Saturday, December 29, 2018

संजय बारू की किताब "द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर" पर बनी फिल्म पर बवाल


बिपिन नंदलाल गिरि 

संजय बारू जो की यूपीए की सरकार के वक्त प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह जी के मिडिया विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे थे तो उन्होंने नौकरी खत्म होने के बाद " एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर" नाम  किताब लिखी थी जो बाजार में 2014 के लोकसभा चुनाव से ठगीक पहले बाजार में आम लोगों के लिए उपलब्ध हुई थी. उस किताब में उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी पर बहुत से संगीन आरोप लगाए थे कि किस तरह से सोनिया गाँधी मनमोहन सिंह के सरकारी काम में बाधा डालती थी, उन पर अपनी मर्जी से काम करने का दबाव डालती थी इस तरह के कई आरोप थे. तो उस किताब पर अब एक फिल्म बनी है और इस फिल्म के मुख्य कलाकारों के नाम और उनके कार्य के अनुसार विवरण प्रस्तुत कर रहा हूँ-

अनुपम खेर- इस फिम में अनुपम खेर मुख्य भूमिका में है इन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का किरदार निभाया है, इनकी धर्म पत्नी महोदया भारतीय जनता पार्टी से पंजाब प्रान्त की वर्तमान लोकसभा सांसद है और अनुपम खेर भाजपा के समर्थक हैं तो ये फिल्म कितनी निष्पक्ष होगी आप दर्शक और श्रोताओं के विवेक के ऊपर मैं छोड़ना चाहता हूँ.

अशोक पंडित- ये इस फिल्म के निर्देशक है और ये अपनों आप को काश्मिरी पंडित कहते है जो कभी कश्मीरियों को देखने तक नहीं जाते और 1990 में हुए कश्मीरी पंडितों के विस्थापन के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार मानते हैं और भाजपा के पिठ्ठू (चमचा) है.

गुट्टे- इस फिल्म का निर्माता है जो ३२ करोड़ की जीएसटी की चोरी करने के  के आरोप में हाल में ही जेल भी जा चुका है तो आप इस बात से भी इनके हैसियत का अंदाजा लगाना कोई कठिन  होना चाहिए।

अपनी किताब में संजय बारू ने लिखा है-पीएमओ में तैनात रहे मेरे पूर्ववर्ती लोगों ने अपने कार्यकाल के दौरान की यादों को कभी किताब की शक्ल देने की कोशिश नहीं की. यहां तक कि कई प्रतिष्ठित पत्रकारों ने भी यह पहल नहीं की. मसलन, कुलदीप नैयर, बीजी वर्गीज, प्रेम शंकर झा, एचके दुआ जैसे नामी पत्रकार कई प्रधानमंत्रियों के साथ काम कर चुके थे. प्रेस सचिव ही नहीं मातहत अफसरों ने भी ऐसी कोई किताब नहीं लिखी, जिससे उनके बॉस के व्यक्तित्व और राजनीति की झलक मिले. जबकि भारत की तुलना में अमेरिका और ब्रिटेन नें कई प्रेस सचिवों ने वहां के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्री के कार्यकाल के बारे में स्वतंत्र रूप से किताबें लिखीं हैं. (Copy)

अब हम फिर से घूम के आते हैं संजय बरुआ की तरफ इस फिल्म में या कह लें तो किताब में संजय बरूआ बताते हुए पाए जा रहें है कि वो इस्तीफा देने जा रहे थे और सोनिया गाँधी राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री बनाना चाहती थी फिर मनमोहन के मुंह से इस्तीफे की बात सुनकर वो कहती हैं कि इस्तीफा देने का ये सही समय नहीं है सरकार पर अभी भ्र्ष्टाचार के आरोप लग रहें है और ऐसे में राहुल  को प्रधानमंत्री कैसे बना सकते है. इस तरह के कुछ विवादस्पद बातें फिल्म के ट्रेलर में देखने को मिल रही है जो सरासर गलत है इस मामले में देश के एक वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई ने "24 Akbar Road: A Short History Of The People Behind The Fall And Rise Of The Congress" किताब में उल्लेख किया है आप अपने आप को समझने के लिए इस किताब को पढ़ें और सही गलत का फैसला करें।
बहरहाल मैं फिर से संजय बरूआ की तरफ मैं फिर से अपना रुख करता हूँ और तर्कों के माध्यम से मई उसे झूठा साबित करता हूँ कि संजय बरूआ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के एक मात्र कर्मचारी थे इससे ज्यादा की उनकी हैसियत नहीं थी और वो सोनिया गाँधी के बेटे तो थे नहीं जो सोनिया गाँधी उनके सामने सारी बात करती थी और तो मनमोहन सिंह जी के पास वो हर वक्त रहते थे उनकी औकात एक सरकारी नौकर की थी और वो वही थी. जब मनमोहन सिंह जी वित्त सचिव थे तब संजय बरूआ के पिता मनमोहन के जी के साथ काम करते थे और इसी आधार पर उन्हें मनमोहन सिंह ने मीडिया एडवाइज़र के पद पर नियुक्त किया था
2013 में लालू प्रसाद को अदालत से सजा होने के बाद तत्कालीन मनमोहन सरकार ने नेताओं को जेल जाने से बचाने और चुनाव लड़ने के पक्ष में एक अध्यादेश ले कर आये थे और उसे राहुल गाँधी ने प्रेस के सामने ये कहते हुए फाड़ दिया था कि ये समाज में गंदगी फैलाएगा और मैं भी गाँधी के इस बात से सहमत था, जब राहुल गाँधी द्वारा ये आर्डिनेंस फाड़ा गया उस समय मै स्नातक की पढ़ाई पूरी करके दिल्ली में हीं जॉब कर रहा था और यह घटना शाम के समय एक पत्रकार वार्ता में हुई थी इसलिए मुझे यह अक्षरशः याद है. यह घटना जब हुई उस समय मनमोहन जी विदेश दौरे पर थे तो इसका भी जिक्र इस फिल्म में मनमोहन जी को अपमानित करने के तरिके से दिखाया है और  इस फिल्म को बनाने का एकमात्र उद्देश्य कांग्रेस पार्टी को नीचा देखने का है और पूर्व प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह के ब्यक्तित्व के माध्यम से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को बदनाम करने की चेष्टा भर है. 
अगर संजय बारू इतने विश्वसनीय थे तो 2008 के बाद मनमोहन सिंह ने उन्हें अपने साथ क्यों नहीं रखा और 2014 में हीं इनकी किताब बाजार में क्यों आयी पहले भी सकती थी और फिल्म 2019 जनवरी में क्यों रही है पहले भी सकती थी. इसमें तथ्य कुछ भी नहीं है क्योंकि मनमोहन सिंह जी ने इन सभी आरोपों को सिरे से नकार दिया था. इस फिल्म में सिवाय राजनीति के और कुछ नहीं है क्यों कि भारतीय जनता ने ट्विटर पर अपने आधिकारिक अकाउंट से ट्वीट किया है तो अब आप अपने विवेक का प्रयोग करे और सत्य-असत्य की पहचान करें।



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