Sunday, May 9, 2021

चिताओं और आंसुओं के बीच में चुनाव का जश्न मनाती भाजपा

बंगाल में बीजेपी/संघ चुनाव हार चुकी है. लेकिन उसे मानने को अब भी तैयार नहीं हैं. इस महामारी के दौर में ये चुनाव याद किया जाएगा. जब पूरा देश कोरोना से जूझ रहा था उस समय देश के प्रधानमंत्री, डेढ़ दर्जन से ज्यादा केंद्रीय मंत्री और पांच-पांच मख्यमंत्री प्रचार में लगे हुए थे. क्यों, बस ममता बनर्जी को हराकर बंगाल जितने के लिए ? इन सबके बीच सरकार ने ये तक नहीं सोचा कि इस चुनाव को कुछ दिनों तक टाल कर कोरोना नियंत्रण के ऊपर ध्यान देना था.  जब प्रधानमंत्री लाखों की भीड़ को ये कहते हैं कि "ऐसा भीड़ तो मैंने अपने पूरे जीवन में नहीं देखा". तो इस सन्देश का असर बहुत दूर तक जाता है. जनता भी लापरवाह हो गयी और चुनाव परिणाम के बाद देखा गया कि कलकत्ता के हालात बहुत खराब हो चुका था. जिसे नियंत्रित करने के लिए नवगठित ममता बनर्जी की सरकार को एक बार में हीं दो हफ्ते का लाकडाउन लगाने का निर्णय लेना पड़ा.

अगर कठोर शब्दों में मैं सरकार के इस कृत्य का आंकलन करूँ तो यही कहूंगा कि चिताओं और आंसुओं के बीच भाजपा/संघ चुनाव का जश्न मना रही थी. भाजपा को ऐसा करने से पहले ठहर कर कुछ वक्त तक सोचना चाहिए था. या जिस तरह लेफ्ट के लोगों ने 22 अप्रैल से अपना चुनाव प्रचार रोक कर वर्चुअल रैली करने शुरू कर दी. उसकी यह चिंता उसके राज्य के लोगों के प्रति जबाबदेह बनाती है. बेशक लेफ्ट और कांग्रेस के गठबंधन को एक भी सीट बंगाल विधान सभा में नहीं दी फिर भी इनके चुनाव रद्द करने की योजना को भुलाया नहीं जा सकता. लेफ्ट के बाद कांग्रेस के राहुल गाँधी ने भी बंगाल में होने वाली अपनी सारी रैलियों को ना कह दिया था. इन सबके बाद भी बीजेपी/संघ भीड़ जुटाने में मशगूल रही. 

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