवेक पर छोड़ देते है.

आरएसएस का मकसद मंदिर निर्माण नहीं दिल्ली के सत्ता थी-

जो लोग आज नारा लगा रहें है कि श्री राम मंदिर निर्माण में देरी होने से हिन्दुओं के सब्र का पैमान भर गया अगर ये पैमान छलक जायेगा तो देश के लिए अच्छा नहीं होगा इस लिए जल्द से जल्द राम मंदिर का निर्माण शुरू किया जाये और अब आपको ये जानकर हैरानी होगी कि आज से लगभग ३१ साल पहले जब विहिप के अशोक सिंघल तब के आरएसएस प्रमुख  बालासाहेब देवरस के सामने गए तो तो देवरस उन पर बहुत बुरी तरह भड़क गए और डाँटते हुए सिंघल से बोले की अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए राजी कैसे हो गए तुम तो संघ के पुराने स्वयंसेवक रहे हो और तुम्हें पता है हमारा मकसद राम मंदिर का निर्माण नहीं बल्कि दिल्ली की साबित पर काबिज होने का है. उस वक्त एक फार्मूला बना था कि विदेशी तकनीक के माध्यम से मस्जिद को खिसका कर दूसरी जगह कर दिया जायेगा और राम चबूतरा को आजाद कर दिया जायेगा और उस पर मंदिर निर्माण का कार्य किया जाएगा। इस तरह किसी भी भवन को एक जगह से दुसरी सफलतापूर्वक स्थापित करने का फार्मूला दुबई में सफल भी हो चूका था जब एक अस्पताल को बनाने के लिए मस्जिद को इस विधि द्वारा हटाया गया था. 

बालासाहब देवरस - वैसे भी देश में 800 राम मंदिर है एक और बन जायेगा तो 801 वां राम मंदिर होगा हमारा आंदोलन जन-भावनाओं के साथ जुड़कर बड़ी सफलता से आगे बढ़ रहा था और हमारा लक्ष्य दिल्ली की सत्ता है न कि मंदिर तुमने आंदोलन के पीठ में छूरा घोपा है.
दिसंबर1987 का वो महीना था जब बालासाहब देवरस ने जो कहा उसे सुन खुद अशोक सिंघल चकित हो गए थे. 
देवरस और सिंघल के इस कटु वार्तालाप की पुष्टि का दावा मैं नहीं कर रहा अपितु यह वरिष्ठ पत्रकार और अयोध्या में निर्मित विवाद को सुलझाने के लिए बने अयोध्या विकास ट्रस्ट के संयोजक शीतला सिंह जी ने किया है. शीतला सिघ जी फ़ैजाबाद से निकलने वाले अखबार जन मोर्चा के संपादक है. शीतला सिंह जी का फ़ैजाबाद, अयोध्या समेत पूर्वांचल के लोगों में बहुत सम्मान है उन्होंने यह उल्लेख ‘अयोध्या - रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का सच’ नामक अपनी किताब में दर्ज की है।  
शीतला सिंह जी ने अपनी किताब के पृष्ठ संख्या 110 में इस घटना का ज़िक्र करते हुए लिखे हैं। उनकी इस जानकारी का मुख्य स्रोत के. एम. शुगर मिल्स के मालिक और प्रबंध संचालक लक्ष्मीकांत झुनझुनवाला हैं। झुनझुनवाला जी  उस वक्त केविश्व हिन्दू परिषद् के वरिष्ठ नेता विष्णुहरि डालमिया के कहने पर उनके लिए कुछ काग़ज़ात लेने शीतला सिंह के पास आए थे और काग़ज़ लेकर दिल्ली लौट गए। अगले दिन जब वे वापस फ़ैज़ाबाद आए तो उन्होंने ऊपर लिखी हुई पूरी बातचीत को एक दुसरे को सुनाई.



देवरस उन पर बहुत बुरी तरह भड़क गए और डाँटते हुए सिंघल से बोले की अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए राजी कैसे हो गए तुम तो संघ के पुराने स्वयंसेवक रहे हो और तुम्हें पता है हमारा मकसद राम मंदिर का निर्माण नहीं बल्कि दिल्ली की साबित पर काबिज होने का है.

मुस्लिमों का समूह भी उपरोक्त फॉर्मूले के तहत निर्माण कार्य के लिए तैयार था पर संघ की राजनितिक महत्वाकांक्षाओं की वजह से ये मुद्दा आज भी विवादों की जड़ बना हुआ है.



मंदिर निर्माण के लिए स्थानीय ट्रस्ट के इस फ़ैसलाकुन हस्तक्षेप के सबसे बड़े समर्थक बने महंत अवैद्यनाथ जो इस ट्रस्ट के सदस्य तो नहीं थे लेकिन विश्व हिंदू परिषद के सबसे बड़े नेता थे। दरअसल, महंत परमंहस, नृत्यगोपाल दास, जस्टिस देवकीनंदन अग्रवाल, नारायणाचारी आदि विहिप नेता आरएसएस से अलग अवैद्यनाथ के गुट के थे.



अयोध्या - राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद का सच’ नामक पुस्तक का पिछले पृष्ठ 

स्रोत : अयोध्या - राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद का सच’ नामक पुस्तक

नोट : ये किताब को पढ़कर निकला हुआ भाव है और तथ्य है जो शब्दशः अनुवादित या उल्लेखित नहीं हो सकते.  


Monday, December 24, 2018

आज के समाज में अपने विचार रखना देशद्रोह से कम नहीं


बिपिन नंदलाल गिरि 

आज देश में एक ऐसा माहौल बना दिया गया है कि सत्ता और संघ के साथ आपके विचार टकराते हैं तो तुरंत आपको देशद्रोही, गद्दार, मूर्ख, फलाना, फलाना और न जानें क्या-क्या बता दिया जाता है. अभी चंद रोज पुरानी बात है देश के मशहूर फिल्मी कलाकार नसीरुद्दीन शाह ने देश के हकीकत और बेहद सवेदनशील हालत पर एक बात रखी कि "आज हमारे देश में ये हालात है कि एक गाय के जान की कीमत एक (सुबोध कुमार मृत) दरोगा के जान से ज्यादा है और अगर कल मेरे बच्चे को भीड़ घेर ले और वो उनसे पूछे कि तुम हिन्दू हो या मुसलमान तो मेरे बच्चे उस भीड़ को इस बात का क्या जबाव देंगे : नसीरुद्दीन शाह ".

नासिर जी के इस वक्तब्य के बाद देश में बवंडर आ गया मानों ऐसा प्रतीत होने लगा कि नासिर साहब ने देश में कोई बम फोड़ दिया हो और गोडसे से बड़ा हत्यारा हो. मीडिया में बहस का दौर शुरू हो गया और हर बार की भाँति विहिप, हिन्दू सेना, आरएसएस, बीजेपी के तरफ से उन्हें देशद्रोही साबित करने के लिए एक पूरी फ़ौज उतार दी जो जाहिलों की तरह उनके बारे में अनाप-शनाप बकना शुरू कर चुके थे और तो और कुछ लोग तरो पकिस्तान जाने के सलाह देने तक हीं सिमित थे और कुछ तो बाकायदा नासिर साहब की पकिस्तान की एयर टिकट भी बुक करवा दी थी. अब सवाल ये उठता है कि क्या देश में एक विचार रह सकता है मेरा मानना हैं नहीं तो उनके सोच में ये बात क्यों बैठ पा रही है या वो जान-बूझकर नासमझ बनने की नाकाम कोशिश कर रहें है नासिर साहब का मूल सवाल क्या था अभी कुछ हफ्ते पहले उत्तर-प्रदेश के बुलंदशहर में सुबोध सिंह नामक बहादुर दरोगा की भीड़ द्वारा हत्या कर दी गयी थी और इस घटना में सुमित नामक एक और युवक मारा गया था और मारा किसने था भीड़ ने और किस लिए मारा था गौकशी की बात को लेकर उग्र प्रदर्शन के बहाने तो देश के ताने-बाने पर सवाल तो उठेगा कि क्या एक गाय के लिए किसी इंसान का कत्ल किया जाना जायज हो सकता है. इसके बाद नासिर साहब के बात पर बवाल बढ़ने के बाद उनका एक और बयान आया कि मेरी कई पुश्तें इसी मुल्क में दफन हुई और आगे भी होंगी ये देश मेरा है और मैं अपने देश से प्यार करता हूँ, परन्तु मुझे अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए किसी के सामने चीखने की जरूरत नहीं है.  

इस दुःखद घटना के घटित होने के बाद सूबे के मुखिया माननीय योगी आदित्यनाथ जी ने कहा कि गौकशी करने वाले के जांच हम पहले करेंगे और इसी लाइन को राज्य के डीजीपी महोदय ने भी दोहराया था सवाल तो थी खड़े होने लगे थे जब राज्य के दो शीर्ष लोगों के मत घटना के कुछ घंटों के बाद जनता की बीच में आ जाये तो समाज और देश से प्रेम करने वालों को चिंता जरूर होनी चाहिए अगर समाज के लोगों को इन घटनाओं पर चिंता नहीं होगी तो वो देशहित में नहीं होगा ये तो सत्य है।  माना कि गाय हम हिन्दूओं की आस्था की प्रतीत है हम उनकी पूजा करते हैं उनको काटना किसी भी तरह से जायज नहीं है परन्तु उनके नाम पर किसी निर्दोष को मार देना ये कहा से जायज है हमारे गीता में, पुराण में, उपनिषद में ऐसे कृत्य को चांडाल का कृत्य कहा गया है ऐसे लोगों को दंड देने का कार्य संविधान का है न कि बीड की रूप में एकत्र हुई जनता की. देश में गाय के नाम पर पहलू खान, सुबोध सिंह जैसे न जाने कितनी हत्याएं हुई है और नतीजा सिफर रहा है तो नासिर साहब को पकिस्तान भेजने वालों तुम देश के भावों को आंसूं करके देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं कर रहे हों. किसी भी गलत कार्य को गलत साबित करने और उसे दंड देने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ न्यायालय को है उसके अलावा किसी को भी नहीं। 

Saturday, December 22, 2018

कंप्यूटर और मोबाइल के माध्यम से सरकार आप के घर में देगी दखल

20 दिसंबर 2018 को गृह मंत्रालय ने एक ऐसा आदेश पारित किया है जिससे लोगो की निजी जिंदगी में दखल की संभावना ज्यादा बढ़ गयी है या यूँ कहे कि जनता के हर पल का हिसाब अब सरकार की नजरों के सामने होगा और हम अब कुछ भी नहीं छुपा सकेंगे। गृह मंत्रालय ने 2009 के एक एक्ट और 150 साल पहले बने टेलीग्राफ एक्ट को आधार बनाकर इस बिल को मंजूरी दी है तो आपके मन में एक प्रश्न जरूर उठ रहा होगा कि जब ये सब पहले से हीं चलता आ रहा है तो अब हमारे निजी अधिकारों पर कैसे हमला हो सकता है तो उसके बारे में इस एक्ट में हुए बदलाव को जान लेना हमारे लिए बहुत अहम है वो ये है कि 2009 में देश के मात्र दो एजेंसियों रॉ और सीबीआई को किसी के कंप्यूटर और फ़ोन का डेटा खंगालने का हक था और ऐसा करने के लिए एक कानूनी रास्ता था, अदालत थी और सम्बंधित अदालत (जो कि गोपनीय थी) से सुरक्षा एजेंसियों को जांच करने के लिए आदेश लेना होता था पर अब क्या बदला है उसे जानते है. 20 तारीख को जो आदेश पारित हुआ है उसमे राष्ट्रिय सुरक्षा के नाम पर दिल्ली पुलिस कमिश्नर समेत देश की 10 शीर्ष सुरक्षा एजेंसियों को किसी का भी फ़ोन और कंप्यूटर खंगालने की सीधे तौर पर इजाजत दे दी गयी है और अब किसी के कंप्यूटर के डाटा को रीड करने और उसे डिकोड करने के लिए इन्हे किसी से कोई भी इजाजत लेने की कोई जरूरत नहीं रह गयी है.

मसलन गृह मंत्रालय के नवीनतम बदलाव से पहले कोर्ट से सम्बंधित एजेंसी इजाजत तो लेती हीं थी साथ हीं साथ कानून में ये बंधन होता था कि जांच के दौरान एकत्र किये हुए डाटा को सुरक्षा एजेंसियां 60 दिनों से ज्यादा संभाल कर नहीं रख सकती थी अर्थात उन्हें एकत्र की हुई जानकारियों को डीलीट करना होता था जो अब नहीं है. कुछ विद्वान अब ये सवाल उठा रहे है कि जब कांग्रेस ने इसी तरह दो एजेंसियों को जांच करने का अधिकार दिया तो कोई कुछ नहीं बोला तो अब क्यों बोल रहे है ये सवाल अनुचित है तो उसका जबाब भी मै तथ्यों के माध्यम से देने की कोशिश करूंगा जिस समय कांग्रेस ने इस  कानून में बदलाव किया था उस समय साइबर सुरक्षा के बारे में बहुत ज्यादा बात नहीं होती थी और दूसरी बात ये कि साल 2014 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार के ब्याख्या किया है और मानव के निजता में उससे जुडी तकनिकी और अन्य बातों को भी जोड़ा है और अपने आदेश में कहा है कि कोई सरकार या एजेंसी कैसे किसी की ब्यक्तिगत बातो को एड्रेस कर सकती है कैसे किसी के अत्यंत निजी बातों की निगरानी कर सकती है ऐसा सरकारें ऐसा करने लगे तो मानव और पशुओं में अंतर नहीं रहेगा.

आसान भाषा में कहें तो हम अपने कमरे में क्या कर रहें है किससे बात कर रहें है, कैसी बात कर रहें है, क्यों कर रहे है ये हमारी निजता के अधिकार के दायरे में आता है अगर सरकार इसी पर पहरा लगा दे तो हमारे इन अधिकारों का क्या फायदा फिर तो ये उसी तरह होगा की हम बाथरूम में जा रहे है और उसका दरवाजा खुला हुआ है जिससे कोई भी मेरे बाथरूम में तांक-झांक कर सके उसे किसी बात का डर हीं नहीं होगा, अब ये सवाल जरूर होगा कि जब आपके पास कुछ हहपने के लिए है हीं नही तो आपको किस बात का डर है तो ये बात मेरे लिए सही हो सकती है पर उन लोगों के लिए नहीं जो देश के निरीह लोगों की लड़ाई लड़ते हैं. क्योंकि ऐसा कानून बन जाने से चाहे कोई भी सरकार हो वो अच्छे लोगों को या सरकार की खिलाफत करने वालो को राष्ट्रिय सुरक्षा के नाम पर खतरा बताकर उनकी आवाजों को खामोश कर देंगी और वो निरीह इंसान इन्साफ की तलाश में या तो जिंदगी भी भटकता रहेगा या अपनी जान दे देगा.  

Friday, December 21, 2018

नेशनल हेराल्ड मामले में कांग्रेस को दिल्ली हाईकोर्ट से जोरदार झटका

कांग्रेस को तीन हिंदी भाषी राज्य को जीते अभी तीन सप्ताह भी नहीं बीते थे कि कांग्रेस पार्टी के लिए तमाम ऐसी खबरें आयी जो उसके जीत की ख़ुशी को काफूर करने के लिए काफी थी. राफेल मामले में देश के सर्वोच्च न्यायालय से फैसला सरकार के पक्ष में आया फिर इसी महीने की 16 तारीख से एक तरफ कांग्रेस के तीन नवनिर्वाचित नेता मुख्यमंत्री की शपथ लेने की अंतिम छण के करीब थे जभी 1984 की सिख विरोधी दंगे को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट का एक बहुत बड़ा फैसला आया जिसमें कांग्रेस पार्टी की और से दिल्ली से तीन बार के सांसद रह चुके सज्जन कुमार को आजीवन कारावास की सजा सुनाई ये सिलसिला यही तक नहीं रुका यहां से आगे बढ़ते हुए कांग्रेस के लिए नाक का सवाल बन चुका नेशनल हेराल्ड तक पहुंचा और एक तरह से कांग्रेस को आज दोपहर दिल्ली हाईकोर्ट से करारा झटका लगा और कांग्रेस की अपील को माननीय कोर्ट ने ख़ारिज करते हुए आईटीओ स्थित नेशनल हेराल्ड भवन (जो कि समाचार पत्र छपने के लिए किराये पर ली गयी थी) को दो हफ्ते के भीतर खली करने का आदेश पारित कर दिया.

नेशनल हेराल्ड है क्या-

यह अख़बार अंग्रेजी भाषा का एक महत्पूर्ण अखबार हुआ करता था इसका बहुत हीं गौरवपूर्ण इतिहास रहा है इस अखबार की स्थापना 9 सितम्बर 1938 में भारत के पहले प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री जवाहरलाल नेहरू जी के द्वारा किया था जो उस समय स्वंत्रता आंदोलन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लेख छपने के नाम से मशहूर था यह अखबार तीन प्रुमख भाषाओँ में प्रकाशित जाता था जिसका नाम अंग्रेजी में नेशनल हेराल्ड, उर्दू में कौमी आवाज तथा हिंदी में नवजीवन था. चर्चित होने की वजह से ब्रिटिश सरकार ने "भारत छोडो आंदोलन" के वक्त 1942 में कुछ सालों के लिए नेशनल हेराल्ड अखबार पर प्रतिबन्ध लगा दिया था जिसे कुछ सालों बाद हटा  लिया गया था. इस अखबार का आजादी से पहले जनमानस में खासा प्रभाव था क्योंकि इसी अखबार के माध्यम से देश के तमाम बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अपनी-अपनी भावनाओं को जन-जन तक पहुंचाते थे इसलिए इस अखबार को स्वतंत्रता सेनानियों का "माउथ पीस" तक कहा जाता था. फिर देश आजाद हुआ और जब तक पंडित नेहरू जी जिन्दा थे जब तक इस अखबार से समयानुसार पत्रों की छपाई और बटाई चलती रही और नेहरू जी के देहांत के बाद यह अखबार उचित देख-रेख के अभाव में धीरे-धीरे जनता से दूर होता गया ठीक वैसे हीं जैसे नेहरू की सोच को इस देश हटाने को आज कोशिश की जा रही है. धीरे-धीरे इस पत्रिका का बाजार में बिकना बंद होता गया और अंततः 2008 में इस अखबार नेशनल हेराल्ड पत्र को बंद करना पड़ा.
इसके बाद नेशनल हेराल्ड के प्रबंधन ने ए जे एल (Associated Journals Limited) नामक एक संस्था के साथ मिलकर इसे चालू करने की योजना पर फिर से काम करना शुरू किया और 1 जून 2017 को फिर से इसके मूल भाषा अंग्रेजी में छपाई का काम शुरू किया या कहें तो एक तरह से फिर से दोबारा नेशनल हेराल्ड को शुरू किया गया. छपाई होने से पहले ही यह अखबार राजनितिक झगड़ों में फंस गया जिस मामले में कांग्रेस के तत्कालीन राष्टीय अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी और कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष श्री राहुल गाँधी जमानत पर बाहर है. इस मुद्दे को अदालत में ले जाने वाले भाजपा के और देश के सबसे बड़बोले नेता डॉ सुब्रमण्डयम स्वामी जी है जो इस मामले में राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी को आरोपी मानते हैं........... 
अब अगली अपील अब सुप्रीम कोर्ट में होगी.        

       

Wednesday, December 19, 2018

समाज में विचारों की असहमति का नया नाम पाकिस्तान

आजादी के सत्तर साल बाद आज हमारे मुल्क में एक ऐसा विचार पैदा किया जा रहा है जिसकी बुनियाद ये है कि जो हमारे विचारों के साथ नहीं जुड़ेगा वो पाकिस्तानी होगा और उसे पकिस्तान चले जाना चाहिए और ऐसी भाषा का प्रदर्शन करने वाले एक ख़ास विचार से सम्बन्ध रखते है और उस पर अपना प्रभाव मनाते है. पकिस्तान भेजने वाले कोई छुटभय्ये नेता नहीं हैं बल्कि सत्ता पक्ष के बहुत बड़े-बड़े नेता है और मंत्री महोदय है. दो मंत्री जो बिहार से आते है गिरिराज सिंह और अश्विनी चौबे जी माने ये लोग तो हमेशा पकिस्तान भेजते रहते हैं बात-बात में पकिस्तान भेज देते हैं. इनका इतना पकिस्तान प्रेम देखकर  मन में कभी-कभी संदेह होने लगता है कि कहीं पकिस्तान में इन्होने टूर-ट्रेवल्स की कम्पनी तो नहीं खोल रखी है, ये तो नंबर बनाते हैं परन्तु इनके राष्ट्रिय अध्यक्ष तो इनसे भी आगे जाकर पकिस्तान का नाम जपते हैं.
एक तुच्छ वाकया 2015 के बिहार विधान सभा में देखने को मिला था जब बीजेपी के पुराने सहयोगी और नए-नए महागठबंधन में शामिल हए नितिश कुमार की पार्टी,कांग्रेस और राजद मिलकर चुनाव लड़ रहे थे और बीजेपी की तरफ से लोजपा, रालोसपा, और भाजपा चुनाव में थी तो बीजेपी के राष्ट्रिय अध्यक्ष जी ने मंच पर खड़े होकर हजारों की भीड़ में ऐलान किया था कि अगर महागठबंधन की जीत होगी तो पटाखे पाकिस्तान में फूटेंगे और बीजेपी ये चुनाव बहुत बुरी तरिके से हार गयी पर पटाखे पाकिस्तान में नहीं पटना में फूटे थे फिर वक्त का पहिया घुमा और नितीश जी फिर से बीजेपी की गोद में आ गिरे और चार घंटे के अंदर सरकार बना ली फिर जब अमित शाह से पत्रकार बंधुओं ने यही सवाल किया तो जबाब देते नहीं बना और बगले झाँकने लगे. इससे एक बात स्पष्ट होती है कि ज्यादा बोलने वाला (बड़बोला) कभी-कभी गटर में भी झाँकने को मजबूर हो जाता है.
हम इस स्तिथि को यही छोड़ते हुए थोड़ा सा पुरानी यादों में चलते है पिछली सरकार के मुखिया श्री मनमोहन सिंह जी अपने 10 साल के प्रधानमंत्री के कार्य काल में देश के सैनिकों के खातिर कभी भी पकिस्तान का रूख नहीं किया परन्तु सबको पकिस्तान भेजने वाली और अपने आप को फर्जी राष्ट्रवादी पार्टी बताने वाली भाजपा के मुखिया पाक के प्रधानमंत्री को अपने शपथ ग्रहण समारोह में दिल्ली बुला लेते हैं और हग तो तब हो गयी जब विदेशी दौरे से लौटते वक्त बिना किसी बुलावे के नवाज के नातिन की शादी में जाने के लिए पकिस्तान में कुछ घंटों के लिए रूक जाते हैं और पार्टी मना कर आते हैं तब यही जो लोगो को पकिस्तान भेजने वाली मंडली है मानो चूहे के बिल में छुप जाती है और इनकी आवाज ठीक उसी तरह नहीं निकलती जिस तरह बिल्ली को देखकर चूहा की.
तो असल बात ये है कि इस महान देश को ये जबरदस्ती सिखलाया जा रहा है कि आप किसी खास समुदाय के नहीं होंगे तो आपके साथ इसी तरह का अपमान जनक ब्यवहार किया जायेगा, आप किसी खास विचार,संगठन को नहीं मानोगे तो आपको भीड़ के द्वारा मार दिया जायेगा, आप की जान हमारे लिए अहमियत नहीं रखती गाय की रखती है, आप क्या खाओगे ये मैं तय करूंगा, आप क्या पहनोगे इसका भी निर्धारण मैं हीं करूंगा पर वे भूल जाते है हमारा देश सवा सौ करोड़ लोगों के भावनाओं से जुड़कर बनता हैं, हर सुबह-शाम किसी खिले हुए बाग़ की तरह खूशबू बिखेरता है जिसकी महक इतनी मदहोश करने वाली होती है कि हे जाति-धर्म के लोगों को एक सतह पर एक साथ लाकर खड़ी कर देती है और अनवरत सुगंध बिखेरती है और इस बगिया रुपी देश की सुगंध में हम भारतवासी एक दुसरे के सुख-दुःख के साथी बन जाते हैं और एक दूसरे से जुड़ें रहते हैं.

जय हिन्द।
जय भारत।।           

Tuesday, December 18, 2018

किसानों का दिन और कांग्रेस की सरकार

कांग्रेस के लिए सत्ता का सुख तो जरूर मिला परन्तु उसके  बाद उसे दो बड़े झटके भी लगे जिससे कांग्रेस को सत्ता मिलने की ख़ुशी थोड़ी काफूर हो गयी परन्तु एक बात तो बड़े दिल से कहना पड़ेगा कल चाहे कांग्रेस का दिन न भी रहा हो पर किसानों का दिन जरूर रहा ऐसा हम कह सकते हैं क्योंकि शपथ ग्रहण के कुछ घंटों के अंदर हीं छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्रियों ने 2 लाख तक के किसानों के कर्जमाफी  के फाइल पर दस्तखत करके उनको एक छोटा सा राहत जरूर दिया है जो निश्चित तौर पर अन्नदाताओं के नाम रहा काश ! देश के सरकारें पहले से हीं धरती पुत्रों का ख्याल रखती तो आज उनको इस तरह की रेवड़ियाँ बाटने की जरूरत नहीं होती और वो अब तक बहुत समृद्ध हो चुके होते।
नेताओं को किसानों की दुर्दशा को समझने के लिए वातानुकूलित कमरे से बाहर निकलकर खेत-खलिहानों में जाना चाहिए और धूप-बरसात में किसानों के पुरुषार्थ को देखकर आंकलन करना चाहिए कि क्यों धरती पुत्र आज बहुत बड़ी विभिषिका में जी रहा है चाहे राहुल गाँधी हो या नरेंद्र मोदी या और कोई जो भी अपने आप को नेता मानता है ये सबके लिए है. चुनावी भाषणों में किसान बनने से किसान का कभी भी कोई भला नहीं हुआ 4 दशक से किसान चुनावों में महज चुनावी किसान की हीं भूमिका में रहा है पर कांग्रेस पार्टी की एक बात को बिना किसी लग-लपेट के मानना चाहिए कि इसने देर से हीं सही चाहे राजनितिक मजबूरी हीं क्यों न कहें किसानों को अपने अजेंडे में सबसे ऊपर रखकर उनकी राजनीति करने की कोशिश कर रही है जिससे अचानक से किसान देश में सबसे चर्चित मुद्दा बन गया है.
केंद्र से कांग्रेस की विदाई के बाद और एक के बाद एक चुनाव हार कर कांग्रेस देश के मानचित्र पर बिलकुल नदारद होने के कगार पर थी तब कांग्रेस ने सबसे पहले पंजाब चुनाव में किसानों के मुद्दे पर राजनिति की शुरुआत की और किसान कर्जमाफी का वायदा किया और भी तमाम मुद्दे थे पंजाब के अंदर पर किसानो और नशे के मुद्दे काफी प्रखर रूप में उठाये गए थे और कांग्रेस को फायदा भी हुआ और कांग्रेस पंजाब में दो-तिहाई बहुमत लेकर सत्ता पर काबिज हुई और किसानो का मध्य प्रदेश की भाँति दो लाख तक कर्जमाफी का अपना चुनावी वायदा पूरा किया। इस चुनाव के बाद तो मानो कांग्रेस ये मान बैठी थी कि उसकी नैय्या को सिर्फ किसान हीं पार लगा सकते हैं और कोई नहीं तो इसी मुद्दे को कांग्रेस ने कर्नाटक में भी दोहराया जहां उसे अपनी सत्ता बचाने की चुनौती थी परन्तु बहुत तो नहीं पर आंशिक रूप से सफलता जरूर मिली। बीजेपी ज्यादा सीट जीतने के बाद भी सरकार बनाने में नाकाम रही और वहीं दूसरी तरफ कम सीट जीतने के बावजूद कांग्रेस जेडीएस के साथ मिलकर एक बार फिर सत्ता में आ गयी और किसानों का कर्जा माफ़ किया।
कर्नाटक चुनाव के बाद शायद कांग्रेस के रणनीतिकारों को शायद पक्का यकीन हो चला था कि अब हमारी जीत की गारण्टी और सत्ता की चाबी किसानों के ही हाथ में है फिर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधान सभा चुनावों में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने इसे बड़े मुखर ढंग से उठाया और सरकार को खूब घेरे में लेते रहे जिसका चुनावी फायदा और किसानों का वोट कांग्रेस की झोली में भरपूर गिरा और परिणामस्वरूप कांग्रेस इन तीनो राज्यों में सत्ता पर काबिज हुई जिसमें छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कांग्रेस विगत 15 सालों से सत्ता से दूर थी.
लोकसभा से पहले का ये चुनाव पूरी तरह किसान के नाम रहा ऐसा कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी !     

Monday, December 17, 2018

आज कांग्रेस के लिए ख़ुशी कम मायूसी ज्यादा हाथ लगी

आज दिल्ली हाई कोर्ट ने 1984 के सिख दंगों के आरोप सुनाते हुए कांग्रेस के पूर्व और बड़े नेता रहें सज्जन कुमार को आजीवन कारावास की सजा सुनाई और ये खबर ठीक उस वक्त आयी जब राजस्थान के मुख्यमंत्री पद और गोपनीयता की शपथ लेने के लिए लगभग तैयार थे उसी समय ये खबर ब्रेक हुई और माननीय न्यायालय ने सज्जन कुमार को पूर्व की सरकारों पर आरोप से बचने का आरोप भी लगाया. जैसे हीं ये खबर मीडिया में आयी तो कांग्रेसी मुख्यमंत्री के शपथ की चर्चा कम और सज्जन कुमार के चर्चे ज्यादा जोर पकड़ लिए और कांग्रेस का ये ख़ुशी का पल सज्जन कुमार के फैसले के आगे फीका पड़ गया.

2013 में इन्हीं आरोपों में निचली अदालत ने सज्जन कुमार को सभी आरोपों से मुक्त करते हुए बरी कर दिया था और तीन लोगों को सजा सुनाई थी पर अब माननीय हाई कोर्ट ने इन्हे भी आरोपियों के श्रेणी में सूचीबद्ध कर दिया है और 31 दिसम्बर तक अदालत में सरेंडर करने का वक्त भी मुकर्रर कर दिया है. सज्जन कुमार को ऊपरी अदालत में यानि सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का मौका है जो निश्चित तौर पर वो सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे। ये फैसला आते हीं राजनीति एक बार फिर उफान पर आ गयी है जो मंत्री कभी राफेल की कीमत पर मीडिया वार्ता करने की हिम्मत नहीं जूता पाते हैं वो आज कांग्रेस से जबाब मांग रहे थे और कांग्रेस एक्सपोज़ हो गयी कुछ ऐसा बयान दे रहे थे और मध्य-प्रदेश में मुख्यमंत्री की के पद और गोपनीयता की तैयारी में लगे कमलनाथ को भी घसीट लिया गया है.

कमलनाथ को आरोपी कहने वाले नेताओं के बारे में जब कांग्रेस के बड़े नेताओं ने मीडिया से कहा कि अगर कमलनाथ दोषी है तो मोदी भी दोषी है अब देखो सज्जन कुमार से शुरू होकर कमलनाथ फिर मोदी तक को ये मुद्दा छूने लगा तो अब आप समझ हीं गए होंगे राजनितिक पार्टियों के विवेक के बारे में वो कैसे बराबरी पर लेकर तौलती है. बहरहाल हम दो कदम और आगे जाकर समझने की कोशिश करते हैं और राजनीति में पड़ने वाले इसके प्रभाव के बारे में समझते है अभी फैसला आने के बाद तात्कालिक असर ये हुआ कि जो आम आदमी पार्टी के सांसद कमलनाथ के आज होने वाले शपथ ग्रहण समारोह में जाने वाले थे उनकी पार्टी ने रोक दिया और वो अभ भोपाल नहीं जा रहें है, ठीक इसी तरह अकाली दल और सत्ता पक्ष इस मुद्दे पर कड़ा रूख अख्तियार कर के बहुत हीं कटु और वाजिब सवाल उठा रहा है. बहरहाल आज सज्जन कुमार की वो हैसियत नहीं है कि वो कांग्रेस के किसी चुनावी नतीजे प्रभवित कर सकें सिवाय राजनितिक मुद्दे के और कुछ ज्यादा नहीं है इस फैसले में और न हीं राजनितिक तौर पर बहुत बड़ी परेशानी देखने को मिलेगी.
  

Saturday, December 15, 2018

राफेल पर झूठ के सहारे सरकार को SC से क्लीन चीट, राहुल का पलटवार

भाजपा को तीन राज्यों की सत्ता गवाने के बाद सुप्रीम कोर्ट से सत्ताधारी पार्टी के लिए इस चुनावी मौसम में राफेल से जुडी एक बहुत बड़ी राहत मिली है और राफेल के खरीद प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप सही बताते हुए मुख्य न्यायाधीश श्री रंजन गोगोई और दो सहयोगी जजों ने एक मत होकर राफेल जांच से जुडी सभी अर्जियों को ख़ारिज कर दिया और इससे विपक्ष को तगड़ा झटका लगा है और खासकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी जो राफेल के मुद्दे को लेकर सरकार पर हमलावर थे और अपनी हर छोटी-बड़ी सभाओं में मुद्दा बनाते हुए सरकार पर आक्रमण करते थे वो अब सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से कमजोर पड़ गया है और राहुल के आरोपों का धार कुंड पड़ जायेगा। कांग्रेस पार्टी को अब नए तरिके से अपनी रणनीतियों में बहुत बड़ा बदलाव करना पड़ेगा क्योकि जनता के बीच में अब कांग्रेस जब भी कोई आरोप लगाएगी तो सबसे पहले उसे शंका की नजर से देखा जायेगा क्योकि देश के आम लोगों की धरना ये है कि सुप्रीम कोर्ट अन्याय नहीं करता और देशवासी इसी विश्वास के साथ आँख बंद करके माननीय उच्चतम न्यायलय में अपनी पूरी आस्था रखता है. 

कांग्रेस को अब इस मुद्दे को धार देने के लिए किसी नए कागज की जरूरत होगी जो फिर से एक बार राफेल मुद्दे को हवा दे सके और विपक्ष के आरोपों को एक बार फिर से वजनदार बना सके और इस मुद्दे को लेकर आगे बढ़ चले. सुप्रीम कोर्ट के इस देश आदेश के बाद निश्चित तौर पर राहुल गाँधी और कांग्रेस को एक तरह से झटका लगा है. और ऐसा लगता है कि निश्चित तौर पर कोई नया तथ्य लेकर देश के सामने आएगी और नये आरोप लगाकर राफेल मुद्दे को और धार देगी.

जैसा कि उम्मीद थी कि कांग्रेस चुप नहीं बैठने वाली है और उम्मीद के मुताबिक वैसा हुआ भी और कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गाँधी ने पीएसी अध्यक्ष श्री मल्लिकार्जुन खड़गे जी को अपने साथ लेकर पत्रकार वार्ता किया और सरकार पर सुप्रीम कोर्ट में झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए सरकार पर एक बहुत बड़ा प्रहार किया है और सरकार अब कटघरे में खड़ी होती नजर आ रही है. राहुल का आत्मविश्वास देखकर एक बात तो साफ है कि वो इस मुद्दे को छोड़ने वाले नहीं है और दूर तक खींचने की कोशिश करेंगे और करें क्यों नहीं जब इसमें कुछ गड़बड़ दिख रहा है.

अब यहां सरकार के मंशा पर सवाल उठ रहे और उसी के साथ दो सवाल भी उठ रहा है पहला सवाल ये कि सरकार ने खुद को क्लीन चिट दिलवाने के लिए जानबूझकर झूठ बोला या किसी रणनिति के तहत झूठ बोलने की कोशिश की और दूसरा सवाल ये उठता है कि क्या सरकार सुप्रीम कोर्ट में फंसती हुई नजर पा रही थी तो अपने आप को राफेल में पाक-साफ बच निकलने के लिए किसी षड्यंत्र के तहत झूठ बोलने का दुस्साहस किया। बहरहाल हम पहले सवाल की तरफ वापस लौटते हैं और इस बात पर विचार करते हैं कि सरकार ने माननीय कोर्ट को ये क्यों बताया कि सभी विवरण को CAG के सामने रख दिया गया था और वहां से जाँच-पड़ताल के बाद CAG की रिपोर्ट PAC के सामने भी प्रस्तुत कर दी गयी थी जो कि हकीकत में दोनों जगह वो रिपोर्ट नहीं है तो क्या हम कहें कि सरकार अपने आप को पाक-साफ दिखने की जल्दबाजी में बुरी तरह फंसती जा रहा है और संसदीय परम्पराओं की गरिमा को भी गिराने का काम कर रही है अगर ऐसा है तो देश के लिए ये शुभ संकेत नहीं हो सकता है इस बात को यहीं रोकते हुए दुसरे सवाल का रूख करते हैं कि राफेल में कुछ तो गड़बड़ है वर्ना राहुल, सोनिया, राजीव, इंदिरा, नेहरू जी को अपशब्द बोलते हुए उन पर आक्रमण करने वाले मोदी जी राफेल के बारे में एक शब्द क्यों नहीं बोलते इससे एक बात तो स्थापित होती है कि दाल में कुछ काला है जिसे हड़बड़ी में छिपाया जा रहा है राहुल गाँधी और कांग्रेस का ये आरोप यदि सत्य है कि 560 करोड़ का जहाज 1560 करोड़ में खरीदा जा रहा है तो इसमें दम है और इस आरोप को झूठलाया नहीं जा सकता है इसका पता कैग की रिपोर्ट और संसदीय कमेटी की जांच में सामने आ सकता है.

जो बीजेपी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बिल्कुल मुखर हो चली थी उसे शाम तक राहुल गाँधी ने खड़गे जी के साथ मिलकर थोड़ा मायूस जरूर कर दिया है अब तो सरकार के मंत्री पीयूष गोयल जी भी मन रहे है कि कैग की कोई रिपोर्ट नहीं आयी है और सुप्रीम कोर्ट से कहेंगे कि वो अपने फैसले में सुधार करें.

Friday, December 14, 2018

राजस्थान में कांग्रेस के लिए एक अनार दो बीमार वाली स्तिथि

तीनो हिंदी भाषी राज्यों के विजेता दल की घोषणा हुए आज तीन दिन बीत चुके है परन्तु कांग्रेस के लिए यह बहुत हीं बड़ा सिरदर्द सब्त हो रहा है तीन दिनों के बाद भी कांग्रेस इन राज्यों में उनके मुखिया का चेहरा दे सकने में अब तक काबिल नहीं हो पायी है. देर-सबेर कल अर्धरात्रि में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का नाम कमलनाथ के रूप में घोषित किया गया और वो भी बहुत कड़ी मशक्कत के बाद हीं ऐसा हो पाया क्योंकि वहां सिंधिया घराने के वारिस ने कमलनाथ के सामने अपनी तगड़ी दावेदारी की पेश की छत्तीसगढ़ में मामला अपेक्षाकृत शांत रहा.

लेकिन सबसे बड़ी परेशानी कांग्रेस के लिए राजस्थान के नेतृत्व को लेकर रार ठनी हुई है एक तरफ दिग्गज और अनुभवी दो बार के राजस्थान के रह चुके अशोक गहलोत है तो दूसरी तरफ युवा और साढ़े चार साल तक राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सचिन पायलट है जिन्हें लेकर युवाओं के बीच एक अलग तरह का उत्साह और समर्थन देखने को मिल रहा है. इन्हीं दोनों के नाम को लेकर कांग्रेस का आलाकमान किसी पेंडुलम की भाँति कभी इधर कभी उधर झूल रहा है और अंदरखाने तो बात ये भी तैर रही है कि सचिन पायलट अपनी दावेदारी को लेकर अड़ गए है और अशोक गहलोत के लिए कोई जगह नहीं छोड़ना चाहते है और हो भी क्यों न बंदे ने साढ़े चार साल तक राजस्थन के एक-एक खाक छानी है गांव से लेकर शहर तक मृत पड़े संगठन को जीवित करने के लिए बहुत परिश्रम और तपस्या की है जरूरत पड़ने पर लाठियां भी खाई है, तो अब जब परिणाम उनकी मेहनत के अनूकूल आया है तो मलाई किसी और को कैसे खाने देंगे।

अब सबकी नजरें दस जनपथ और कांग्रेस के दिल्ली स्थित हेड क़्वार्टर पर आकर रूक चुकी है कि यहां आलाकमान से क्या फरमान जारी किया जाता है और जो भी फैसला होगा उसे सबको मानना पड़ेगा और एक पक्ष अपना मन मसोस कर रह जायेगा क्योंकि अभी इनके सामने कोई और रास्ता नहीं होगा और ये पार्टी से बगावत कर सकें ऐसी स्तिथि में भी नहीं है क्योंकि जो जनादेश है वो आंशिक रूप से हीं सही अल्पमत में है किसी के भी समर्थक थोक के भाव में जीत कर विधान सभा में नहीं पहुंचे है जिससे ये लोग वाकिफ है.

जहां तक मैं समझता हूँ कि मायूसी सचिन पायलट के हाथ लगेगी क्योंकि इस बार राजस्थान कांग्रेस में सी पी जोशी जैसे बहुत वरिष्ठ नेता चुनाव जीत कर आए हैं जो अपने से कनिष्ठ सचिन पायलट के साथ कार्य करने में कतराएंगे और यही बातें सचन के खिलाफ जा सकती है परन्तु कांग्रेस को उनकी महत्वाकांक्षाओं का ख्याल रखना चाहिए और युवाओं के इस आवाज सचिन पायलट को किसी भी तरिके से संतुष्ट करते हुए फैसला करना चाहिए जिससे २०१९ के आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को ज्यादा से ज्यादा फायदा मिल सके.