जैसा कि नए साल में पहला चुनाव दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश में सम्पन्न हुआ. जहां नेताओं ने खासकर भाजपा/संघ समर्पित लोगों ने जहरीले भाषणों की बौछार कर दी. यह चुनाव दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के बेटे और सांसद प्रवेश वर्मा और हिमांचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर के विवादित बयानों और चुनाव आयोग द्वारा चुनाव प्रचार करने के लिए प्रतिबंधित किये जाने के लिए भी जाना जाएगा. इस चुनाव में केंद्र की सत्ता धारी पार्टी बीजेपी ने शाहीन बाद में नागरिकता संशोधन के खिलाफ चल रहे धरने को लेकर एक ख़ास समुदाय को हर वक्त टारगेट करती रही. वहीं दूसरी तरफ केजरीवाल अपनी स्वास्थ्य, शिक्षा, मुफ्त बिजली के नारों के सहारे जनता से अपने पक्ष में वोट करने की अपील करते रहे. चुनाव के पूर्व या बाद हुए सर्वेक्षणों से एक बात तो साफ़ हो गयी है कि आने वाली सरकार केजरीवाल के नेतृत्व में हीं बनेगी. दिल्ली के प्रबुद्ध नागरिकों ने बीजेपी/संघ के बहकावे में न आकर अपनी मुख्य जरूरतों को ध्यान में रखकर वोट किया है.
जिस दिन से 'एक्जिट पोल' आये हैं उस दिन से मैं सोशल मीडिया पर देख रहा हूँ कि कुछ मूर्ख हिन्दुओं को गाली दे रहें हैं. और बीजेपी को सपोर्ट न करने वाले हिन्दू को गाली दे रहें हैं और लालची बता रहें हैं. इन बेवकूफों को लगता है कि ये हिन्दूओं के ठेकेदार हैं. अरे भाई तुम भी हिन्दू मैं भी हिन्दू हूँ. हिन्दू होने के लिए संघ/भाजपा को वोट देना कब से अनिवार्य हो गया है ? ऐसे जहर बोने वाले खुद तो अंदर से लौकी की तरह खोखले होते हैं और दूसरों का भी अपनी तरह से आंकलन करते हैं. केजरीवाल का काम दिल्ली की जनता को पसंद आया. लोग उसमें रुचि दिखा रहें हैं. तो इसमें हिन्दू, लालची, आतंकावादी होने का क्या मतलब है ? वैसे इतने जहर घोलने के बाद भी बीजेपी हार रही है ये तो तय है. दिल्ली एक बार फिर केजरी मय होने को तैयार है.
जब दिल्ली के देशभक्त पार्टी के सांसद केजरीवाल को आतंकवादी कह रहे थे. तो ये पागल क्यों नहीं कह रहें थे कि केजरीवाल हिन्दू है और हिन्दू आतंकवादी कभी नहीं हो सकता. क्या इसके मायने ये न निकाला जाय कि जो संघ/बीजेपी के खिलाफ जाएगा उनके ऊपर इसी तरह का अवांछनीय आरोप लगाने की कोशिश करती है. केजरीवाल अगर आतंकवादी था तो केंद्र की सरकार उसे जेल में क्यों नहीं डाली. यह उतना हीं हास्यास्पद बयान हैं जितना कि सावरकार को वीर और स्वतंत्रता सेनानी कहना. केजरीवाल किसी राज्य के चुने हुए मुख्यमंत्री हैं. उनके खिलाफ इस तरह के कपटपूर्ण और गंदी राजनीति देश के लिए कभी सार्थक नहीं हो सकती। इस तरह का कृत्य हमेशा देश के दुश्मन करते हैं, देशभक्त नहीं.
आज की रात राजनितिक गुंडों के लिए कयामत की रात की होगी. क्योंकि जनता अपने सरोकार के साथ खड़ी होगी या गाली देने वालों के साथ खड़ी होगी इसका कल जबाब मिल जाएगा. मतलब कल दिल्ली चुनाव का नतीजा सबकी आंखों के सामने होगा. इस चुनाव का इन्तजार ठीक उसी तरह का है जैसे 'आपातकाल' के बाद इंदिरा जी के चुआवी परिणाम को जानने के लिए जनता आधी रात तक इन्तजार करती रही. और अंततः परिणाम ये आया था की इंदिरा जी चुनाव हार गयी. आज हम उस दौर से इस दौर की तुलना क्यों कर रहें हैं तो उसका कारण ये है कि आज की राजनीति में महज एक चुनाव जितने के लिए एक निर्वाचित मुख्यमंत्री को खुलेआम 'आतंकवादी' केंद्र सरकार के मंत्री कहते हैं. यह सब हमारे लोकतंत्र के लिए किसी काले धब्बे की तरह होगा. आज की रात बहसियों के लिए न काटने वाली होगी. कल लोकतंत्र के जीत का दिन है.
2019 के दौर को याद किया जाय तो कौन जानता था कि राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार जाएंगे ? किसे पता था कि महाराज माधवराव सिंधिया के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया चुनाव हार जाएंगे ? क्या किसी को अंदाजा था कि अजीत सिंह अपने बेटे समेत चुनाव हार जाएंगे ? लेकिन ये हुआ. यही हमारा लोकतंत्र है. हमारा लोकतंत्र अगर किसी को सिर माथे पर बिठाता है तो उसे जमीं में भी दबाने की क्षमता रखता है. तो कल दिल्ली से भी कुछ ऐसा हो सकता है जो किसी के लिए झटका तो किसी के लिए खुशी लेकर आ सकता है.
आज की रात राजनितिक गुंडों के लिए कयामत की रात की होगी. क्योंकि जनता अपने सरोकार के साथ खड़ी होगी या गाली देने वालों के साथ खड़ी होगी इसका कल जबाब मिल जाएगा. मतलब कल दिल्ली चुनाव का नतीजा सबकी आंखों के सामने होगा. इस चुनाव का इन्तजार ठीक उसी तरह का है जैसे 'आपातकाल' के बाद इंदिरा जी के चुआवी परिणाम को जानने के लिए जनता आधी रात तक इन्तजार करती रही. और अंततः परिणाम ये आया था की इंदिरा जी चुनाव हार गयी. आज हम उस दौर से इस दौर की तुलना क्यों कर रहें हैं तो उसका कारण ये है कि आज की राजनीति में महज एक चुनाव जितने के लिए एक निर्वाचित मुख्यमंत्री को खुलेआम 'आतंकवादी' केंद्र सरकार के मंत्री कहते हैं. यह सब हमारे लोकतंत्र के लिए किसी काले धब्बे की तरह होगा. आज की रात बहसियों के लिए न काटने वाली होगी. कल लोकतंत्र के जीत का दिन है.
2019 के दौर को याद किया जाय तो कौन जानता था कि राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार जाएंगे ? किसे पता था कि महाराज माधवराव सिंधिया के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया चुनाव हार जाएंगे ? क्या किसी को अंदाजा था कि अजीत सिंह अपने बेटे समेत चुनाव हार जाएंगे ? लेकिन ये हुआ. यही हमारा लोकतंत्र है. हमारा लोकतंत्र अगर किसी को सिर माथे पर बिठाता है तो उसे जमीं में भी दबाने की क्षमता रखता है. तो कल दिल्ली से भी कुछ ऐसा हो सकता है जो किसी के लिए झटका तो किसी के लिए खुशी लेकर आ सकता है.
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