Tuesday, June 8, 2021

महंगाई अब हमारी नियत बन चुकी है

बदलते भक्तिमय दौर के साथ-2 हमारी इच्छाएं भी बदलती जा रहीं है. हमने एक वो दौर भी देखा था जब पेट्रोल और डीजल पर 1 रूपये की कीमत बढ़ोत्तरी पर तत्कालीन विपक्ष धरने पर बैठ जाता था और आज प्रीतिदिन की बढ़ोत्तरी के बाद भी हमारी नींदें नहीं टूट पा रही है. जब विपक्ष कहता था कि उस वक्त की तत्कालीन सरकार ने देश के सारे पैसे विदेश भेज दिए हैं, कांग्रेस के मंत्रियों द्वारा अथाह भ्रष्टाचार किया जा रहा है. तब भी डीजल और पेट्रोल की कीमतें मात्र 76 रूपये तक पहुँच पाई थी. जबकि आज अथाह श्रद्धा भाव से 18-18 घंटे काम करने के बाद भी पेट्रोल 100 तक पहुंच गया है. फिर भी हम भारतीय इसे अब अपने ब्यवहार में ढाल चुके हैं और चुप रहना बेहतर बोलने की अपेक्षा बेहतर समझने लगे हैं.
इसी अपेक्षा को देखते-देखते सरसो के तेल की कीमत सत्तर सालों में पहली बार 220 रूपये प्रति लीटर से ऊपर पहुंच कर रिकार्ड कायम कर चुका है. हम देशवासियों की चुप्पी का हीं नतीजा है कि इतनी कमरतोड़ महंगाई के बावजूद हम शांत हैं. अपना मुंह खोलने को तैयार नहीं हैं. मैंने भी अपने अल्प बोध के दौरान महंगाई के ऊपर सत्ता को जाते देखा है. अटल जी की सरकार को कौन भूल सकता है ? जहां प्याज की बढ़ी हुई कीमतों ने सत्ता परिवर्तन कर दिया था. लेकिन यहां एक बात गौर करने वाली है कि उस दौर की जनता अपने मुद्दों को लेकर जीवंत थी और ऐसा प्रतीत होता है कि आज की जनता मरणासन्न स्थिति में पहुँच चुकी है. जिसे महंगाई, बेरोजगारी, अशिक्षा, सामाजिक असुरक्षा से कोई वास्ता नहीं है. 
समाज में बहुत सी समस्याएं मुंह बाये खड़ी है, जिन्हें हम जानते भी हैं पहचानते भी हैं. लेकिन ये सोच कर मुंह मोड़ लेते हैं कि इससे हमारा क्या ? यही प्रवृत्ति सरकार को घमण्डी बनने पर मजबूर हुई. तेल, डीजल-पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के साथ-साथ खाद्य पदार्थों की कीमतें भी आसमान की तरफ मुंह उठाये अग्रसर है. सरकार से कोई एकाक आदमी सवाल करती है तो सरकार उसका जबाब बड़े घमंड से देती है कि महंगाई रोकना हमारे हाथ में नहीं हैं. शायद महंगाई अब हमारी नियत बन चुकी है. क्योंकि उन्हें पता है कि अब सत्ता बरकरार रखने के लिए मंहंगाई को थामने की जरूरत नहीं है, बल्कि हिन्दू-मुसलमान वाली राजनीति को साधने की जरूरत है. खैर जो भी हो चुप रहकर हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहें हैं.

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